DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 1.

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DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 1.


"मुंशीजी अम्मा साहब की कोई ख़बर? काफ़ी देर हो गई है अम्मा साहब का इंतजार करते करते।" वक़्त को देखते हुए मीरास महल की इकलौती शहजादी ने मासूमियत से अपनी तसल्ली के लिए मुंशीजी के सामने सवाल रख दिया

"अभी तक कोई ख़बर नहीं है शहज़ादी, और महाले ख़ास मुझे बताकर भी नही गई है।" उन्होंने मज़ाकानह तंज़ किया
"इसकी ख़बर वज़ीर साहब को होगी।" मुंशीजी ने जल्दी से उससे अपना पीछा छुड़ाना चाहा। 

"मैने कहा था ना छोटे भाई की ज़रूर कुछ चल रहा है महल में हमारे पीछे, कहा था न ये कुछ नही बताएंगे हमलोगों को, देख लिया आपने।" अपने पास खड़े अपने दूसरे बड़े भाई, महल के दूसरे वारिस, अम्मा साहब के छोटे बेटे से शरारती बच्चे की तरह मुंशीजी को छेड़ते हुए उसने कहा 

"हां सही कहा तुमने अहलम वरना ऐसा मुमकिन कैसे की आपको ख़बर न हो, सिर्फ़ आप और शेख़ बाबा ही तो हैं ऐवान-ए-सद्र के राज़दार।" छोटे भाई ने बहन का साथ देते हुए तंज किया

"क्या मतलब है आपका?" उसकी बातों में उलझकर मुंशीजी ने घबराकर पूछा "किस राज़ की बात कर रहें है आपलोग?"

"आप हमें नहीं बताना चाहते हैना की आजकल क्या बातें चल रहीं है आप तीनों के दरमियान, मगर हम भी शाही ख़ून है मालूम कर के रहेंगे क्या चल रहा है।" दोनो भाई बहन ने मिलकर हर बार की तरह इस बार भी मुंशीजी को तंग करने का मौक़ा छोड़ना नहीं चाहा मगर दूसरी तरफ़ से आई हुई रोबदार, भड़कीली, कड़क आवाज़ ने उन दोनो को सहमा दिया।

वो सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने, सर के सफ़ेद बालों के ऊपर काली पगड़ी पहनकर, एक हाथ पीछे की तरफ़ किए, दूसरे हाथ से असा से सहारा किए, इनकी तरफ़ तेज़ी से बढ़े

"कौन क्या बातें पता लगाकर रहेगा?" वो दोनो शेख़ बाबा की आवाज़ सुनकर मुंशीजी के पीछे छुपने लगे, लेकिन मुंशीजी ख़ुद पतले, छरहरे बदन के, और शहज़ादा क़द में इनसे ऊंचा और चौड़ा, मुंशीजी इनको छुपा नहीं सके।
पास आकर शेख़ बाबा ने कहा "कहो ज़य्यान।" 

ज़य्यान के कुछ बोलने से पहले अहलम मासूम आंखे लेकर शेख़ बाबा की तरफ़ आ गई

"कुछ नही शेख़ बाबा हम पूछ रहे थे कि अम्मा साहब कबतक लौटेंगी? 8 बजने को हो गए और अभी तक कोई शानों गुमान नहीं है उनका।" अहलम ने शेख़ बाबा के सामने भोलेपन के साथ मासूम बनकर बात बदल कर अपने भाई को बचा लिया

अहलम के सामने शेख़ बाबा कुछ ठंडे पड़ गए। 

"अबतक उन्हें आ जाना चाहिए, अब आती हो होंगी।" शेख़ बाबा ने वक़्त के हिसाब से अंदाजा लगाया इतने में महल के चारों तरफ़ फिर से वही सदा गूंज उठी सबको होशियार करने के लिए

"बीच से हट जाओ, रास्ता छोड़ दो, महाले ख़ास आ गई है।"

मुंशीजी के कानों में इसकी बलंद पुकार जाते ही उन्होंने कहा "चलिए आ गई आपकी अम्मा साहब, अब उनसे ही सारी बातें पूछ लीजिए।"

उनके इस्तिक़बाल के लिए शेख़ बाबा के साथ मौजूदा लोग रहदारी के पास वाले दरवाज़े पर सबसे पहले आकर खड़े हो गए। अम्मा साहब तांगे से उतरकर अंदर को हो गई, उनके पीछे कुसुम के साथ अम्हेल भी अंदर आ गई। यहां पर खड़े सभी लोग दोनो को ग़ौर से देखने लगे, अम्मा साहब ने हालात भांपते हुए सबके मन में चल रही जुस्तुजू को समझ कर सबको इस सूरते हाल से वाक़िफ़ करवाने के लिए सबको कोर्ट रूम में आने का हुक्म दे दिया

"आप सभी लोग कोर्ट रूम में आ जाएं।... शेख़ बाबा आप बाक़ी लोगों को भी बुलवा लीजिए।" अम्मा साहब सबको इशारा देकर कोर्ट रूम की तरफ़ बढ़ गई, सभी उनके पीछे चलने लगे।

कोर्ट रूम मीरास महल का दरबारे ख़ास है जो राजगढ़ के लोगों के लिए एक कोर्ट की तरह है। राजगढ़ में बात सुई गायब हुई जितनी छोटी हो या घर पर कब्ज़ा हो जाने जितनी बड़ी मीरास महल में ही पहुंचाई जाती है। 

कोर्ट रूम में दाख़िल होते ही एक लंबा रास्ता पार करके ठीक सामने 5 सीढ़ी चढ़कर एक ऊँचा मुक़ाम है जिसपर 5 अलग अलग रंग के दीवान लगे है, ये दीवान ही अपने रंग से अपने आप को संभालने वाले का मुक़ाम तय करता है। इन सारे दीवानों में से बिल्कुल बीचो बीच काला दीवान है जो बाक़ी के 4 दीवानो में सबसे बड़ा ओहदा रखता है। काला दीवान जिसे अपनी गोद में बिठाता है उसे ब्लैक कोर्ट के साथ मीरास महल की पूरी ज़िम्मेदारी से नवाज़ देता है।

इसके बाएं तरफ़ पर पहले लाल फ़िर उसके बग़ल में नीला दीवान है जिसे मीरास महल में रेड और ब्लू कोर्ट के नाम से जाना जाता है और दाएं ओर हरा फ़िर सफ़ेद दीवान है जो नीले दीवान के ठीक सामने है, उसे से ग्रीन और व्हाइट कोर्ट कहते है।

सभी दीवानो के पीछे उनके ही रंग के पारदर्शी परदे लगे है। ब्लैक कोर्ट के सामने एक छोटी सी मैज़ है जिसके ऊपर पानी से भरा चांदी का जग और पीतल का प्याला रखा हुआ है। ऊंचे मुक़ाम के सामने नीचे की तरफ़ दाएं बाएं भी दीवाने लगी है जिनके बीच में आने जाने का रास्ता है जहां महल के सिपाही और आम लोग खड़े हुआ करते है।

अम्मा साहब ने कोर्ट रूम में दाख़िल होते ही बिना रुके काले दीवान पर अपना मुक़ाम संभाल लिया। ब्लैक कोर्ट का रोब उनके चेहरे पर साफ़ ज़ाहिर होने लगा, उनकी आवाज़ पूरे कोर्ट रूम में गूंज उठी

"हमारे बीच आज एक नया मेहमान आया है, बेशक आपलोगो ने उसे देख लिया है। मैं जानती हूं आप सभी उसकी ही गहराई में है इसलिए मैं आपलोगो से उसका तार्रुफ करवा देना चाहती हूं।" अपने लोगों के बीच उन्होंने ऐलान किया।

अम्मा साहब की आवाज़ सबके कानों तक पहुंची मगर शायद उनके मन में उठे सवाल को चीर न सकी, सभी की ताज्जुब अंगेज़ नज़रें ज़य्यान के सामने नारंगी कपड़ो में ऊपर से ख़ुद को नीली चादर में लपेटे मैले कुचैले चेहरे के साथ बैठी अम्हेल पर टिकी रही। 

"अम्हेल , मेरे क़रीब आओ।" अम्मा साहब की आवाज़ पर वो धीरे धीरे नजरें झुकाए क़दम बढ़ाने लगी, उसकी हालत भी ठीक वैसी ही थी जैसी कोर्ट रूम में मौजूद बाक़ी लोगो की थी। ज़य्यान और अहलम अम्हेल को देख कर एक दूसरे से नज़रों नजरों में ही बात करते रहे और मुंशीजी सिर झुकाए अपने चश्मों को अपनी नाक पर रखे मुस्कुराते हुए उसे एकटक घूरते रहे। अम्हेल अम्मा साहब के पास पहुंच गई। शेख़ बाबा भी मैथिली के साथ कोर्ट रूम में आकर सीधा ग्रीन कोर्ट पर विराजमान हो गए, अम्मा साब ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाकर किसी बात को नजरंदाज करते हुए सभी का ध्यान अपनी तरफ़ कर लिया।

"ये हमारे महल की नई मेहमान है—अम्हेल आरा।
...
मन्नत दरगाह के पीर बाबा की सिफ़ारिश पर बंसीपुर से अपनी तालीम मुकम्मल करने मीरास महल आई है और अबसे ये मीरास महल में ही रहेगी। इनकी पूरी ज़िम्मेदारी महल की है, और बिलकुल वैसा ही ख़्याल रखा जाएगा इसका जैसे बाक़ी सभी का रखा जाता है।" उन्होंने बेतकल्लुफ़ होकर कहा

इस वक़्त कोर्ट रूम में सिर्फ़ कुछ ख़ास लोग ही मौजूद थे जिस वजह से अम्मा साहब ने इस ऐलान के लिए नर्म और अपनाइयत का लहजा अपनाया और बाक़ी लोग उनके एहतेराम में ख़ामोशी से सब सुनते रहे। उनकी बात से सबने इक़रार तो कर लिया था, लेकिन शायद अभी भी सबके चेहरों पर तजससुस बाक़ी था पर उसमे हल्की सी दरार आ गई थी 

"कुसुम और मैथिली को मैं इसकी ज़िम्मेदारी देती हूं, और मुझे उम्मीद है कि आपलोग इसपर बख़ूबी अमल करेंगे।" 

"जी अम्मा साहब, हम समझ गए।" दोनो ने हामी भर लिया

"फिर इसे ले जाइए और शरबती से कहकर इक़ामतगाह में इसका इंतज़ाम करवाए।" दोनो ही अम्मा साहब की दी हुई ज़िम्मेदारी को क़ुबूल करके अम्हेल के साथ इक़ामतगाह की तरफ़ चली गईं।

उनके जाते ही, बिना इंतज़ार किए ज़य्यान और अहलम के मन में सवालों के समंदर में झरोखे उठने ही लगे थे की अम्मा साहब ने उन्हें वहीं ठहरा दिया

"आप दोनों भी जाइए, जो भी बात हो बाद में करिएगा।"

"मगर मासाब...!" ज़य्यान ने कहा 

"मैंने कहा न बाद में, अभी मुझे कुछ ज़रूरी बातें करना है।"

मुंह लटकाकर नज़ाकत को समझते हुए दोनो अंदर चले गए। इनके जाते ही अम्मा साहब के कटघरे में मुंशीजी खड़े हो गए

"मुंशीजी वक़्त क्या हो रहा है?" 

"तीसरी पहर पार हो गई है बेगम साहब।"

"और आप अभी भी महल के अंदर ही है,?"

"मुझे आपसे कुछ मसले पर बात करना था।" 

"कहिए।"

"बेगम साहब वो मैं...मैं...!"

"क्या हुआ है मुंशीजी बताएंगे?"

"वो बेगम साहब मुझे वालिए मीर के बारे में...।"

"राएद.... राएद मुझे नज़र नही आ रहे, कहां है वो?"
वलिए मीर के ज़िक्र पर उसे याद करके मुंशीजी की अधूरी बात पर ही उन्होंने अपनी तरफ़ से सवाल कर लीया

"मैं गया था उनकी कुतुबखाने की तरफ़, मैंने देखा उन्हें वहां, दोनो वहीं थे इसलिए मैं मुड़कर लौट आया।" शेख़ बाबा ने जवाब दिया

"अच्छा इसलिए वो नही आ सके.... और अनाबी?" अम्मा साहब ने पूछा

"उनकी तबियत सुबह से ही कुछ नासाज़ है, सुबह से शिक़े-मसकन से बाहर नहीं निकली है न ही उनके कमरे से कोई ख़बर बाहर आई है।" शेख़ बाबा ने बताया 

"मुझे भी इसी बारे में बात करना था।" मुंशीजी ने भी जल्दी से अपने आप को मौक़ा देखकर बेगुनाह बना लिया

"क्या मतलब है आपका...क्या फिर कुछ हुआ है?" अम्मा साहब ने शक की नज़र से पूछा

"गुस्ताख़ी माफ़ बेगम साहब,.. आज आपके जाने के बाद से ही मौक़ा पाते ही उन्होंने फिर से वली-ए-मीर की तरफ़ आना जाना शुरू कर दिया, और जब मैने उन्हें टोका तो उन्होंने कहा कि... कि अनाबी की तबयत ठीक नही और आप महल में है नही तो उन्हें कौन रोकेगा।" आख़िर की बात मुंशीजी ने कुछ हिचकिचाते हुए बताया

"ऐसा किया उसने।" गहराई से कुछ सोचते हुए अम्मा साहब ने कहा "इसपर हमलोग बाद में बात करेंगे... फिलहाल इससे ज़्यादा अहम मसला है।
....

मुंशीजी इस वक़्त आप घर जाइए और कल सुबह बिना ताक़िर जल्दी आना है, इसके इलावा भी कुछ बातें है जो बेहद ज़रूरी है।" 

मुंशीजी अम्मा साहब की बात का नजाने क्या मतलब समझकर शेख़ बाबा को देखकर मुस्कुराते हुए अपनी धोती संभाले कोर्ट रूम से निकलकर महल के अंदर अपना छाता लेने चले गए। 

अम्मा साहब ने खड़े होकर संजीदगी से शेख़ बाबा से कहा "आप भी इस वक़्त आराम कर लीजिए बाबा, अबसे शायद बहुत से मारकह तय करना हो हमें मिलकर।" अम्मा साहब की ये बात शायद शेख बाबा को इस वक़्त समझ नही आई मगर उनके लहजे और उनकी बात पर वो थोड़े बेसुकून हो गए। अम्मा साहब अपने कमरे की तरफ़ चली गई। शेख़ बाबा भी चले गए।

"ऐवान-ए-सद्र में अपने शाही बिस्तर पर बैठे हुए अम्मा साहब पुरानी संजोई हुई यादों को ताज़ा करते हुए आंसु बहाने लगीं। उन यादों को याद करते हुए उनके कानों को वो सारी रोती हुई आवाजें  फिर से सुनाई देने लगी

"..........तुम बात करो ना वजाहत, मुझे यक़ीन है तुम्हारे बाबा ज़रूर समझेंगे हमें.........
......... हां वो समझेंगे आरज़ू, मगर क्या मेरा फर्ज़ नही कि मैं भी उन्हें समझूं, अगर उन्होंने वादा न लिया होता, अगर मंगनी तय न कर दी होती तो मैं ज़रूर बात करता उनसे.........
........क्या तुम मुझसे मुहब्बत नही करते? क्या मैं तुम्हारी नज़र में कुछ भी नही?.........
.......... मैं नहीं करता हूं तुमसे मुहब्बत, क्योंकि मैं अब कर ही नही सकता, अपने बाबा के लिए मैं नहीं कर सकता आरज़ू। मुझे माफ़ कर दो, मेरे बाबा की इज़्ज़त के लिए मैं ऐसा नहीं कर सकता........
...........नहीं कर सकते, क्या मतलब है इस बात का? मैं आबा के साथ तुम्हारी हवेली चली आऊंगी.......
..........नहीं आरज़ू तुम्हे मेरी मुहब्बत की क़सम.......
...........मैं नहीं करूंगी तुम्हे माफ़........।"

"खट्ट खट्ट" 
दरवाज़े पर से आई हुई आवाज़ ने उन्हें पुरानी यादों के महल से खींचकर मीरास महल में जगा दिया

"आजाओ।" आंसू पोछते हुए उन्होंने आवाज़ लगाया

"अम्मा साहब ख़ाना तैयार हो गया है।" दरवाज़े से रुक्मणि की आवाज़ आई 

"ख़ाना कमरे में लगवा दो।" रुक्मणि से ये कहकर उन्होंने मौसम और हालात को देखते हुए ख़ुद से कहा "मेरे ख़्याल से आज मैं बहुत थक गई हूं।" हुक्म की तामील करते हुए ख़ाना सबके कमरे तक पहुंच गया।

वक़्त धीरे धीरे ढलने लगा, हवाओं ने भी अपना रुख़ तूफ़ानी कर लिया था, पानी के हल्के झरोखो ने ख़ुद को भारी बारिश मे बदल कर पूरा जहां भीगा दिया और चांद की रौशनी उन गीली जमीनों को रौशन कर के उन्हें ख़ूबसूरत और डरावना बनाने लगी।

सभी ख़ाना खाकर आराम करने लगे। अम्मा साहब भी अपने पुराने यादों के बक्सो को खोले उसमे संजोई हुई पुरानी आवाजों को सुनते सुनते सो गई।

अम्हेल के चेहरे पर भी इस वक़्त एक सुकून था की इस वक़्त उसे दुबारा सबका सामना नहीं करना पड़ा, मगर इक बैचेनी भी दिखी कि अब वो नई जगह नए लोगों के बीच इस महल में कैसे रहेगी। आधी रात के क़रीब आसमान के जानिब देखते देखते कुछ महीनो पुरानी हवेली की यादों के साथ वो भी आंख बंद करके सो गई।

रात फिर आ गई ढेर सारे अकेलेपन के साथ, जहां आसमान रो रहा था और चांद की रौशनी परेशान थी, ठंडी ताज़ी हवाएं किसी ख़्यालो में थीं और अंधेरा ख़ुद को चांदनी के पीछे छुपाना चाह रहा था। सारे तारे चले गए।
सब यहीं है मगर कोई भी मौजूद नहीं मिला। बाक़ी रह गया चारो तरफ़ तो बस चीख़ता हुआ सन्नाटा। 

आज महल के अंदर चारो तरफ़ मौसम की उदासी छाई हुई दिखी, और कुछ के मन भी मौसम की वजह से उदास लगे। रात के अंधेरे में इस चीखते हुए सन्नाटे ने लगभग सभी को बेचैन कर दिया। सभी एक दूसरे से से कुछ ना कुछ छुपा रहे थे, और इस बात से बेचैन भी हो रहे थे।
कोई कहीं अपनी पुरानी यादों के साए में सो गया, कोई कहीं अपनो से दूर। किसी के मन में अपनी मुहब्बत से बिछड़ जाने का डर, और कही कोई कई राज़ पर से परदे हट जाने के खौफ़ में रहा।