vacant almira in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | खाली अलमारी का सुकून

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खाली अलमारी का सुकून



रविवार की सुबह थी। दिवाली पास थी, इसलिए कनु ने आज घर की बड़ी सफाई का मन बनाया था। झाड़-पोंछ के बाद उसकी नजर सालों से टाली जा रही उस अलमारी पर पड़ी, जिसका एक दरवाजा ठीक से बंद भी नहीं होता था। उसने गहरी सांस ली और अलमारी खोल दी।

अलमारी जैसे सांस ले रही थी। खचाखच भरी हुई, जींस, कुर्तियां, साड़ियां, टॉप। हर कपड़े के साथ एक याद जुड़ी थी। यह लाल कुर्ती उसने पहली सैलरी से ली थी। यह नीली साड़ी भाई की शादी में पहनने के लिए। उसने एक कुर्ती निकाली, पहनने की कोशिश की, बटन खिंच गए। उसने आह भरकर रख दिया।

अधिकतर कपड़े बस इसीलिए जगह घेर रहे थे कि 'जब पतली हो जाऊंगी, तब पहनूंगी।'

पिछले तीन सालों से कनु थायराइड से जूझ रही थी। शुरुआत में उसने ध्यान नहीं दिया, फिर जब वजन तेजी से बढ़ने लगा तो डॉक्टर के पास गई। उसके बाद डाइटिंग, जिम, योग, सुबह की सैर, सब करके देख लिया। पर वजन था कि कम होने का नाम ही नहीं लेता था। ऑफिस में लोग हंसकर कहते, 'कनु, तुम्हारी अलमारी तो म्यूजियम बन गई है।'

उसने आईने में खुद को निहारा। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे, चेहरे पर थकान। वह बेड पर बैठ गई और सोचने लगी, क्या मैं सिर्फ इन कपड़ों में समाने के लिए जी रही हूं? क्या मेरी खुशी इन साइज 'M' और 'S' के टैग में अटकी है?

तभी उसकी आंखों के सामने कल शाम का दृश्य कौंध गया। ऑफिस से लौटते समय फ्लाईओवर के नीचे उसने कुछ महिलाओं को देखा था। एक बूढ़ी अम्मा फटे शॉल में सिकुड़ी बैठी थी। एक युवा मां अपने छोटे बच्चे को पुराने अखबार से ढकने की कोशिश कर रही थी। ठंडी हवा चल रही थी और उनके पास तन ढकने को कुछ नहीं था।

कनु का दिल भर आया। उसके मन में एक विचार बिजली की तरह चमका, 'मेरी अलमारी में तो कपड़े सड़ रहे हैं, और यहां लोग ठंड से कांप रहे हैं। मेरा वजन तो कम हो नहीं रहा, क्यों न ये सारे कपड़े उन जरूरतमंदों को दे आऊं? जगह भी खाली होगी और किसी का भला भी।'

बस, फिर उसने एक पल की देर नहीं की। यह दिवाली की सबसे सच्ची सफाई होगी, उसने सोचा। उसने अपने लिए सिर्फ चार-पांच जोड़ी रोज पहनने के आरामदायक कपड़े रखे। बाकी सारे, वो 'कभी पतली होऊंगी' वाले कपड़े, एक-एक करके तह किए और एक बड़े बैग में पैक कर दिए।

बैग बहुत भारी था, पर उसका मन हल्का हो रहा था। उसने एक रिक्शा बुलाया। रिक्शा वाला अधेड़ उम्र का था, उसकी बनियान फटी हुई थी। कनु ने उससे पूछा, "भैया, आपके घर में कौन-कौन है?" उसने बताया, पत्नी और दो बेटियां हैं। कनु ने बैग से दो गर्म शॉल और दो कुर्तियां निकालकर उसे दीं, "दिवाली का तोहफा समझकर रख लीजिए।" रिक्शे वाले की आंखें भर आईं, "मैडम, भगवान आपको बहुत दे।"

फ्लाईओवर के नीचे पहुंचकर कनु ने रिक्शा रुकवाया। वह बैग लेकर उन महिलाओं के पास गई। पहले तो वे सकुचा गईं, पर कनु जमीन पर ही उनके पास बैठ गई। उसने एक-एक करके कपड़े निकाले। बूढ़ी अम्मा को उसने अपनी सबसे प्यारी, लगभग नई स्वेटर दी। अम्मा ने उसे छूकर देखा, फिर कनु के सिर पर हाथ रखकर दुआ दी, "बेटी, तू सदा सुखी रहे।"

उस युवा मां को उसने दो साड़ियां और बच्चों के लिए कुछ गर्म कपड़े दिए। वह बार-बार 'दी-दीदी' कहकर धन्यवाद दे रही थी। कोई कपड़ों को गले लगा रहा था, कोई तुरंत पहनकर देख रहा था।

कनु बस उन्हें देखती रही। उन चेहरों पर जो चमक थी, वह किसी भी मॉल की शॉपिंग में उसे कभी नहीं मिली थी।

खाली बैग लेकर जब वह घर लौटी, तो शाम हो चुकी थी। उसने अपनी अलमारी को देखा, जो अब आधी से ज्यादा खाली थी। कुछ हैंगर खाली लटक रहे थे। अजीब बात थी, आज वह बहुत हल्का महसूस कर रही थी।

उसने आईने में फिर खुद को देखा। इस बार उसे अपना बढ़ा हुआ वजन नहीं दिखा, उसे अपनी मुस्कान दिखी। इतना सुकून उसे भरी अलमारी को देखकर कभी नहीं मिला था, जितना आज इस खाली अलमारी को देखकर मिल रहा था।

उसने समझ लिया था, हम कपड़े नहीं, उम्मीदें जमा करते हैं। और जब हम अपनी अधूरी उम्मीदों को किसी की जरूरत बना देते हैं, तो अलमारी ही नहीं, मन भी खाली और हल्का हो जाता है। यही तो दिवाली है, अंधेरे से उजाले की ओर, बोझ से हल्केपन की ओर।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली