कहाँ गईं तुम नैना - 8



               कहाँ गईं तुम नैना (8)



उस दिन आदित्य करीब आठ बजे घर पहुँचा तो पाया कि महक बाहर खड़ी उसकी प्रतीक्षा कर रही है। उसे वहाँ देख कर आदित्य को आश्चर्य हुआ। महक हंस कर बोली। 
"आज मैंने सोंचा कि तुम्हारे घर चल कर धावा बोला जाए। पर तुम्हारा चेहरा बयां कर रहा है कि तुम मुझे देख कर खुश नहीं।"
उसकी बात सुन कर आदित्य खुद को संभालते हुए बोला।
"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। आओ अंदर आओ।"
कह कर वह दरवाज़ा खोलने के लिए आगे बढ़ गया। महक उसके पीछे पीछे अंदर आ गई। चारों तरफ नज़र दौड़ा कर बोली।
"नाइस प्लेस....तुम यहाँ अकेले रहते हो।"
"हाँ नैना न्यूज़ चैनल में काम करती है। वह दिल्ली में ही रहती है।"
"ओह....पर तुम लोग मिल पाते हो ?"
"हाँ कभी मैं दिल्ली चला जाता हूँ तो कभी वो यहाँ आ जाती है।"
आदित्य उसे बैठा कर चेंज करने चला गया। लौट कर आया तो महक सोफे पर बैठी हुई थी। 
"तुम कुछ लोगी ?"
"जो भी तुम पिओ।" 
आदित्य के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह अपने साथ महक के लिए भी ड्रिंक बना कर ले आया। ड्रिंक सिप करते हुए महक बोली। 
"तुम दोनों अलग अलग रहते हुए भी एक दूसरे के बहुत करीब हो।"
आदित्य के मन में गर्व का भाव पैदा हुआ। काम के सिलसिले में दोनों अलग शहरों में रहते थे। पर उनका रिश्ता अभी भी मजबूत था। यह उन दोनों के आपसी प्यार व विश्वास का परिणाम था। 
महक कुछ गंभीर हो गई। आदित्य की तरफ देख कर बोली। 
"मेरी किस्मत तुम्हारे जैसी नहीं है। मैंने जिसे प्यार किया उसे मेरा प्यार बंधन लगता था। 
"कौन था वह ? अगर बताना चाहो तो।"
"अपने दिल का दर्द तुम्हें नहीं तो किसे बताऊँगी। पर पहले मेरे लिए एक और ड्रिंक बना लाओ प्लीज़।"
आदित्य अपने और उसके लिए ड्रिंक बना लाया। दो घूंट पीने के बाद वह कुछ क्षण चुप रही। उसके बाद उसने अपनी आप बीती बनानी शुरू की.....

महक की मेहनत के कारण उसके मामा का रेस्टोरेंट को न्यूज़ीलैंड के प्रमुख इंडियन रेस्टोरेंट में शुमार था। वहाँ रह रहे भारतीय मूल के लोगों की वहाँ भीड़ लगी रहती थी। रॉबिन माखीजा भी अक्सर वहाँ खाना खाने के लिए आता था। रॉबिन का जन्म न्यूज़ीलैंड में ही हुआ था। वह वहाँ एक आईटी कंपनी चला रहा था। रॉबिन के माता पिता का तलाक भी कई साल पहले हो चुका था। उसकी कस्टडी पिता को मिली थी। उसकी सही देखभाल हो सके इसके लिए उन्होंने दूसरी शादी कर ली। लेकिन अपनी नई माँ के साथ उसकी कभी पटरी नहीं बैठी। पिता ने इस सबके लिए उसे दोषी ठहराया। रॉबिन एकदम अकेला पड़ गया। 
पिता ने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया था। केवल उसकी पढ़ाई और अन्य खर्चों के लिए ही वह स्वयं को उत्तरदाई मानते थे। बजाए इस बात से दुखी होने के रॉबिन ने अपने जीवन की बागडोर कम उम्र से ही अपने हाथ में ले ली। वह स्वच्छंद था। जो मर्ज़ी होती थी वही करता था। 
उसके कई अफेयर और कई ब्रेकअप हो चुके थे। पर ना वह किसी अफेयर को संजीदगी से लेता था। ना ही अगल होने पर कोई अफसोस करता था। दरअसल किसी भी रिश्ते के बंधन में बंधना उसे पसंद नहीं था। वह पूरी कोशिश करता था कि पैसों के लिए भी अपने पिता पर निर्भर ना रहे। स्कूल के समय से ही वह कोई ना कोई काम कर अपने खर्चे निकाल लेता था। 
महक ने खुद को रेस्टोरेंट के काम में उलझा रखा था लेकिन वह मन ही मन बहुत उदास रहती थी। पहले माता पिता के तलाक और बाद में माँ के शादी कर लेने के कारण वह अकेली पड़ गई थी। उसके मामा ने विवाह नहीं किया था। अतः उनका भी कोई परिवार नहीं था। वह भी मनमौजी किस्म के थे। रेस्टोरेंट की ज़िम्मेदारी उसे सौंप अक्सर ही घर से बाहर रहते थे। महक अपने जीवन में किसी का साथ चाहती थी। वह अपना एक परिवार चाहती थी। 
महक धीरे धीरे रॉबिन की तरफ आकर्षित होने लगी। वह भी महक से खुल कर बात करता था। दोनों में दोस्ती हो गई। महक अक्सर रॉबिन के साथ ड्राइव पर जाती थी। उस समय दोनों म्यूज़िक सुनना पसंद करते थे। रॉक ग्रुप एक्सपोनेंट्स का गाना 'व्हाई डस लव डू दिस टु मी ?' महक को बहुत पसंद था। 
रॉबिन ने एक बीच कॉटेज खरीदा था। एक शाम वह महक को लेकर अपने कॉटेज पर गया। वह बीच कॉटेज बहुत सुंदर था। महक उसे देख कर चहक उठी। दोनों देर तक एक दूसरे के साथ रोमांटिक बातें करते रहे। डिनर के बाद रॉबिन अपना गिटार ले आया। गिटार पर उसने महक को कई रोमांटिक गाने सुनाए। उनमें से कुछ पुरानी हिंदी फिल्मों के गीत भी थे। 
उस रात महक रॉबिन के कॉटेज में ही रुक गई। वह उसके जीवन की सबसे हसीन रात थी। उसी रात को महक के मन में रॉबिन के साथ घर बसाने के सपने ने जन्म लिया। वह इस सपने के हकीकत बनने की राह देखने लगी।
लेकिन महक का ये सपना उसके और रॉबिन के रिश्ते के लिए घातक साबित हुआ। अपने सपने को सच करने के लिए महक रॉबिन पर अधिकार जमाने लगी थी। वह चाहती थी कि रॉबिन कहीं भी जाए तो उसे बता कर जाए। हर पार्टी में उसे साथ ले जाए। रॉबिन को यह पसंद नहीं आ रहा था। उसने महक को इस बात के लिए चेतावनी भी दी कि उसकी यह कोशिश बेकार है। वह एक आज़ाद पंछी है। बंधन उसे पसंद नहीं। पर महक को अपने प्यार पर बहुत अधिक यकीन था। उसे लगता था कि वह रॉबिन को अपना बना कर ही रहेगी।
महक को समझाने की अपनी सारी कोशिशों को बेकार जाते देख कर रॉबिन ने फैसला किया कि वह कुछ दिनों के लिए कहीं घूमने चला जाएगा। एक दिन जब महक उसके कॉटेज पहुँची तो वह बाहर जाने की तैयारी कर रहा था।
"कहाँ जा रहे हो रॉबिन ? मुझे बताया भी नहीं।"
"तुम्हें हर बात बताना ज़रूरी नहीं है।"
"पर रॉबिन हम....."
उसकी बात बीच में ही काट कर रॉबिन बोला। 
"ये रिलेशनशिप मेरे गले का फंदा बन रही है। मैंने पहले ही कहा था कि मुझे बांधने की कोशिश मत करो।" 
उसकी बात सुन कर महक को धक्का लगा। उसकी आँखें नम हो गईं। खुद को संभालते हुए उसने पूँछा।
"कब लौटोगे ?"
"जब मेरी मर्ज़ी होगी। पर तुम मेरा इंतज़ार मत करना।"
महक ने फिर भी इंतज़ार किया। लेकिन लौटने के बाद रॉबिन पूरी तरह से बदल गया था। जो रिश्ता खूबसूरत लम्हों के साथ शुरू हुआ था। वह महक के लिए बुरी याद बन गया।

महक की आँखों से आंसू बह रहे थे। आदित्य समझ नहीं पा रहा था कि उसे कैसे तसल्ली दे। महक अब नशे की गिरफ्त में थी। कहानी सुनाते हुए उसने चार पेग पी लिए थे। वह बहकने लगी थी। 
"आदित्य... प्लीज़ मुझे सहारा दो। मैं बहुत तन्हा हूँ। मुझे तुम्हारा साथ चाहिए।"
उसकी बात सुन कर आदित्य परेशान हो गया।
"महक मैं शादीशुदा हूँ। नैना को बहुत चाहता हूँ।"
महक उठ कर उसके पास आने का प्रयास करने लगी। इस कोशिश में वह लड़खड़ा गई। आदित्य ने वक्त पर संभाल लिया नहीं तो गिर जाती। 
"मैं तुमसे रिश्ता बनाने को नहीं कह रही। बस तुम्हारा साथ और थोड़ी सी हमदर्दी चाहिए। क्या अपने दोस्त से इतना भी नहीं चाह सकती हूँ।"
महक नशे की हालत में जिस तरह पेश आ रही थी उससे आदित्य पछता रहा था कि उसे इतनी अधिक पीने क्यों दी। जब वह अचानक उसके घर आई थी तभी उसे संभल जाना चाहिए था। पर अब रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। महक की हालत भी ऐसी नहीं थी कि उसे कहीं भेजा जा सके। उसने महक को समझाया कि अभी वह नशे में है। बाद में उससे बात करेगा।
आदित्य को याद आया कि गेस्टरूम का ऐ.सी. काम नहीं कर रहा है। इसलिए उसने तय किया कि महक को अपने बेडरूम में सुला कर वह खुद हॉल में सोफे पर सो जाएगा। महक को सहारा दे कर वह बेडरूम में ले गया। उसे बिस्तर पर लिटा कर वह बाहर आ गया। 
आदित्य को इस समय नैना की बहुत याद आ रही थी। वह किसी भी कीमत पर उसका विश्वास तोड़ना नहीं चाहता था। इस दुनिया में उसके लिए नैना से बढ़ कर कोई नहीं था। उसने तय कर लिया कि महक के होश में आने पर वह उसके सामने सारी बात साफ कर देगा। उससे एक दूरी बना कर रखेगा। इसी तरह के विचारों में डूबता उतराता वह सो गया।
अचानक कॉलबेल की आवाज़ सुन कर वह जग गया। हॉल में लटकी घड़ी पर नज़र डाली तो रात के दो बजने वाले थे। आदित्य के मन में सवाल उठा कि इस समय कौन आ गया। एक बार कॉलबेल फिर बजी।
आदित्य ने उठ कर दरवाज़ा खोला तो सामने नैना खड़ी मुस्कुरा रही थी।
"सरप्राइज़्ड हैं ना..."
आदित्य विचित्र स्थिति में था। नैना ने उसे सरप्राइज़ करने का बहुत गलत समय चुना था। उसे दुविधा में देख कर नैना बोली।
"क्या हुआ ? बाहर ही खड़ा रखोगे।"
आदित्य ने मुस्कुराने की कोशिश की और एक तरफ हट गया। अंदर आते हुए नैना बोले जा रही थी।
"बहुत दिन हो गए थे। सोंचा छुट्टी लेकर अचानक आकर तुम्हें सरप्राइज़ करूँ। दस बजे के शो के बाद ही निकल पड़ी।"
लेकिन सोफे पर बैठते ही उसे टेबल पर दो गिलास रखे दिखाई पड़े। उसने आदित्य की तरफ देखा तो वह घबराया सा था। उसकी मनोदशा के बारे में वह कुछ पूँछती उससे पहले ही बेडरूम से महक की आवाज़ आई।
"आदित्य प्लीज़ यहाँ आ जाओ। आई एम फीलिंग लोनली।"
नैना ने आदित्य की तरफ देखा। उसके चेहरे पर छले जाने का भाव था। बेकसूर होते हुए भी आदित्य कसूरवार की तरह खड़ा था। नैना ने बिना कुछ कहे अपना बैग उठाया और बाहर चली गई।
आदित्य पत्थर के बुत की तरह खड़ा रह गया।












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