भाग 15 — आस्था और अंधविश्वास
जिलिंगटांडी गाँव के एक छोर पर स्थित विशाल पेड़ के नीचे उस शाम पंचायत सजी हुई थी। समय लगभग साढ़े सात-आठ बजे का था। गाँव के बुद्धिजीवी, बुजुर्ग, नौजवान और समाज के कई प्रतिष्ठित लोग वहाँ एकत्रित थे। चारों ओर अँधेरा गहराने लगा था, लेकिन पंचायत में चल रही चर्चा ने वातावरण को गंभीर बना रखा था। अधिकांश लोगों का मानना था कि जब से रामलाल और उसके परिवार ने उस दिकू गुरु से दीक्षा ली है, तब से गाँव में हैजा, डायरिया और दूसरी बीमारियों का प्रकोप बढ़ गया है। कुछ लोगों को आशंका थी कि ग्रामदेवता जाहेर आयो नाराज हो गए हैं और उनकी नाराजगी का परिणाम पूरे गाँव को भुगतना पड़ सकता है। हालाँकि, इन आशंकाओं का कोई प्रमाण किसी के पास नहीं था, लेकिन वर्षों से चली आ रही मान्यताओं ने लोगों के मन में भय पैदा कर दिया था।
विवाद की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई थी। गाँव के बुजुर्ग बुधराय ने रामलाल की बड़ी बेटी माही को कई बार समझाया था, “बेटी, तुमने उस दिकू गुरु से दीक्षा ले ली है। अब तुम पहले जैसी संताल नहीं रही। इसलिए तुम्हें मांझी हाड़ाम के थान पर गोबर की मड़ोली नहीं करनी चाहिए और न ही वहाँ धूप, अगरबत्ती तथा दिया जलाना चाहिए। ऐसा करने से मांझी हाड़ाम नाराज हो सकते हैं। उनकी नाराजगी केवल तुम तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे गाँव पर संकट आ सकता है।”
माही बुजुर्ग का अनादर नहीं करती थी। वह उनकी बात सुनकर चुप रह जाती, लेकिन अपने विश्वास को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। वह सुबह-शाम मांझी हाड़ाम के थान पर जाती, गोबर से मड़ोली करती और शाम को वहाँ दिया तथा अगरबत्ती जलाती। दीक्षा लेने के बाद उसके मन में यह विश्वास गहरा हो गया था कि ईश्वर एक हैं, भले ही उनके नाम और रूप अलग-अलग हों। उसके लिए मांझी हाड़ाम के थान पर पूजा करना अपनी संस्कृति और पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करना था। वह अपने गुरु से प्राप्त आध्यात्मिक विश्वास और अपनी संताली परंपराओं को एक-दूसरे का विरोधी नहीं मानती थी।
इसी बीच एक शाम बुधराय की जवान बेटी चांदमनी को तेज बुखार आ गया। बुखार में वह बड़बड़ाने लगी। कभी खटिया को कसकर पकड़ लेती, तो कभी भयभीत होकर चिल्लाने लगती।
“देखो, वह आ गया! मुझे जाना होगा। देखो, काली बिल्ली मेरे सिर के बाल नोच रही है! बाबा, उसे रोकिए न! बिना कपड़ों के महिलाएँ नाचती हुई मेरी तरफ आ रही हैं। वे मुझे भी अपने साथ ले जाएँगी। मेरे भी कपड़े खोलेंगी! नहीं, नहीं, मैं उनके साथ नहीं जाऊँगी। मैं कपड़े नहीं खोलूँगी!”
चांदमनी ने खटिया को और कसकर पकड़ लिया। अपनी बेटी की यह हालत देखकर बुधराय बुरी तरह घबरा गया। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उसकी बेटी के साथ क्या हो रहा है। भयभीत मन ने इस घटना को माही की पूजा से जोड़ दिया। उसे लगने लगा कि कहीं ग्रामदेवता नाराज तो नहीं हो गए हैं? जब से रामलाल के परिवार ने उस दिकू गुरु से दीक्षा ली है, गाँव में तरह-तरह की बीमारियाँ बढ़ रही हैं। यदि ग्रामदेवता नाराज हो गए, तो पूरे गाँव को इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है।
उस समय गाँव के लोगों में भूत-प्रेत, डायन और गुनी-बैगा से जुड़ी मान्यताएँ गहरी थीं। किसी के बीमार पड़ने या फसल खराब होने पर लोग अक्सर बीमारी का कारण जानने के बजाय अदृश्य शक्तियों के प्रकोप की आशंका करने लगते थे। बुधराय भी इसी सामाजिक वातावरण में पला-बढ़ा था। बेटी की हालत ने उसके मन में बैठे भय को और गहरा कर दिया। आखिरकार उसने गाँव के लोगों को इकट्ठा कर पंचायत बुलाने का निर्णय लिया।
उधर, रामलाल अपने बड़े भाई बागुन के साथ गाँव के दूसरे छोर से पंचायत की ओर आ रहा था। उनके साथ लातू हँसदा और उसके पिता रामेश्वर हँसदा भी थे। रास्ते में रामलाल ने अपने बड़े भाई से पूछा, “भैया, माही ने ऐसा क्या कर दिया है, जिसके कारण गाँव के लोगों को पंचायत बुलानी पड़ी?”
बागुन ने उत्तर दिया, “मुझे ठीक-ठीक कुछ पता नहीं है। वहाँ पहुँचेंगे, तब मालूम होगा।”
रामलाल के मन में चिंता होने लगी। माही अब कॉलेज जाने लगी थी और जीवन के उस पड़ाव पर थी, जहाँ अनेक नए अनुभव सामने आते हैं। क्षणभर के लिए उसके मन में आशंका उठी कि कहीं माही से कोई ऐसी भूल तो नहीं हो गई, जिसे लेकर गाँव के लोग नाराज हैं? लेकिन अगले ही पल उसे अपनी बेटी पर भरोसा हुआ। माही ने सत् दीक्षा ली थी और अपने गुरु के दिए नाम का अभ्यास करती थी। उसे विश्वास था कि इस दीक्षा ने उसकी बेटी के जीवन में सदाचार और आत्मिक शांति की भावना को मजबूत किया है।
जब वे विशाल पेड़ के नीचे पहुँचे, तब तक काफी लोग एकत्रित हो चुके थे। गाँव के मांझी हाड़ाम चातुर माँझी, संताली समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू, अभय टुडू, गणेश हेंब्रम और रामलाल के साले दिलीप हेंब्रम सहित अनेक ग्रामीण वहाँ उपस्थित थे। रामलाल ने सभी को जोहार किया। बागुन, लातू और रामेश्वर ने भी सबका अभिवादन किया और बैठ गए।
कुछ देर बाद चातुर माँझी ने बुधराय से पूछा, “तुमने गाँव के लोगों को इकट्ठा किया है। बताओ, आखिर बात क्या है?”
बुधराय उठकर खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर चिंता और नाराजगी दोनों दिखाई दे रही थीं।
उसने कहा, “मांझी बाबा, मैंने रामलाल की बेटी माही को कई बार समझाया कि वह मांझी हाड़ाम के थान पर मड़ोली करना बंद कर दे, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी। वह रोज सुबह-शाम वहाँ जाती है। अब मेरी बेटी चांदमनी तेज बुखार से पीड़ित है। वह बड़बड़ा रही है और ऐसी बातें कर रही है, जिन्हें सुनकर मेरा कलेजा काँप उठता है। मुझे डर है कि कहीं यह सब ग्रामदेवताओं की नाराजगी का परिणाम तो नहीं। जब से रामलाल और उसके परिवार ने उस दिकू गुरु से दीक्षा ली है, गाँव में बीमारियाँ बढ़ रही हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी के साथ-साथ गाँव के दूसरे लोगों पर भी कोई संकट आए।”
बुधराय की बात सुनकर कुछ लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। कुछ के चेहरों पर चिंता थी, जबकि दूसरे लोग चुपचाप सुनते रहे। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि चांदमनी के तेज बुखार का वास्तविक कारण क्या हो सकता है। पहले से मन में बैठी मान्यताएँ लोगों को बीमारी का संबंध धार्मिक आस्था से जोड़ने के लिए प्रेरित कर रही थीं।
चातुर माँझी ने कुछ देर विचार किया, फिर संताली समाज के अध्यक्ष सिनाराम मुर्मू की ओर देखते हुए कहा, “सिनाराम, तुम समाज के अध्यक्ष हो। इस विषय पर तुम्हें अपनी बात रखनी चाहिए। पंचायत को कोई निर्णय लेने से पहले सभी पक्षों की बात सुननी होगी।”
सिनाराम मुर्मू धीरे से उठे। उन्होंने उपस्थित लोगों की ओर देखा और गंभीर स्वर में कहा, “बुधराय की बात को पूरी तरह अनसुना नहीं किया जा सकता। हमारी संस्कृति, हमारे हापराम और हमारी परंपराओं का अपना महत्त्व है। उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। मैंने भी कई बार रामलाल को समझाया था कि वह उस दिकू गुरु से दीक्षा लेने के विषय में फिर से विचार करे, लेकिन उसने अपनी दीक्षा नहीं छोड़ी। मुझे भी चिंता है कि कहीं हम अपनी संस्कृति से दूर तो नहीं होते जा रहे हैं।”
कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा, “हमारी संताली संस्कृति की अपनी पहचान है। लेकिन किसी दूसरे गुरु से दीक्षा लेने के बाद अपनी पुरानी आस्था के साथ किस प्रकार संबंध रखा जाए, इस विषय पर मैंने पहले कभी ऐसा विवाद नहीं सुना। इसलिए मेरा विचार है कि पंचायत को इस मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। लेकिन माही की बात सुने बिना उसे दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हमें पहले उसी के मुँह से पूरी बात सुननी चाहिए।”
सिनाराम मुर्मू की बात सुनकर पंचायत में गंभीरता छा गई। कुछ लोग माही को बुलाकर उसकी बात सुनने के पक्ष में थे, जबकि कुछ अब भी अपनी पुरानी मान्यताओं के आधार पर निर्णय लेना चाहते थे।
विशाल पेड़ के नीचे कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। अब सभी की निगाहें चातुर माँझी की ओर थीं। निर्णय अभी होना बाकी था। उस शाम जिलिंगटांडी में केवल माही की पूजा-पद्धति पर चर्चा नहीं हो रही थी, बल्कि एक बड़ा प्रश्न भी सामने खड़ा था—क्या अपनी संस्कृति से प्रेम करने के लिए किसी दूसरे के विश्वास को अस्वीकार करना आवश्यक है? और क्या किसी परिवार की धार्मिक आस्था को गाँव में फैलने वाली बीमारियों का कारण मान लेना न्यायसंगत है?