अदृश्य हमसफ़र - 23

अदृश्य हमसफ़र…

भाग 23

ममता अपनी असमंजस की स्थिति से उबरने के लिए जी जान से कोशिश करने लगी। कोशिशें ही कामयाब होती हैं और अंततः ममता भी सफल हुई।

गर्दन को एक हल्का सा झटका देकर विचारों के प्रबल प्रवाह से बाहर आई और अनुराग की तरफ देखकर मुस्कुराई।

नजरें मिलते ही अनुराग ने फिर से अपना पुराना राग दोहरा दिया-" मुंन्नी, मेरी बात का जवाब देना नही चाहती तो कोई बात नही। " अनुराग की आवाज में इस बार हल्की सी मायूसी का पुट था।

ममता ने आवाज को संयत करते हुए कहा-" अरे जवाब क्यों नही दूँगी। देती हूँ न। बहुत याद आयी तुम्हारी, कसम से अनुराग। देखो न, तुम्हारे अलावा कोई भी तो ऐसा नही था कि गुस्सा आने पर जिसके बाल खींच लूँ या मनमर्जी के माफिक उंगली पर नचा डालूँ। (अब तक सम्भल चुकी ममता ने अनुराग के सवाल को हंसी में टालने की कोशिश की) तुम तो मेरी आदत बन चुके थे लेकिन जब अचानक से गायब हो गए तो कमी महसूस होना तो लाजमी ही था।

भला ये कोई बात की तुमने। "

अनुराग-" बस लड़ने के लिए ही याद आता था। " सहज सी आवाज में धीमे से पूछा अनुराग ने।
ममता-" अरे सिर्फ लड़ने के लिए ही क्यों? देखो न, जब भी मुझसे कुछ टूटता या खराब होता तो इल्जाम किस पर लगाती, तुम तो थे ही नही। तब भी सच्ची में बहुत याद आते थे। "

कहते कहते ममता ने हंसी की फुलझड़ियां बिखरा दी।

अब तक अनुराग समझ चुके थे कि ममता उन्हें जान बूझकर बनाने की कोशिश कर रही है और बातें घुमाने में लगी हुई है। उन्होंने लम्बी सांस भरते हुए पलंग के सिरहाने पर टेक लगाकर आंखे बंद कर ली। चेहरे पर पीड़ा की हल्की रेखाएं उभर आई। ममता ने तो चुहल की थी बात की टालने के लिए लेकिन अनुराग के लिए पीड़ा का सबब बन गयी। ममता बारीकी से अनुराग के चेहरे की बनती बिगड़ती रेखाओं के मुआयना करती जा रही थी। अनुराग के चेहरे पर उभरी पीड़ा की रेखाएं ममता के मन को भी क्लांत कर गयी। बहुत कुछ कहना चाह रही थी लेकिन फिर भी मौन को तरजीह दे रही थी। वह चाहती थी कि अनुराग पहले कहें तो बाद में मैं अपनी ज़ुबान खोलूं। उधर अनुराग ममता की बातों में से ही कोई सकारात्मक इशारा ढूंढने में लगे हुए थे जिससे उनके दिल को तसल्ली हो जाये कि जब वह अपनी बात कहें तो ममता हंगामा खड़ा न करे।

यद्धपि ममता के स्वभाव में उन्हें स्थिरता और समझदारी साफ दिखाई दे रही थी लेकिन फिर भी हल्के से आशंकित थे और भी ज्यादा विचारमग्न होते उससे पहले ही ममता की आवाज उनके कानों तक पहुंची।

"अनुराग"

आंखें खोलकर बस हम्म्म्म ही कहा उन्होंने।

ममता-" कहना तो नही चाहती थी लेकिन तुम्हारी पीड़ा और यह उभरता मौन मुझे मजबूर कर रहा है। तुमने बहुत कुछ किया है मेरे लिए और बहुत सहा भी है मेरे बचपने को। अब और ज्यादा परेशान नही कर सकती तुम्हें।

सुनो - तुम बहुत याद आये अनुराग, हर दिन हर पल।

मेरी कोई सुबह या शाम तुम्हे याद किये बिना नही गुजरी। "

ममता एक पल को कहते कहते रुकी और अनुराग की तरफ देखा। अनुराग के चेहरे से पीड़ा की रेखाएं गायब हो रही थी। सुकून साफ झलक रहा था। अनुराग को शांत देखकर ममता को भी सुकून भरी खुशी मिली। ममता अब तक समझ चुकी थी कि जब तक अनुराग उसके मन की बात नही जान लेंगे तब तक अपना मुंह नही खोलेंगे। जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं अनुराग, ऐसे में अगर मुझे हार स्वीकार करके मन की बात खोलनी भी पड़े तो कम से कम इनके जाने का मार्ग सुगम हो जाएगा और अपने दिल की बात कहने में आसानी होगी। बस यही सोचते सोचते ममता ने कहना आरम्भ किया।

ममता-" हर पल, हर लम्हा साये की तरह मेरे साथ रहते थे। सोचो खुद ही, अगर किसी से उसका साया ही रूठ जाए तो वह कैसा महसूस करेगा। तुम्हारे जाने के बाद भी हर बात के लिए मेरी आँखें तुम्हे तलाश करती थी। मनोहर जी आदर्श पति थे, कभी मुझे कोई दुख नही होने दिया लेकिन उस सुख की चर्चा सुनने के लिए तुम मेरे साथ नही थे।

जब बड़ा बेटा गोद में आया और उसे पहली बार मायके लेकर आयी, यकीन मानो या न मानो लेकिन माँ और बाबा की गोदी में देने से पहले उसे तुम्हारा आशीर्वाद दिलाना चाहती थी लेकिन तुम कहीं नही थे। बस शगुन के रुपये बड़ी माँ को देकर चले गए। क्यों इतने पत्थर दिल बन गए थे अनुराग? तुम्हें मैं तंग करती थी और सजा के तौर पर आशीर्वाद से मेरे बच्चों को वंचित कर दिया। "

इतना कहते कहते ममता का गला भर आया और आवाज थर्राने लगी। एक पल को गहरी सांस लेकर खुद को संभालने की कोशिश तो की लेकिन खुद को सुबकने से न रोक पायी।

अनुराग ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा-" नही ममता, बच्चों को आशीर्वाद से कभी वंचित नही रखा। तुम्हें तो पता भी नही है। तुम्हें याद होगा कि सूरज मुन्ने को लेकर बाहर निकल जाता था क्योकिं तुम तो बड़ी माँ के कमरे से निकलती ही नही थी। सूरज उसे मेरे पास लेकर आता था और पूरा पूरा दिन उसके साथ खेलने के लिए मैने पूरे सप्ताह की छुट्टी ली थी। "

ममता की गर्दन एकदम से अकड़ कर तन गयी।

सुबकना भूलकर यकायक गुर्राई-" मुझसे इतनी दुश्मनी क्यों निभाई?"

अनुराग उसके बदलते रंगों का पूरा लुत्फ उठा रहे थे। मुस्कुराते हुए बोले-" तुम पगली थी और हमेशा पगली रहोगी। मुंन्नी, उठो तो जरा, वह सामने वाली अलमारी से कुछ सामान लेकर आओ। जाओ तो। "

ममता तुरन्त उठी और अलमारी के सामने खड़ी होकर पीछे मुड़ी।

अनुराग-" पीछे क्या देखती हो खोलो उसे, पगली । "

ममता को अलमारी खोलते ही अंदाज हो गया कि यह अनुराग की है। उसकी नजरें अलमारी में ऊपर से नीचे तक मुआयना करने लगी। अलमारी में एक एक समान और अनुराग के पकड़े बड़े करीने से लगाये गए थे। सामान जिस तरह से रखा गया थे देविका की सुघड़ता का परिचय दे रहा था।  

तभी पीछे से अनुराग की आवाज आई-" सबसे ऊपर वाले शेल्फ में बिल्कुल पीछे की तरह एक डब्बा रखा होगा। उसे लेकर आओ। "

ममता का हाथ वहां तक नही पहुंच रहा था तो वह पास में रखी पाटी को खींचकर उस पर चढ़ गई। डब्बा तो निकाल लिया लेकिन पीछे से अनुराग की हंसी सुनकर ठिठकी।

अनुराग -" सिर्फ नाक की लंबाई पर जोर दिया मुंन्नी, अलमारी तक भी हाथ नही पहुंच रहा तुम्हारा।
ठिगनी कहीं की। "

बचपन से हाजिर जवाब रही ममता चुप न राह सकी और उसने तपाक से जवाब दिया-" हुंह, लंबे तो ऊंट भी होते हैं, तपते रेगिस्तान में नंगे पैर घूमते हैं। क्या करना ऐसी लम्बाई का। "

हंसीं में बात कही गयी थी बात अनुराग दिल पर ले गये।

क्रमशः

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Vinay Panwar Verified icon 3 months ago

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Right 3 months ago

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Sonam Trivedi 3 months ago

कहानी कुछ ज्यादा ही लंबी और बेमतलब के संवाद वाली होती चली जा रही है। इतना भी क्या बेसिर पैर के dialouge। शुरुआत और मध्य भाग सही लगा अभी तो बहुत उबाऊ हो गया है

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Manjula Makvana 3 months ago

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Shobhna 3 months ago