अदृश्य हमसफ़र - 18

अदृश्य हमसफ़र..

भाग 18

देविका ने एक गहरी सांस ली और कहना आरम्भ किया-" जिस लड़की को अनुराग ने टूटकर चाहा, जिसे एक नजर में देखते ही अपना सब कुछ भूल बैठे थे, जो आज भी उनके मन प्राण पर कब्जा किये बैठी है वह आप हैं। हाँ उनकी मुंन्नी ही है। आज भी अगर वह मौत से लड़ रहे हैं तो इसीलिए कि कुछ अधूरी बातों को पूरा करना चाहते हैं। आपके सामने प्रायश्चित करना चाहते हैं कि यकायक आपके दूर जाने के उनके फैसले ने आपको जितने घाव दिए शायद कुछ मलहम लगा सके। आपसे माफी मांगे बिना तो उनको मुक्ति भी स्वीकार्य नही। " देविका एक ही सांस में सब कुछ कह गयी और उसने गर्दन झुका ली।

देविका के चुप होते ही कमरे में खामोशी व्याप्त हो गयी। ममता की तरफ से कोई प्रत्युत्तर न आता देख देविका ने नजरें उठाकर देखा। ममता तो जैसे पाषाण प्रायः हो चुकी थी। आंखे एक जगह ठहर गयी थी। चेहरा निर्विकार था और मुंह अधखुला रह गया था।

ममता को ऐसे देख कर देविका घबरा गई । उसने तुरंत ममता के दोनो बाजू पकड़ पर हिलाया और धीरे से पलंग पर लेटा दिया। दौड़कर रसोई से पानी लायी और ममता के मुंह पर छींटे मारने लगी। हल्के हल्के से गाल थपथपाकर ममता जिज्जी, ममता जिज्जी....अरे उठिए न लेकिन ममता की ओर से न कोई हलचल न ही कोई जवाब। चेहरा भावशून्य और निर्विकार।

10 मिनट से ज्यादा हो गए थे ममता की चेतना को लुप्त हुए और अभी भी होश में आने का नाम नही ले रही थी। देविका के चेहरे पर गहन अफसोस के भाव लगातार परिक्रमा कर रहे थे। खुद से ही बड़बड़ाने लगी थी-" मुझे भी न, क्या जरूरत पड़ी दी मुंन्नी जिज्जी के सामने सारी बातें खोलने की। अब क्या हाल हो गया इनका। यही वजह रही होगी शायद जिसकी वजह से सभी ने इनसे उनके विषय में कितनी बातें छुपा कर रखी थी। "

देविका अपने किये पर अफसोस करते करते फिर से मुंन्नी को होश में लाने का जतन करने लगी।

"मुंन्नी जिज्जी उठिए, आपको कुछ हो गया तो मैँ खुद को कभी माफ नही कर पाऊंगी। मुझे इस अनजाने अपराध का भागी न बनाइये। खुद को रोक नही पायी आपके सामने। जिन बातों को हमेशा कलेजे में दबा कर रखा वह आपके सहानुभूति के चंद शब्दों और अपनेपन के निश्छल स्पर्श से फौरन बाहर आ गयी। जिज्जी उठो न। " देविका की आंखे नम हो गयी और धीरे धीरे उनमें से आंसू रिसने लगे।

ममता तो जैसे जड़ हो चुकी थी। सुन सब रही थी लेकिन कुछ कहने की शक्ति जैसे विलुप्त हो चुकी थी। चाह रही थी कि चीखे बहुत जोर से लेकिन गले से आवाज ही नही निकल रही थी।

देविका अब रोने लगी थी। रोते हुए एक आखिरी कोशिश उसने की और कहा-" आप होश में आइये जिज्जी, मैं उनको क्या जवाब दूँगी की आपकी यह हालत मेरी वजह से हुई है। उठिए, अब नही सहन कर पाऊंगी। जा रही हूँ उन्हें ही बुलाने" - देविका ने रोते रोते कहा।

" अनुराग को बुलाने जा रही है देविका" जेहन में ये शब्द घुसते ही ममता ने अपनी सारी शक्ति अर्जित करके हाथ को हिलाया और देविका का हाथ पकड़ लिया।

देविका ने उसके चेहरे की तरफ देखा तो उसने पुरजोर कोशिश की आंखों से समझाने की लेकिन पुतलियों ने साथ नही दिया और टस से मस न हुई। बड़े जतन के बाद भी जब ममता असफल हुई तो उसने देविका का हाथ हौले से दबाया। देविका इतना समझ गयी कि ममता होश में आने की कोशिशों में लगी है और नही चाहती कि वहाँ किसी को भी बुलाया जाए। मन में शांति की हल्की सी लहर उठी कि चलो, कुछ तो हरकत हुई इस निष्प्राण प्रायः ममता में।

ममता को बहुत गहरा सदमा पहुँचा था देविका की बातों से। उसके मन में तो अनुराग के प्रति ऐसे भाव कभी नही आये फिर अनुराग ने ऐसा कैसे किया। खुद से निरंतर जंग करती जा रही थी कि किसी तरह शरीर की बिखरी जान सिमट जाए तो कुछ और गांठे खुले।

अंततः ममता खुद को होश में लाने में सफल रही। धीरे धीरे भावशून्य चेहरे पर गहन पीड़ा के भाव उभरने लगे। आंखों की पुतलियों में हलचल हुई और नमी आने लगी। देविका ने तुरन्त उसके पैरों के तालू पर जल्दी जल्दी हथेली रगड़ना शुरू कर दी। हिम्मती तो शुरू से ही थी ममता अतःएव खुद को संभालने में कामयाब हुई। धीरे धीरे उठकर बैठने लगी तो देविका ने कहा-" आप अभी लेटी रहिये। मैं यहीं हूँ आपके पास। मुझे माफ़ कर दो मुंन्नी जिज्जी, मुझे सब कुछ आपसे नही कहना चाहिए था। "
कहते कहते देविका की आंखे फिर से बरस पड़ी। यही सब कहते कहते उसने दो तकिए और उठाकर ममता की कमर के पीछे लगाकर ममता को अधलेटा सा कर दिया।

खुद वहीं ममता का हाथ अपने दोनो हाथों में पकड़ कर बेड पर ही बैठ गयी।

ममता अब तक काफी हद तक खुद को संभाल चुकी थी। देविका के हाथ को उठाकर उसने अपने सीने पर रख लिया। झुकी नजरें उठने को तैयार नही थी। झुकी नजरों और घुटी घुटी आवाज से ममता ने कहा-" देविका तुम्हारी अपराधी हूँ मैं। "कहते कहते ममता की आंखों से आंसू ढलक पड़े।

"नहीं जिज्जी, ऐसा न कहिये। मैं आप सभी जितनी पढ़ी लिखी तो नही हूँ लेकिन मन की भाषा अच्छे से समझती हूँ। आपका कोई दोष नही इन सबमें। "

ममता-" नही, दोषी तो हूँ मैं । अनजाने में ही सही लेकिन तुम दोनों के बीच सदैव एक दीवार की भांति खड़ी रही। "

ममता मन के भावों को मन में दबाना चाहती थी लेकिन कम पढ़ी देविका की भी तो मन के भावों को पढ़ने में मास्टरी थी।

ममता के मन की उथल पुथल को बखूबी पढ़ पा रही थी।

अपनी जगह से उठी और ममता के सीने से लग गयी, कुछ पल ऐसे ही रही फिर उठते वक़्त ममता का माथा चूम लिया। ममता की पलकें और ज्यादा झुक गयी और आंखों की कोरों से आंसूं बहने लगे। देविका ने आंसूं पोंछे और बोली-" जिज्जी, जो कह रही हूँ ध्यान से सुनियेगा।

आप खुद को अपराधी न मानिए । आपका कोई दोष नही। आप हैं ही इतनी प्यारी कि कोई अजनबी भी प्यार कर बैठे फिर अनुराग तो बरसों आपके साथ रहे हैं।

जिस दिन इन्होंने आपके घर में कदम रखा और आप पर पहली नजर पड़ी, तभी से आपके प्रति प्रेम के अंकुर इनमें फूटे जो दिनों दिन बढ़ते गए और आज तलक एक गहरे बरगद की तरह घना वृक्ष बनकर खड़े हैं। आपकी हर शरारत उस वृक्ष में एक नई डाल उगा देती थी। ये उन पलों को जीते चले गए।

वहीं दूसरी ओर आपने इनको अपना प्रतिद्वंदी समझा जो जबरदस्ती आपके घर का सदस्य बना। इतना ही नही आपके लाड़ दुलार के एकछत्र साम्राज्य में सेंध भी लगाने लगा। बाबा आपके सबसे करीबी थे लेकिन धीरे धीरे अनुराग उनके सबसे करीबी बनते जा रहे थे। आपमें जलन के भाव बढ़ते जा रहे थे और हर पल आप इनसे बदला लेने की सोचती रहती। माफ करना जिज्जी, बहुत बड़ी बात कहने जा रही हूं, यही तो आपका भी प्रेम ही था कि हर वक़्त सोच में अनुराग छाए रहते थे। "

ममता ने बीच में बात काटनी चाही लेकिन देविका ने उसे वहीं शांत कर दिया।

" पहले आप मेरी पूरी बात सुन लीजिए फिर बाद में जो भी कहेंगी मैं सब सुनुगी। आप सजा भी देंगी तो हँसकर स्वीकार्य है। "- कहकर देविका ने फिर आगे बात बढ़ाई -" आप इनको सताती गयी और ये उसमें भी सुख पाते गये। प्रेम तो आपने भी किया लेकिन उसे समझ नही पायी। कहते हैं न कि नादाँ की दोस्ती जी का जंजाल । यही कहावत आपने सार्थक कर दी। अनुराग टूटकर चाहते रहे लेकिन कहने की हिम्मत नही कर पाए। "

"एक बात और, आपने अनुराग को दा का सम्बोधन दिया जो उपज था बावजी की डांट का नहीं तो आप इन्हें इज्जत से पुकारती भी नहीं। यही सम्बोधन था जिसका मान रखने के लिए इन्होंने अपने सीने पर पत्थर रखा।

अच्छा एक बात बताइये जिज्जी, "- देविका ने ममता की तरफ देख कर पूछा।

ममता ने सिर्फ आंखों से इशारा किया कि पूछो, अभी तलक ममता की जुबां उसका साथ देने में असमर्थ थी। देविका -" विदाई के वक़्त आपकी आंखें रोना भूलकर इनको ढूंढ रही थी ?"

ममता ने हाँ में गर्दन हिलाई।

"ये प्रेम नही तो और क्या था जिज्जी?"

"जब आप पगफेरे के लिए वापस आयी तब घर में घुसते ही इनके नाम की गुहार लगाई, भले ही आप लड़ने के लिए पुकार रही थी"

ममता ने फिर से हाँ में गर्दन हिलाई।

"ये प्रेम नही तो और क्या है जिज्जी?"

"ये जो आपकी आदतों में शुमार हुए वही तो आपका प्रेम था। हर बात के लिए अनुराग पर आश्रित रहना, क्यों जिज्जी? जिसे आपने अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझा उसे हर पल सबसे ज्यादा अपने करीब रखा?"

"आप बहुत नादां थी, ह्रदय के भाव बहुत पवित्र थे तभी तो अनुराग के प्रेम को समझ नही पायी। अगर जरा भी समझ जाती तो मुझे यकीन है आप इन्हें अपने आस पास भी न फटकने देती। लेकिन आपको बता दूँ यह भी प्रेम का ही रूप है। "

ममता बस सुनती जा रही थी जो भी देविका कह रही थी। उसके अन्तस् में बहुत गहरे तक वह बातें घर करती जा रही थी। आज उसे अहसास होने लगा था कि अनुराग की सबसे बड़ी गुनहगार तो वह है।

देविका ने फिर अपनी बात आरम्भ की-" आपके ब्याह के बाद आपके उज्ज्वल भविष्य के लिए इन्होंने आपसे दूरी बना ली वह भी आपसे बिना कुछ कहे। "

फिर देविका ने वही सब बातें कही जो अनुराग ने बाबा से कही थी। इन सभी के परिणाम स्वरूप आपने भी कसम खा ली कि कभी अनुराग का नाम भी ज़ुबान पर नही लाएंगी। नाम आपकी जुबान पर नही आया लेकिन आंखों की तलाश खत्म नही हुई। क्या यह प्रेम नही?

जब भी आप यहां किसी भी समारोह में सम्मिलित होने आती यह पल पल छुप छुप कर आपको देखते रहते लेकिन आपके सामने नही आते थे। अपने परिवार से आपका परिचय तक नही करवाया कहीं आप परिवार के जरिये उन तक पहुंच न जाये। यही वजह थी कि मैं भी आपको देखती तो रही और मिलने को तरसती रही लेकिन कभी आपसे बात नही कर पाई।

ममता के मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला-"आह"

जितना आपको देखा, आपको जाना, आपको समझा जिज्जी, आपकी इज्जत मेरी नजरों में बढ़ती गयी। झूठ नही कहूंगी जब अनुराग के मुंह से उस वक़्त आपका नाम सुना जिस वक्त एक पत्नी पति का पूर्ण समर्पण चाहती है तो आप पर बहुत क्रोध आया और इन पर भी। फिर जब धीरे धीरे इनसे सब पता चला तो क्रोध की जगह श्रद्धा ने ले ली। इनका प्यार तो पूजा से भी ऊपर उठ गया। बाबा के मान के खातिर इन्होंने खुद को खुद में समेट लिया...कहते कहते देविका ने गर्दन झुका ली।

दो पल रुककर देविका ने फिर कहना शुरू किया-"

आपको देख कर आपके सरल स्वभाव को जाना। आपने इनसे प्रेम किया लेकिन उसी प्रेम से अनजान हैं आपसे मिलकर ही माना। सोच भी नही सकती थी कि एक पढ़ी लिखी लड़की जो मुंम्बई जैसे शहर में रहती हो वह इतनी भोली कैसे हो सकती है लेकिन सत्य तो यही निकला। आपका मनोहर जी के प्रति प्रेम और समर्पण देखकर मुझे बेहद संतुष्टि मिली। अब इन सभी में किस्मत को ही दोष दे सकते हैं। "

अब तक ममता खुद को काफ़ी हद तक सम्भाल चुकी थी। ममता ने धीरे धीरे सहमति में गर्दन हिलाते हुए पूछा-" घर में कितने लोगों को यह बात पता है कि अनुराग मुझसे प्रेम करते हैं?"
देविका ने जवाब दिया-" सिर्फ बाबा को और मुझे। बाकी सभी को यही बताया गया कि ममता की आपसे नजदीकी शायद मनोहर जी को रास न आये अतः आपसे दूरी का फैसला लिया अनुराग ने। "

ममता के चेहरे पर संतुष्टि के हल्के फुल्के भाव नजर आए।

ममता-" मेरा एक कहा मानोगी देवी। "

देविका-" आप हुकुम कीजिये। "

ममता-" अभी अनुराग से न कहना कि मुझे सब पता चल गया है। "

देविका-" लेकिन आप ऐसा क्यों चाहती हैं?"

ममता-" उनके मुंह से निकलवाना चाहती यही सब, बस और कुछ नही। जिस प्रेम को जीया उन्होंने वह उन्ही के शब्दों में उन्ही की जुबान से बाहर आये तो उनके लिए ही बेहतर होगा। "

देविका-" आप ठीक कहती हैं। "

ममता धीरे धीरे बिस्तर से उठी और देविका के पैर छू लिए। देविका अचानक से हुई इस हरकत से चिहुंक उठी।

अरे ...अरे...आप यह क्या कर रही हैं?

ममता-" अपराध तो मुझसे हुआ है देवी, अनजाने में ही सही लेकिन तुमने प्रेम के जिस स्वरूप को जीया वह तो पूजनीय है। मुझ अभागी को देखो जिसे छप्पर फाड़ कर प्रेम मिला लेकिन समझ ही नही पायी। मनोहर जी से प्रेम मिला लेकिन बीच रास्ते में छोड़ गए। एक आप हैं पति के ह्रदय में कोई और बसती है वह आपके सामने हैं और आप उससे भी प्रेम करती हैं। इस प्रेम को मैं क्या नाम दूँ।

मुझे कुछ देर अकेला छोड़ दीजिए देवी, आज दिन में अनुराग से बातें करने के लिए शक्ति अर्जित करनी है। "

"समझ सकती हूँ जिज्जी"- कहकर देविका बिना कोई पल गवाए कमरे का दरवाजा उढाल कर बाहर निकल गयी।

ममता ने एक नजर कमरे में चारों तरफ दौड़ाई, उसे लगा चारों तरफ कितनी परछाइयां हैं जो उस पर हंस रही हैं। किसी को प्रेम मिलता नही और जिसे मिलता है वह समझता नही।

ममता सोच की गर्त में गहराई तक डूबती जा रही थी। सोचते सोचते कब उसकी आंख लगी उसे ही पता नही चला। दो रातों से रुकी नींद, उस पर इस नए धमाके से उठे धुएं को सहन कर पाना शायद उसके सरल ह्रदय पर भारी पड़ रहा था।

क्रमशः

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