DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | Chapter 6 Scene 4

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Chapter 6 Scene 4

"अहलम की क्या ख़बर है?" कोर्ट रूम से ऐवान ए सद्र पहुंचते ही अम्मा साहब का पहला सवाल यही आया। 

"वो अपने कमरे में हैं... लेकिन केसरी बता रही थी की आली जान और वलिए मीर को याद करके बहुत उतरी उतरी सी हैं।" जवाब सुरूर से पेशे क़िदमत हुआ

"हम्म्म... जबसे ज़य्यान गए हैं वो मेरे पास भी नहीं आईं। हम कुछ देर में ख़ुद उनसे मिलने जाएंगे।" उन्होंने एक तरह से ऐलान किया 

"जी।" 

"क्या अम्हेल का ख़त रवाना करवा दिया गया है?" 

"जी अम्मा साहब, उसे गुप्त तौर पर शाही एलची के ज़रिए रवाना करवाया गया है।"

"बेहतर।... और इक़ामतगाह की क्या ख़बर है?"

"अभी तक कोई ख़बर नहीं आई है।" 

"दाईंजाँ।" दरवाज़े पर से रुक्मणि की हांफती हुई आवाज़ आई, उसे सुनकर सुरूर उसके पास पहुंच गई

"क्या हो गया?" 

"वो दाइजां....।" उसने सुरूर से कहा "मुश्ताक महल से मल्लिकाए अहसान की शाही सवारी आई है।" 

"शाही सवारी!" सुरूर ने ये ख़बर जल्दी से अम्मा साहब तक पहुंचाई। अम्मा साहब के अंदर ख़ुशी की लहर दौड़ गई

"मलिका जान आईं हैं।... जाओ सबको ख़बर करदो और उनके इस्तिक़बाल की तयारी करो।" उनका हुक्म जारी हुआ

रुक्मिणी फरमान लेकर इक़ामतगाह पहुंच गई। उसने उनके आने की ख़बर मैथिली को दिया और उसने खादिमाओं के साथ उनके इस्तेक़ाबाल की तैयारी शुरू कर दिया।

अम्मा साहब भी अपनी तैयारी में लग गईं। 

कुछ खादिम, खादिमांओं ने उनके इस्तेक़बाल के लिए ताज़ीम में सर झुकाकर महल के सामने के रास्ते को घेर लिया। लायलामी की सवारी महल के अंदर उनके बीच आकर ठहर गई।

कुछ ही पल में बिलाल शाही सवारी से बाहर आ गया। सबके चेहरे खिल उठे थे। उसकी आमद ने जैसे महल के लोगों के बीच नई उमंग भर दी। 
उसने लायलामी को भी सहारा दिया।

लायलामी उतरते ही सबसे पहले महल की तरफ़ बढ़ी जहां अम्मा साहब भी उनके इंतज़ार में खड़ी थीं।
लायलामी ने उन्हें गले मिल लेने के बाद पूछा 

"कैसी हो तुम?"

"बख़ैर हूं।... आप बताइए, आपका आना कैसे हुआ?" उनका लहजा उनकी शादमानी को बयां कर रहा था

"बस तुमसे मिलने का दिल चाहा तो चली आई।"

"महीनों बाद मीरास महल में आपको देखकर बहुत ख़ुशी हो रही है।"

"मुझे भी इतनी ही ख़ुशी महसूस हो रही है।" 

बिलाल दोनों लोगों को देखते हुए आगे की तरफ़ आ गया 

"अरे बड़ीमां मैं भी तो हूं। मुझ पर भी तो अपनी नज़रे इनायत डालिए।" 

"आपको मैं कैसे भूल सकती हूं।" उनकी ख़ैर-ख़्वाह नज़र उसपर पहुँची "हां मगर आपने तो बहुत लंबा इंतज़ार करवा दिया।"

"उम्र का तकाज़ा है, और साथ ही नज़ाकते फ़र्ज़।

"उम्र और ज़िम्मेदारी! आपकी शरारतें अभी तक वैसी ही हैं।" अम्मा साहब ने उसका कान पकड़कर खींच लिया

"हूं तो मैं आपका ही बेटा न।" उसका ख़ुशतबई अंदाज़ बरक़रार रहा

"सही कहा आपने। आइए अब अंदर चलिए।"
अम्मा साहब के साथ सबलोग दरबारे-ख़ास की तरफ़ बढ़ने लगे।

पीछे दोनों महलों की खादिमाएं भी थीं। सारे लोग दरबारे-ख़ास पहुंचकर तशरीफ़ फरमा हो गए। 

लायलामी ने अपनी खादिमाओं से, लाया हुआ तश्तो-तोहफ़ा इशारे से मीरास महल की खादिमांओं के हवाले करवा दिया। मीरास महल की तरफ़ से मेहमान नवाज़ी भी शुरू हो गई।

"महल का सूरते हाल कैसा है?" लायलामी ने किसी मामले पर रौशनी डालना चाहा

"सब ख़ैर है। हालात काफ़ी सुधर गए हैं।" उन्होंने बताया

"इसके लिए तुमने तशद्दुद भी सहा है और सख़्तियां भी। तुम्हारी मेहनत ही रंग ला गई है।" 

"इसमें आपने और शेख़ बाबा ने भी हमारा बहुत साथ दिया है। उस वक़्त में आपने हमें बहुत संभाला था।" 

"हमें तो हर क़दम तुम्हारे साथ रहना लाज़मी ही था, आख़िर तुम्हें मीरास महल की बहु बेगम के दर्जे पर फ़ायज करने के मान हमने ही तो पाया था। फ़िर आख़िर दरमियान सफ़र में तुम्हारा साथ कैसे छोड़ देते भला।"

दोनों नरमी से मुस्कुराने लगे।
"काफ़ी दिनों से हम महल आने के ख़ाहिशमंद थे। तुमसे मिलकर दिल को सुकून हुआ।" 

इन सब में बिलाल की नज़रें हर तरफ़ किसी को ढूंढने में लगी थीं, उसकी तवज्जो दरबारे ख़ास में थी ही नहीं।
उसपर ध्यान देते हुए लायलामी ने उसे पुकारा

"बिलाल।... ध्यान कहां है आपका?"

"देख रहा हूं काफ़ी शांति  यह।... क्या किसी को हमारे आने की ख़बर नहीं है बड़ीमां? लगता है किसी को मुझसे मिलने की चाहत ही नहीं है।"

"आपकी नन्ही शहज़ादी नागाहानी का शिकार होकर कमरे में आराम फरमा हैं।" 

"नागहानी में!" उसका मुस्कुराता चेहरे पर फ़िक्र के असरात नज़र आने लगे "उन्हें क्या हो गया?"

"उनके पैरों में चोट आ गई थी जिसकी वजह से वो ज़्यादातर आराम फरमा रहतीं हैं।"

"फ़िर तो मुझे उनतक जाना होगा।" उसने हाथ में थामी चाय की प्याली तशत पर रख दिया 

"जी बिल्कुल।" उसे अम्मा साहब से इजाज़त मिल गई।

बिलाल जाने के लिए खड़ा हो गया। उसे रास्ता दिखाने के लिए उसके साथ एक खादिमा जाने लगी 
"तुम रहने दो, मैं चला जाऊंगा।" उसे ठहराकर वो चला गया

दरबारे-ख़ास से अहलम के कमरे तक जाते हुए वो हर रास्ते को देख रहा था और उसकी नज़र किसी को लगातार ढूंढने में थी लेकिन ज़्यादातर उसे हर तरफ़ ख़ामोशी ही मिली। 

अहलम के कमरे के पास पहुंचकर उसने बाहर से उसे आवाज़ लगाया 

"क्या मुझे अंदर आने की इजाज़त है?"

अहलम उसकी आवाज़ सुनते ही पहचानकर बिस्तर पर से कूद कर खड़ी हो गई। 

"भाईजान!" उसने उत्साहित होकर कहा।

दरवाज़ा खोलने केसरी दरवाज़े के पास पहुंच गई।

बिलाल अंदर आ गया, अहलम बिना इंतज़ार उछलते हुए उसकी तरफ़ बढ़ गई 

"भाईजान ये आप हैं?"

"शहज़ादी...।" बिलाल ने इस लफ्ज़ पर ख़ास तवज्जो और ज़ोर दिया "ये लापरवाही और ग़ैर ज़िम्मेदाराना अंदाज़ आप पर ज़ेब नही देते। ये चोट कैसे लगी आपको?"

"ये तो आप ही हैं। आपकी आदतें अभी तक बदली नही।" उसने बिलाल को अंदर लाकर बिठा लिया "आपने क्यों इतना अरसा लगाया आने में? क्या आपको अपनी नन्ही शहज़ादी का ज़रा भी ख़्याल नही आता था?" 

अहलम का मन ज़य्यान के जाने से काफ़ी उदास था और बिलाल को देखकर उसने शिकायतों की पोटली खोल दिया "एक तो बड़े भाई हमेशा मसरूफ़ रहते हैं और छोटे भाई आते भी हैं तो हफ्ता भर के लिए और आप..... आप तो बिल्कुल मुझसे मिलने नही आते।" 

"ऐसा मुमकिन है भला की मैं आपको भूल जाऊं। लेकिन महल की ज़िम्मेदारियों में इतनी मासरूफ़ियत हो गई है के वक़्त नहीं मिल पाता।"

"लेकिन मैं आपसे नाराज़ हूं।.. भला कोई ऐसे बहाने बनाता है अपनी छोटी बहन के सामने।" 

अहलम की शिकायतें देखकर वो उसके बचपन को याद करके अफ़सोस नाक चेहरा बनाकर उसके सामने अपने घुटनो पर बैठ गया, बिल्कुल वैसे जैसा बचपन में किया करता था 

"मेहरबानी करके मुझे माफ़ कर दीजिए शहज़ादी, ऐसी ग़लती मुझसे दुबारा हरगिज़ नहीं होगी मगर आप मेरी जान बक्श दीजिए... बस इस दफ़ा।" 

"नहीं, ऐसा मुमकिन नहीं, हम बिलकुल नहीं सुनेंगे, हमारे राज में ऐसी ग़लतियों की कोई माफ़ी नहीं होती सिर्फ़ सज़ा होती है, इसलिए बेहतर है की आप अपनी सज़ा पाने के लिए तयार हो जाइए।" बिलाल को देखकर उसका साथ देते हुए अहलम भी इसमें शामिल हो गई

"शाहज़ादी, इस दफ़ा, बस एक दफ़ा, मैं आपको यक़ीन दिलाता हूं आइंदा भूल के भी ऐसी भूल नहीं होगी मुझसे। मैं इस क़दर उलझ गया था की मुझे वक़्त नहीं मिला। वरना मैं आपको नज़रअंदाज़ करूं ऐसी जुर्रत मुझमें कहां?" 

"आप क्या चाहतें है के आप अपनी ग़लतियों पर पर्दा डालने के लिए ऐसे बहानों का इस्तेमाल करे और हम आपकी बेबुनियाद बातों पर यक़ीन कर लें? अगर हमने ऐसा किया तो हमारे और भाई भी ऐसी ही उम्मीद करेंगे हमसे, हम उन्हें क्या जवाब देंगे?"

"ये बेबुनियाद बहाने नही, मैं वाक़ई आपसे एक एक लफ़्ज़ सच कह रहा हूं। आप चाहिए तो अपने कारिंदो से मालूम करवा लीजिए।" 

थोड़ी देर ख़ामोश होकर बिलाल ने कुछ सोचते हुए फिर वही रवय्या अपना लिया
"क्या आप मुझपर वाक़ई ये ज़ुल्म कर पाएंगी, क्या मुझे सज़ा देकर आपको सुकून मिल पाएगा?"

"भाईजान अब खड़े हो जाइए।" उसके अफ़सोस नाक चेहरे को देखकर अहलम की नाराज़गी शांत हो गई
"आप सारे भाई ख़ूब जानते हैं कि मुझे अपनी बातों में ले लेना।" उसने नाक चढ़ाकर कहा

"तो क्या इसे मैं आपकी माफ़ी समझूं?" 

"मैं सोच सकती हूं।"

"क्या आपकी नाराज़गी ख़त्म हो गई?"

"एक शर्त पर।" अहलम ने सोचकर कहा

"फरमाइए।"

"मैं कई दिनों से कमरे में बंद हूं और बाबा की वजह से ये केसरी मुझे कहीं जाने भी नही दे रही और अब मुझे यहां अच्छा नहीं लग रहा है बिल्कुल....इसलिए आप मुझे अब मैदान लेकर चलेंगे।"

"क्या फिर ये नाराज़गी ख़त्म हो जाएगी?" 

"जी हां, बिल्कुल हो जाएगी।"

"ठीक है फ़िर हम ज़रूर चलते हैं।"

वो बिना सोचे राज़ी हो गया, और उसे लेकर मैदान के जानिब जाने लगा।

केसरी की हिम्मत उसे रोकने की नहीं थी इसलिए वो भी डरते हुए उनके पीछे चलते चलते अहलम को अगाही देती रही

"बीबीजी ध्यान से, बीबीजी आराम से।" 

चलते हुए फ़िर से बिलाल ने हर तरफ़ नज़र दौड़ाकर अहलम से सवाल किया

"आपके महल में इस क़दर ख़ामोशी का आलाम क्यों है?"

"क्योंकि छोटा भाई और बड़े भाई दोनो ही महल से बाहर गए हुए है।" उसने आह भरकर मुंह लटका कर बताया

"और शेख़ बाबा वो भी कहीं नज़र नही आए?" 

"वो तो अनाबी के साथ कोर्ट रूम में है और मुंशीजी भी वही होंगे।"

"और बाक़ी लोग?"

"आजी अब जल्दी शिक़ ए मसकन से बाहर नहीं आती और कुसुम तो अब ज़्यादातर अम्हेल आपी के साथ इक़ामतगाह की तरफ़ रहती है।" 

"अच्छा तो वो इक़ामतगाह की तरफ़ रहतीं हैं।" उसने मुस्कुराते हुए कहा और मैदान की तरफ़ चला गया।

क़ुदरत के मौसम की तरह महल का मौसम भी ऊपर नीचे होता रहा था, लेकिन उसके बाद भी सब जैसा चल रहा था चलता रहा।
मीरास महल बता रहा था कि आने वाले तूफ़ान से लाख़ पौधे टूटें, पत्ते झरें लेकिन एक मज़बूत पेड़ को दूसरों का सहारा बनने के लिए आख़री दम तक मज़बूती से खड़े रहना पड़ता है।