कहाँ गईं तुम नैना - 4

      
           कहाँ गईं तुम नैना (4)


नैना का केस पुलिस इंस्पेक्टर नासिर अहमद को सौंपा गया था। नासिर ने अब तक इस केस में जो जाँच पड़ताल की थी उससे कोई खास नतीजा नहीं निकला था। आदित्य ने जमुना प्रसाद पर शक ज़ाहिर किया था। लेकिन वह सत्ताधारी दल का विधायक था। उस पर आसानी से हाथ नहीं डाला जा सकता था। नासिर ने उन गुंडों को गिरफ्तार कर पूँछताछ की थी जिन्होंने नैना को धमकी दी थी। लेकिन उन्होंने भी जमुना प्रसाद का नाम नहीं लिया था। गुंडों का कहना था कि उन्हें एक अंजान आदमी ने पैसे देकर नैना को धमकाने के लिए कहा था। पोल खोल शो के ज़रिए नैना ने और भी कई लोगों का पर्दाफाश किया था। अतः यह हरकत किसी की भी हो सकती थी। 
अपने शो में नैना ने जब फुलवारी केस के बारे में सबूत रखे थे तब भी उनमें कुछ ऐसा नहीं था जिससे जमुना प्रसाद को सीधे सीधे घेरा जा सके। अनाथालय के उस कर्मचारी ने जिसने छिपे हुए कैमरे पर बात की थी यह कहा था कि सविता जमुना प्रसाद को जानती है। वह उनके इशारों पर काम करती है। लेकिन गिरफ्तारी के बाद सविता ने बयान दिया कि वह जमुना प्रसाद को नहीं जानती है। इसलिए जमुना प्रसाद के खिलाफ कोई सबूत नहीं था।
पुलिस स्टेशन में आदित्य इंस्पेक्टर नासिर के सामने बैठा था। 
"अब तक की जाँच का तो यही नतीजा निकला है मि. आदित्य। अब बिना किसी ठोस सबूत के हम जमुना प्रसाद पर हाथ नहीं डाल सकते हैं। फिर पोल खोल शो से तो औरों का भी नुकसान हुआ था। उनमें से भी कोई यह हरकत कर सकता है।" 
इंस्पेक्टर नासिर की बात सुन कर आदित्य गंभीर हो गया। उसे लग रहा था कि जमुना प्रसाद ने ही नैना को गायब किया है। जबकी पुलिस को उसके विरुद्ध कुछ भी नहीं मिला था। नैना का केस अभी ज़रा सा भी आगे नहीं बढ़ा था। वह परेशान हो गया। उसे परेशान देख कर इंस्पेक्टर नासिर ने कहा।
"हम नैना के कॉल डीटेल के बारे में पता करने की कोशिश कर रहे हैं। शायद उससे कुछ पता चले। हम दूसरे लोगों का पता करने की कोशिश करेंगे जो नैना को धमकी दिला सकते थे।"
आदित्य उठ कर खड़ा हो गया। 
"ठीक है इंस्पेक्टर नासिर तो मैं चलता हूँ। आपको कोई नई बात पता चले तो मुझे बताइएगा।"
पुलिस स्टेशन से निकलते ही आदित्य ने चित्रा को फोन किया। उसने चित्रा से मिलने का समय मांगा। चित्रा ने कहा कि वह दोपहर डेढ़ बजे उससे मिल सकती है। पर इस बार उसे उसके चैनल के दफ्तर के पास वाले रेस्टोरेंट में आना होगा। चित्रा ने उसे रेस्टोरेंट का नाम बता दिया।
अभी सुबह के साढ़े ग्यारह बजे थे। वह अपने फ्लैट पर गया। जब से वह आया था उसने अपने ऑफिस का कोई हाल नहीं लिया था। उसने शीरीन को फोन मिलाया। 
"हैलो शीरीन। कैसी हो ?"
"मैं ठीक हूँ। तुम बताओ नैना के बारे में कुछ पता चला।"
"पुलिस तफ्तीश कर रही है। पर अभी कोई सफलता नहीं मिली। मैं सोंचता हूँ कि मैं भी अपनी तरफ से कोशिश करूँ। अभी कह नहीं सकता हूँ कि कब तक यहाँ रहना पड़े। ऑफिस में सब ठीक है ना। मेरी कोई ज़रूरत पड़े तो बताना।"
"आदित्य तुम यहाँ की बिल्कुल भी फिक्र मत करो। मैं सब संभाल लूँगी। तुम नैना को तलाशने में अपना ध्यान लगाओ।"
शीरीन से बात करने के बाद आदित्य का मन हल्का हो गया। वह सोंच रहा था कि शीरीन जैसी दोस्त मिलना सचमुच सौभाग्य की बात है। उसके हर कठिन समय में वह उसके साथ खड़ी रही। चाहे वह समस्या व्यक्तिगत हो या बिज़नेस की। नैना के साथ जब वह अलग हुआ था तब शीरीन ने ही उसे टूटने से बचाया था। 
आदित्य ने निकलने से पहले कुछ कपड़े जिन्हें धुलने के लिए देना था लांड्री बैग में डाल कर रख दिए। उसने सोंचा कि लौटने के बाद इन्हें किसी लांड्री में धुलने के लिए दे आएगा। 
आदित्य सही समय पर रेस्टोरेंट पहुँच गया। कुछ ही समय में चित्रा भी वहाँ पहुँच गई। आदित्य ने उसे नैना के केस में अब तक जो भी प्रगति हुई उसके बारे में बताया।
"चित्रा पुलिस का तो कहना है कि जमुना प्रसाद पर सीधे हाथ डालने लायक सबूत नहीं हैं। लेकिन मुझे ये लगता है कि हो ना हो पर जमुना प्रसाद ही नैना के गायब होने में उसका ही हाथ है।"
"हो सकता है। भले ही जमुना प्रसाद के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिले हों। पर नैना का भी मानना था कि वह आपराधिक प्रवृत्ति का है। नैना ने मुझे बताया था कि वह जमुना प्रसाद के खिलाफ सबूत खोजने का प्रयास कर रही थी। इसके लिए उसने बसंत नाम के एक व्यक्ति को लगाया था। पोल खोल शो के लिए भी उसने नैना की मदद की थी।"
"मतलब बसंत के पास जमुना प्रसाद के खिलाफ कोई सबूत हो सकता है।"
"आदित्य छुट्टी पर जाने से कुछ दिन पहले नैना ने मुझे बताया था कि बसंत से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। शायद वह अपने घर चला गया हो। उसने कहा था कि लौटने के बाद पता करेगी।"
"तुमको बसंत का नंबर मालूम है।"
"नहीं नैना ही उससे काम कराती थी। उसके पास ही उसका नंबर था।"
"ओह..अगर बसंत से मिल पाता तो वह मेरी मदद कर सकता था।"
खाना सर्व हो गया था। खाते हुए चित्रा आदित्य की बात के बारे में सोंच रही थी। अचानक ही जैसे उसे कुछ याद आया।
*नैना ने एक बार मुझे बताया था कि गार्गी कॉलेज के पास एक शंकर टी स्टॉल है। शंकर पाल उसका मालिक बसंत के ही गांव का है। तुम उससे मिलो। हो सकता है वह बसंत के बारे में तुम्हें कुछ बता दे। "
"थैंक्यू चित्रा...तुमने मेरी मदद की।"
"मैंने पहले ही कहा था कि नैना की तलाश में जो मदद कर सकूँगी वह करूँगी।"
आदित्य ने तय कर लिया कि यहाँ से सीधे वह शंकर पाल से मिलने जाएगा। 
शंकर टी स्टॉल पर दो लोग बैठे चाय पी रहे थे। पहले से बैठे ग्राहक पैसे देकर जाने लगे तो शंकर ने टोंका कि साहब अपने कुल्हड़ उठा कर कूड़ेदान में डालिए।
आदित्य को देखते ही शंकर बोला।
"आइए साहब। सिर्फ चाय पिएंगे या बन मक्खन भी लेंगे।"
"केवल चाय..."
शंकर ने मिट्टी के कुल्हड़ में चाय लाकर आदित्य को दी। चाय पीते हुए आदित्य बात शुरू करने का बहाना ढूंढ़ रहा था।
"बसंत ने जैसी बताई थी चाय वैसी ही है। मज़ा आ गया।"
आदित्य की बात सुन कर शंकर ने उसे गौर से देखा।
"आप बसंत को कैसे जानते हैं।" 
"हाँ... मैं नैना का पती हूँ।"
"वही टीवी वाली नैना मैडम।"
"हाँ.."
आदित्य ने उससे कहा कि वह बसंत से मिलना चाहता है। यह सुन कर शंकर कुछ नाराज़ हो गया।
"बड़ी मुश्किल से उसकी जान बची है साहब। उस जमुना प्रसाद के लोगों ने तो उसे मार ही दिया था। वह नैना मैडम का ही काम कर रहा था। लेकिन उन्होंने तो उसकी सुध तक नहीं ली।"
"नैना ने उसे फोन करने की कोशिश की पर उसका नंबर नहीं लगा। उसके बाद से तो नैना भी गायब है। मुझे लगता है कि नैना को उसने ही अगवा कराया है। इसीलिए चाहता था कि बसंत से मिलूँ। शायद वह कोई मदद कर सके।"
नैना के गायब होने की बात सुन कर शंकर को अपनी रुखाई पर अफसोस हुआ। इस बार नर्मी से बोला। 
"साहब जमुना प्रसाद के गुंडों ने बसंत को मार मार कर अधमरा कर दिया था। उन्होंने उसका फोन भी तोड़ दिया। वो लोग उसे रेल की पटरी पर फेंक कर भाग गए थे। किसी भले आदमी ने उसे अस्पताल पहुँचा दिया। बहुत मुश्किल से जान बची।"
"ओह....अब बसंत है कहाँ ?"  
शंकर ने कुछ बताने से पहले अगल बगल देखा। 
"साहब उसके बाद बसंत बहुत डर गया। वह अपने घर चला गया। वहीं है। बस घर में पड़ा रहता है। कहीं निकलता भी नहीं।"
"शंकर तुम समझ रहे हो ना मेरा उससे मिलना बहुत ज़रूरी है।"
शंकर ने एक बार फिर तसल्ली करने के बाद कहा।
"हम दोनों गाज़ियाबाद के अगरौला गांव के रहने वाले हैं। मैं आपको उसका पता लिख कर दे देता हूँ। आप जाकर मिल लीजिए।"
शंकर ने एक कागज़ पर पता लिख कर दे दिया। आदित्य ने उसे धन्यवाद दिया। चाय के पैसे चुका कर वह कार में आकर बैठ गया। आगरा से चलते समय जल्दबाज़ी में वह सही से पैकिंग नहीं कर पाया था। उसे कुछ ज़रूरी सामान और कपड़े लेने थे। वह शॉपिंग मॉल की तरफ बढ़ गया। 
घर पहुँचते पहुँचते शाम के छह बज गए। वह कुछ देर आराम करने के लिहाज़ से सोफे पर लेट गया। वह सोंच रहा था कि कल सुबह ही वह गाज़ियाबाद के लिए निकल जाएगा। बसंत से मिल कर उसे शायद कोई सुराग मिले जिससे वह नैना तक पहुँच सके। नैना के बारे में सोंच कर हर पल उसका दिल बेचैन रहता था। वह कहाँ होगी, किस हाल में होगी सोंच कर वह दुखी हो जाता था। सोफे पर लेटे लेटे उसकी आँख लग गई। 
जब वह जागा तो करीब आठ बजे थे। उसने सोंचा आज डिनर के लिए वह खुद अरुण अंकल के घर चला जाए। अरुण अंकल उसे देख कर खुश हुए। उन्होंने कहा कि वह उससे मिलना चाहते थे। किंतु कुछ दिनों से बीमार रहने के कारण उसके पास नहीं आ सके। आदित्य ने कहा कि आना तो उसे चाहिए था। पर वह भी अपनी उलझनों में फंसा था। उसने नैना के केस में अब तक जो हुआ सब उन्हें बता दिया। 
"अंकल कल सुबह ही मैं बसंत से मिलने के लिए निकल जाऊँगा। देखिए शायद भगवान कुछ मदद करें।"
"बेटा भगवान सब ठीक करेगा। बस तुम सावधान रहना। जमुना प्रसाद बहुत खतरनाक लगता है।"
डिनर के बाद चलते समय आदित्य ने रमेश से कहा कि उसके कुछ कपड़े हैं। वह उन्हें लांड्री में धुलने के लिए दे आए। रमेश ने कहा कि वह जाते हुए चाबी दे जाए। कल वह फ्लैट की सफाई भी कर देगा और कपड़े भी धो देगा।

 

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