अदृश्य हमसफ़र - 15

अदृश्य हमसफ़र…

भाग 15

अपने लिए पगली का सम्बोधन सुनकर ममता की भवें तन गई। नकली गुस्सा जाहिर करते हुए इठला उठी-" अनु दा, दादी बन चुकी हूँ मैं। आपको पगली दिखती हूँ। "

अनुराग मद्धम सी हंसी हँसकर कहने लगे-" ये कहाँ लिखा है कि जो दादी बन जाती है वह पगली नही रहती। देखो न मुन्नी अभी भी तुम अपनी उम्र भूलकर मेरे सामने कैसे बच्चों की तरह इठलाने लगी हो। "

ममता एकदम से अचकचा गयी। सच बात थी आज इतने दिनों बाद अनु दा से मिलने की खुशी शिद्दत से महसूस कर रही थी। इतनी कि अनुष्का की बिदाई का दर्द भी भूल गयी थी। तुरन्त ही खुद को सम्भाला और बोली-" बातों में मत भटकाइये और मेरे सवालों का जवाब दीजिए। "

अनुराग ने जैसे जैसे कहना आरम्भ किया ममता जड़ से जड़वत होती चली जा रही थी।
अनु दा ने कहना शुरू किया-" देखो मुन्नी जो कहना चाहता हूँ आज खुल कर कहूँगा। पता नही कितने दिन शेष हैं मेरी जिंदगी के और न जाने आज के बाद तुमसे मिलना हो भी या नही। " कहते कहते उनकी आवाज भारी हो गयी। शायद अन्तस् की दबी भावनाओं का भार कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था।

मुन्नी ने तुरन्त पास में रखे जग से गिलास में पानी उड़ेला और अनु दा के मुंह से लगा दिया।
अनु दा ने बिना किसी हील हुज्जत के पूरा गिलास खाली कर दिया।

कुछ पल को खामोशी का पलड़ा भारी हो गया। खामोशी ज्यादा सांय सांय करने लगती उससे पहले अनु दा ने उसे भंग कर दिया।

"मुन्नी, देखो हमारी जगह बदल गयी है। आज तुम मेरा ख्याल रख रही हो। " मुन्नी बस मुस्कुरा कर रह गयी । उसकी मुस्कुराहट में लेकिन दर्द छलका जा रहा था।

अनु दा-" तुम्हारी बिदाई के समय तुम्हारे सामने न आने के लिए मुझे कलेजे पर कितने पत्थर रखने पड़े यह तो बस मैं ही जानता हूँ। मन फिर भी न माना और बेकाबू होकर मुझे ले ही आया तुम्हारी गाड़ी के पीछे। बहुत मन किया तुम्हें देखूं और तुमसे गले मिलकर जी भर कर रो लूँ एक बार लेकिन नही। बड़ी मुश्किल से खुद को काबू कर पाया था। डर था कि तुम भरी भीड़ में बेकाबू न हो जाओ। तुम्हारा भरोसा भी तो नही था न कि किस बात पर बिफर जाओगी। "

"सच कहते हैं" - कहते कहते मुन्नी ने गर्दन झुका दी।

" पगफेरे के लिए जब तुम आई तब भी जान बूझकर नही आया तुम्हारे सामने उसके एक नही कई कारण थे। "

अनु दा की बात बीच में काटकर मुन्नी बोली-" इतना तो मुझे भी अंदाजा था कि संयोग नही है ये जान बूझकर मुझसे दूर रहने की साजिश है। "

"हा हा हा"

अनु दा के ठहाके सुनसान पड़ी छत पर गूंज उठे।

अनु दा-" होशियार तो बचपन से हो भइ, समझ जाओगी और फिर जिद भी बनाओगी मुझसे न मिलने की। इतना तो मुझे भी यकीन था। अरे मेरी पगलिया मुन्नी पुरुष के मनोविज्ञान को समझना तुम्हारे लिए सिर्फ कठिन ही नही असम्भव भी था। हमेशा तो सुरक्षित पनाहों में रही थी तुम। पहले जैसी स्थिति अगर तुम्हारे ब्याह के बाद भी रहती तो मेरे और तुम्हारे पवित्र रिश्ते पर सबसे पहले शक की उंगली मनोहर जी उठाते। "

मुन्नी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला तो शब्द निकलने से पहले ही अनु दा ने इशारे से उसे टोका।

" चुप कर पगली, जानता हूँ यही कहेगी कि मेरे मनोहर जी तो बहुत खुले विचारों वाले व्यक्ति थे, आम पुरुष से बहुत अलग थे, वगैरा वगैरा। सुन गौर से, हर पुरुष के दो व्यक्तित्व होते हैं एक सभी के लिए दूसरा सिर्फ अपनी पत्नी के लिए और कोई भी पति अपनी पत्नी के जीवन में दूसरे पुरुष का दखल सहन नही करता भले ही उसका सगा भाई क्यों न हो। " समझी तुम।

अनुराग ने कहना जारी रखा -" एक पति अपनी पत्नी के लिए कितना परिग्रही हो सकता है उदाहरण के साथ समझाता हूँ तुम्हे। किसी भी महिला को छोटे कपड़ों में देख कर कह देगा कि कितनी सुंदर लग रही है लेकिन वही कपड़े अपनी पत्नी को नही पहनने देगा। अब समझी तुम। अब बताओ जब दूसरी महिला उनमें सुंदर लग सकती है तो क्या उसकी पत्नी नही लगेगी। इसका एक ही कारण है कि वह नही चाहता उसकी पत्नी की तरफ किसी भी पुरुष की नजर उठे भले ही प्रशंसा के लिए ही हो। "

ममता की गर्दन स्वमेव ही सहमति में हिलने लगी।

अनु दा-" मुन्नी एक बात कहूँ, तुम आज भी बहुत नादाँ हो। दुनिया की चालबाजियों से बिल्कुल बेखबर, भोली और मासूम। "

मुन्नी-" चुप करो अनु दा। इतनी भी भोली नही मैं। "

अनु दा-" अरे सच्ची। नही मानोगी तो यह भी साबित कर दूंगा। "

अब मुन्नी फिर से चुप हो गयी, जानती थी जरूर कोई बात है जिसकी वजह से ऐसा कह रहे हैं।
अभी तक खुलकर बात भी नही हुई थी लेकिन मुन्नी की सारी शिकायतें धूमिल हो चुकी थी। उसे जैसे याद ही नही रहा कि पूरे 32 साल के इंतजार के बाद ये घड़ियां आई हैं जब अनु दा ने उसे पुकारा। अब बस लालायित थी तो उन्हें सुनने के लिए।

अनु दा ने फिर कहना आरम्भ किया-" मेरे ब्याह में तुम्हें न बुलाने की ज़िद भी मेरी ही थी। वह तो बाबा की ही समझदारी थी कि तुमसे यह बात न कहकर उन्होंने तुम्हारे ही सिर दोष मढ दिया। औपचारिकतावश न्योता भेजा गया था मेरे ब्याह का तुम्हें। बाबा की अपेक्षा अनुसार तुम नही आई, कारण तुम्हें तो मेरे बुलाये का इंतजार था। तो हुई न पगली। तुम्हारी ज़िद और गुस्से का फायदा उठाया हमने। "

ममता की आंखे फैलकर बड़ी हो गयी और मुंह खुला का खुला रह गया। "हे रामजी, इतना बड़ा धोखा। " बस यही शब्द निकले मुन्नी के मुंह से। फिर से पूछ बैठी -" लेकिन दा, आप क्यो नही चाहते थे कि मैँ आपकी शादी में सम्मिलित होने के लिए आऊं। "

" क्योकिं यदि तुम मेरे सामने आती तो शायद मैं घोड़ी पर बैठ ही नही पाता। बेसाख़्ता अनुराग के मुंह से निकल ही गया। " लेकिन तुरन्त ही खुद को सम्भाला और कहने लगे " क्योकिं मैं नही चाहता था कि तुम्हारी नाराजगी इतनी आसानी से खत्म हो जाये। "

ममता ने उन्हें टोका-" क्या? क्या कहा आपने, फिर से दोहराना जरा दा। मेरी वजह से आप घोड़ी पर नही बैठ पाते। ये क्या बात हुई?"

अनु दा ने तुरन्त चुटकी ली-" तुम्हारा क्या भरोसा, जैसे ही मैँ घोड़ी पर बैठता तुम पीछे से घोड़ी को पिन चुभो कर उसे दौड़ा देती। मैं तो न इधर का रहता न उधर का। "

"अरे आप मुझे इतना नालायक समझते थे। "- मुन्नी ने विस्मय मिश्रित आवज में पूछा।
अनु दा-" नालायक तो कदापि नही लेकिन शैतान तो इससे भी ज्यादा। अब खुद ही याद कर लो कितनी शैतानियों के इल्जाम मेरे सिर धरे तुमने। वह तो बाबा तुम्हें जानते थे अच्छे से नही तो तुम तो दो दिन में मेरा बोरिया बिस्तर गोल करवा देती अपने घर से। जलकुकडी कहीं की। "

"अनु दा" - शिकायती लहजें में मुन्नी ने मुंह बनाते हुए कहा।

अनु दा मन में सोच रहे थे 54 साल की हो गयी है लेकिन आज भी भोलापन बरकरार है इसका। आज भी मेरा प्रेम पकड़ नही पाई मुन्नी।

ममता को भी यकीन हो गया कि सच में वह तो अनु दा को तंग करने के लिए किसी भी हद से गुजर जाती थी। उसे अफसोस होने लगा कि उसकी इसी आदत की वजह से वह अनु दा के ब्याह की रस्मों से वंचित रह गयी।

अनु दा उसके अंतर्मन के द्वंद को समझ चुके थे बोले - "बस कर पगली; अब खुद को इतना भी आत्मग्लानि से न जला। जो शैतानियां मेरे ब्याह में न कर पाई मेरे बच्चों के ब्याह में जी भर कर करना। कम से कम मैं सम्भाल तो लूँगा। "

अनु दा के इतना कहते ही दोनो ठहाके लगा कर हँसने लगे।

अचानक हँसते हँसते ममता की रुलाई फूट पड़ी। अनुराग ने उसके कंधे पर हाथ रखा और पूछा-" क्या हुआ ममता ?रोने क्यों लगी। "

ममता अपनी कुर्सी से उठी और अनुराग के सामने फर्श पर घुटने मोड़ कर बैठ गयी। अपना सिर अनुराग की गोदी में रख दिया और रोते हुए कहने लगी-" मनोहर जी को गए 5 बरस हो गए। इतने बरसों में आज खुल कर हंसी हूँ। मेरी जिस खनकती हंसी के सभी कायल थे न दा, उसे मनोहर जी अपने साथ ले गए थे। आज आपने मुझे वह लौटा दी। आप कहाँ गुम हो गए थे अपनी मुन्नी को छोड़कर? मुझमें तो अपनी जान बसती थी न। फिर क्यों मुझे अकेला छोड़ा आपने? कहते कहते मुन्नी ने अपने दोनो हाथ अनुराग की कमर के गिर्द लपेट दिए और फिर जोर जोर से रोने लगी।
अनुराग की स्थिति यकायक जड़ हो गयी। ममता के इतने करीबी स्पर्श का उन्हें अहसास तक नही था। वह न तो ममता को चुप करा रहे थे और न ही खुद से अलग कर पा रहे थे।
भावनाओं का युद्ध सतही तौर पर जारी था।

जहाँ एक ओर तो ममता को उसका खोया हुआ सहारा मिल रहा था जिसके लिए वह बरसों से प्रतीक्षारत थी वहीँ दूसरी और अनुराग को अपने पहले प्रेम का पहला स्पर्श आलिंगन के रूप में मिल रहा था जिसे न तो कुछ कह पा रहे थे, न ही पकड़ पा रहे थे और न ही खुद से उसे अलग कर पाने में खुद को समर्थ पा रहे थे।

क्रमशः

***

***

Rate & Review

Verified icon

Afifa Kagdi 3 months ago

Verified icon

Right 3 months ago

Verified icon
Verified icon

Komal 3 months ago

Verified icon

Sharmila 4 months ago