कभी अलविदा न कहना - 12 in Hindi Love Stories by Dr. Vandana Gupta books and stories Free | कभी अलविदा न कहना - 12

कभी अलविदा न कहना - 12

कभी अलविदा न कहना

डॉ वन्दना गुप्ता

12

आज अचानक घर पहुँचकर मैं सबको सरप्राइज देना चाहती थी, किन्तु मेन गेट पर लटकते ताले ने मुझे ही शॉक दे दिया। सुनील से बस में हुई मुलाकात के बाद मेरा जो मन सतरंगी सपनों में खोने लगा था, घर पहुँचकर अनेक दुश्चिंताओं से भर गया। घर में बहुत ही विषम परिस्थितियों में कभी ताला लगा होगा। सँयुक्त परिवार का यह बहुत बड़ा फायदा हुआ करता था कि कोई न कोई घर पर रहता ही था और घर की बहुएँ अपने पतियों के खाने की चिंता न करते हुए निश्चिंत होकर मायके जा सकती थीं। मुझे याद ही नहीं कि हमारे घर पर कभी ताला लगा हो... इसलिए गेट पर लटका ताला अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा था।

"विशु! तुम कब आयीं? तुम्हें पता चल गया कि तुम्हारी ताईजी को हार्ट अटैक आया है, सभी संजीवनी हॉस्पिटल में हैं।" मुझे घर के सामने यूँ पशोपेश में खड़ा देख पास वाली आंटी आ गयीं थीं।

"जी.... कब... कैसे...?" मैं घबरा गयी थी... तभी अंशु और पापाजी को आता देख मुझे ढाँढस बंधा।

यंत्रवत सी मैं घर में गयी, सामान रखकर हॉस्पिटल पहुँचने तक मुझे कुछ भान ही नहीं था। हॉस्पिटल कैंपस में अशोक की कार देखकर अचम्भे के साथ ही मेरी चेतना लौटी थी। आई सी यू के बाहर ही सभी चिंतित बैठे थे। मम्मी, दादी, ताऊजी के थके हुए चेहरे देखकर मैं जड़वत सी खड़ी रह गयी। "आ बेटा! बैठ जा.. थक गयी होगी... मैंने मना किया था, तुझे फोन करने के लिए... फिर भी नहीं माने, कर ही दिया.." अम्मा ने हाथ पकड़कर मुझे पास में बैठा लिया।

"लेकिन अम्मा दी तो फोन मिलने के पहले ही निकल चुकी थीं... लैंडलॉर्ड ने रेखा दी से बात करवायी थी।" अंशु की बात सुनकर मैं फिर सोच में पड़ गयी। मुझे टेलीपैथी पर काफी भरोसा है और मेरी इंट्यूशन पॉवर पर भी... आज फिर उसका प्रमाण मिल गया था।

अलका दी कोने में गुमसुम बैठी थीं। उनके चेहरे पर पसरा अपराध भाव मुझे सोचने पर विवश कर रहा था। अशोक की उपस्थिति भी प्रश्नचिन्ह के समान दिमाग पर काबिज थी।

"ताईजी को...  एकदम से.... अटैक क्यों और कैसे....." मेरी रुलाई फूट पड़ी।

"कुछ नहीं होगा तेरी ताईजी को... सब ठीक हो जाएगा...  वो तो अशोक मिल गया और सही समय पर हॉस्पिटल ले आया, उसने भर्ती करने के बाद हमें खबर की, वरना पता नहीं... ईश्वर उसका भला करे... "

"कहाँ गयीं थीं ताईजी अकेली?"

"अकेली नहीं, अलका के साथ मार्केट गयीं थीं और वहीं पर अचानक तबियत खराब हो गयी।"

अलका दी और मेरी नज़रें मिलीं.... एक पल में ही उनकी झुकी नजरों ने चुगली कर दी कि कुछ गड़बड़ है। मुझे बेचैनी होने लगी थी उनसे अकेले में बात करने की.. मैं उनके पास जाकर बैठ गयी। उनकी निगाहों की कातरता मुझे अंदर तक हिला गयी। उस पल मुझे एहसास हुआ कि आर्थिक आत्मनिर्भरता आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ लोगों को भी आप पर भरोसा करने की वजह देती है। मैं उम्र में उनसे छोटी होने के बावजूद एक बड़ी बहन की तरह उनका सम्बल बनती हुई खुद को महसूस कर रही थी। उन्होंने इशारा किया और हम दोनों उठकर बाहर आ गए। शाम हो चली थी और हॉस्पिटल कैंपस में बने हुए गार्डन में मरीजों के परिजन डेरा डाले हुए थे। एक कोने में लगी बेंच पर धूप की हल्की सी लकीर उसके खाली होने का सबूत थी। हम दोनों उस बेंच पर जाकर बैठ गए।

अलका दी अपलक शून्य में निहार रही थीं। सपाट भावशून्य चेहरा... लेकिन मन में विचारों का झंझावात... कितनी विचित्र मनोस्थिति से वे गुजर रही थीं, यह मैं अनुभव कर रही थी। उनकी बड़ी बड़ी आँखों में अचानक से उभरती नमी ने मुझे भी भिगो दिया था। उन्होंने कसकर मेरा हाथ पकड़ा और फूट फूट कर रो पड़ीं... "विशु! सारी गलती मेरी है, मैं भटक गयी थी, यदि अशोक सही समय पर नहीं आता तो......?? मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी...."

"दीदी! आप प्लीज हौसला रखिए... ताईजी को कुछ नहीं होगा... और बीमारी कभी कहकर नहीं आती, खुद को कसूरवार मत समझिए.... वक़्त अच्छा था, जो समय पर हॉस्पिटल पहुँच गए, इसके लिए ईश्वर के साथ अशोक जी को भी धन्यवाद दीजिए..." मैंने उन्हें कसकर गले लगा लिया। वे मेरे कंधे पर सिर टिकाए रोती रहीं... मैंने उन्हें हल्का हो जाने दिया...!

"सही कहा तुमने... बुरा वक्त कहकर नहीं आता किन्तु उसके आने के जिम्मेदार तो हम ही हैं न... सारी गलती मेरी है, मैं क्या करूँ विशु... हर बार नकारे जाने के दर्द को झेलते हुए मैं गलत रास्ते पर बढ़ गयी थी... वह सिर्फ नाम का दीपक था... मुझे लगा था कि वह मेरी जिंदगी में रोशनी बिखेर देगा... किन्तु....." वे फिर रोने लगीं। मैं चौंक गयी... 'अब ये दीपक कौन? और ताईजी को अटैक इस वजह से आया... शायद दीदी का चक्कर चल रहा होगा और ताईजी को पता चल गया होगा... लेकिन....' मेरी सोच को विराम लग गया जब अशोक की आवाज़ सुनाई दी... "अलका! भूल जाओ अब वो सब... यूँ समझो कि तुम्हारी किस्मत अच्छी थी, जो मैं वक़्त पर पहुँच गया.... वरना वो कमीना..... और अब सिर्फ आंटीजी का ध्यान रखो.... वैशाली सम्भालो अपनी दीदी को...." उसने मुझे आदेशात्मक लहज़े में कहा... मुझे बुरा नहीं लगा... लेकिन मैं एक नयी कहानी के खुलने का इंतज़ार करने लगी..... दीपक कौन? अलका दी से क्या सम्बन्ध? वह क्या करने वाला था? ताईजी को किस घटना से शॉक लगा? और अशोक का इन सबमें क्या रोल?..... तभी कोई नोटिफिकेशन टोन टाइप सुनाई दी और अशोक ने जेब से कोई उपकरण निकाल कर देखा... मैं समझ गयी यही पेजर है... "अरे! सुनील का मैसेज, मैं उसे फोन लगा लूँ जरा... " कहते हुए वह हॉस्पिटल काउंटर की ओर बढ़ गया जहाँ सी सी बी वाला फोन लगा था। मैं इस नयी टेक्नोलॉजी से प्रभावित होकर सोचने लगी कि वाकई विज्ञान के युग में तकनीकी क्रांति की ओर हमारे कदम बढ़ रहे हैं... कितना आसान हो गया है अपनों के सम्पर्क में रहना... ये उन दिनों की बात है, जब इनकम ज्यादा नहीं हुआ करती थी और ये संसाधन महँगे होने की वजह से कुछ रईस घरों में ही हुआ करते थे। उसके कुछ दिनों बाद ही मोबाइल का आगाज़ हुआ था और जिसे हर कोई अफोर्ड नहीं कर सकता था... आपके पर्स या पॉकेट में मोबाइल की उपस्थिति आपकी शान थी और उसे रखने वाला खुद को बादशाह से कम नहीं समझता था और बाकी लोग भी उसे प्रकट में सम्मान देते हुए मन में ईर्ष्याभाव भी रखते थे। आजकल तो मोबाइल क्रांति आ गयी है... मोबाइल विलासिता नहीं जरूरत की वस्तु बन गयी है।

"दीदी! आप रिलैक्स करिए और कृपया मुझे बताइए कि ये माजरा क्या है?" मैं अशोक के वापस आने के पहले ही सारी स्थिति जान लेना चाहती थी। अशोक फोन पर बात करने के बाद दूसरी दिशा में चला गया... वह शायद मुझे और अलका दी को बात करने का वक़्त देना चाहता था... उसकी समझदारी मुझे फिर प्रभावित कर गयी। अलका दी ने जो बताया उससे मैं भीतर तक काँप सी गयी। मुझे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था... कि... अलका दी इतनी नासमझी कर सकती थीं।

"दी! आप दीपक से कब और कैसे मिलीं?"

"तू सुनीता को जानती है न, जो मेरे साथ सिलाई क्लास में आती थी?"

"हाँ, उसकी किसी लड़के से दोस्ती थी, एक बार घर भी आयी थी।"

"हाँ रे वही... वह लड़का उसका लवर था, काफी अमीर था, बहुत सारी गिफ्ट देता था... वह उससे मिलने जाती तो मुझे भी ले जाती थी... दीपक उस लड़के का दोस्त था और धीरे धीरे मेरी भी उससे दोस्ती हो गयी, उसी तरह की जैसी सुनीता की थी... मुझे वह अच्छा लगने लगा था, क्योंकि वह मेरी बहुत तारीफ करता था... मुझे लगने लगा कि कोई है जो मुझे वैसी ही पसन्द करता है, जैसी मैं हूँ और फिर......."

वे फिर रोने लगीं... मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि.. "दीदी प्लीज हिम्मत रखिए... सब ठीक हो जाएगा.." मन में तो बहुत गुस्सा आ रहा था कि ताईजी ने हमेशा मुझपर नज़र रखी, मुझे रोका टोका... काश थोड़ा ध्यान अपनी बेटी पर दिया होता तो आज ये नौबत नहीं आती... और अलका दी से तो बात करने का मन भी नहीं हो रहा था, किन्तु मुझमें परिपक्वता आ गयी थी, और मुझे इसका अहसास होने लगा था, क्योंकि अपने गुस्से पर नियंत्रण रख मैं अलका दी से सहानुभूतिपूर्वक बात कर रही थी और उन्हें हौसला भी दे रही थी। आज अलका दी ने घर में रखे ताईजी के सोने के कंगन चुराए थे और ताईजी के साथ ही मार्किट जाने के बहाने दीपक को देने पहुँच गयीं थीं क्योंकि उसने दी से कहा था कि उसे नौकरी पर जॉइनिंग तभी मिलेगी जब वह बीस हज़ार की रिश्वत देगा और नौकरी मिलने के बाद ही दोनों की शादी हो पाएगी। कपड़ों की दुकान पर ताईजी को छोड़कर वे बाहर प्याऊ तक चली गयीं थीं। पानी पीने के बाद प्याऊ के पीछे ही दीपक को कंगन देकर वे जैसे ही पलटीं, अशोक को देखकर सकपका गयीं थीं। दीपक भी घबरा गया.... "जी सर, आप यहाँ... मैं तो बस..."

अशोक ने उसका हाथ पकड़ा... एक थप्पड़ लगाया और जेब से कंगन निकाल लिए... "सर के बच्चे तेरी हिम्मत कैसे हुई...? खबरदार अब इसके आस पास भी नज़र आया तो सीधे जेल भिजवा दूँगा... और अलका तुम जानती हो इसे..? कॉलेज का गुंडा है, नकल प्रकरण में रेस्टीकेट हो चुका है... ग्रेजुएशन भी पूरा नहीं हुआ है और तुम......." अचानक ताईजी को आता देख वे चुप हो गए। उन्हें चुप देख दीपक गुर्राया... "देख लूँगा सर आपको... हमारे बीच में आने की कोशिश मत करो... मैं इसे भगाकर ले जाऊँगा और आप कुछ नहीं कर पाएंगे.."

"मम्मी.... क्या हुआ... अचानक ताईजी को गिरते देख दी घबरा गयीं थीं और दीपक भाग गया था वहाँ से...... सारी घटना जानने के बाद मुझे अलका दी पर गुस्सा भी आ रहा था और तरस भी.... हम दोनों एक ही घर में पले बढ़े... पापाजी और ताऊजी के स्वभाव, आचार और विचार में काफी समानताएं थीं, बस मम्मी और ताईजी के विचारों और संस्कारों की भिन्नता के कारण साथ रहते हुए भी हमारी परवरिश के तौर तरीकों में जो सूक्ष्म अंतर था उसका इतना अधिक प्रभाव.... मैं आश्चर्यचकित थी और खुद को खुशकिस्मत भी मान रही थी। मम्मी के लिए मन में ढेर सारा प्यार और सम्मान उमड़ रहा था, किन्तु वक़्त नहीं था उसे जताने का....  मैं समझ गयी थी अलका दी की गहरी साजिश को.... जिसका निशाना मैं, अशोक और सुनील थे, किन्तु वही आज बूमरैंग की भांति उनके जीवन को तबाह करने वाली थी। वे खुद ही खुद के जाल में फंस गयीं थीं। कुछ और प्रश्न भी मेरे मन में कुलबुलाने लगे थे, जिनका जवाब अलका दी ही दे सकतीं थीं... मसलन... जब वे दीपक से अकेले में मिलतीं थीं तो कंगन देने ताईजी के साथ क्यों गयीं..? अशोक को पुर्जा दिया, शादी से मना करने के लिए, उसकी वजह भी दीपक ही था, किन्तु सुनील से शादी की इच्छा क्यों जाहिर की...?

दूर से अशोक और सुनील आते दिखे और फिलहाल के लिए मेरे प्रश्न अनुत्तरित रह गए....!

क्रमशः....13

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