कर्तव्य - 1 in Hindi Social Stories by Asha Saraswat books and stories Free | कर्तव्य - 1

कर्तव्य - 1

                     कर्तव्य (1)

   व्यक्ति को अपने जीवन में माता-पिता,भाई -बहन का ध्यान रखना चाहिए; जब शादी हो जाये तो जीवन पर्यंत जीवन साथी का पूरा ध्यान और भरणपोषण करना चाहिए।जब बच्चे हों तो उनकी पूरी ज़िम्मेदारी से शादी विवाह करने के बाद,उनके बच्चों का भी भरपूर ध्यान रखना आवश्यक है ।जो अपनी सभी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभाता है वही समाज में एक अच्छा व्यक्ति कहलाता है ।ऐसा सदियों से सुनने में आता रहा है ।
लेकिन कुछ भारत-माता के सपूत , माता पिता के बेहद लाड़ले ऐसे भी इस संसार में हैं जो कि अपनी पत्नी बच्चे न होते हुए भी सब का भरण पोषण बड़े ही अच्छे ढंग से करते हुए अपना जीवन ख़ुश होकर निछावर कर देते है ।स्वरचित कहानी—-
           
                           कर्तव्य (1)

         बाहर से किसी की आवाज़ आ रही थी .. कोई बड़े भैया को नाम से पुकार रहे थे । मैंने जाकर देखा तो मैं शर्म से वापस आ गई । 

          उन्होंने मुझे देख लिया था,वह हमारे घर पर पिताजी से मिलने अक्सर आया करते थे । सभी उन्हें ख़ज़ांची साहब कहा करते थे । उन्होंने फिर एक आवाज़ दी ..गुड़िया इधर सुनो …मैं दौड़ कर मॉं के पास गई और उन्हें बताया कि ख़ज़ांची साहब आये हैं ।मॉं दौड़ कर बाहर दरवाज़े पर आईं, और मुझे डाँटते हुए बोलीं— अरे गुड़िया तुमने नमस्ते की ख़ज़ांची साहब से ..मैं शर्म से मॉं के बग़ल में खड़ी हो गई और धीरे से बोली— नमस्ते ।

     ख़ज़ांची साहब— नमस्ते ताई जी कैसी हैं आप?

      मॉं— मैं तो ठीक हूँ आप बताओ हमारी बहुरानी कैसी हैं ?

    ख़ज़ांची साहब— आपकी बहुरानी बिलकुल ठीक है, ताईजी । 

    आज आपकी बहुरानी ने ही मुझे भेजा है ।कल दुर्गा अष्टमी है, गुड़िया और पूर्व को कल ग्यारह बजे में लेने आऊँगा । भैया की तरफ़ देख कर बोले — 

    तुम और गुड़िया तैयार हो जाना मैं लेने आ जाऊँ तब मेरे साथ चलना, तुम दौनो की दावत है हमारे घर।

   भैया भी शर्माते हुए मॉं के साड़ी के पल्लू में छुप गए ।
जब वह चले गए तो मैंने भैया को चिडाते हुए कहा—-
लड़के होकर शर्माते हो ?

   भैया— तू तो अंदर ही भाग गई डरपोक कहीं की। 

मुझे डरपोक शब्द कुछ अच्छा नहीं लगा और मैं ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी ।मॉं ने देखा तो भैया को डॉंटा क्यों परेशान कर रहे हो । तभी बड़े तीनों भाई आ गये और मुझे चुपके से डरपोक-डरपोक कह कर चिडाने लगे ; मैं दहाड़े मार कर रो रही थी ।भैया दहशत से मॉं के डर से वहॉं से अंदर कमरे में चले गए ।

     मैं तो कहॉं चुप होने वाली थी, ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी जब पिताजी ने देखा और पूछा क्या बात है गुड़िया ,तुम क्यों रो रही हो ; तो मैंने भाइयों का चिडाना पिताजी को बता दिया ।

   पिताजी— चलो तीनों कहॉं हो इधर आओ अपनी छोटी बहन से माफ़ी माँगो । यदि छोटी बहिन को सताओगे तो तुम्हारे कान पक जायेंगे। बड़े भाइयों ने कान पकने की बात सुनकर बहुत जल्दी से माफ़ी माँग ली । लेकिन पूर्व भैया ने मुझे और चिडाया फिर बाहर दोस्तों में खेलने चले गये । मैं बहुत देर तक प्रतीक्षा कर की रही लेकिन मैं सो गई पता ही नहीं चला वह कब आकर सो गए ।

     अगले दिन घर में दुर्गा पूजा की तैयारी हो रही थी , मॉं ने जल्दी से पूजा की और हम सभी भाई बहन को प्रसाद दिया;मैंने तो थोड़ा सा ही खाया क्यों कि मुझे याद था कि ख़ज़ांची साहब के घर हमें दावत खाने के लिए जाना था ।

      मॉं ने अपना काम निपटाने के बाद हम दोनों को तैयार कर दिया । मुझे मेरी मन पसंद फ्राक मॉं ने पहना दी लेकिन पूर्व भैया को वह कपड़े पसंद नहीं थे । वह मॉं से कह रहे थे कि मुझे दूसरे कपड़े पहनने है , तभी ख़ज़ांची साहब हमें लेने आ गये ।

    हम लोग उनके साथ चले गये , रास्ते में भैया मुझे घूरते रहे , संकोच में वह कुछ कह नहीं पाये । जैसे ही हमें गाड़ी में से उतार कर ख़ज़ांची साहब गाड़ी खड़ी करने गये, भैया ने बहुत ज़ोर से मेरे कोहनी मार दी मुझे दर्द हुआ लेकिन संकोच में मैं भी नहीं बोली धीरे से मैंने कहा घर पर बताउँगी ।अपनी सुंदर फ्राक को पहन कर इठलाती हुई मैं उनके साथ ही अंदर चली गईं ।

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