जिंदगी के रंग खुशियों के संग



     प्राची ने टिफ़िन पैक किया, बैग उठाया और ऑफिस के लिए निकल पड़ी। आजकल वैसे भी घर में उसका मन नहीं लगता है। दस महीने पहले तक वह बहुत व्यस्त रहती थी। सुबह से चक्करघिन्नी बनी घूमती, घर आवाज़ों से गूँजता रहता था...  

एक तरफ पिताजी की आवाज़ आती.. "पुच्चू! बेटा मेरा चश्मा कहाँ रखा है..."
"जिज्जी आज टिफ़िन में क्या बना दूँ...?" भाभी रोज पूछती थीं।
"बुई आज मूवी चलेंगे, 'स्त्री' लगी है पीवीआर में..." भतीजी उससे दस साल ही छोटी थी, तो दोनों में दोस्ती ज्यादा थी।
"गुड़िया! आज शाम को कला संगम में प्रदर्शनी देखने चलेंगे, ऑफिस से जल्दी आ जाना..." भैया ने कहा था और उस दिन...........! उस दिन के बाद कितना कुछ बदल गया... जिंदगी ऐसी करवट भी लेगी कभी... किसने सोचा था... इस तरह भरे पूरे घर में यह सन्नाटा.... 

उसने डोर लॉक किया और नीचे उतरी। सर्दियों में स्कूटर को भी ठण्ड लग जाती है। किक खाकर भी चालू होने का नाम नहीं लिया तो वह बैग को कंधे पर टांग पैदल ही निकल पड़ी।

"ऑटो..." उसकी आवाज़ सुन ऑटो रुक तो गया, किन्तु उसमें बैठे युवक को देख वह ठिठक गयी।
"मैडमजी! आ जाओ ये सर भी आपके ऑफिस ही जाएंगे." ऑटो वाला परिचित था, वह जरूरत पड़ने पर अक्सर इसी ऑटो से जाती थी। युवक ने कोने में सिमट कर उसके लिए जगह बना दी। संकोच के साथ ही घड़ी की भागती सुइयों को देख वह बैठ गयी।

"यूँ तो जिंदगी को जीते हैं लोग....
जिंदगियाँ हमें जिएँ तो कोई बात बने....."
गाने की पंक्तियाँ सुन वह चौंक गई। 
"हेलो! हाँ यार बस पहुँच रहा हूँ... नहीं नहीं कोई परेशानी नहीं होगी, तेरे ऑफिस की कोई मैडम हैं साथ में... रास्ता नहीं भटकूँगा..."
"ओह! तो ये जनाब के मोबाइल की रिंग टोन थी, और ये ऑफिस में किससे मिलने जा रहा है?" प्राची सोचने लगी।
"मैं रोहित... क्या आपका नाम जान सकता हूँ?" मोबाइल बंद कर उसने प्राची की ओर देखा।
यूँ तो वह बात करने या परिचय के मूड में नहीं थी, फिर भी एटिकेट्स के कारण उसने नाम बता दिया।
"वाओ... यू नो... प्राची मतलब पूरब और रोहित मतलब सूर्य... दोनों का कितना गहरा रिश्ता है...!"
"जी पर आप मुगालते में मत रहना... मुझे आपमें जरा भी दिलचस्पी नहीं है, मजबूरी नहीं होती तो मैं ऑटो में भी नहीं बैठती। ऑफिस पहुँचने के बाद आपका रास्ता अलग और मेरा अलग...." उसने आवाज़ में तल्खी लाते हुए दो टूक जवाब दिया और ईयरफोन लगा लिए ताकि उसे अवॉयड कर सके।

यूँ तो दस महीने पहले तक वह एक खुशमिज़ाज़ और जिंदादिल लड़की थी, किन्तु उस हादसे ने उसे पूरी तरह तोड़कर उसकी जिंदगी ही बदल दी थी। उस दिन मूवी से लौटते हुए रात का एक बज गया था। पहली बार लेट नाईट शो में गए थे। पिताजी की दवाई के लिए उसी ने याद दिलाया और...........! इसके आगे वह सोचना ही नहीं चाहती... उसने मोबाइल में म्यूजिक ऑफ किया और ईयरफोन लगे लगे ही आँखे बंद कर लीं।

एक धक्का सा लगा और दोनों की कोहनी टकराई। प्राची ने घूरकर उसे देखा। उसने मुस्कुराते हुए ऑटो वाले की ओर इशारा किया और होंठों को तिरछा करते हुए कंधे उचका दिए।

"ऑफिस आ गया, उतरना नहीं है क्या..?" ऑटो वाले की आवाज़ सुन वह अचकचा गयी। क्या सोचेगा ये? पर्स खोलने लगी तो रोहित ने मना करते हुए खुद पैसे दिए और दोनों लिफ्ट की ओर चल दिए।
"मैडमजी! क्या आप बताएंगी कि विजय का केबिन किस फ्लोर पर है?" 
'यह बॉस का दोस्त है मतलब' सोचते हुए उसने उसे साथ आने का इशारा किया।

ऑफिस में अपनी टेबल पर होकर भी आज वह वहाँ नहीं थी।
"जिंदगी में लम्हें नहीं... हर लम्हें में जिंदगी जियो..." पापा की यह बात आज रोहित के मोबाइल की रिंगटोन ने फिर याद दिला दी। कितनी खुशनुमा थी जिंदगी... किसकी नज़र लग गयी? आज तो जिंदगी बोझ बन गयी है। काश! वह इतनी जिम्मेदार नहीं होती... काश! कि वह पापा की दवाई खत्म होने के पहले ही लाने की चिंता नहीं करती... काश कि....... बस इस काश के आगे वह सोच ही नहीं पाती।

रोहित भी विजय के केबिन में लगे काँच से प्राची को देख रहा था। विजय ने उसे बता दिया था कि एक रात परिवार के साथ मूवी से लौटते हुए प्राची एक मेडिकल स्टोर पर दवाई लेने गयी थी कि रोड के किनारे खड़ी गाड़ी को एक अंधाधुंध भागते हुए ट्रक ने टक्कर मार दी थी। हादसा इतना भयानक था कि हॉस्पिटल के सामने होते हुए भी किसी को बचाया नहीं जा सका था। प्राची अकेली गाड़ी से बाहर थी तो बच गयी और आज तक उस हादसे से उबर नहीं पाई है।

"एक चिड़िया हमारे दिलों में चहकती है... एक तितली हमारी हथेलियों पर दमकती है... एक अनुभूति जो मन की क्यारी में महकती है... वह क्या है..? बूझो तो जाने...!"
रोहित पता नहीं कब से प्राची के सामने वाली चेयर पर बैठा था।
"आ आ आप... कब आए, कहिए कुछ काम है मुझसे..?" प्राची असहज हो गयी। पता नहीं उसके व्यक्तित्व में कौन सा चुम्बकीय आकर्षण था कि वह उसकी ओर खिंच रही थी।
"बस मेरे सवाल का जवाब दे दो, चला जाऊँगा.."
"मुझे नहीं पता...."
"वह हमारे आसपास ही बिखरी है और हम कस्तूरी मृग की भांति भटक रहे हैं उसके लिए, जो हममें है और हमसे ही है।"
रोहित की बातें सुनकर आसपास की टेबल वाले भी इधर ही आ जमे थे। प्राची को असहज होता देख रोहित सबको सम्बोधित करते हुए बोला.... "मेरा मानना है कि पहले हमें स्वयं से जुड़ना चाहिए, फिर अपनों से और फिर सबसे ।" 
एकाएक ऑफिस तालियों से गूँज उठा। 
"प्राची मेरा दोस्त थोड़ा सिरफिरा है, तुम्हें परेशान तो नहीं कर रहा..?" विजय भी वहीं आ गए थे।
"जी जी नहीं... ऐसी कोई बात नहीं है..." कहते हुए वह अजीब सा महसूस कर रही थी।
"छोटी से छोटी बात दिल को गुदगुदा सक‍ती है और हमें खुश रहने के लिए किसी का इंतजार करने की जरूरत नहीं.... मैंने जो प्रश्न पूछा उसका सिंपल सा जवाब है.... 'खुशी' समझी मिस प्राची.....??" रोहित की नज़रों में पता नहीं क्या था जो उसकी नज़रें अपने आप झुक गयीं।

आज रात भी प्राची को नींद नहीं आयी... किन्तु करवटें बदलते हुए उस हादसे की सिलवटें नहीं थीं... आज रोहित का चेहरा... उसकी मुस्कुराहट और उसकी बातें उसे सोने नहीं दे रहीं थीं। वह सोचती रही कि स्कूटर स्टार्ट नहीं होना... ऑटो में रोहित का मिलना... क्या कोई संकेत है? वह अपनों की दर्दनाक असामयिक मौत से स्तब्ध और दुखी होकर निराशा में जी रही थी, ऐसे में रोहित का आना...... और....... खुशी के अहसास को जगाकर जिंदगी जीने के लिए प्रेरित करना.... !

अगले दिन वह समय से पहले ही ऑफिस पहुँच गयी। 
विजय और रोहित दोनों वहीं थे।
"अगर हम जीवन में छोटी-छोटी बातों पर अपना मन खराब न करें तो हम सब 'सेंचुरी' मार सकते हैं।" रोहित की बात पर विजय के चेहरे का रंग उदासी में बदलते देख वह फिर बोला... "दोस्त! हम सब मरते हैं पर हम सब जीते नहीं.... मरने के पहले जीना मत छोड़ो.." यह उसने प्राची की ओर देखकर बोला था।
"अच्छा अब चलता हूँ..." 
"आपका मोबाइल नम्बर....?" अनायास ही प्राची के मुँह से निकला.... वह खुद ही शर्मिंदा हो गई अपने उतावलेपन पर....
"विजय के पास है..." कहकर हाथ हिलाता हुआ रोहित आँखों से ओझल हो गया...!

"मे आई कम इन सर..?" विजय के बुलाने पर प्राची उसके केबिन में पहुँची।
"आओ प्राची, ये पैकेट रोहित तुम्हारे लिए दे गया है.."
कांपते हाथ और धड़कते दिल से उसने पैकेट लिया...
"मुझे हैरानी होती है कि रोहित जैसे खुशमिज़ाज़ और दूसरों को जीना सिखाने वाले इंसान को ईश्वर ने इतनी छोटी जिंदगी क्यों दी?" विजय की बात सुन प्राची एक बार और थरथरा गयी... "क्या कहा आपने..?"
"हाँ प्राची रोहित को थर्ड स्टेज का कैंसर है... फिर भी देखो... सबकी जिंदगी में खुशियों के रंग बांटता फिर रहा है.. " विजय को आँसू पोंछता छोड़ वह बोझिल तन मन के साथ अपनी चेयर पर आ बैठी। काश! कि कैंसर का इलाज हो सकता.... सोचते हुए काँपते हाथों से पैकेट खोला....
एक तस्वीर थी... बहुत सारे स्माइली के साथ और चंद पंक्तियाँ...
"न ख़ुशी की उम्र है बड़ी, 
न गम की दीवार है खड़ी...
जीवन-मृत्यु है बस एक पल का किस्सा
हँसते रहे तो खुशियाँ हैं जीवन का हिस्सा..
दोस्त! हँसते हँसते जीना सीखो...
मरने से पहले जीना न छोड़ो....."
अक्षर धुंधले होने लगे और मन.... वह तो भरने से पहले ही रीतने लगा था कि...
"सर! मुझे रोहित का नम्बर दीजिए.." वह फिर विजय के केबिन में थी।
"हेलो रोहित! हाँ मैं प्राची... सुनो तुमने कहा था न कि सूरज रोज पूरब से निकलता है... पश्चिम में अस्त होने के बाद फिर पूर्व दिशा से उजाला फैलता है... तुम्हारे मिशन में मैं तुम्हारे साथ हूँ... दूसरों के जीवन में खुशियों के रंग भरते हुए तुम कभी अस्त हो भी गए तो मेरे अश्रुजल से उस उजाले की किरणें खुशियों के इंद्रधनुष बिखेरती रहेंगी.... ताउम्र... " 
उसे देखते हुए विजय सोच रहा था...
..... वाकई दूसरों को खुशी देने में अपने दुःख को भूलना ही जिंदगी है..... खुशियों के रंग बिखेरने से ही जिंदगी निखरती है... अपनी भी और अपनों की भी......!

©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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