गवाक्ष - 20 in Hindi Social Stories by Pranava Bharti books and stories Free | गवाक्ष - 20

गवाक्ष - 20

गवाक्ष

20==

रेकॉर्डर का बटन दबा दिया गया, सत्यनिधि ने नटराज व शारदा माँ की प्रतिमाओं के समक्ष वंदन किया और कॉस्मॉस की ओर देखकर मुस्कुरा दी जो उठकर उसके पास आकर उसके जैसे ही प्रणाम करने की चेष्टा कर रहा था।

वातावरण में संगीत की स्वर-लहरी बिखरने लगी और नृत्यांगना के कदम धीमे-धीमे उठते हुए लयबद्ध होने लगे। कुछेक पलों में वह संगीत के लय -ताल में खोने लगी --'तिगदा दिग दिग थेई'के साथ उसने चक्कर काटने शुरू कर दिए । कॉस्मॉस भी लट्टू की भाँति घूमने लगा था। कितना आनंद आ रहा था ! वह सब भूलता जा रहा था, कौन है?कहाँ है?कहाँ से आया है?'थेई' के साथ वह नृत्यांगना की देखादेखी अपना पाँव ज़मीन पर बजाने लगा। ओह! पाँव की थाप कितनी मधुर थी ! वह प्रफुल्लित हो उठा और चक्कर पर चक्कर काटता रहा। उसे पता भी नहीं चला कब सत्यनिधी अपना नृत्य समाप्त कर चुकी थी, संगीत बंद हो चुका था, वह लगातार घूमे जा रहा था ।
अचानक सत्यनिधी खिलखिलाकर हँसी ---
"समझ में आया समाधि किसे कहते हैं ?तुम समाधि में चले गए थे। न किसी बात का ज्ञान, न चिंता, न सोच ----बस तल्लीन ! इसीको कहते हैं समाधि! समाधि आनंद है, परम आनंद!अब बताओ क्या तुम्हें किसी बन, पर्वत या कन्दरा में जाने की आवश्यकता लगती है?" सत्यनिधि ने कॉस्मॉस को व्यवहारिक रूप में समाधि का अर्थ समझा दिया था ।
"प्राणी माँ के गर्भ से जन्म लेता है किन्तु अपना समय पूर्ण करके न जाने कहाँ चला जाता है ? चलो, एक महत्वपूर्ण सूचना तो प्राप्त हुई कि तुम जैसे दूत संसार में हमें लेने आते हैं किन्तु यह तो बताओ हमें यहाँ से कहाँ ले जाया जाताहै?तुम्हें तो यह ज्ञात होगा ?"सत्यनिधि ने कॉस्मॉस केमुख पर प्रश्नवाचक दृष्टि गड़ा दी ।
"ऊँहूँ ----मुझे केवल गवाक्ष तक का मार्ग ज्ञात है, इसकेआगे कुछ नहीं मालूम, मेरा कार्य केवल आज्ञा पालन करना है, शेष कुछ नहीं । "
"ऐसा कैसे हो सकता है ?तुम भी तो वहीँ रहते हो ----" उसके मुख पर अविश्वास पसर गया।
" मैं सच कह रहा हूँ, बाई गॉड, मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं है ----" उसने अपनी ढोड़ी के नीचे गर्दन की त्वचा को चूंटी में भरकर कहा ।
" अरे ! यह कहाँ से सीखे ?"सत्यनिधी ने हँसकर पूछा ।
" एक बच्चे को लेने गया था, उसी से सीखा । बहुत प्यारा बच्चा था । मेरी मित्रता हो गई थी उससे" बच्चे का चेहरा कॉस्मॉस की आँखों में नाचने लगा ।
"और तुम उसके प्राण ले गए? कैसे कठोर हो तुम !”
" कहाँ ले जा पाया, तभी तो भटक रहा हूँ, इतने सारे सत्य मिले किन्तु मैं अभी तक एक को भी नहीं ले जा पाया । "उसने अपने माथे पर छलक आई पसीने की बूँदें हाथ से पोंछ डालीं।

इस बार पृथ्वी पर आकर थकान, पसीना ! ये सब उसके लिए नवीन अनुभव थे ।
"गत वर्ष जब पृथ्वी पर आया था तब मुझे ज्ञात हुआ कि मनुष्य के मन में कोमल संवेदनाएं होती हैं जो उसके रिश्तों को जीवित रखती हैं । हमारे गवाक्ष से बिलकुल उल्टा हिसाब-किताब है पृथ्वी पर! पृथ्वी पर संवेदनाओ को सँभालने की बात की जाती है तो गवाक्ष में प्रशिक्षण दिया जाता है कि हमारे लिए संवेदनाओं का दूर-दूर तक कोई संबंध ही नहीं होना चाहिए ---पृथ्वी पर आकर मेरे भीतर संवेदनाओं की कोमलता उगने लगी | "
" एक प्रकार से तो यह अच्छा है न ?"
"अच्छा है किन्तु हमारे व्यवसाय में संवेदनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है न ! यदि हम संवेदनशील हो गए तो अपना कर्तव्य कैसे पूर्ण करेंगे ?"
"अच्छा है न, संवेदना विहीन मनुष्य का होना मनुषत्व काअपमान है । "
"किन्तु हम मनुष्य हैं कहाँ ? जो आपके लिए वरदान है, वही हमारे लिए विष-पान है । जैसे ही हमारे भीतर संवेदनाएं फूटने लगती हैं हम अपने गवाक्ष से दूर होते जाते हैं, वहाँ की दृष्टि में 'बेचारे' हो जाते हैं । "
"तो क्या गवाक्ष का जीवन भी पृथ्वी की भाँति ही चलता है?" गवाक्ष की जीवन-शैली के बारे में जानने में निधि की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी ।
" नहीं, पृथ्वी सी संवेदना वहाँ नहीं होतीं । वहाँ एक मौन पसरा रहता है --मैं अपने कार्य में असफ़ल हुआ तब मुझे ज्ञात हुआ जिसको मेरे स्वामी दंड कहते हैं, वह तो वास्तव में पुरूस्कार है । "
" कौनसा पुरूस्कार ?"
"यही, पृथ्वी पर रहने का, आनंद करने का ----"वह दिल खोलकर हँसा ।
"तो पृथ्वी पर तुम्हें आनंद आ रहा है ? हमने तो सुना है स्वर्ग में बहुतआनंद है । इसीलिए सब स्वर्ग जाने की आकांक्षा रखते हैं !"निधि ने कॉस्मॉस को प्रश्नों के कटघरे में ला खड़ा किया, शायद यह ऊपर की कुछ बात बता ही दे ।
 "लेकिन स्वर्ग देखा किसने है? मैंने तो नहीं । मुझे तो आपकी धरती पर ही वह आनंद स्वर्ग लगा
 जिसका अनुभव मुझे नृत्य के समय हुआ । “  
"यह तो बहुत समझदारी की बात की तुमने !" नृत्यांगना ने प्रसन्नता से कॉस्मॉस को मानो शाबाशी दे डाली ।
" मैं जानता हूँ मनुष्य पंच तत्वों से मिलकर बना है और अंत में उन्हीं में मिल जाता है परन्तु ये पंच तत्व हैं कौन कौन से ? " कॉस्मॉस बहुत जिज्ञासु था, पृथ्वी की समस्तजानकारी हासिल करना चाहता था ।
" तुम तो मुझे बताते नहीं ----और --"
"लेकिन मैं सचमुच गवाक्ष के अतिरिक्त कुछ नहीं जानता--"

उसने निधी की बात बीच में काटकर भोलेपन से कहा ।
 "अर्थात वहाँ के निवासी भी हमारी भाँति अज्ञात वृत्त में गोल-गोल घूम रहे हैं ?"
"नहीं, नहीं --वहाँ नीरव शान्ति में स्वामी सब लोगों को कार्य पर लगाए रखते हैं । किसीके पास यह सब सोचने का मस्तिष्क ही नहीं है। "
"छोड़ो यह सब ---उस बच्चे की बात बताओ जो तुम्हारा मित्र बन गया था । "
"उसके लिए पहले उसके माता-पिता के बारे में भी सुनना पड़ेगा, आपका समय--। वह झिझका--
" वो तो तुमने खराब कर ही दिया --अब अपनी बीती सुनाओ "निधि को महसूस हो रहा था कि कॉस्मॉस के साथ वह एक बंधन में बंधने लगी है ।
कॉस्मॉस ने अपनी पृथ्वी की पिछली यात्रा के पृष्ठ पलटे –

"वे धर्म के एक महान ठेकेदार थे । संभवत: किसी बड़े मंदिर अथवा आध्यात्मिक पीठ के सर्वोच्च पदाधिकारी !"

"नाम था-- सत्यशिरोमणि !" उनके आगे-पीछे लोगों का झुण्ड लगा रहता, लोग उन्हें आचार्य श्री, गुरुदेव, महाराज आदि नामों से संबोधित करते। प्रत्येक मंच पर उन्हें सम्मानित किया जाता, बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते, रेशमी श्वेतअथवा पीत वस्त्र धारण करते, सेवक-सेविकाएँ घेरे रहते, उनका खान-पान, रहन-सहन देखते ही बनता। " कुछ रुककर वह बोला --

"उन्हें मैंने एक बड़े से पुष्पों से सुसज्जित मंच पर व्याख्यान देते हुए सुना था । आज की ही भांति मैं तब भी भटक रहाथा । पता चला महानुभाव का नाम सत्य शिरोमणि है, बस मेरी तो
बाँछें खिल गईं । यह सत्य का भी शिरोमणि था । अगर मेरी दाल गल जाती है तब मैं पूरे गवाक्ष पर
छा जाऊँगा | मैंने सोचा और कई दिन तक निरंतर उनके व्याख्यान सुनने जाता रहा । वे बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते थे । जो उनको सुनने आते, उन्हें भक्तगण कहा जाता। पुष्पमालाओं से उनका मंच सुसज्जित होता और उनके आभूषण इतने चमकदार होते कि उन पर से दृष्टि हटती ही नहीं आपने जो धातु का नाम लिया था न---सोना, हीरे --उनसे सारी देह जगमगाती रहती। "
"आध्यात्मिक संत को इन सबकी कहाँ आवश्यकता होती है?"सत्यनिधि ने टोका ।
"देखा, जैसे मुझे उत्सुकता होती थी और मैं बीच में टपक जाता था ---आप भी --" उसने बीच में ही स्वयं को रोक लिया ।

"क्षमा करिए--"उसे इस प्रकार नहीं टोकना चाहिए था, यह सभ्यता नहीं है, उसने सोचा ।

" ऊँहूँ ---आगे बढ़ो भई, ठीक कह रहे हो तुम ---
मैं निरंतर उनका पीछा करता रहा । अपनी अदृश्य होने की कला से सदैव उनके समीप बना रहा किन्तु जब वे कक्ष के भीतर जाते, उनके साथ सेवा के लिए कई स्त्रियाँ भी जातीं । मैं वहाँ से लौट आता। मैं स्त्रियों के समक्ष उनसे वह बात नहीं कह सकता था जिसके लिए उनका पीछा कर रहा था, फिर अंदर जाकर क्या करता ?
इसी प्रकार कई दिन व्यतीत हो गए। मैं थकने लगा
, मैंने सोचा अब यहाँ काम नहीं बनेगा, किसी दूसरी खोज
में निकलना होगा । उसी दिन मैंने देखा उनके शयन कक्ष से
स्त्रियाँ बात करती हुई बाहर निकल रही थीं ।
" महाराज आज हमसे रुष्ट हो गए हैं क्या ? सेवा का अवसर नहीं दे रहे । "
महानुभाव के कक्ष में प्रतिदिन भिन्न -भिन्न स्त्रियाँ जाती थीं। केवल एक स्त्री सदा उनके साथ रहती थी जोस्त्रियों के भीतर जाने की तथा उन महानुभाव के अन्य कार्यों की व्यवस्था करती थी। उस दिन वह स्त्री भी
नहीं दिखाई दे रही थी, यहाँ तक कि सबको यह आज्ञा दी गई थी कि उस दिन महाराज जी चार घंटे तक एकांत चाहते हैं, यदि उन्हें कोई आवश्यकता होगी तब दूरभाष -यंत्र का प्रयोग करके आदेश दे दिया जाएगा ।

मैं सोच में पड़ गया, न जाने क्या बात है तभी मुझे कक्ष से बोलने की आवाज़ सुनाई दी। मैं उन्हें अपने साथ ले जाने के लोभ में उनके आगे-पीछे ही घूम रहा था, मुझे उनकी धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी। उनके आदेशानुसार उस समय उनके पास कोई नहीं होना चाहिए था फिर ये संवाद किसके साथ और कैसे?
" अरे !-फिर --?" निधि दो शब्द बोलकर चुप हो गई।
कॉस्मॉस मुस्कुराया, वह समझ गया था कि अन्य इन्द्रियों की भांति उत्सुकता भी मन में उठने वाला एक नैसर्गिक भाव है ।
" मैं अपने अदृश्य रूप में तो घूम ही रहा था, बिना देरी किए मैंने उनके कक्ष में प्रवेश कर लिया। वे उस समयअकेले ही थे और किसी से अपने उसी दूरभाष -यंत्र पर बात कर रहे थे । " 
"छोटा सा यंत्र था?---उसे मोबाइल कहते हैं ?" निधी फिर कह बैठी।
" हाँ, वही ! धन्यवाद --" उसे नया शब्द मिला था । वैसे उसने ऐसे यंत्र को अब तक कई बार देख लिया था |
"हाँ, तो मैं उन महानुभाव के कक्ष में प्रवेश करके उनके संवादों को कान लगाकर सुनने लगा था, वे किसी से बहुत क्रोधित थे। दूसरी ओर के संवाद मैं सुन नहीं सकता था किन्तु वे जो बोल रहे थे उसका सीधा सा आशयथा कि वे जिससे भी वार्तालाप कर रहे थे, उसे अपने पास
नहीं आने देना चाहते थे । "
"यह क्या इसी शहर की बात है?" निधी की उत्सुकता में उबाल आ रहा था ।
"आप बीच में टोकती बहुत हैं । " उसने कुछ उसी अंदाज़ में कहा जिसमें वह कॉस्मॉस को टोकती आई थी ।
"नहीं, अभी मैं भारत में हूँ, यह विदेश की बात है जब पिछली बार मैं उधर की यात्रा पर निकला था । "
"जो बात समझ में न आए, वह पूछनी तो चाहिए न ?"
 निधी ने मुस्कुराकर उसकी ही ज़बान में प्रश्न परोसकर उत्तर दिया ।
"क्या तुम्हारा कार्य विदेश में भी होता है?" निधी को महसूस हुआ मानो उसके समक्ष किसी विदेशी कंपनी का प्रतिनिधि अपने उत्पादन की प्रशंसा कर रहा हो।
"ओह !मृत्यु किसी एक स्थान पर ही आती है क्या ? विदेशमें प्राणियों के जन्म-मृत्यु नहीं होते ?"

क्रमश..

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रोचक है cosmos के निरंतरता का द्रश्य

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