Trilok - 4 in Hindi Novel Episodes by Prapti Timsina books and stories PDF | त्रीलोक - एक अद्धभुत गाथा - 4

त्रीलोक - एक अद्धभुत गाथा - 4

त्रीलोक - एक अद्धभुत गाथा
(उपन्यास)
4
सबलोग एयरपोर्ट पोहोचते है। वो लोग एयरपोर्ट के अंदर चलते है। सब लोग अपनी अपनी सूटकेस चेकिंग के लिए देते है। सूटकेस चेकिंग के बाद डायरेक्टर साहब ने ऑनलाइन खरीदी हुई टिकट दिखाकर सब लोग वेटिंग रूम मे जाते है। थोड़ी समय के बाद सब लोग प्लेन के अंदर जाते है। जल्द ही प्लेन टेक ऑफ करती है। सब लोग आराम से कश्मीर पोहोचते है। कश्मीर के एयरपोर्ट से बाहर निकलकर टैक्सी का इंतजार करते है। थोड़ी ही देर इंतजार करनेके बाद टैक्सी मिलती है। डायरेक्टर साहब दो टैक्सी रिज़र्व करते है।
टैक्सी वाला कहता है - "आपको कहा जाना है, सर?"
डायरेक्टर साहब - "यहाँ का सबसे अच्छा होटल ले चलो।"
टैक्सी ड्राइवर - "ठीक है। मे आपको Hotel Heaven ले चलता हु। Hotel Heaven यहाँ का सबसे अच्छा होटल है। उस होटल पर सारी सुभीधा है।
नंदनी - "फिर तो हमें वही चलना चाहिए।"
डायरेक्टर - "हा, वही पर चलते है।"
टैक्सी ड्राइवर उन सबको होटल ले चलता है। टैक्सी होटल पोहोचता है। टैक्सी होटल का गेट से होकर अंदर जाता है। होटल की गेट बहत बड़ा था। होटल के अंदर कुछ पेड़ लगाए हुवे थे। वहा के केयर टेकर पेड़ के पत्ते काटकर उसपर डिज़ाइन बना रहेथे।
ऐसी खूबसूरत होटल और वहा की रौनक देखकर दीपिका कहती है - "लगता है हम यहाँ की सबसे बढ़िया होटल पर आये है।"
होटल की पार्किंग एरिया पर टैक्सी ड्राइवर टैक्सी पार्क करता है।
टैक्सी ड्राइवर टैक्सी से उतरकर कहता है - "लो हम आगये।"
सारे लोग टैक्सी से उतारते है। डायरेक्टर साहब टैक्सी का भाड़ा देते है। टैक्सी ड्राइवर टैक्सी की डिक्की से सब का सूटकेस निकलता है। सब लोग अपने अपने सूटकेस लेकर होटल के अंदर चलते है। होटल का एरिया बहत बड़ा था। होटल के दो बिल्डिंग थे, तीन स्विमिंग पूल और कुछ गार्डन थे। होटल के बिल्डिंग, पूल और गार्डन साफ करने के लिए बहत सारे लोग को रखा गया था। होटल की बिल्डिंग बाहर से बहत ही खूबसूरत था। होटल की बिल्डिंग के बाहर तीन सिक्योरिटी गार्ड थे। सब लोग होटल के अंदर जाते है। होटल अंदर से भी बहत बड़ा दीखता है।
होटल के अंदर बहत सारे प्राचीन चीजे सजाकर रखी हुई थी। उस होटल के दिवार पर एक बहुत बड़ी और पुरानी घड़ी थी। घड़ी के आसपास कुछ इतिहासकार की फोटो फ्रेम मे सजाकर रखी हुवी थी। होटल की अंदर की डेकोरेशन पुरानी चीजों से की गयी थी। वहा पर बहत सारी एंटीक पीस रखी हुई थी। और दूसरी तरफ डायरेक्टर साहब और उनकी टीम होटल के अंदर पोहोचते ही सब खड़े के खड़े ही रह गए थे। सब लोग होटल को बिना पलके झपकाकर देख रहेथे।
दीपिका अपनी आँखे पोछकर देखती है और नंदनी को कहती है - "ये क्या खुदा पहाड़ निकला चुहिया।"
अनिल दीपिका की बात को बढ़ावा देकर कहता है - "हा यार, मे तो सोच भी नहीं सकता बाहर से इतनी मॉर्डन बिल्डिंग है और अंदर से होटल कम म्यूजियम ज्यादा लग रहा है।"
राघव अपना भी राय देते हुवे कहता है - "जो भी हों पर होटल अच्छा है।"
नंदनी - "हा यहाँ की दीवारों को तो देखो, ये तो बहुत कीमती और ऐतिहासिक पेंटिंग्स है।"
डायरेक्टर साहब - "जो भी हों, ये आईडिया बहत अच्छा है।"
सूरज - "ऐसी आईडिया किसीकी दिमाग़ आयी थी? होटल को म्यूजियम बनाने का !"
डायरेक्टर साहब होटल मे दो हप्ते के लिए रूम बुक करते है और सात कमरेकी चाबी लेकर आते है और सबको एक एक चाबी देकर कहते है - "Enjoy your Holidays."
सब लोग अपना सर हिलाकर हा कहने का इसरा देते है। दीपिका अपनी कमरे जाकर आराम करनेकी सोचती है और कहती है - "नंदनी चलो रूम मे जाते है।"
नंदनी - "तुम जाओ मे अभी आयी।"
इतना कहकर नंदनी पूरा होटल घूमने लगती है। उसका ध्यान उन दिवार पर साजे हुवे प्राचीन चीजों ने खींच ली थी।
अनिल और सूरज दीपिका को कहते है - "चले?"
दीपिका - "चलो।"
नंदनी प्राचीन चीजे देख रही थी और दूसरी तरफ राघव पेंटिंग्स को देख रहा था। नंदनी का ध्यान दिवार पर था। उन फोटो को देखते हुवे चलती है और अचानक राघव से टकरा जाती है।
नंदनी जल्दी जल्दी कहती है - "माफ़ करना "
नंदनी राघव को देखकर कहती है - "राघव, तुम?"
राघव - "हा वो मे यहाँ की डिज़ाइन को देख रहा था।"
राघव उसके हाथ पकड़कर उसे उन दीवारों के करीब लेजाता है और वाला पे रखी हुवी पेंटिंग दिखाकर कहता है - "देखो ना कितना खूबसूरत पेंटिंग है, हैना?"
नंदनी - "हा सचमे, ये बहत खूबसूरत है पर ये है क्या? मतलब किस चीज का पेंटिंग है?"
राघव नंदनी का ध्यान पेंटिंग के नीला हिस्सा पर केंद्रित करते हुवे कहता है - "ये देखों, यहाँ पर सायद नदी होगा। देखो नदी बेहेता हुवा नजर आरहाहै।"
राघव बाकि के हिस्से पर भी अनुमान लगाकर कहता है - "सायद यहाँ पर पहाड़, यहाँ पर बर्फ और........ "
राघव अपना सर खुजलाते हुवे कहता है - "कुछ समझ मे नहीं आरहा। ये आखिर है क्या?"
नंदनी मुस्कुराकर कहती है - "लगता है इसका ऐतिहासिक राज है।"
राघव को नंदनी का हस्ता हुवा चेहरा देखकर अंदर ही अंदर एक तरह की सुकून महसूस करता है।
और अपनी मज़ाक करनेकी आदत को दोहराकर कहता है - "पेंटिंग्स अगर समझमे नहीं आएंगे तो ज्यादा बिकेगी ना, इसीलिए ऐसी पेंटिंग्स बनाई होगी।"
नंदनी प्यारी मुस्कान देकर कहती है - "हा, सायद।"
दोनों ही एक दूसरे के हसीं को देखकर सुकून महसूस कर रहेथे। और अचानक नंदनी को भगवान नारायण ने दी हुवी पर्ची याद आती है।
नंदनी राघव से कहती है - "मे बहत थक गयी हु। मुझे सायद रूम मे जाना चाहिए।"
इतना कहकर नंदनी जाने ही वाली थी की राघव ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया।
राघव कहता है - "वो मुझे तुमसे कुछ कहना था.... वो दरअसल बात ये है की... "
नंदनी सोचती है - "कही राघव मुझे प्यार का इजहार तो नहीं करने वाला? अरे नहीं अगर उसने किया तो मे क्या जवाफ दूंगी यही की मेरी जिंदगी की डोर किसी और की डोर से जुड़ चूका है? नहीं मे ये राज नहीं कह सकती, ये तो नियम के खिलाफ है। अब क्या होगा?"
नंदनी अपनी चंचल मन को सभाल कर राघव से कहती है - "क्या बात है राघव? तुम मुझसे कुछ कहने वाले थे?"
राघव कहता है - "मुझे माफ करना।"
नंदनी फिर से पूछती है - "माफ़ी, किस बात की माफ़ी?"
राघव - "तुम्हे याद है हम बंगला मे अपनी अतीत के बारेमे बात कररहे थे।"
नंदनी - "हा मुझे याद है।"
राघव - "उसके बाद, मे तुमसे गले लगा था। पर मुझे उस दिन बहत गलत लगा, सायद मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।"
नंदनी राघव से कहती है - "मे तो तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त हु तो तुम मुझे अपना दर्द कहकर आंसू नहीं पूछोगे तो किस्से जाकर अपना दर्द बाटोगे?"
राघव - "मे कितना खुसनसीब हु की मुझे तुम जैसी दोस्त मिली।"
नंदनी - "चलो रूम मे चलते है।"
राघव - "हा।"
दोनों ही अपने अपने रूम मे जाते है। नंदनी अपना सूटकेस रखकर फ्रेश होती है। उसके बाद बेड पर आराम करके भगवान नारायण ने दी हुई पर्ची निकलती है। वो पर्ची को खोलती है।
नंदनी पर्ची पढ़ती है - "मेरी सबसे प्यारी भक्त हो तुम नक्षत्रा और तुम्हारी जिंदगी मे एक प्यारी और खूबसूरत परिसानी आयी है। पर तुमने अपनी मन की बात ज्ञात किया ही नहीं। तुमने मन से नहीं दिमाग़ से निर्णय लिया की तुम राघव को ना चुनकर भैरव को चुनोगी। और वही निर्णय तुम्हारी मन को कई प्रकार की प्रश्न कर रहीहै। तुम्हारी मन की उलझन को सुलझाने के लिए हमने कुछ उपाय लिखी है। इन तरीको से तुम्हे ये ज्ञात होजायेगा की तुम्हे राघव से प्रेम है या नहीं।"
नंदनी परिसान होकर कहती है - "इससे आगे तो कुछ भी नहीं लिखा।"
नंदनी पर्ची को बंद करके सोचती है - "नारायण ने मुझे आधी अधूरी पर्ची क्यों दी?"
और अचानक वो पर्ची हवा मे उड़ने लगती है। नंदनी देखती है की वो पर्ची अपने आप बोलने लगता है।
पर्ची हवा मे उछलकर कहता है - "कैसी हो नंदनी? ठीक तो होना? मेरा नाम है बड़बोला। मुझे भगवान नारायण ने भेजा है तुम्हारी मदत के लिए।"
नंदनी कुछ बोलने ही वाली थी की पर्ची फिरसे बोलने लगता है - "अब तुम ये सोचोगी की तुम्हारी कौन सी मदत करने आया हु, हैना? मे बता ही देता हु। मे एक पर्ची हु मेरा नाम है बड़बोला, मुझे सारी भाषा आती है। मे तुम्हे हर चीज का नक्शा दिलवा सकता हु। मे भगवान नारायण का कोई भी सन्देश तुम्हे देसकता हु। उन्होंने मुझे इसी काम के लिए भेजा है। तुम कुछ बोलती क्यों नहीं।"
बड़बोला झटपट मे अपनी बात ख़तम करता है।
नंदनी - "तुम सचमे बड़बोला हो।"
बड़बोला - "हा मैंने अभी अभी तो कहा। अब ये बताओ की तुम्हे मुझसे क्या मदत चाहिए?"
नंदनी - "मुझे ये जानना है की नारायण की उपाय क्या है?"
बड़बोला - "अच्छा वो। मेने सुना है कोही तुमसे प्यार करता है। देखो मे अपनी अनुभव से तुम्हे कहता हु की प्यार कभी अमृत होता है तो कभी जहर से भी घातक बनजाति है। अब मे तुम्हे उपाय बताता हु। अगर तुम्हे किसीसे प्यार हुवा तो उसके लिए तुम्हे चिंता और फ़िक्र होंगी। तो तुम्हे ये पता करना है की तुम्हारी दिल मे उसकी फिक्र होती है या नहीं?"
नंदनी केहेती है - "नारायण ये बात पर्ची मे भी लिखसकते थे फिर उन्होंने तुम्हे क्यों...?"
बड़बोला नंदनी के बात ख़तम होने से पेहेले कहता है - "अरे भगवान नारायण ने तुम्हे उपाय स्वरुप मुझे ही भेजा है। क्यों की उनका ये मानना है की मे तुम्हारी मदत करसकता हु। देखो नंदनी मे ये नहीं जनता की तुम्हे उस लड़के से प्यार करके कौन सी समस्या आएगी। पर मे एक बात जरूर कहूंगा की अगर तुम्हे उससे प्यार है तो सिर्फ मन की सुनो दिमाग़ का नहीं, प्यार के मामलेमे मन से फैसला लेना पढ़ता है। अगर तुम दिमाग़ से गलत फैसला लोगी तो तुम्हारी जिंदगी कभी चैन नहीं पायेगा, तुम खुद से नफरत करने लगोगी और उस फैसले से भी।"
नंदनी सोचती है - "तो मुझे जल्द से जल्द पता करना होगा।"
बड़बोला - "मेरा शुबकामना तुम्हारे साथ है।"
इतना कहकर बड़बोला अदृश्य होजाता है। नंदनी के मन मे इस बात का डर था की कही उसे राघव से प्यार ना होजाये।
नंदनी सोचती है - "कही गुरूजी का भबिस्यबाणी सच ना होजाये।"
तभी उसका रुमका दरवाजा कोही खटखटाता है। नंदनी दरवाजा खोलती है। दीपिका दरवाजा पर थी।
दीपिका कहती है - "चलो खाना खानेका वक़्त होगया।"
नंदनी रूम को लक करके खाना खाने चलती है।
क्रमशः.......... .





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