DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | Chapter 6 Scene 3

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Chapter 6 Scene 3

मौसमे सर्मा को अभी ज़्यादा वक़्त नहीं हुआ था पर बरसात भी अपने आप को उससे ओझल न रख सका।

रह रहकर वो भी अपनी झलक सर्मा को दिखा रहा था और अब तूफ़ानी हवाएं और घिरते बादलों के ज़रिए वो सर्मा को अपने आने का पैग़ाम भी देने लगा, हालांकि सर्दी अभी बारिश के इस्तिक़बाल के लिए तयार नही थी। बारिश की हवाएं भी सर्द हवाओं में घुलने लगी, साथ मिलकर ये पेड़ पौधों से टकराती, धूल मिट्टी उड़ाती, किसी से भी टकराकर उनके कपड़े, बालों को बिखेर दे रही थीं। 

सुबह सूरज की तपिश में सुकून लेते लोग अचानक घिरते हुए काले बादलों को देखकर ताज्जुब में पड़ने लगे क्योंकि इस वक़्त वो मौसम के करामत को समझ ही नहीं पा रहे थे।

मीरास महल का भी कुछ ऐसा ही हाल था। उसके आंगन में बैठी खदिमाएं बदलते मौसम को देखकर उससे अपने आप को और उन फूलो की टोकरियों को बचाने के लिए उन्हें उठाकर बरामदे में आ गई

"ये अचानक मौसम को क्या होने लगा?" टोकरी उठाकर आसमान को देखते हुए एक लड़की ने कहा

"हम क्या ही कह सकते है इसके बारे में, ये तो क़ुदरत की करामत है।" अंदर टोकरी को सरियाते हुए मैथिली ने कहा

"बात तो सही है– मगर ऐसा भी हो सकता है सोचा नहीं था।" दूसरी लड़की ने कहा

"मुमकिन तो कुछ भी हो सकता है, वो क़ुदरत है उसमे क्या मुमकिन और क्या मुमकिन नहीं। ये भी तो हो सकता है किसी की दुआ क़ुबूल हुई हो।" मैथिली ने खड़े होकर यूंही कहा

"दुआ.....!, ऐसी दुआ भला कौन कर सकता है।"

"दुआ तो सबके पास अलग अलग होती है। क्या पता किसी को इसमें बारिश पसंद हो या उन्हें ज़रूरत हो।" इस बार मैथिली ने मज़ाकानह तौर पर जवाब दिया जिसपर सब हंसने लगे

"हो सकता है, जैसे मुझे धूप की गर्मी पसंद है।" एक लड़की ने भी हंसी मज़ाक करते हुए कहा

"और जैसे मुझे रात की हवा।" दूसरी लड़की ने भी हंसकर कहा

"और जैसे मुझे सावन के महीनों की हवा।" मैथिली ने बताया

"और.....जैसे मुझे आंधी और तूफ़ान।" हाथ में सेनी लिए हुए कुसुम भी इनके बीच आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर मैथिली ने पूछा "तुम तो ख़ुद ही तूफ़ान हो तो तुम्हे वही पसंद आएगा न।" उसपर कुसुम ने मुंह फूला लिया, फ़िर मैथिली ने सेनी देखकर पूछा

ये क्या है?"

"ख़ीर।"

"ख़ीर लेकर क्यों घूम रही हो?"

"अम्हेल आपी के लिए लेकर जा रहीं हूं।" 

"अच्छा रुक्मणि कहां है मुझे बताओगी, कहीं नज़र ही नही आ रही?" मैथिली ने पूछा 

"आपको नहीं मालूम? बदलते मौसम को देखकर वो बेचारी तो मजनू की याद में लैला बन गईं हैं।" नाटकी अंदाज़ में कुसुम को जवाब देता देखकर सब लड़कियां ज़ोर से हंसने लगी

"क्यों तुम बेचारी का मज़ाक बना रही जो, लाइब्रेरी वाली हरकत पर एक तो ऐसे ही मुश्किल से बच पाई हो।" मैथिली ने हंसकर कुसुम से कहा

"अच्छा ठीक है नहीं करते अब कुछ।" कुसुम हंसकर इक़ामतगाह की तरफ़ चली गई, और कुछ आगे रास्ते में केसरी उससे टकरा गई

"किधर जा रही हो तुम?" केसरी ने पूछा

"इक़ामतगाह जा रहे है और कहां जाएंगे।" 

"तुमसे कितनी बार कहा है ये सब काम मत किया करो, लाओ इसे हम दो।" केसरी सेनी कुसुम से लेने लगी उसको पीछे करके कुसुम ने उसे छेड़ते हुए कहा

"क्या हो गया केसरी, बस लेकर ही तो जा रहे है वैसे भी इक़ामतगाह जा रहे है हम, तुम्हारी ज़रूरत नही है हमें।"

"फिर अगर तुम्हारी वजह से हमें डाट पड़ी न तो हम शेख़ बाबा से तुम्हारी शिकायत लगा देंगे।"

"नही पड़ेगी डाट, हमने बाबा से कह दिया है मेरी वजह से तुम्हे कुछ न कहा करें। और तुम्हे मालूम हैना हमें बोर होना पसंद नही। तुम जाओ बीबीजी के पास।"

"हम जाते है लेकिन....।" केसरी की बात ख़त्म होने से पहले ही कुसुम आगे चली गई। "हमेशा मुझे डाट पड़ती हैं इनकी वजह से।" केसरी झल्लाकर दूसरी तरफ़ चली गई

अम्हेल का दरवाज़ा खटखटाकर कुसुम अंदर पहुंच गई। कमरे में हया और अम्हेल साथ बैठे हुए थे। दोनों को साथ देखकर कुसुम ने कहा

"वह वह आपलोग साथ में ही है।" मेज़ पर सेनी रखकर, ख़ीर का प्याला उठाकर दोनो को थमाकर वो अम्हेल के पास बैठ गई  "आपलोग आपस में क्या बातें कर रहे है मेरे बग़ैर?"

"तुम्हे ही याद कर रहे थे।" हया ने जवाब दिया 

"आपलोग ने देखा बादल कितने काले हो गए है।" उसने उत्तेजित होकर बताया

"क्या सच में?" अम्हेल ने पूछा

"आपने नही देखा बादल बिल्कुल काले घिर गए है और तूफ़ानी हवा भी चलने लगी है।" उसने उसी अंदाज़ में कहा

"हां ठंड बढ़ने का एहसास तो हुआ था।" अम्हेल बिस्तर से हटकर दरवाज़ा खोलकर छत पर चली गई, कुसुम और हया भी उसके पीछे आ गए

"कहां घिरे है काले बादल, बस हवा थोड़ी और ठंडी हो गई है।" हया ने आसमान में नज़र दौडाते हुए कहा 

"वही तो मैं भी देख रही हूं, आंगन में थी मैं तो बिल्कुल काले बादल छाए हुए थे। इतनी जल्दी कैसे बदल गया!" कुसुम ने इस करिश्मे पर हैरत जताया 

"तुम्हे क्या हो गया?" हया ने कुसुम को देखकर पूछा

"हम सच कह रहे है अभी काले बादल थे।" उसने उसी हैरत से कहा

"अरे कोई बात नही, मौसम तो बदलते ही रहते है, और अब तो सर्दी के बारिश के दिन भी आ रहें हैं।" हया ने कहा

"अभी कहां, अभी तो उसे आने में वक़्त है।" कुसुम ने आसमान देखकर कहा "अभी से ठंड इतनी हो गई है बारिश के बाद तो नजाने कितनी बढ़ जाएगी।"

"हम्मम, चलो अब अंदर आजाओ।" हया ने कहा और कुसुम के साथ अंदर आ गई। अम्हेल की नज़र, उस चांदनी रात की झलक को, और उसमें टहलते वलिए मीर को याद करते हुए, बग़ीचे की तरफ़ ठहर गई।

"अम्हेल आपी अंदर आकर ख़ीर ले लीजिए, वो ग़ज़लें बाद में गा लीजिएगा।" कुसुम ने मज़ाकाना तंज़ किया और अपनी बात पर ख़ुद हंस पड़ी, साथ में हया भी हंसने लगी, अंदर आकर दरवाज़ा भेड़ते हुए अम्हेल भी उसकी बात पर मुस्कुराकर बैठ गई

वाक़ई मौसम बदलते देर नहीं लगती। घिरते बादल अचानक से थम गए थे, सूरज दुबारा से असमान के बीचो बीच नज़र आने लगा। मौसम की तब्दीलियों को देखकर लगभग सभी हैरन और फिक्रमंद हो गए थे। कोई नही जानता की कब क्या हो जाएगा इसलिए मौसम को देखते हुए सभी ने अपने अपने लिए एहतियात बरता।