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सब्जीश्री

कहानी—

2/29एल24

सब्जीश्री

ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाष'

ट माटर टोकरी से ।ांका. टीवी पर सुदरीश्री कार्यक्रम आ रहा था. यह देख कर उस ने पास ही बैठे हुए धनियाजी से कहा,‘‘ भाई धनियाजी ! वह देखों. क्या मस्त कार्यक्रम आ रहा है ?''

‘‘ हां टमाटरजी,'' धनिया ने टीवी की तरफ देख कर कहा.

तभी टीवी से आवाज आई,‘‘ सुंदरीश्री का खिताब जाता है.......मिस गीताजी को...'' यह सुनते ही सभी ने जोरदार तालियां बजा दीं.

यह देख कर टमाटर और धनियाजी कैसे पीछे रहते. उन्हों ने भी जोरदार तालियां बजा दीं,

‘‘ वाकई, आज हम ने बहुत बढ़िया कार्यक्रम देखा है,'' धनियाजी ने कहा तो टमाटर बोला,‘‘ काष ! हम भी ऐसा कोई कार्यक्रम रख पाते ?''

‘‘ हांहां क्यों नहीं,'' टोकरी में बैठा बैंगन बोला,‘‘ चलों ! हम भी सब्जीश्री कार्यक्रम रख लेते हैं. सभी सब्जियां रैंप पर वौकआऊट करेगी. जो सब्जी सब से श्रेष्ठ होगी, उसे ‘‘सब्जीश्री'' का खिताब दिया जाएगा.''

यह प्रस्ताव टमाटर और धनियाजी को भी पसंद आया. सभी ने एक साथ इस का समर्थन किया.

फिर क्या था. देखते ही देखते ‘‘सब्जीश्री'' कार्यक्रम शुरू हो गया.

इस कार्यक्रम का अध्यक्ष धनियाजी को बनाया गया था. प्रस्तुतकर्ता थे टमाटरजी. इन दोनों का इस कार्यक्रम का निर्णायक भी बनाया गया था.

सब से पहले रैंप पर लौकी ने वौकआऊठ किया. वह बनठन कर आई थी. उस की चाल में मस्ती थी,‘‘ लौकी मेरा नाम,

सब्जी में आना काम.

रंग मेरा हराभरा है,

न हल्का, न गहरा है.''

लौकी की सीधीसाधी बातें सुन कर सभी सब्जियों ने तालियां बजा दी.ं उन्हें लौकी का इतरा कर चलना पंसद आ रहा था. ऐसा करते हुए सब्जियों ने पहली बार देखा था इसलिए सभी खुष थी. और सभी को मजा भी आ रहा था.

बैंगन भला कैसे पीछे रहता. उसी ने इस कार्यक्रम को शुरू करने की राय दी थी. वह रैंप पर कूदताफांदता आया,‘‘ सब्जियों का मैं राजा

लंबाचौड़ा ताजा.'' कहते हुए नीलेनीले बैंगन ने वाकआऊट किया.

अरबी बहुत बेताब थी. बैंगन के रैंप से वापस लौटते ही अरबी ने रैंप पर कदम रखा. वह जोर से फिसलती हुई आई. फिर अचानक रूकी. घुटने के बल बैठते हुए उस ने दोनों हाथ जोड़ लिए. फिर इतराते हुए बोली,‘‘ चिकनीचुपड़ी और सफेद,

जैसे गूंदा हुआ मैदा.

खाते सब के सब

करता नहीं कोई भेदा.''

शरमिली भिण्डी आराम से बैठी थी. अरबी के बातें सुन कर वह भी उत्साहित हो गई. वह ।ट से टोकरी से उतरी. रैंप पर आते हुए बोली,‘‘ हरीभरी हूं मैं भिण्डी,

सम।ें न मु। को टिण्डी.''

कहते हुए वह खिलखिला कर हंस पड़ी. उस के हंसते ही सब सब्जियों ने ताली बजा दी.

अंत में आलू बचा था. वह रैंप में जाना नहीं चाहता था. उसे माालुम था कि उस में कोई रंगरूप नहीं है. वह रैंप पर जा कर क्या कहेगा. इसलिए वह चुपचाप बैठा था. भिण्डी से रहा नहीं गया. उस ने आलू को छेड़ा,‘‘ भाई आलूजी ! तुम रैंप पर क्यों नहीं जाते ?''

‘‘ मैं वहां जा कर क्या करूंगा. मेरा रंगरूप भी अच्छा नहीं है,'' आलू ने कहा तो बैगन बोला,‘‘ भाई रूपरंग को जाने दो. रैंप पर वाकआऊट करने का मजा तो ले आओ.''

तब कहीं जो कर आलू ने अंत में रैंप पर प्रवेष किया. वह नहाधो कर आया था. उस ने धनिए की छतरी लगा रखी थी. सिर पर टमाटर की जोरदार कैप थी. वह बहुत बढ़िया लगा रहा था. वह रैंप पर आते ही बोला,‘‘

भाईयों ! न मु। में रंग है न रूप

दिखता हूं जैसे पड़ा हुआ ठूंठ.

सब सब्जियों के आता काम,

सीधासादा हूं, आलू मेरा नाम.'' कहते हुए आलू ने ।ूक कर सलाम किया.

उस के इस अंदाज पर सभी सब्जियों ने ताली बजा दीं. आलू उसी अंदाज में मुस्कराता हुआ वापस चलता बना. उस के आनेजाने का अंदाज बढ़िया था.

अंत में कार्यक्रम का निर्णय करने का समय आया. सभी सब्जियां धनियाजी व टमाटर को निहार रही थी. वे आपस में विचारविमर्ष कर रहे थे.

इधर बैंगन सोच रहा था कि वह सब से अच्छी सब्जी है. उस का रंगरूप बढ़िया है. सिर पर डंडीनुमा ताज है. इसलिए यह ताज उसे ही मिलेगा.

लौकी अपनी चिकनाई व हल्के हरे रंग पर मौहित थी. उसे लगा कि वह अपने रंग व स्वाद के कारण यह ताज ले जाएगी.

अरबी अपनी चिकनाई पर मुग्ध थी. उसे मालुम था कि धनियाजी व टमाटर उस की चिकनाई में फिसल कर उसे ही ताज देंगे.

भिण्डी अपने निराले स्वाद पर प्रसन्न थी. उसे पता था कि उस का गहराहरा रंग सब को पसंद है. सब उस की सूखी सब्जी खा कर इतराते हैं. इसलिए यह ताज उसे ही मिलेगा.

इसलिए सभी की निगाहें टमाटर व धनियाजी के निर्णय पर टिकी हुई थी.

टमाटर ने अपनी कुर्सी पर उठते हुए कहा,‘‘ भाइयोंबहनो ! यह ताज कौन जीतता है ? यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है. महत्व तो इस बात का है कि कौनकिस से मिल कर रहता है.

‘‘ वैसे हर सब्जी की अपनी विषेषताएं है. उन में अपने गुण है. हर सब्जी का अपना रंगरूप है. इसलिए कोई भी सब्जी सभी गुणों से भरपूर नहीं है. इसलिए हम ने तय किया है कि हम सर्वमान्य गुण के आधार पर इस कार्यक्रम का निर्णय करेंगे,'' कहते हुए टमाटर ने कहा,‘‘ अब इस आधार पर धनियाजी सब्जीश्री होने का फैसला आप का सुनाएंगे.''

यह सुनते ही सब सब्जियां एकदूसरे का मुंह देखने लगी. उन्हें सम। में नहीं आ रहा था कि ये किस गुण के आधार पर सब्जीश्री का फैसला करेंगे. उन्हें यह जानने की तीव्र जिज्ञासा थी कि कौन सब्जीश्री बनेगा.

तभी धनियाजी ने खड़े होते हुए कहा,‘‘ साथियों ! समाज में वहीं सब से ज्यादा आदर पाता है जो एकदूसरे के साथ हिलमिल कर काम करता हो. एकदूसरे की मदद करता हो. उसे ही हम सब से अच्छा मानते हैं.

‘‘ बस , इसी एक गुण को ध्यान में रखते हुए मैं आलूजी को सब्जीश्री का खिताब देता हूं.''

यह सुनते ही सब ने तालियां बजा दी.

सब सब्जियां सम। गई थी कि आलू ही एकमात्र ऐसी सब्जी है जो हर सब्जी के साथ मिल जाती है. वह हरेक के काम आता है. जिस सब्जी के साथ मिलता है, उस का स्वाद बढ़ा देता है. कभी वह अकेला तो कभी सभी के साथ मिल कर सब्जी की सहायता करता रहता है. इसलिए सच में वहीं ‘‘ सब्जीश्री'' के ताज का असली हकदार है.

यह सम।ते ही सब सब्जियां मुस्करा दी.

‘‘ धन्यवाद धनियाजी,'' भिण्डी ने कहा और आलू ने टमाटर के हाथ से ताज पहन लिया.

हाल तालियां की गड़गड़ाट से गूंज उठा.

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दिनांक— 07.10.2009प्रमाणपत्र

प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्तुत रचना मेरी मौलिक है. यह कहीं से ली अथवा चुराई नहीं गई है. इसे अन्यत्र प्रकाषन हेतु नहीं भेजा गया है.

ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाष'

अध्यापक, पोस्टऑफिस के पास

रतनगढ—485226 जिला—नीमच (मप्र)

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