सादगी
अनु कोई असाधारण नाम नहीं था, और वह खुद भी खुद को असाधारण नहीं मानती थी। वह एक साधारण सी, सुलझे विचारों वाली लड़की थी। उसे सजने-संवरने का शौक नहीं था। उसके लंबे-ढीले सूट, करीने से ओढ़ा हुआ दुपट्टा और भीतर की रोशनी से दमकता आभापूर्ण चेहरा ही उसे भीड़ में अलग पहचान दे देता था।
वह 'सादा जीवन, उच्च विचार' में सचमुच विश्वास करती थी। गणित में वह प्रतिभा का परचम लहराती थी। उसकी कोई खास सहेली नहीं थी, पर वह सबसे बोलती थी, सबकी चुपचाप सहायता करती थी, और फिर भी अपने आप में अकेली ही रहती थी। उसे इधर-उधर की चुगली, दिखावा, ईर्ष्या, इन सबसे सख्त नफरत थी। खाली समय में वह कॉलेज की लाइब्रेरी में किताबों के बीच मिलती। इसीलिए कॉलेज में सभी उसका मन से सम्मान करते थे। वाद-विवाद हो, भाषण हो या काव्य-पाठ, हर प्रतियोगिता में वह प्रथम आती थी। उसकी जीत में कभी अहंकार नहीं होता था, बस एक शांत मुस्कान होती थी।
एक दिन विद्यालय में घोषणा हुई, 'मिस फेवरेट क्वीन' प्रतियोगिता होगी। जीतने वाली को पचास हजार रुपये का पुरस्कार मिलेगा। पूरे विद्यालय में हलचल मच गई। सभी लड़कियों ने बढ़-चढ़कर अपने नाम लिखवाए। पार्लर के अपॉइंटमेंट बुक होने लगे, महंगे गाउन और पश्चिमी परिधान खरीदे जाने लगे।
अनु ने पहले तो भाग लेने से मना कर दिया। उसे यह चमक-दमक की दुनिया अपनी नहीं लगती थी। पर रात को लेटे-लेटे उसे अपना एक पुराना सपना याद आया। वह एक ऐसा कोचिंग सेंटर खोलना चाहती थी जहाँ गरीब और जरूरतमंद महिलाएं सिलाई, कढाई, बुनाई और क्राफ्ट सीखकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उसके पास ज्ञान था, हौसला था, बस पूंजी नहीं थी।
उसने सोचा, "कोशिश तो करनी ही चाहिए। इन पैसों से मेरा सपना पूरा हो सकता है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? नहीं जीती तो एक तजुर्बा ही सही।"
अगले दिन उसने भी अपना नाम लिखवा दिया।
और फिर वह दिन आ ही गया। पूरा सभागार दर्शकों से खचाखच भरा था। मंच दुल्हन की तरह सजाया गया था। एक-एक करके लड़कियां आईं। कोई नए जमाने के पश्चिमी परिधान में, कोई डिजाइनर लहंगे में, भारी मेकअप और आधुनिक साज-सज्जा के साथ। मंच रोशनी से जगमगा रहा था।
तभी अनु का नाम पुकारा गया। वह आई, साधारण सी शिफॉन की हल्की पीली साड़ी में। न कोई मेकअप, न गहने, न कोई बाहरी श्रृंगार। सिर्फ आत्मविश्वास से दमकता हुआ चेहरा और सबका दिल जीत लेने वाली एक मीठी मुस्कान। पहले तो सभागार में एक अजीब सी खामोशी छा गई, फिर उसने अपनी स्वरचित कविता का पाठ शुरू किया।
उसकी वाणी में इतनी सच्चाई, इतना दर्द और इतना आत्मबल था कि पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। लोगों की आंखें नम हो गईं।
निर्णायक मंडल ने एकमत से अनु को प्रथम विजेता घोषित किया। पुरस्कार राशि देते हुए मुख्य अतिथि ने माइक पर कहा, "सादगी भरी सुंदरता ही सबसे अनमोल है। आज यह साबित हो गया कि सादगी सब फैशन पर भारी है। आज की विजेता, अनु सबसे प्यारी!"
एक बार फिर सभागार तालियों से गूंज उठा, और इस बार वह गूंज अनु के सपनों को नई उड़ान दे रही थी।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली