बहुत समय पहले की बात है। एक घने हरे पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर एक नन्हीं सी चिड़िया ने अपना छोटा सा घोंसला बनाया था।
उस घोंसले में कुछ नहीं था, बस कुछ तिनके, दो सूखे पत्ते और उसकी मेहनत। पर उसने तिनका-तिनका जोड़कर उसे इतने प्यार से सजाया था कि वो किसी महल से कम नहीं लगता था।
रोज सुबह जब सूरज की पहली सुनहरी किरण धरती पर आती और आकाश में नीलिमा छा जाती, तो वो नन्हीं चिड़िया अपने नाजुक से पर फैलाती और भोजन की तलाश में उड़ जाती। कभी किसी खेत से दाना मिल जाता, कभी किसी आँगन से। उसी छोटे-मोटे दाने से वो अपना पेट भर लेती और खुश हो जाती। शाम ढलते ही वो फिर अपने घोंसले में लौट आती। हवा में झूलता हुआ उसका छोटा सा घर, उसके लिए पूरी दुनिया था। वो अपनी उस छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थी। उसे किसी बड़े महल की चाह नहीं थी।
एक दिन वो नन्हीं चिड़िया तालाब किनारे पानी पीने के लिए बैठी थी। तालाब का पानी बिल्कुल शांत था। तभी उसने देखा, तालाब के पास एक राजकुमार बैठा है। उसकी आँखें बंद हैं और वो बड़ी सुंदर आत्मा से तपस्या कर रहा है। चेहरे पर तेज था, पर आँखों में उदासी।
चिड़िया को उस पर बड़ी दया आ गई। वो धीरे से उड़ी और जाकर उसके कंधे पर बैठ गई।
राजकुमार ने आहट महसूस की और आँखें खोलीं। सामने एक नन्हीं सी चिड़िया को देखकर वो मुस्कुरा दिया। उसने बड़े प्यार से उसे अपने हाथों में लिया और कहा, "तू इतनी छोटी है, पर तेरी आँखों में कितना सुकून है।"
फिर उसने अपनी मंत्र शक्ति से एक चमत्कार किया। देखते ही देखते वो नन्हीं चिड़िया एक सुंदर राजकुमारी में बदल गई।
राजकुमार उसे अपने साथ बड़े महल में ले आया। महल बहुत बड़ा था। सोने के दरवाजे, रेशमी पर्दे, नौकर-चाकर, खाने के लिए छप्पन भोग। राजकुमार ने उसे सब सुख-सुविधाएँ दीं। कहा, "अब से तुम इस महल की राजकुमारी हो।"
पर राजकुमारी का मन महल में लगता ही नहीं था।
उसे सोने के बिस्तर पर नींद नहीं आती थी, उसे तो अपनी डाल पर झूलते हुए घोंसले की याद आती थी। उसे बंद कमरों में घुटन होती थी, उसे तो खुले आसमां के नीचे ही सुकून मिलता था। वो दिन भर महल के बड़े बगीचे में बैठी रहती।
राजकुमारी बनने के बाद भी भगवान ने उससे एक वरदान नहीं छीना था - उसे अब भी सभी पक्षियों और पशुओं की भाषा समझ आती थी। वो दिन भर पेड़ों से, फूलों से, तितलियों से बातें करती। यही उसके दिन का सबसे खुशी भरा समय होता था।
एक दोपहर जब वो बगीचे में अकेली बैठी थी, तभी एक छोटी सी गिलहरी दौड़ती हुई उसके पास आई। हाँफते हुए बोली, "राजकुमारी, एक बहुत जरूरी बात बतानी है। आज रात रानी राजकुमार को खीर खाने को देगी, पर उसे मत खाने देना। उस खीर में जहर है। रानी राजकुमार को मारना चाहती है और राजगद्दी हथियाना चाहती है। तुम उनकी जान बचा लेना और बदले में राजकुमार से कहना कि तुम्हें फिर से चिड़िया बना दे।"
राजकुमारी सन्न रह गई।
उसी शाम महल में एक बड़े भोज का आयोजन था। सभी अतिथि आ चुके थे, शहनाई बज रही थी। रानी ने सबके सामने बड़े प्यार का नाटक करते हुए राजकुमार को खीर का कटोरा देते हुए कहा, "प्रिय बेटे, यह खीर मैंने तुम्हारे लिए विशेष रूप से अपने हाथों से बनवाई है, इसे खाओ, तुम्हें बहुत अच्छी लगेगी।"
राजकुमार कटोरा लेने ही वाला था कि राजकुमारी को गिलहरी की बात याद आ गई। वो भीड़ को चीरते हुए आगे आई और जोर से बोली, "नहीं, इसे मत खाओ राजकुमार! इसमें जहर है, कृपया इसे मत खाओ। रानी आपको मारना चाहती है।"
पूरा दरबार शांत हो गया। रानी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वो चिल्लाने लगी, "ये लड़की झूठ बोल रही है! ये पागल हो गई है, इसे महल से बाहर निकालो!"
पर राजकुमारी अपनी सच्चाई पर अडिग रही। उसने कांपते हाथों से वो खीर का कटोरा लिया और बगल में खड़े एक कुत्ते के आगे डाल दिया। कुत्ते ने दो चम्मच खीर खाई और वहीं तड़पकर मर गया।
सबकी साँसें रुक गईं। राजकुमार को सब समझ आ गया। सच सामने था।
राजकुमार ने तुरंत सैनिकों को हुक्म दिया और रानी को जेल में डाल दिया गया।
उसके बाद राजकुमार ने राजकुमारी का हाथ पकड़ा और कहा, "तुमने आज मेरी जान बचाई है, मांगो तुम्हें क्या पुरस्कार चाहिए।"
राजकुमारी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मुझे महल नहीं चाहिए, गहने नहीं चाहिए। मुझे बस मेरी आजादी दे दीजिए। मुझे फिर से वही नन्हीं चिड़िया बना दीजिए।"
राजकुमार उसे खोना नहीं चाहता था, उसका दिल बैठ गया। पर वो वचन दे चुका था। वचन का पक्का था, इसलिए भारी मन से उसने फिर अपनी मंत्र शक्ति से उसे नन्हीं चिड़िया बना दिया।
और आज भी, वो नन्हीं चिड़िया महल के उसी बगीचे में रहती है। कभी इस डाल पर, कभी उस डाल पर। खुले आसमां में उड़ती है, अपनी मर्जी से दाना चुगती है और खुश रहती है।
क्योंकि सखी, महल में सुख मिल सकता है, पर सुकून तो हमेशा अपने छोटे से घोंसले में और खुले आसमां में ही मिलता है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली