Kabhi Alvida Naa Kehna - 11 in Hindi Love Stories by Dr. Vandana Gupta books and stories PDF | कभी अलविदा न कहना - 11

कभी अलविदा न कहना - 11

कभी अलविदा न कहना

डॉ वन्दना गुप्ता

11

अगला सप्ताह काफी व्यस्तता में गुजरा। मैंने राजपुर में शिफ्ट कर लिया। रेखा और अनिता के साथ होम शेयर कर मैं रिलैक्स महसूस कर रही थी, लेकिन खुश नहीं थी। चूँकि वे दोनों एक दूसरे के साथ कंफर्टेबल थीं और मुझे कभी कभी दाल में कंकर वाला फील करवा देतीं थीं। अब अप डाउन डेली न होकर वीकली हो गया था। सुनील से मुलाकात तो हुई थी, किन्तु बात कोई खास नहीं... अलका दी भी चुप थीं और अंकु की बोर्ड परीक्षा शुरू हो गयी थी, तो घर पर भी माहौल अभी शांत था। मुझे सोचने के लिए वक़्त मिल गया था।

"मैडम! ये फॉर्म चेक कर लीजिए।" मैं स्टाफ रूम में बैठी थी और एक युवती परीक्षा फॉर्म लेकर आयी। मैंने नज़र उठाकर देखा.. एक विवाहित युवती थी।

"प्राइवेट एग्जाम में बैठ रही हो? कौन सी क्लास का फॉर्म है?"

"मैडम, एम ए सोशियोलॉजी में करना है.."

"तुमने तो बी एस सी मैथ्स किया है, अब एम ए क्यों कर रही हो, एम एस सी करो।" मैंने बेमतलब सलाह दे डाली।

"जी मैडम! शादी के बाद समय मिलना मुश्किल है, एम ए तो प्राइवेट हो जाएगा, किन्तु एम एस सी के लिए नियमित अध्ययन जरूरी है।" उसकी बात सुनकर अचानक मैं तीन साल पीछे पहुँच गयी।

"वैशाली को पढ़ने का शौक है।" मम्मी की बात सुनकर रंजन ने कहा था कि "हम तो दिनभर शॉप पर रहेंगे, तुम कर लेना एम एस सी, इतना टाइम तो मिल ही जाएगा।"

वाकई मेरी छटी इन्द्रिय कुछ ज्यादा ही सक्रिय है... क्योंकि तभी उस युवती के पीछे एक युवक गोद में एक साल की बच्ची को लेकर आया... "हो गया विशु? लो संभालो इसे..." मैं चौंक गयी परिचित आवाज़ में 'विशु' सुनकर... वह रंजन ही था। "जी, हो गया.." मैंने पुनः फॉर्म देखा... 'विशाखा गोयल'... ओह तो यह विशु है.. तब तक शायद रंजन ने भी मुझे पहचान लिया था... "अरे! वैशाली तुम यहाँ...?" उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव देखकर मुझे सुकून मिला, क्योंकि विशाखा की जगह खुद की कल्पना कर हँसी आ रही थी और अपने उस समय के निर्णय पर मुझे आज बहुत खुशी मिली।

"जी मैंने यहाँ बतौर लेक्चरर जॉइन किया है, अभी एक महीना ही हुआ है.."

"अच्छा अच्छा.... गुड... विशु ये अलका की कजिन है..." उसने बीवी से परिचय करवाते हुए कहा... "कोई काम हो तो बताना... ये कार्ड रखो, कभी घर आना, बुआजी ने बताया नहीं कि तुम यहाँ हो.." उसकी आवाज़ में आश्चर्य और खिसियाहट का मिश्रण महसूस किया मैंने.... कभी कभी औपचारिकताएं कितनी जरूरी हो जाती हैं, हम दोनों ही जानते थे कि मैं कभी उसके घर नहीं जाने वाली, फिर भी... उसकी 'विशु' के चेहरे के बदलते रंग से मैं समझ चुकी थी कि ताईजी की भाभी उसे मेरे बारे में बता चुकी थीं, क्योंकि उसके चेहरे पर थोड़ी देर पहले मेरे लिए जो सम्मान का भाव था, अब ईर्ष्या में बदल चुका था। पता नहीं क्यों... आज मुझे सुनील की बेतहाशा याद आ रही थी।

घर पहुँची तो महफ़िल जमी थी। कैंपस में रहने वाले सभी साथी आर्ट्स स्ट्रीम के थे, तो मॉर्निंग शिफ्ट में कॉलेज जाते थे। रेखा का विषय भूगोल होने से प्रैक्टिकल होते थे और मैं अकेली साइंस फैकल्टी में थी तो पाँच बज जाते थे कॉलेज से निकलने में और कभी कभी रेखा मेरे साथ होती थी। निखिल सर और विजय की अच्छी दोस्ती थी, और चूँकि रेखा और विजय के रिलेशन को घर वालों की मौन स्वीकृति मिल चुकी थी और अनिता भी निखिल सर को इसी दृष्टि से देखती थी, तो घर पर वे चारों देर रात तक गपशप करते थे। मुझे नौ बजते ही नींद आने लगती थी तो सभी खुश थे, वे लोग भी मेरी कंपनी उस समय पसन्द नहीं करते थे। आज भी महफ़िल देर तक जमने वाली थी। मैंने बैग पैक किया और अवकाश आवेदन पत्र लिखकर रेखा को दिया.. "सुन! मैं अभी घर जा रही हूँ, ये एप्लीकेशन कल कॉलेज में दे देना।"

"कल बैंक हॉलिडे है क्या?" अनिता का प्रश्न समझ में आने पर मुझे गुस्सा आया, किन्तु मन में कहीं सुनील की याद भी मचल रही थी... "नहीं तो... क्यों?" मैंने अनजान बनते हुए कहा।

"आज अचानक घर कैसे जा रही है फिर?"

"यहाँ कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहती, इसलिए..." मैं भी तीर छोड़कर निकल गयी।

आज मैं इस माहौल से दूर भाग जाना चाहती थी। मुझे कोफ्त होती थी ये देखकर कि पढ़ लिखकर काबिल बन जाने के बाद भी लड़कियों का एक ही लक्ष्य होता था कि किसी अच्छे घर के लड़के से शादी कर गृहस्थ जीवन में रम जाना.... अपने जीवन का लक्ष्य भी वे सिर्फ इसलिए निर्धारित नहीं करतीं कि शादी के बाद ससुराल वालों को पसन्द आए वही काम करना है। मुझे इस सामंजस्य से विरोध नहीं था... मैं कहती थी कि अपनी पसन्द के मुताबिक घर वर देखेंगे न कि घर वर के हिसाब से अपनी पसन्द बदलेंगे। मुझे साहित्य पढ़ने का शौक था और शायद इसीलिए मुकेश सर से दोस्ती हो गयी थी। वे हिंदी के थे और पुस्तकालय में उपलब्ध काफी साहित्यिक किताबें मुझे सुझायी थीं। मैंने दोस्ती भी सिर्फ साहित्य चर्चा तक सीमित रखी थी, क्योंकि मैं किसी प्रपंच में नहीं पड़ना चाहती थी और रेखा, अनिता, निखिल सर और विजय की दोस्ती की चर्चा पूरे शहर में थी।

बस में बैठते ही मुझे अशोक की बातें याद आ गयीं। उसकी साफगोई की मैं कायल थी, किन्तु अभी भी कहीं न कहीं अविश्वास की एक महीन परत थी। दिल कहता था कि वह सच बोल रहा था, किन्तु दिमाग अलग दिशा में सोच रहा था। 'काश! सुनील भी इस बस में आ जाए...' मेरे सोचने के साथ ही सुनील बस में चढ़ा। मुझे खुशी हुई। मुझे देखकर उसके चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित खुशी के भाव मुझे एक सुकून का एहसास करा गए। "आज शनिवार तो नहीं है?" उसकी बात सुनकर मुझे हँसी आ गयी।

"क्या शनिवार के अलावा मुझे घर जाने की इजाजत नहीं है, आज घर की याद आ रही थी।" कहना तो चाह रही थी कि 'तुम्हारी याद आ रही थी और यकीन नहीं हो रहा कि तुमसे मिलने के लिए ही आज घर जा रही हूं।'

"कोई खास वजह, घर की याद आने की?"

"शायद....." सिर्फ इतना ही बोल पायी।

"चलो जी अच्छा है, आज आपको घर की याद आयी, इस बहाने आपसे मुलाकात तो हुई।"

"मतलब आप भी मुझसे मिलना चाह रहे थे?" मैंने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए पूछा। वह शायद इसके लिए तैयार नहीं था।

"नहीं, मेरा मतलब था कि......"

"क्या मतलब था आज बता ही दीजिए.." अपनी हिम्मत पर मैं खुद हैरान थी।

"क्या यार विशु तुम भी......" वह अब तक सम्भल चुका था, इसलिए उसका बेलौस अंदाज़ लौट आया था। "दरअसल अशोक भाई पूछ रहे थे तुम्हारे बारे में.."

"ह्म्म्म, क्या कहा फिर तुमने अपने अशोक भाई से?"

"क्या कहूँगा, जब तक तुम कुछ बोलोगी नहीं, उन्होंने सिर्फ तुमसे मुलाकात के बारे में पूछा था और हाँ उन्होंने पेजर खरीदा है, उसका नम्बर तुम चाहो तो मैं तुम्हें दे सकता हूँ।"

"उससे क्या होगा?"

"तुम लैंडलाइन से कॉल कर उनके लिए मैसेज छोड़ सकती हो।"

"जब तुम पेजर खरीदो, तब नम्बर दे देना।" मैं अपनी बात इससे ज्यादा स्पष्ट नहीं कह सकती थी, मुझे आश्चर्य हो रहा था... इतनी हिम्मत मुझमें कैसे आ गयी।

"कल वापिस आओगी?" उसने बात बदलते हुए पूछा।

"नहीं, छुट्टी ली है, अब सोमवार को ही वापसी होगी।"

"चलो! कॉफ़ी पीते हैं?" बस हमेशा वाले होटल पर रुकी थी।

"तुम्हें तो चाय पसन्द है।" उस दिन की बात मेरे दिमाग में अभी भी थी।

वह बिना कुछ बोले उतर गया। अब बस में कुछ और लोगों से भी परिचय हो चुका था और वे सब जानते थे कि सुनील और मैं पारिवारिक मित्र हैं। मैं भी कॉफी पीने बस से उतर गयी।

"तुम बहुत अच्छा गाते हो..." मैं अनायास ही आप से तुम पर आ गयी और मुझे पता भी नहीं चला।

"अशोक भाई के शब्दों को आवाज़ देना मुझे हमेशा अच्छा लगता है.... आपको पसन्द आया... शुक्रिया..."

उफ्फ ये क्या चल रहा था हमारे बीच... मैं 'तुम' पर पहुँची तो वह 'आप' पर आ गया था।

"एक बात बताओ, तुम्हें तो पता ही होगा कि तुम्हारे भाई ने अलका दी को नापसन्द क्यों किया?"

"उन्होंने अलका दी को नापसन्द नहीं किया, तुम पसन्द आ गयी, इसलिए वो ऑउट ऑफ पिक्चर हो गयीं।"

"वो मेरी दी हैं, तुम्हारी नहीं.... तुम क्यों अलका दी बोल रहे हो।" वैसे उसके मुँह से अलका दी सुनकर मुझे काफी राहत मिली थी, फिर भी मैं सीधे उसके विचार जानना चाहती थी।

"तुम्हारी दी... मेरी दी.... उसमें क्या गलत है।"

"गलत ये है कि वे तुमसे उम्र में छोटी हैं और जैसे तुम्हारे भाई को मैं पसन्द आ गयी, वैसे ही मेरी दी को तुम पसन्द आ गए हो और उन्होंने भी तुमसे शादी की इच्छा जाहिर की है.... अब बताओ तुम क्या कहते हो...?" मैंने आखिर प्रश्न दाग ही दिया।

वह एकदम असहज हो गया... "शादी कोई खेल नहीं है…. यह कैसे सम्भव है?"

"जी अब समझे आप.... यही तो मैं भी इतने दिनों से कह रही हूँ.... कोई समझ क्यों नहीं रहा...?"

"हम्म्म्म..... " उसने सिर्फ इतना ही कहा, लेकिन मुझे समझ में आ गया कि मैंने उसके लिए प्रश्न छोड़ दिया है और वह उत्तर ढूँढने की कोशिश में शायद मेरे मन की बात समझ सकेगा।

"मेरा एक फेवर करोगे?"

"क्या...?"

"चौंक तो ऐसे गए जैसे मैंने कोई अनहोनी बात कह दी।"

"तुम बोलो तो सही, क्या करना होगा?" उसके चेहरे पर अनेक प्रश्नचिन्ह थे।

"खैर.... छोड़ो... जाने दो....." मैं आज फुल फॉर्म में थी।

"मैंने पकड़ा कब.....?" वह भी शरारत के मूड में आ गया और हम दोनों ही मुस्कुरा उठे। काफी हल्का महसूस कर रही थी मैं... और शायद वह भी.....!

"जोक्स अपार्ट... बोलो क्या कह रही थी।" उसने फिर पूछा।

"तुम एक बार अपने अशोक भाई से पूछना कि क्या वे अलका दी से शादी करेंगे..?" मैं चाहकर भी अशोक को भाई नहीं बोल पा रही थी, जिस तरह से उसने मेरी दी को अपनी दी बना लिया था, मैं भी उन्हें अपना भाई बनाना चाह रही थी। मैं जानना चाहती थी कि अशोक की बात में कितनी सच्चाई है…. इसलिए घुमा फिरा कर सुनील को ही उकसा रही थी कि वह उनसे बात करे। इस मुलाकात की एक अच्छी बात यह रही कि मुझे सुनील के मन की थोड़ी थाह मिल गयी थी और अंशु की सलाह मानकर मैंने भी उसे संकेत दे ही दिया था। बस अपनी मंज़िल पर पहुँचने वाली थी और शायद हम भी मंज़िल की ओर बढ़ रहे थे..........!

क्रमशः....12

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