birds and anklet in Hindi Fiction Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | चिड़िया और पायल

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चिड़िया और पायल


छोटे से शहर के बीचों-बीच एक राजकीय बालिका इंटर कॉलेज था। कहते हैं अंग्रेजों के जमाने में ये जेल थी। मोटी-मोटी दीवारें, जंग लगे ताले और एक कोना तो आज भी ऐसा था जहाँ कोई नहीं जाता था। उस कोने में एक कमरा था, हमेशा बंद। उसकी टूटी खिड़की के कांच से अंदर झाँको तो एक पुरानी, धूल खाई बस खड़ी दिखती थी।

स्कूल के पुराने चपरासी काका कहते - "बिटिया, इस बस को मत देखो। पच्चीस साल पहले ये बस इसी स्कूल की बच्चियों को हरिद्वार टूर पर ले जा रही थी। रास्ते में एक्सीडेंट हो गया। पूरी बस... फिर कभी वापस नहीं आई। किसी तरह खींच कर यहाँ लाकर डाल दी गई। तब से कहते हैं, उन बच्चियों की आत्माएँ यहीं भटकती हैं।"

स्कूल की सभी लड़कियाँ उस कमरे से डरती थीं, सिवाय एक के - रीना के।

रीना कक्षा नौ की छात्रा थी। बहुत ईमानदार, बहुत दयालु। भगवान ने उसे एक अनोखा वरदान दिया था - वो पशु-पक्षियों की भाषा समझ लेती थी। पेड़ पर बैठी चिड़िया क्या कह रही है, आंगन में बिल्ली क्यों रो रही है, वो सब समझ जाती। पर उसने ये बात कभी किसी को बताई नहीं, क्योंकि उसे डर था लोग उसे पागल कहेंगे।

एक दिन दोपहर में, जब स्कूल में लंच की घंटी बजी और सब मैदान में चली गईं, रीना पानी पीने उसी पुराने कोने से गुजर रही थी। तभी उसे एक बहुत धीमी, रोने जैसी आवाज सुनाई दी।

"दीदी... रीना दीदी... इधर देखो... नीचे..."

रीना ने चौंक कर नीचे देखा। खिड़की के पास एक छोटी सी चिड़िया बैठी थी, पर उसकी आवाज चिड़िया की नहीं थी।

"मैं यहाँ... मैं चिड़िया बोल रही हूँ... मैं उसी बस में थी..."

रीना का खून जैसे जम गया। डर से उसका चेहरा पीला पड़ गया। उसे अपनी आँखों और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। सामने एक चिड़िया थी, पर बोल एक मरी हुई लड़की रही थी।

चिड़िया फिर बोली, और अब उसकी आवाज में रोना था -

"दीदी, डरो मत। मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी। मैं उस समय छठी कक्षा में पढ़ती थी। मेरी माँ विधवा थी। ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया था। बड़ी मुश्किल से वो मुझे पढ़ाने का खर्च निकाल पाती थी। वो इसी स्कूल की कैंटीन में खाना बनाती थी। उनका सपना था, मैं पढ़-लिखकर इसी विद्यालय में अध्यापिका बनूँ। लेकिन विधि को ये मंजूर न था। मेरी मृत्यु हो गई उसी बस दुर्घटना में।"

इतना कहकर वो थोड़ा रुकी। फिर बोली -

"मेरी माँ आज भी इसी विद्यालय के पीछे बने सरकारी मकान में रहती है। मेरी आत्मा को अभी तक मुक्ति नहीं मिली। दीदी, मेरी एक मदद करोगी? इस बस में आज भी मेरी एक पायल पड़ी है। तुम वो पायल ले जाकर मेरी माँ को दे देना। उनसे कहना, ये उनकी बेटी की आखिरी निशानी है। आने वाले श्राद्ध पक्ष में मेरा विधि-विधान से पिंडदान कर दें, तो मुझे मुक्ति मिल जाएगी।"

ऐसा कहकर वो चिड़िया फुर्र से उड़कर उस अंधेरे कमरे में चली गई और थोड़ी देर में चोंच में एक छोटी, मिट्टी लगी पायल लेकर लौटी और रीना के सामने रख दी।

रीना थर-थर काँप रही थी, पर उसके अंदर की दयालु लड़की डर से बड़ी थी। वो उस आत्मा की सहायता करना चाहती थी। उसने कांपते हाथों से उस पायल को उठा लिया।

चिड़िया ने उसे धन्यवाद कहा और गायब हो गई।

रीना पायल लेकर स्कूल के पीछे बने क्वार्टरों की तरफ गई। वहाँ बहुत जर्जर हालत में बने घर थे। जगह-जगह से प्लास्टर उखड़ा हुआ था। एक घर के बाहर एक महिला कपड़े धो रही थी। उम्र करीब साठ-सत्तर की लग रही थी, पर गरीबी और बीमारी ने उसे जल्दी बूढ़ा बना दिया था।

रीना समझ गई, यही उसकी माँ है।

उसने धीरे से पास जाकर कहा, "अम्मा, क्या आप... कैंटीन में काम करती थीं?"

महिला ने सिर उठाया। रीना ने उसे सारी बात बताई और वो मिट्टी लगी पायल आगे बढ़ा दी।

पायल देखते ही महिला के हाथ से कपड़ा छूट गया। उसने पायल को छूकर पहचान लिया। ये वही पायल थी जो उसने मेले से अपनी बेटी के लिए खरीदी थी।

"मेरी गुड़िया..." कहकर वो फूट-फूट कर रोने लगी। पच्चीस साल का बांध टूट गया।

रीना ने उसे चुप कराया। अपने टिफिन का खाना उसे खिलाया। अपने गुल्लक के कुछ रुपए भी उसके हाथ में रख दिए। उस दिन रीना उस बूढ़ी माँ को अकेला नहीं छोड़ सकी।

फिर श्राद्ध पक्ष आया। रीना ने उस महिला के साथ मिलकर उस चिड़िया का श्राद्ध करवाया, विधि-विधान से पूजा करवाई, ब्राह्मणों को भोजन करवाया। पूजा करते समय रीना को लगा जैसे ठंडी हवा का एक झोंका आया और सब शांत हो गया।

शाम को रीना ने उस महिला को उसके घर तक छोड़ा और अपने घर आ गई।

उस रात रीना को बहुत गहरी नींद आई। सपने में उसने देखा, वही छोटी लड़की स्कूल की ड्रेस में मुस्कुरा रही है और कह रही है - "दीदी, मुझे मुक्ति मिल गई।"

आज रीना के मन में एक अजीब सी शांति थी।

उसने समझ लिया था - जिंदगी सच में एक सफर है। कोई इस सफर में बस में छूट जाता है, कोई सरकारी क्वार्टर में इंतजार करता रह जाता है, और कोई-कोई रीना जैसा, जो इस सफर में दो बिछड़े लोगों को मिला देता है।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली