Roads - 31 in Hindi Motivational Stories by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 31

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राहें - 31

अन्त्तव्यथा

मोना ने अपनी बचपन की सहेली सोनाली को फोन पर पूछा---
तेरे घर ऊपर वाले कमरे खाली हैं क्या?
सोनाली ने कहा- हॉ खाली तो है, तू क्यों पूछ रही है?
मोना बोली - वे दोनों कमरे कुछ दिनों के लिये मुझे दे दे।
सोनाली ने पूछा - क्यों!
मोना ने बताया - पापा जी (ससुर जी) की तबियत ठीक नहीं
हैं, वह करोना पॉजीटिव आ गये हैं, अस्पतालों में जगह नहीं हैं। तू दोनों 
कमरें मुझे दे दे, हम लोग पापा को वहीं रख देगें, हमारा सरकारी
क्वाटर छोटा है, और डाक्टर लोग पापा को अलग कमरें में रखने को
बोल रहें हैं।
सोनाली को कुछ बोलते नहीं बना। करोना के मरीज को अपने
घर में रखे या मना कर दे। उसने धीरे से पूछा -यहाँ रहेंगें तो
उनकी देखभाल कौन करेगा?
मोना ने कहा - वहाँ दो कमरें हैं , एक में पापा रह जायेंगे दूसरे
कमरें में गौरव (उसका पति) वहा रहकर पापा की देखभाल करते
रहेंगें।
सोनाली अनमने मन से बोली- देख लेते हैं जैसी व्यवस्था बने
बनाले, मैं कमरें खाली करवा देतीं हूँ।
सोनाली को पति से सलाह करने का अवसर ही नहीं मिला-
वह पूरा सामान हटा भी नही पायी थी कि मोना अपने ससुर किशोर
जी को लेकर सोनाली के घर पहुँच गई। सोनाली के घर में
किरायेदार को रखनें के लायक दो कमरें, रसोई, बाथरूम सब
व्यवस्था ऊपर में थी । मोना पति गौरव और ससूर को लेकर सोनाली के घर आ गई, वो पति और ससुर की व्यवस्था वहाँ
बनाकर अपने घर भिलाई आ गई। घर में सासू जी की तबियत भी
ठीक नहीं थी, मोना ने घर में सबके लिये खाना बनाया और सबके सोने की
व्यवस्था की।
शाम को सोनाली के पति मयंक जी घर आये तो उन्होनें
सोनाली से पूछा- ऊपर में कौन है?
सोनाली बोली -मोना के ससूर किशोर अकंल को करोना हो
गया है, उनको अलग रहने के लिये डॉक्टर ने कहा है परन्तु मोना के घर में कमरे की कमी के कारण
मोना के कहने पर मैने उनको ऊपर वाले कमरे दे दिये हैं।
मयंक ने आश्चर्य व गुस्से
 से सोनाली को घूरते हुये कहा--
करोना मरीज को घर में क्यों रखी? क्या जरूरत थी उन्हें रखने की?
सफाई देते हुये सोनाली बोली- उनके आने जाने का रास्ता
अलग है, वे लोग बाहर से आयेंगें जायेंगें, मोना ने कहा, तो मैं मना
नहीं कर पाई, क्या करती? परेशानी में अपनों का साथ ना दो तो वो
भी नही बनता।
मयंक ने फिर कहा- अपने परिवार का भी तो ख्याल रखना
होता है। दूसरों के चक्कर में हम भी ना फंस जाये। पूछना तो था।
अपने घर भी छोटी बच्ची है। उसका तो ख्याल रखना चाहिए था, उनके घर में छोटी नातिन है, 
सोनाली ने कहा- पूछने का समय ही नहीं मिला। मोना ने
मुझसे पूछा- ऊपर रूम खाली है ? तो मैने सीधे ही बोल दिया "हॉ
खाली है" और वह अकंल को लेकर आ गई। अस्पतालों में कहीं
जगह नहीं हैं सब भरे हैं इसलिये वह उन्हें यहाँ ले आई और मैं मना
नही कर पाई।
सदैव दूसरों को सहयोग देने वाले मयंक करोना मरीज को
अपने घर रखने में हड़बड़ा रहे थे क्योंकि उन्हें अपनी छोटी पोती के
कारण डर था, परन्तु पत्नी के कारण वे चुप रहे। और मन में कुढ़ते
रहे।
चार दिन बाद किशोर अकंल की तबियत ज्यादा बिगड़ी और वे
चल बसे। सोनाली, मोना व घर के सभी सदस्य स्तंभित रह गये।
करोना पीडित व्यक्ति के शव को उठाने के लिये कोई तैयार
नहीं था। अस्पताल में खबर की- उनसे निवेदन किया कि किशोर
जी की मृत्यु हो गयी है। उनको उठाने की व्यवस्था की जाये तो
अस्पताल प्रबंधन अपने ही अस्पताल के मरीजों के कारण परेशान थे,
सभी स्टाफ कहीं ना कहीं व्यस्त थे। कोई रिश्तेदार करोना पीड़ित
शव को उठाने के लिये आ नहीं रहें थे।और कोई मित्र संबन्धी भी आते जाते नहीं थे, 
मयंक साहब ने ही नगर निगम के अपने परिचित अधिकारी से
कहकर गाड़ी व कर्मचारी बुलवाये। निगम के कर्मचारी अपनी सुरक्षित
ड्रेस में गाड़ी लेकर आये और किशोर अकंल के शव को श्मशान 
लेकर गये । गौरव ने दूर से ही दाह संस्कार की औपचारिकता
निभाई, उसके पास सहारा देने के लिये कोई नही था, पिता की मृत्यु
पर वह बहुत असहाय और अकेला हो गया, रोने के लिये किसी के 
कंधे का सहारा नहीं मिला। अनेकों मित्रों, सम्बन्धियों के होते हुये
आज कोई भी उसके साथ नहीं था, ना अर्थी को कंधा देने कोई मिला और ना
रोते समय उसे कोई सहारा देने वाला था। बड़ी मुश्किल से एक
पंडित जी को वह कहीं से व्यवस्था कर ले आया था उन्हीं के मंत्रों
की ध्वनि पर वह यंत्रवत पिता का क्रियाकर्म कर रहा था। भीषण
मानसिक यंत्रणा से गौरव गुजर रहा था। गौरव ने किसी तरह क्रिया
कर्म व पिता का दाह संस्कार किया बिल्कुल अकेला गौरव और
शमशान में जलती चिता, वह वहाँ ज्यादा देर रूक नहीं पाया, उसे घबराहट होने लगी , अकेले बैठे वो रोता रहा, कोई भी उसके साथ नहीं था, दुखी मन से वो अपने घर आ
गया।
श्राद्धकर्म के लिये आवश्यक सामाग्री, पिंडदान, दसवां, तेरहवीं-
पंडितों को भोजन, शैयादान, वस्त्रदान हिन्दू परम्परानुसार बहुत
विधान होता है। गौरव समझ नहीं पा रहा था कि वह किस तरह और
केसे सब काम करें। बाजार भी बंद थे, सामान भी उपलब्ध नहीं थे।
मंहगे दामों में चोरी छिपे सामान खरीदना था। सहायता को कोई अपना था ही नहीं वो बहुत बेबस और लाचार महसूस कर रहा था. 
सूखी भोजन सामग्री, वस्त्र व दक्षिणा पंडितों के घर भिजवायी।
इतनी ही परेशानी तो नहीं थी मन का टूटा गौरव तन से भी थकता जा रहा था, 
एक तो पिता का साया उठ गया, पिता अभी तक घर
की व्यवस्था सम्हालते थे। उसे पता ही नहीं चला कि कब वह बड़ी
बच्ची का पिता बन गया है। मम्मी भी पिछले दिनों से बीमार चल रही
थी। उन्हें तो उसने बताया भी नहीं था कि पापा नहीं रहे और वे 
सोनाली के घर पर रह रहे थे, वह अभी तक पापा के अस्पताल में भर्ती
होने की बात मम्मी से कहता आ रहा था।
पिता की मृत्यु का समाचार कब तक छिपाता, जैसे ही माँ को
पिता की मृत्यु का समाचार मिला , वे रोकर बेहोश हो गई और अब
उन्हें सम्हालना और भी कठिन था। गौरव स्वयं भी घबरा गया था रात रात भर उसे नींद नहीं आती थी, घंटों मन में कुछ न कुछ सोचता रहता और रोता रहता था, वो अपने को असहाय समझने लगा था , घंटों चुपचाप बैठा रहता था ,कोई था भी नहीं जो वो अपना दुख कह ले तो थोड़ा हल्का हो जाय , वो मन ही मन घुटता रहता था. 
परन्तु फिर भी किसी तरह उसने अपने आपको सम्हाला,ऐसे समय में मोना उसको
बहुत सहारा देती, सास को भी सम्हालती, स्त्रियों में दुख सहने की
अदभूत शक्ति ईश्वर ने दी है, उसी के सहारे वह सब काम जैसे बने
वैसे पूरे हो पाये।परन्तु इस भयानक बीमारी के कारण उस समय लोगों को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों को झेलना पड़ा. इनके दीर्घ कालीन परिणाम बड़े दुख दायी हुए. 

छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
Email-shiromanimathur@gmail.com 
मोबाइल no- 9893742299