बर्फ में दबी आग



       बारिश थम चुकी थी.. बालकनी में झूले की गति के समान दोलायमान विचारों को विराम देने की कोशिश में कृति की नजर गमले में लगे पौधे की एक पत्ती की नोंक पर लटकी उस आखिरी बून्द पर टिक गयी, जो टपकते टपकते रह गयी थी और अपने जड़त्व और गुरुत्वाकर्षण के बीच संघर्षरत थी .

उस बून्द के साथ उसे एक साम्य सा महसूस हुआ. वह भी तो आज तक खुद से ही जूझ रही है, जैसा सोचती, वैसा कर नहीं पाती, हर बार टूटती पर दूसरे ही पल दुगुने उत्साह से जुट जाती एक नए संकल्प के साथ .

कृति बचपन से ही मेधावी रही है . शिक्षण हो या गृहकार्य.. दोनों में समान रुचि और कुशलता , परिवार में कोई धार्मिक प्रसंग हो या शादी विवाह, उसकी उपस्थिति के बिना फ़ीके ही रहते. फुर्ती और हाजिरजवाबी भी इतनी कि लोग दाँतों तले ऊँगली दबा लेते . स्कूल कॉलेज में शिक्षकों की प्रिय और दोस्तों की परमप्रिय कृति अपने मन में विचारों का कितना सुलगता लावा छुपाए है, ये कोई नहीं जानता था . 

वह एक मध्यमवर्गीय परम्परावादी परिवार की बेटी थी, जिसने बचपन से घर में महिलाओं को अपने अरमान कुचलते देखा था. बस यहीं से उसके मन में कहीं गहरे एक विद्रोह की चिंगारी सुलगने लगी. बेटे और बेटी की परवरिश में यूँ तो कोई भेद न था पर अवसरों की उपलब्धता में एक निश्चित अंतर परिलक्षित होता था. जब मनचाहे कोर्स में दाखिले की मनाही हुई तो उसकी निगाह शिक्षा से वंचित रहे बच्चों पर गई और उसने समझौता कर लिया था, किन्तु अपनी लक्ष्यप्राप्ति के लिए परिवार से बगावत उसके जीवन का पहला संघर्ष था और घरवालों की इच्छा के विरुद्ध उसने अन्य शहर में नौकरी जॉइन कर ली थी.

वह और कुशाग्र एक साथ पढ़ते थे.. दोस्ती और प्यार के बाद शादी तक का सफर ख्वाब सा गुजर गया. जमीनी हकीकत से रूबरू होते ही उनका रिश्ता हम-तुम से कब तू-तू मैं-मैं में बदल गया, वे जान नहीं पाए. नौकरी और बड़े शहर की भागमभाग भरी जिंदगी के बीच व्यवस्थित घर की जिम्मेदारी किसकी..? आज के जमाने का बहुत बड़ा प्रश्न.. कुशाग्र पुरुषोचित अहम का मारा और कृति नारी शिक्षा और स्वतंत्रता की पक्षधर.. दोनों को अपनी अपनी जिंदगी अपने घर से ज्यादा प्यारी.. यहाँ फिर कृति को ही झुकना था.. घर-परिवार के लिए वो झुकी, परन्तु मन में एक नया ज्वालामुखी सुलगने लगा था .

पूरी जिंदगी तो होम कर दी, खुद के लिए चाहते हुए भी कुछ अलग सा कर न पाई, क्या यह उसकी पराजय थी? उसने देखा वह बून्द अभी तक पत्ती की नोंक पर लटकी अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत थी .

माँ बनने के बाद उसे महसूस हुआ कि गाहे बगाहे एक लावा तो उसके भीतर अभी भी धधकता था, किन्तु उसकी ऊष्णता अब मानो शीतलता का आवरण ओढ़ सुहाने लगी थी . बेटी की नृत्य-संगीत और चित्रकारी में रुचि देख उसने उसे स्कूल के बाद क्लास तक लाने, ले जाने का जिम्मा ले लिया था. बेटा भी होनहार निकला. दोनों ही कक्षा में अव्वल आने के साथ अन्य गतिविधियों में भी उपलब्धि हासिल करते. अपने पारिवारिक, सामाजिक और शासकीय दायित्व निभाते वह थककर चूर हो जाती, फिर भी पत्नीधर्म निभाना नहीं भूली, हाँ एक मलाल रह जाता कि कभी तो पतियों को भी अपना धर्म निभाना चाहिए?? उसके मन पर जमी बर्फ के भीतर एक लावा सुलगता ही रहा और खुद से संघर्ष चलता रहा .

बेटी डॉक्टर और बेटा कंप्यूटर इंजीनियर बन गया था. बेटी की नई जिंदगी की शुरुआत फिर एक संघर्ष थी उसके लिए.. कुशाग्र की आपत्ति और बेटी की जिद में फिर से एक पत्नी और माँ की लड़ाई थी. जीत माँ की हुई क्योंकि उसने सोच लिया था कि बेटी अपनी जिंदगी भरपूर जिएगी और अपने सपनों से कोई समझौता नहीं करेगी. बेटे को भी विदेश से गूगल कम्पनी से अच्छा ऑफर मिला, उसे भी अपने मन पर पत्थर रख उसके सपनों की उड़ान पूरी करने सात समंदर पार भेज दिया .

अब जिन्दगी एकदम खाली थी.. कभी वह बालगृह जाती और अनाथ बच्चों को खिलौने, मिठाई और किताबों के साथ ढेर सारा दुलार बाँट आती.. कभी वृद्धाश्रम जाती और बुजुर्गों को फल, कम्बल और कपड़ों के साथ खूब सारा अपनापन देकर ढेरों आशीष ले आती.. निराश्रितों के पुनर्वास हेतु सेवारत संस्थाओं को भी खुलकर दान देती और कभी कभी मंदिर के बाहर बैठे भिखारियों को भोजन दे आती .

उसे थोड़ा सा सुकून मिलता था.. जब भूखे को खाना , नंगे को कपड़े, बेघर को घर मिलते देखती . सबको जीने के लिए संघर्ष करते देखती, सहारा मिलते भी देखती.. किन्तु अपने मन के भीतर कुलबुला रहे सवालों का जवाब नहीं ढूंढ पाती थी . देखने वाले उससे रश्क करते, किन्तु वह खुद ही नहीं जान पा रही थी कि उसकी इस लड़ाई का अंत है भी या नही? उसकी संघर्ष यात्रा का विराम है या ये अंतहीन यात्रा है??

वह सोच में गुम पता नहीं कब तक बैठी रहती यदि कुशाग्र कॉफी और बिस्किट की ट्रे लेकर उसके पास आकर नहीं बैठता . उसे कॉफ़ी का मग पकड़ाते हुए कुशाग्र बोला.. "सुनो..! क्या तुम सोचते सोचते थक नहीं जाती हो..?" 
"अब तो आदत सी हो गयी है.." वह फीकी सी मुस्कुरा दी.
"आदतें बदल भी तो सकती हैं.."
"किसके लिए बदलूँ?"
"बंदा खिदमत में हाजिर है.." कुशाग्र शरारत पर उतर आया था.
 एक पल के लिए उसे विश्वास नहीं हुआ..
"क्या..! सच..??" वह इसी पल के लिए तो तरसती रही जिंदगी भर...
" तुमने मेरी और बच्चों की खुशी के लिए पूरी उम्र लगा दी.. कर्तव्य और जिम्मेदारी को अपने सपनों से ऊपर रखा.. फिर भी कभी कोई शिकन नहीं, कोई उफ्फ तक नहीं.." कहते हुए कुशाग्र ने उसकी पलकों की कोरों पर झिलमिलाते हुए मोतियों पर अपने अधर रख दिये..
सालों से धधक रहा लावा फूट पड़ा और उसकी ऊष्मा से मन पर जमी बर्फ भी पिघलकर आँखों से बह निकली.. कुशाग्र की बाँहों में समाते हुए उसने देखा कि पत्ती पर लटकी बून्द को कहीं से एक चिड़िया ने आकर अपनी चोंच में ले लिया है...
  
उसे भी अपने संघर्ष का प्रतिफल मिल गया था..!!

©डॉ वन्दना गुप्ता
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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