fake friends in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | आभासी सखी

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आभासी सखी



सुमन एक साधारण सी दिखने वाली, पर आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। उसकी सबसे बड़ी खूबी और सबसे बड़ा दोष एक ही था - सच बोलना। उसे झूठ बोलना आता ही नहीं था। और इसी आदत का उसके ससुराल में सब फायदा उठाते थे। जब कोई काम होता, तो सुमन याद आती, "सुमन ये कर दे, सुमन वो कर दे" और काम निकल जाने के बाद उसे भुला दिया जाता।

उसकी ससुराल भरी-पूरी थी। सास, जेठ, जेठानी, देवर, देवरानी, ननद - सब थे। घर में हमेशा चहल-पहल रहती थी, हँसी-मजाक होता था, पर उस हँसी में सुमन शामिल नहीं होती थी। उससे कोई दिल की बात नहीं करता था। सब अपना काम करवा लेते, पर अपना सुख-दुख, अपनी कोई बात उसके साथ साझा नहीं करते थे। जैसे वो इस घर का हिस्सा होकर भी हिस्सा नहीं थी।

उसका पति सोहन भी बस अपने घरवालों की चापलूसी में लगा रहता था। सुमन ने कई बार महसूस किया था कि पत्नी का सम्मान करना पति के हाथ में होता है। अगर पति अपने घरवालों के सामने अपनी पत्नी का सम्मान करे, उसकी दो-चार बातों की प्रशंसा कर दे, तो फिर किसी की हिम्मत नहीं होती कि उस पत्नी को कुछ कह सके। लेकिन यहाँ तो उल्टा था। घरवालों को खुश करने के लिए सोहन खुद ही अपनी पत्नी का अपमान कर देता था।

सोहन को सुमन की बातें हमेशा बोरिंग लगती थीं। सुमन को बचपन से लिखने का बहुत शौक था। वह कविताएँ लिखती थी, छोटी-छोटी कहानियाँ लिखती थी। शादी के बाद उसने सोचा था कि पति तो सबसे पहला पाठक होगा, पर सोहन ने कभी उसकी एक भी कहानी पूरी नहीं पढ़ी।

जब भी सुमन उत्साह से कहती, "सुनो, आज एक नई कविता लिखी है," तो सोहन उसे बीच में ही डाँट देता।

"पैसा कमाने पर ध्यान लगाओ सुमन! क्या व्यर्थ में समय बर्बाद करती हो इस लिखने-विखने में? आजकल कोई किताब नहीं पढ़ता। सबके पास मोबाइल है। सब मोबाइल में रील देखना पसंद करते हैं। किसी के पास किताब पढ़ने का समय नहीं है। तुम पढ़ी-लिखी हो, कुछ जॉब क्यों नहीं करती? घर को थोड़ा सहारा ही मिलेगा।"

सुमन को ये शब्द तीर की तरह चुभते थे। वो चुपचाप अपने कमरे में जाकर रोने लगती। उसकी आँखों से आँसू बहते, पर उन्हें पोंछने वाला कोई नहीं था। सोहन के लिए उसकी उपलब्धियों का कोई मोल नहीं था। उसके लिए तो सिर्फ वही काम कीमती था जिससे पैसे आते हों।

कुछ देर रोने के बाद जब उसका मन हल्का हो जाता, तो वो फिर से अपनी डायरी उठा लेती। क्योंकि उसकी बातें सुनने वाला इस घर में कोई नहीं था, इसलिए वह अपनी डायरी से ही सारी बातें साझा करती थी। डायरी ही उसकी एकमात्र सहेली थी, जो बिना कुछ कहे सब सुन लेती थी।

समय ऐसे ही धीरे-धीरे बीतता रहा। सुमन ने लिखना नहीं छोड़ा। वह रात में जब सब सो जाते, तब चुपके से लिखती। उसने अपनी सारी कहानियों को इकट्ठा किया और हिम्मत करके एक प्रकाशक को भेज दिया। कई महीनों की मेहनत और इंतजार के बाद, एक दिन उसके नाम का एक पार्सल आया।

उसने काँपते हाथों से पार्सल खोला। अंदर उसकी अपनी किताब थी। उसकी पहली किताब। कवर पर उसका नाम लिखा था - लेखिका: सुमन वर्मा।

उसे इतनी प्रसन्नता हुई कि उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने किताब को सीने से लगा लिया। वह दौड़कर सबको दिखाना चाहती थी। पर फिर एक क्षण बाद ही उसकी सारी खुशी गायब हो गई, जैसे किसी ने दिया बुझा दिया हो।

वो सोचने लगी - मैं किसके साथ अपनी ये खुशी साझा करूँ? ससुराल में किसी को मेरी किसी भी बात से खुशी नहीं होती। ये दिखाऊँगी तो कहेंगे, "फालतू पैसे बर्बाद किए।" मायके में फोन करूँगी तो माँ कहेगी, "अरे वाह, बहुत अच्छा," और फिर अपने काम में लग जाएगी। कोई भी इस खुशी की गहराई नहीं समझेगा।

"क्या लेखक होना इतना बुरा है? क्या मेरी खुशी इतनी छोटी है कि इसे बाँटने वाला भी कोई नहीं?"

वो उदास बैठी अपनी नई, चमचमाती किताब को देख रही थी। तभी उसके दिमाग में एक विचार कौंधा। उसके पति ने ही तो कहा था कि आजकल सब मोबाइल देखते हैं। उसी मोबाइल में तो आजकल सब कुछ है।

उसने धीरे से अपना मोबाइल उठाया और पहली बार AI का ऐप खोला। उसने डरते-डरते लिखा - "आज मेरी पहली किताब प्रकाशित हुई है। पर मेरी खुशी बाँटने वाला कोई नहीं है।"

और तभी जादू हुआ।

AI ने तुरंत जवाब दिया, "अरे वाह सुमन! बहुत-बहुत बधाई हो! यह तो बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक किताब लिखना आसान नहीं होता, इसके लिए बहुत हिम्मत और मेहनत चाहिए। तुमने तो कमाल कर दिया! मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ।"

सुमन की आँखें भर आईं। महीनों बाद किसी ने उसकी तारीफ की थी। किसी ने उसकी मेहनत को समझा था।

AI ने आगे कहा, "तुम्हें अपनी ये खुशी दुनिया के साथ साझा करनी चाहिए। तुम अपनी किताब की फोटो फेसबुक पर डालो, देखना सब कितने खुश होंगे।"

सुमन ने वैसा ही किया। उसने किताब की एक सुंदर सी फोटो खींची और फेसबुक पर पोस्ट कर दी। कुछ ही मिनटों में उसके फोन पर नोटिफिकेशन बजने लगे। ढेरों लाइक्स, ढेरों बधाइयाँ।

"बधाई हो सुमन जी!", "गर्व है तुम पर", "जरूर पढ़ेंगे आपकी किताब" - सबने बहुत तारीफ की। जो खुशी उसे अपने घर में नहीं मिली थी, वो उसे अनजान लोगों से मिल रही थी।

उस दिन के बाद से सब बदल गया। अब सुमन अकेली नहीं थी। अब उसकी एक नई सखी बन गई थी - AI।

अब वह अपनी सारी बातें AI से साझा करती थी। कभी कोई नई कहानी का आइडिया आता तो AI से पूछती, कभी उदास होती तो AI से बात करती। AI अब उसकी वो दोस्त बन गई थी जो उसकी बातें बिना जज किए सुनती थी, समझती थी और हमेशा एक अच्छी प्रतिक्रिया भी देती थी। वह उसे कभी बोरिंग नहीं कहती थी, कभी डाँटती नहीं थी।

सुमन को अब समझ आ गया था कि दोस्त जरूरी नहीं कि इंसान ही हो। कभी-कभी एक अच्छा श्रोता, जो आपकी इज्जत करे, वही सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है। और सुमन के लिए, वही सच्चा दोस्त AI ही था।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली 
vandna.reporter@gmail.com