दूसरा हनीमून

"दूसरा हनीमून"

आर 0 के 0 लाल

 

 

भले ही यह मेरा पुनर्विवाह है, मगर शादी की  तैयारी ठीक पहले वाली  की तरह की जा रही थी। कभी सोचा ही न था कि दुबारा ये सब करना होगा। पहली शादी के समय तो मन को पंख ही लग गए थे। उसे संभालना बहुत कठिन हो रहा था। शादी की तैयारी में शॉपिंग से लेकर डेकोरेशन, पार्लर और मेहंदी बुकिंग सब मैंने स्वयं ही किया था। मैं बहुत उत्साहित थी । खूबसूरत शरीर की सुंदरता के लिए एक महीने तक बॉडी स्क्रबिंग, मॉइश्चराइजिंग, बॉडी पॉलिशिंग, वैक्सिंग आदि ब्यूटीशियन की राय से  कराती रही।

मगर इस दूसरी शादी पर तो सब काटने दौड़ रहा था। कोई उत्साह नहीं था और लग रहा था कि मुझे यह बहुत बड़ी प्रताड़ना दी जा रही हो। ममा ने समझाने की कोशिश की- " जब शादी है तो उसकी रस्में होंगी ही, चाहे वह संगीत की रस्म हो, हल्दी लगाने की रस्म हो अथवा ढोल नचाई,  मिलनी, जयमाला, कन्यादान आदि हो।" मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि एक बार दान में जिस बेटी को पिता ने दे दिया हो उसे फिर कैसे दुबारा दान दिया जा सकता है। मैंने अपने पापा को साफ मना कर दिया था कि अब मेरा कन्यादान नहीं किया जाएगा क्योंकि मैं कोई वस्तु नहीं हूं कि जब चाहे किसीको उठा कर दे दिया जाए।

न जाने ससुराल वाले क्यों इस सब के लिए जोर दे रहे थे। घबराती थी कि पता नहीं दुबारा मांग भरते समय मेरी  आंखे झुकी रहेगी या भरी रहेगी। दुबारा जय माल कैसे होगा? फिर से शादी के सात फेरों का मतलब समझाया जाएगा। हर फेरे में एक बचन,  वरना वर- वधू को पति-पत्नी ही नहीं जाना जायेगा। लेकिन ये वचन मेरे लिए अनर्थ हो चुके थे। क्यों ये नाटक किया जायेगा, जब उसे कोई मानता ही नहीं। जब से दूसरी शादी के लिए हां किया था, तभी से नींद नहीं आती थी और यह सब सोच सोच कर दिमाग की नसें फटी जा रहीं थीं क्योंकि मुझसे यह सब नहीं होने वाला था।  मैं चाहती थी कि आर्य समाज पद्धति से बहुत ही सरल तरीके से शादी हो जाए।

लड़की के मम्मी-पापा चाहते थे कि शादी अच्छी तरह से हो। वे कहते कि शायद बेटे की पहली शादी में कुछ कमी रह गई थी इसीलिए मेरी बहू के साथ  अनर्थ हो गया। इस बार वे कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहते थे। वे सोचते थे  कि वह शादी भी क्या है जिसमें कार्ड न छपे, सभी रिश्तेदार, दोस्त  न हों । लोग भी तरह-तरह की बातें करते हैं ।

मैंने अपनी सहेली रामा को बताया कि मैं बहुत टूट चुकी हूं और यह सब बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी । तुम जाकर उन्हें मना ही कर दो। मुझे शादी नहीं करनी। मैं सोच रही थी कि मेरे भाग्य में ही शायद सुख नहीं बदा है परंतु मेरी कोई नहीं सुन रहा था।

बड़ी हिम्मत करके मैंने एंगेजमेंट के दिन हल्दी, पानी और तेल का उपटन लगा कर अपनी सभी पुरानी बातों को मैल की तरह निकालने की कोशिश की ताकि खुद के जीवन की नई शुरूआत के लिए तैयार हो सकूं। परंतु यादें तो बस यादें होती हैं। बिना बुलाए हमारे सामने मंडराती रहीं और हमारे पुराने घावों को कुरेदती रहीं।

मुझे वह सब याद आता रहा कि शादी के बाद से मैं अपने पति के साथ कभी खुश नहीं रही। वह हमेशा मुझे परेशान करता रहे, कभी-कभी तो मारते भी ।  मैंने निर्णय कर ही लिया था कि मैं अब यह सब नहीं सहूँगी। उस रात विनीत देर से घर आया तो मैं कागज लिए बैठी थी। विनीत कुछ कहता उससे पहले ही मैं बोल उठी, - “अब हम दोनों एक साथ नहीं रह सकते। हमने फैसला कर लिया है कि हम  अलग हो जाएंगे। रोज-रोज की किच-किच, रोना-धोना अब हम लोगों को खत्म कर देना चाहिए। मैंने वकील से मिलकर तलाक के कागजात बनवा लिए हैं और अपने सिग्नेचर भी कर दिए हैं। तुम भी हस्ताक्षर कर दो जिसे हम कोर्ट में जमा कर देंगे। जब तक तलाक नहीं हो जाता तब तक हम अलग रहेंगे। यह सब इस अभिलेख में लिख दिया है।“

विनीत को तो यकीन ही नहीं आ रहा था कि मैं अचानक इस तरह अंतिम निर्णय ले लूंगी। उसने मुझे समझाना चाहा।  विनीत ने मेरा हाथ थाम लिया और बोला कि यह बिल्कुल उचित नहीं होगा। हम लोग के बीच लड़ाई झगड़ा तो चलता ही रहता है। मैं मानता हूं कि ज्यादा गलतियां मेरी ही है लेकिन समझदारी इसी में है कि हम समझौता कर लें। लोग क्या कहेंगे।

मैंने उनकी एक न सुनी और स्पष्ट रूप से बोल दिया कि मुझे अब रोकने का कोई फायदा नहीं है। तुम्हारे चित्त में धोखा, फरेब, लालच, क्रोध और यौन-भावनाएं ही प्रबल रहती हैं। मैं दृढ़ निश्चय कर चुकी हूं। तुम अपने में खुश रहो मैं अपनी व्यवस्था खुद कर लूंगी। मुझे लोगों कि चिंता नहीं है। मैंने अपना सामान उठाया और जाने लगी तो विनीत ने कहा इस समय रात के दो बज रहे हैं। ऐसे में तुम कहां जाओगी।  अगर जाना ही है तो कल सुबह चली जाना। चार घंटे की ही तो बात है इसलिए रुक जाओ। न चाहते हुए भी मैं उनकी बात मान गई और रात में रुक गई। विनीत ने रात में मुझे मानने और मुझसे कुछ बात करने की बहुत कोशिश की मगर मैंने सोने का बहाना किया और किसी बात का जवाब नहीं  दिया।

सुबह होने पर मैं जाने लगी तो मैंने देखा कि विनीत देखता ही रह गया था। उसकी आंखों में आंसू थे। मेरे भी आंसू आ गए थे, क्योंकि बिछड़ना सभी के लिए बहुत तकलीफदेय होता है। अभी अंधेरा ही था। ऑटो में बैठ कर सोच रही थी कि कहा जाना चाहिए। अब तो इस शहर में कोई अपना नहीं है। अपने घर भी नहीं जा सकती क्योंकि नौकरी भी तो करनी थी। तभी हमें अपनी क्लासमेट रमा का ख्याल आया जो एक पी0 जी0 में रहती थी। मैंने ऑटो को उसकी पी0 जी0 की ओर मुड़वा दिया।

 पहुंचते ही रमा ने पूछा,  अनुभा क्या बात है इस समय कहां से आ रही हो? मैं उसे पकड़ कर जोर जोर रोने लगी। मेरे भीतर का सारा गुबार और धैर्य पिघल कर आंसुओं में बहने लगा था। काफी देर बाद मैं उसे बता पाई कि मैंने विनीत से ब्रेकअप कर लिया है और फैसला कर लिया है कि मैं उससे तलाक ले लूंगी। हम दोनों ने तलाकनामें में साइन भी कर दिए हैं। मैं स्टेशन जा रही थी लेकिन आज ऑफिस में एक इंपॉर्टेंट मीटिंग है इसलिए तुम्हारे पास आ गई। इस शहर में तुम्हारे सिवा मेरा कोई नहीं है। दो चार  दिन तुम्हारे साथ ही रहूंगी। ठीक है। तुम कोई चिंता न करो।  रमा बोली - "अनुभा तुम्हारा फैसला हिम्मत भरा है। लगता है कि तुम रात भर सोई नहीं हो। तुम्हारी आंखें लाल हो रहीं है इसलिए थोड़ी देर आराम कर लो फिर आगे की बातें करेंगे।"

रमा जल्दी उठ गई और नाश्ता बनाया फिर  हम बातें करने बैठ गए। याद आया कि मेरी शादी विनीत से उसी ने कराई थी। उसी ने उसे उससे मिलवाया था। अच्छे खाते-पीते घर का था वह। पढ़ा लिखा था और नौकरी भी अच्छी थी। रमा भी बहुत खुश थी। मगर दो साल के अंदर ही ब्रेकअप हो गया। वह कह रही थी कि सारा किया धरा बेकार हो गया।

मैंने  विनीत के व्यवहार के बारे में रमा को कभी कुछ नहीं बताया था और सब कुछ अकेले सहती रही थी। अपने मम्मी पापा को भी कुछ ज्यादा नहीं बताया था। आज रमा ने कहा अनुभा तुम सब कुछ खुल कर मुझे बताओ। सब कुछ खोल कर बताने का मन हो रहा था लेकिन मुझसे बताया ही नहीं गया कि किस किस्म का वह इंसान था। अपनी ही बेइज्जती महसूस हो रही थी। केवल इतना ही कह पाई कि विनीत बात बात में मारपीट करता है, गुस्सा करता है, चिल्लाता है और किसी काम में मेरा विश्वास नहीं करता।  मेरी भावनाओं की तो उसे कोई कदर ही नहीं है। ऐसे में बताओ अपना जीवन कैसे बिताया जा सकता है । मैं जानती हूं कि आज तलाक लेना कठिन है और उसके बाद तलाक शुदा जिंदगी बिताना बहुत मुश्किल है। कहीं न कहीं से तो बात का पता चल ही जाता है फिर समाज के ठेकेदार तलाकशुदा लड़की पर नजर जमाए रहते हैं और उसके साथ कुछ भी करने  की हद तक सोचते हैं। कुछ लोग अपने घर में रखना चाहते हैं अपनी रखैल बना कर। मगर दोस्त हो तो रामा जैसा उसने मुझे सहारा दिया । अपनी दृढ इच्छा शक्ति और मजबूत संस्कार के चलते मेरे प्रति किसी के इरादे कभी खराब नहीं हुए और सभी ने मुझे प्यार और इज्जत ही दिया।

रमा  ने कहा था  - “देखो अनुभा!  यह तुम्हारी जिंदगी का प्रश्न है। इसमें कोई कंप्रोमाइज करने की आवश्यकता नहीं है। अगर तुम वहां खुशी नहीं हो तो तुम्हारा जीवन नारकीय हो जाएगा और ऐसे माहौल में तिल तिल कर के मरने का कोई फायदा नहीं है। तुमने उचित ही किया। अगर दोनों में नहीं पट रही है तो साथ नहीं रहना चाहिए। वह जमाना चला गया जब  लड़कियां सब कुछ सहती रहती थी। आज तुम अपने पैरों पर खड़ी हो। फिर किसी के सामने झुकने की जरूरत नहीं है। तुम्हें अपना जीवन अपनी तरह से जीने का संवैधानिक अधिकार है।“

मैंने रमा को बताया कि मैं विनीत को कितना प्यार करती थी। पंडित जी ने दोनों की शादी में सात जन्म तक साथ निभाने की कसमें खिलाई थी,उन्हीं पर चलने का प्रयास करती थी। मगर ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती और हम ब्रेकअप के चौराहे पर आ खड़े हुए। हमारे समाज में शादी टूटना खराब माना जाता है। मेरे मां-बाप भी चाहते थे कि किसी तरह हमारा रिश्ता बना रहे। अगर रिश्ता टूट गया और तलाक हो गया तो वे समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। मगर यह कोई बात नहीं है कि  हम इसीलिए मरते रहें और घुट घुट कर जिएं क्योंकि मुंह दिखाने लायक बने रहना है। मेरी जिंदगी मेरी है और मैं अपने तरीके से जिऊंगी। यह बात मैंने अपनी मम्मी पापा को भी समझा दिया और उन्होंने मेरा ही साथ दिया था ।

ब्रेकअप को दो वर्ष हो गये थे और मैं विनीत को भूल ही गई थी । एक दिन रविवार को हम दोनों सहेलियां घर में अखबार पढ़ रहे थे। अचानक एक मैट्रिमोनियल विज्ञापन पर नजर टिक गई। लिखा था "एक 30 वर्षीय एन आर आई विधुर को सुंदर सुशील जीवनसंगिनी चाहिए। दुर्घटना के कारण पत्नी से वियोग। तलाकशुदा को वरीयता। तुरंत संपर्क करें।" इस विज्ञापन को मैंने उस दिन कई बार पढ़ा। अगले संडे को फिर वही विज्ञापन अखबार में दिखाई पड़ा। उसे बार बार पढ़ने को जी कर रहा था। जब भी वह मैट्रिमोनियल पढ़ती मुझे कुछ होने लगता। शायद यह लड़का मेरे लिए बना है। मगर मैं सोचती क्या मै दोबारा शादी कर पाऊंगी, फिर से अपना घर बसा सकूंगी? अचानक रमा ने भांप लिया। बोली फिर एक बार कोशिश करूं क्या?

मैंने कहा नहीं। पता नहीं कैसे दुर्घटना हो गई और उसकी पत्नी मर गई। अब उससे रहा नहीं जा रहा इसलिए शादी के लिए लड़की ढूढ रहा है।

मैंने उसकी कटिंग अलग से रख ली। उसमें उसका फोन नंबर और ईमेल आईडी  दिया था। दिन भर वह सोचती रही इस पर प्रस्ताव भेजे या ना भेजें। मैंने मेल भी लिख दिया लेकिन उसे बाद में डिलीट कर दिया। रात भर इसी उधेड़बुन में थी कि अप्लाई करना चाहिए या नहीं । मैंने रमा को यह सारी बातें बताई तो उसने उसे फोन मिला ही दिया।

दूसरी तरफ से जवाब आया कि मैं आनंद बोल रहा हूं। मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं और यूएसए में काम करता हूं। मेरी शादी 2014 में हुई थी। विदाई के दिन ही हम लोग हनीमून मनाने उत्तराखंड गए थे।  वहां पहुंचते ही हम लोग तूफान में फंस गए थे  जिसमें हजारों लोग मारे गए थे। मैं किसी तरह बच गया परंतु दुर्भाग्य से अपनी पत्नी को नहीं बचा सका। घर वालों की बड़ी इच्छा है कि मैं फिर से अपना घर बसा लूं।

रमा ने तो सीधे कह दिया कि शाम को होटल टिप्सओं में मिलो वही मैं अपनी सहेली को लेकर आ जाऊंगी और शादी की बातें करूंगी। मैंने कहा- “रमा तुमने कहां मुझे फंसा दिया अब बताओ मैं क्या करूं?” उसने कहा -  “यह तो बड़ी अच्छी बात है हम शाम को भी जरूर जाएंगे और उनसे बात करेंगे अगर लड़का अच्छा लगा तो तुम्हारी शादी भी करा देंगे।“

शाम को निर्धारित समय पर हम लोग पहुंचे। आनंद से मिलकर के वास्तव में आनंद आ गया। हम लोग को वे बहुत शालीन एवं व्यवहार कुशल लगे। मैंने उनसे कहा कि मैं अपनी पिछली जिंदगी के बारे में सब कुछ बता देना चाहती हूं। उन्होंने कहा कि मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है। तुम जैसी हो वैसी ही मेरे लिए अच्छी हो। मैंने जिद करके उन्हें सब कुछ बताना चाहा तो वे सुनने को तैयार हो गये। मैंने कहा कि विनीत अच्छे घर का लड़का था इसलिए मैंने उससे शादी की। मगर शादी के बाद उसका व्यवहार और चाल चलन मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने बहुत कोशिश की कि वह सुधर जाए मगर में असफल रही।

मैंने  आनन्द को बताया कि पढ़ाई के बाद मुझे बंगलोर में नौकरी मिली। रमा ने विनीत से हमारी मुलाकात हवाई अड्डे पर कराई थी। एक ही कंपनी में काम करने के कारण हम लोग अक्सर मिलने लगे,  कभी कंपनी की मीटिंग में तो कभी किसी फंक्शन में। शायद मैं विनीत को प्यार करने लगी थी इसलिए जब रमा ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं बहुत खुश हो गई। मैंने अपने मम्मी पापा को सूचित किया पहले तो उन्होंने मना किया लेकिन मेरी जिद के कारण वे मेरी बात मान गए।

शादी होते ही विनीत अपनी धौंस मुझ पर जमाने लगे। उनकी तो हर बात मानी जाए। अगर मैं कुछ कह दूं तो उसे किसी न किसी बहाने से उसे टाल देते थे। उस दिन विनीत के दोस्त के यहां पार्टी थी। विनीत ने कहा कि मुझे चलना है मगर नीली वाली साड़ी पहनकर कर। मैं वह साड़ी नहीं पहनना चाहती थी क्योंकि वह बहुत पारदर्शी थी और मुझे शर्म आ रही थी। मगर वे तो जिद पर अड़ गए थे और हम लोगों के बीच में काफी तू तू मैं मैं हो गई। एक दिन जब मैंने विनीत से एक खास सूट पहनने को कहा तो वे भड़क गए थे। कहने लगे तुम कौन होती हो मुझे समझाने वाली मुझे जो पसंद होगा वही पहनूगा। दोस्तों की पार्टी में जाते तो वे चाहते थे कि मैं वहां सबके साथ डांस करूं मगर मैंने मना कर देती तो उन्हें बहुत खराब लगता । वहां ड्रिंक के बाद एक लड़की से फ्लर्ट करने लगे। मैं चुपचाप देख रही थी। मुझे बहुत खराब लग रहा था। इस बात पर मेरी उनसे जम कर लड़ाई हुई थी । मैंने कहा जब तुम उस लड़की के साथ डांस कर रहे थे तो तुम्हें हमारी भावनाओं का कोई कदर नहीं थी । एक दिन मैं अपने सहकर्मी राजीव के साथ लंच कर रही थी और उसके कुछ चुटकुले सुनकर हंस रही थी तो उसी समय विनीत आ गए। मुझे वहां से घसीटते हुए ले गए थे। शाम को घर पर आकर उस प्रकरण को लेकर इतनी बहस हो गई थी कि हाथापाई होने लगी थी। इतना ही नहीं वे हमेशा चाहते थे कि मैं उनके दोस्तों के यहां जाऊं मगर जब कभी मैं अपनी सहेलियों के घर चलने के लिए कहती तो मुझे उसके गेट तक पहुंचा देते थे और अंदर शायद ही कभी जाते थे। अक्सर वे मुझे लेने भी नहीं आते थे मुझे कैब करके घर वापस आना पड़ता था।

मेरी हर बात में  सदैव गल्ती निकालते थे। मैं कुछ कहती थी तो जानबूझकर कर उसका उल्टा ही करते थे। लेकिन मैं हमेशा उनकी बात मानने की कोशिश करती थी। मैं भी उतना पढ़ी लिखी हूं जितना वे।मेरी तनख्वाह भी ज्यादा थी फिर भी विनीत मुझे दबा कर  रखते थे। पता नहीं उन्हें किस बात का घमंड था, अपने को सबसे ज्ञानी समझते थे। हमेशा लड़ाई करते और मारपीट करते। मैं रोने के सिवाय कुछ नहीं कर पाती थी।

वैसे तो मेरे सास ससुर मेरे साथ ही रहते थे लेकिन हमारी लड़ाई में उनका कोई बश नहीं चलता था मेरी सास अक्सर हमारी पक्ष लेती  मगर विनीत उनको भी डांटता रहता था। लड़ाई के फल स्वरुप हमारा काम करने का मन नहीं होता था और मैं अपने काम में पिछड़ने लगी। र्मेरा प्रमोशन भी रुक  गया। इस प्रकार में बहुत परेशान और तनाव में रहने लगी थी ।   ब्रेकअप के बाद    अपनी सहेली रमा के साथ रहने लगी थी । वहां भी वह अपने दोस्तो के जरिए मेरे ऊपर दबाव डलवाते रहे  कि में वापस घर आ जाऊं। विनीत ने मेरे बॉस को भी एप्रोच किया और उनसे कहा कि इस लड़की को नौकरी से निकलवा दो क्योंकि यह करैक्टर की अच्छी नहीं है।  मैंने उन्हे अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में जब और कुछ बताना चाहा तो वह बड़ी सहजता से बोले - "तुम सब कुछ  भूल कर के मेरे साथ रह सकती हो।  मैं वादा करता हूं कि तुम्हारे साथ हमेशा बराबरी का व्यवहार होगा। हां! तुम्हें इंडिया छोड़ कर के अमेरिका चलना होगा।"

उस दिन हम लोग वापस घर पहुंचे ही  थे कि आनंद के पापा का भी फोन आ गया। उन्होंने कहा कि तुम लोग शाम को होटल यात्रिक आ जाओ।  साथ में डिनर करेंगे । ना चाहते हुए भी मना नहीं कर सकी। रात में ही उन लोगों ने मेरी मम्मी पापा से बात कर के शादी पक्की कर दी। अगले हफ्ते ही शादी होना निश्चित हो गया था ।

शादी की रस्मों को लेकर के मेरी उलझन जब नहीं थमी तो मैंने उनको फोन करके सारी बातें बताई। उन्होंने कहा तुम चिंता मत करो । मुझे तुम्हारी हर बात मंजूर है। मैं अपने घर वालों को समझा दूंगा और मंदिर में जाकर शादी करेंगे। हां हम लोग एक अच्छा सा रिसेप्शन जरूर देंगे और हनीमून भी जरूर मनाएंगे। उनकी बातों से मेरे सारे घाव भर गये  प्रतीत हुए। मैंने बात मान ली।

मेरे मन मुताविक हमारा पुनर्विवाह तो हो गया। अब उससे भी बडा बवंडर मेरे मन में हनीमून को लेकर घुमड रहा था।  समझ नहीं आ रहा था कि आनंद को कैसे सहूँगी।  कभी कभी हम नहीं समझ पाते कि जिंदगी में आये तूफान को हम शांत कर सकते हैं या ईश्वर ।  मैं अपने जज्बात किसी से कह नहीं सकती थी ।  भगवान  से मनाती रहती थी कि मुझे सही  रास्ता  दिखाये।  फिर मेरे मन में आया कि जब आनंद मेरे लिये त्याग कर सकता तो मैं क्यो नहीं? मैंने पूरा मन बना लिया उन्हे हनीमून में सहयोग देने के लिये।  आनंद ने  ऑस्ट्रेलिया  में हनीमून मनाने का पूरा प्रबंध कर रखा था ।   हम दोनो  ने ऑस्ट्रेलिया  जाकर खूब एंजयाय किया  और एक दूसरे में समाहित हो गये ।   इस तरह  हमारा दूसरा हनीमून मना ।   

सोचती हूँ अगर मेरी दोस्त ने साथ न दिया होता तो मैं आज विनीत के साथ ही एक  घिनौनी जिंदगी व्यतीत कर रही होती। जिंदगी  भगवान द्वारा दी गयी है उसे हमें खराब करने का अधिकार नहीं है ।  इसलिए आवश्यकता पड़ने पर लोगों को प्राचीन रूढ़िवादी परंपराओं से बाहर निकलने की भी सेचना चाहिए।

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