बाँसुरी की धुन
भाग — 11
सिनाराम और उनके साथी वहाँ से जा चुके थे। पीछे रह गए थे कुछ ऐसे प्रश्न, जिनका उत्तर वर्षों से लोगों के मन में करवटें ले रहा था।
रावण हेम्ब्रम और लालदा ने इतने सरल शब्दों में जीवन, धर्म, संस्कार और मनुष्य के कर्तव्य को समझाया था कि वहाँ उपस्थित लोगों की वर्षों पुरानी धर्म-जिज्ञासा जैसे कुछ देर के लिए शांत हो गई थी।
उन्होंने किसी पर कोई मत थोपने का प्रयास नहीं किया था।
बस इतना कहा था—
धर्म केवल किसी तस्वीर के सामने दीप जलाना नहीं है।
धर्म उस सत्य को अपने चरित्र में उतारना है, जिसे हम अपने मुख से स्वीकार करते हैं।
रावण दा ने कहा था—
“मनुष्य यदि अपने भीतर के अंधकार को पहचान ले और अपने आचरण को सत्य, सेवा, संयम और सदाचार की ओर मोड़ दे, तभी धर्म उसके जीवन में उतरता है। केवल पूजा करने से मनुष्य धार्मिक नहीं होता। पूजा से मिले संस्कार जब उसके व्यवहार में दिखाई देने लगें, तब समझना चाहिए कि धर्म ने उसके भीतर जन्म लिया है।”
रामलाल मुरमू चुपचाप सुनते रहे थे।
उनके साथ उनकी पत्नी सलमा हेम्ब्रम, बेटी माही मुरमू और परिवार के दो छोटे बच्चे भी बैठे थे।
रावण दा के शब्द जैसे उनके भीतर कहीं बहुत गहरे उतर रहे थे।
किसी ने दबाव नहीं डाला था।
किसी ने उन्हें बाध्य नहीं किया था।
उनके भीतर उठे प्रश्नों ने स्वयं उन्हें उस द्वार तक पहुँचाया था।
अंततः परिवार ने अपनी इच्छा से सत दीक्षा ग्रहण की।
विदा का समय आया।
लालदा और रावण दा ने पूरे परिवार को स्नेहपूर्वक विदा किया।
रामलाल कुछ दूर निकल चुके थे कि तभी तापस दा उनके समीप आए।
उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा—
“रामलाल!”
रामलाल पीछे मुड़े।
तापस दा कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। फिर गंभीर स्वर में बोले—
“रामलाल, आज तुम केवल दीक्षा लेकर घर नहीं लौट रहे हो। आज तुम एक जाग्रत संथाल बनने की दिशा में पहला कदम रख रहे हो।”
रामलाल ध्यान से सुनते रहे।
तापस दा ने कहा—
“किसी के दबाव में, किसी के भय में और किसी के विरोध में इस पवित्र बीज नाम को कभी मत त्यागना। याद रखना—अंधेरी रात में जब रास्ता दिखाई न दे, तब यही नाम तुम्हारे भीतर दीपक की तरह रोशनी दिखाएगा।”
रामलाल की आँखें नम हो गईं।
तापस दा ने आगे कहा—
“हो सकता है, आगे चलकर तुम्हें अपने ही समाज से विरोध के स्वर सुनाई दें। लोग प्रश्न करेंगे। कुछ लोग तुम्हें गलत समझेंगे। कुछ तुम्हें रोकने का प्रयास भी करेंगे। लेकिन किसी की बात को अपने हृदय पर मत लेना। अज्ञान में कही गई बात मनुष्य के भीतर से नहीं, उसके भय से निकलती है।”
कुछ क्षण मौन रहा।
फिर तापस दा ने धीरे से कहा—
“तुम जिस बीज नाम को लेकर जा रहे हो, वह केवल तुम्हारा नहीं है। यदि तुमने इसे अपने आचरण में उतार लिया, तो इससे तुम्हारे परिवार का ही नहीं, तुम्हारे समाज के अनेक लोगों का कल्याण हो सकता है। इसलिए अपने पथ पर अडिग रहना।”
रामलाल ने दोनों हाथ जोड़ दिए।
“मैं प्रयास करूँगा।”
परिवार आगे बढ़ गया।
सूरज अब पेड़ों के पीछे उतर चुका था।
जंगल के रास्ते पर एक अजीब-सी शांति उतर आई थी।
और तभी—
बहुत दूर से बाँसुरी की एक हल्की धुन सुनाई दी।
रामलाल रुक गए।
उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं था।
धुन फिर सुनाई दी।
इस बार थोड़ी स्पष्ट—
“फूँऽऽ... फूँऽऽ...”
माही ने भी कदम रोक दिए।
“बाबा... आपने सुना?”
रामलाल ने उसकी ओर देखा।
“क्या?”
“बाँसुरी।”
सलमा भी चुप हो गई।
उसने भी वह धुन सुनी थी।
लेकिन परिवार के बाकी बच्चों को कुछ सुनाई नहीं दिया।
कभी वह धुन पेड़ों के पीछे से आती हुई लगती, कभी हवा में घुल जाती। कभी लगता कोई बहुत पास बैठकर बाँसुरी बजा रहा है और अगले ही क्षण ऐसा लगता जैसे वह ध्वनि किसी अदृश्य दिशा से आ रही हो।
पीपल का वह पेड़ अब दूर दिखाई दे रहा था।
उसी के नीचे काली माँ की माला रखी थी।
रामलाल की दृष्टि अनायास उसी ओर चली गई।
उन्हें लगा जैसे उस माला के पास कोई छाया खड़ी है।
उन्होंने पलक झपकाई।
छाया गायब थी।
फिर बाँसुरी बजी।
इस बार धुन के भीतर जैसे कोई शब्द छिपा था—
“पथ से मत हटो...”
रामलाल के भीतर एक कंपन-सा हुआ।
उन्हें लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति उन्हें आगे बढ़ने का साहस दे रही हो।
शायद यह केवल हवा थी।
शायद किसी चरवाहे की बाँसुरी।
शायद जंगल की कोई रहस्यमयी ध्वनि।
लेकिन रामलाल के मन में एक ही विचार उठ रहा था—
क्या कोई अदृश्य शक्ति संथाल समाज को उसकी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी आगे बढ़ने का रास्ता दिखाना चाहती है?
धुन कुछ क्षण हवा के कणों में तैरती रही और फिर धीरे-धीरे शून्य में विलीन हो गई।
रामलाल ने कुछ नहीं कहा।
पर उनके कदम पहले से अधिक दृढ़ हो गए।
घर पहुँचते-पहुँचते शाम रात में बदलने लगी थी।
लेकिन घर के आँगन में प्रवेश करते ही रामलाल को महसूस हुआ कि यहाँ जंगल से भी अधिक घना अंधेरा उनका इंतजार कर रहा है।
उनके बड़े भाई बागुन मुर्मू पहले से ही आँगन में बैठे थे।
चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।
रामलाल को देखते ही वे उठ खड़े हुए।
“रामलाल!”
आवाज में भाई का स्नेह नहीं था।
आक्रोश था।
बागुन ने कठोर स्वर में कहा—
“बाबा का घर सिर्फ तुम्हारा नहीं, मेरा भी है। आँगन एक है। हम दोनों अलग-अलग परिवार में रहते जरूर हैं, लेकिन जब तक यह एक ही घर और एक ही आँगन है, तब तक तुम यहाँ कोई गैर-आदिवासी, गैर-संथाल की दीक्षा की कोई भी फोटो को रखने न दूंगा, अब क्या हमारे घर में उनकी तस्वीर भी टाँगोेगे?”
आँगन में सन्नाटा छा गया।
रामलाल शांत रहे।
बागुन की आवाज और तेज हो गई—
“तुमने जीते-जी माँ-बाप को कभी प्रसन्न नहीं किया। उनके जाने के बाद भी क्या उनकी आत्मा को दुःख पहुँचाना चाहते हो? हमारे आराध्य देव—मारांग बुरु, लुगू बाबा, मोड़े तुरुई—क्या तुम्हारे लिए कुछ नहीं हैं?”
गाँव के कुछ लोग भी धीरे-धीरे वहाँ जमा होने लगे।
बागुन ने उँगली उठाकर कहा—
“हम संथाल हैं। हम प्रकृति पूजक हैं। हम अपने पूर्वजों को मानते हैं। हमारा धर्म हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। और तुम उसी घर में ऐसी दीक्षा लेकर आ गए, जिसे हमारा समाज स्वीकार नहीं करता!”
तभी बागुन की पत्नी भी भीतर से निकल आई।
उसने सलमा की ओर देखते हुए कहा—
“अरे देख सलमा! तू तो माही के बाप को समझा सकती थी। मेरी दो जवान बेटियाँ हैं। कल कौन इनसे रिश्ता करेगा? अब कोई रिश्ता नहीं रखना हम लोगों से!”
सलमा ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।
रामलाल के मुँह से अनायास निकला—
“भाभी...”
उसकी आवाज में शिकायत नहीं, विनती थी।
“आज माँ-बाप नहीं हैं। अब तुम दोनों ही तो मेरे बड़े हो, मेरे अभिभावक हो। ऐसा मत कहो।”
सलमा ने भी धीमे स्वर में कहा—
“दीदी, पानी को पीटने से पानी अलग नहीं होता। भाई-भाई भी ऐसे अलग नहीं होते।”
लेकिन बागुन की पत्नी का क्रोध शांत नहीं हुआ।
वह बोली—
“अहा! अभी दिखावे का नाटक हो रहा है! इतना ही सम्मान था तो दीक्षा लेने से पहले क्या मुँह में ताला लगा था?”
बागुन की पत्नी के इस वाक्य ने जैसे बागुन को और कठोर होने का अवसर दे दिया।
उन्होंने कहा—
“अगर तुम्हें इन्हें पूजना ही है तो अपनी जमीन लो, अपना घर बनाओ और अलग रहो। जब तक तुम एक ही आँगन में हो, तुम्हें अपनी मनमानी करने का अधिकार नहीं है।”
भीड़ में से किसी ने कहा—
“यह ठीक नहीं हुआ।”
दूसरे ने कहा—
“एक शिक्षक होकर बच्चों को संस्कार देने वाला आदमी ही अपने घर में यह करेगा?”
तीसरे ने कहा—
“इसकी बेटी सयानी हो रही है। कल कौन अपना रिश्ता लेकर इनके घर आएगा?”
एक और आवाज आई—
“गाँव को मिलकर इसका विरोध करना चाहिए।”
शब्द बढ़ते गए।
आँगन में आक्रोश की आग फैलने लगी।
रामलाल ने सब सुना।
फिर धीरे से हाथ जोड़ दिए।
“भाइयों...”
उनकी आवाज में न क्रोध था, न चुनौती।
“मैंने सत दीक्षा ली है, यह सत्य है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैंने अपने आराध्य देव—मारांग बुरु, लुगू बाबा, मोड़े तुरुई—का त्याग कर दिया है।”
भीड़ कुछ शांत हुई।
रामलाल ने कहा—
“मैं संथाल हूँ। मेरी जड़ें इसी मिट्टी में हैं। मेरे पूर्वजों की स्मृति मेरे भीतर है। प्रकृति मेरे लिए केवल पेड़-पौधे और पहाड़ नहीं है। प्रकृति उस विराट जीवन का नाम है, जिसमें हम सब जुड़े हुए हैं।”
उन्होंने आकाश की ओर देखा।
“यदि हम सचमुच प्रकृति पूजक हैं, तो हमें प्रकृति को बचाने, बढ़ाने और उसके साथ संतुलन में जीने का संकल्प भी लेना होगा।”
कुछ लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
रामलाल आगे बोले—
“मैंने जो सत दीक्षा ली है, वह अपने आराध्य को छोड़ने का अस्त्र नहीं है। बल्कि अपने भीतर के मनुष्य को जाग्रत करने का प्रयास है। मैं किसी देवी-देवता का अपमान नहीं कर रहा। जिसे अब तक मानता आया हूँ, उसे भी उसी श्रद्धा से मानूँगा।”
अब तक गाँव के लोगों में कानाफूसी शुरू हो चुकी थी।
“अब संथालों की पहचान मिट जाएगी।”
“हम लोग मूर्ति की पूजा नहीं करते, अब यहाँ नई पूजा शुरू होगी।”
“न जाने गाँव में अकाल, बाढ़ या बीमारी आ जाए... ग्राम देवता नाराज हो जाएँगे।”
“नहीं... हमें कुछ करना होगा।”
“मुझे लगता है, अब पूरे संथाल टोले पर शीघ्र संकट आएगा।”
जितने मुँह, उतनी बातें।
लेकिन आश्चर्य यह था कि कोई भी रामलाल के सामने आकर खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
क्यों?
शायद दूर से आती उस बाँसुरी की धुन की आवृत्ति धीरे-धीरे पूरे वातावरण में फैल रही थी।
न जाने उस ध्वनि में ऐसा क्या था कि आक्रोश से तने हुए माथे अपने-आप ढीले पड़ने लगे।
बागुन कुछ कहने ही वाले थे कि—
अचानक हवा रुक गई।
पेड़ों के पत्ते जैसे स्थिर हो गए।
और उसी क्षण—
बाँसुरी की धुन सुनाई दी।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
लेकिन इतनी मधुर कि आँगन में उठी सारी आवाजें जैसे उसी के भीतर समा गईं।
किसी ने बाँसुरी बजाते हुए किसी को नहीं देखा।
किसी ने उस धुन का स्रोत नहीं जाना।
लेकिन पता नहीं क्यों—
कुछ ही क्षण पहले जो चेहरे क्रोध से तने हुए थे, उन पर अचानक एक विचित्र शांति उतर आई।
बागुन की मुट्ठी ढीली पड़ गई।
एक वृद्ध ने धीरे से अपना सिर उठा लिया।
सलमा ने रामलाल की ओर देखा।
माही चुपचाप पीपल की दिशा में देखने लगी।
रामलाल के भीतर वही ध्वनि उतर रही थी—
“धर्म बाँटता नहीं...
धर्म जोड़ता है।”
फिर जैसे किसी अदृश्य स्वर ने कहा—
“अपनी जड़ों को मत छोड़ो...
पर प्रकाश से भी मत डरो।”
रामलाल की आँखें बंद हो गईं।
उन्हें लगा जैसे उनके भीतर कोई द्वार खुल रहा है।
वह धुन केवल कानों से नहीं सुनी जा रही थी।
वह जैसे मन के भीतर बज रही थी।
और उसी क्षण रामलाल ने अनुभव किया—
शायद यह किसी एक धर्म की विजय का प्रश्न नहीं है।
शायद असली प्रश्न यह है कि मनुष्य अपने धर्म को कितना जीता है।
आँगन में अब कोई विवाद नहीं था।
केवल मौन था।
लेकिन वह मौन साधारण मौन नहीं था।
उसमें वर्षों पुराने प्रश्न थे।
पूर्वजों की स्मृतियाँ थीं।
नई पीढ़ी की जिज्ञासा थी।
और कहीं बहुत गहराई में—
एक अनदेखी बाँसुरी की धुन थी।
माही ने धीरे से अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।
“बाबा...”
रामलाल ने उसकी ओर देखा।
माही ने पूछा—
“क्या बाँसुरी हमें रास्ता दिखा रही है?”
रामलाल ने कुछ क्षण उसे देखा।
फिर मुस्कुराकर बोले—
“बेटी, रास्ता बाँसुरी नहीं दिखाती...”
वह रुक गए।
“रास्ता हमारे भीतर का सत्य दिखाता है। बाँसुरी तो बस हमें उसे सुनने की याद दिलाती है।”
पीपल के पत्ते अचानक हिले।
धुन फिर सुनाई दी।
और इस बार—
ऐसा लगा जैसे वह धुन पूरे जंगल से होकर गाँव के हर घर तक पहुँच रही हो।
कहीं कोई उसे सुन रहा था।
कहीं कोई उसे महसूस कर रहा था।
और कहीं...
कोई उस धुन से डर भी रहा था।
क्योंकि हर नई रोशनी सबसे पहले उसी अंधेरे को बेचैन करती है—
जिसने वर्षों से अपने भीतर उजाला आने नहीं दिया।
उस रात रामलाल के घर में कोई नहीं जान पाया कि बाँसुरी कहाँ से बज रही थी।
लेकिन अगले दिन सुबह...
गाँव के बीचोंबीच पीपल के पेड़ के नीचे एक ऐसी चीज मिली,
जिसे देखकर रामलाल का चेहरा अचानक बदल गया।
वह वस्तु...
उसी काली माँ की माला के पास पड़ी थी।
क्रमशः.....