कर्तव्य - 6 in Hindi Social Stories by Asha Saraswat books and stories Free | कर्तव्य - 6

कर्तव्य - 6

                     कर्तव्य (6)


       भैया की शादी के बाद जब हम स्कूल गये तो हमारी सभी सहेलियों ने कहा—  “अरे अनुराधा तुम शादी की मिठाई नहीं खिलाओगी ?”

  मै मिठाई के डिब्बे अपने साथ ले गई थी वह मैंने सविता को दे दिए । उसने पहले एक मिठाई का डिब्बा 
स्टाफ़ रूम में ले जाने के लिए रख लिया, बाक़ी मिठाई सभी सहेलियों में बॉट दी। सबने मिठाई खाते हुए भाभीजी के बारे में पूछा, मैं भाभीजी की बहुत प्रशंसा कर रही थी तो मेरी सहेली भावना ने कहा— “अभी भाभीजी नई दुल्हन है । बाद में पूछेंगे, यह कहकर हंसने लगीं ।

     मैं सविता को साथ लेकर शर्माती हुई स्टाफ़ रूम में अध्यापिकाओं को मिठाई देकर आ रही थी, तभी बड़ी दीदी ने बधाई देते हुए कहा— “अनुराधा शादी कैसी हुई।”

    मेरा नाम घर पर गुड़िया था लेकिन स्कूल में सब अनुराधा कहकर बुलाते थे । “दीदी शादी बहुत अच्छी हुई ।”मैंने कहा ।

    “हम देखने आयेंगे तुम्हारे घर ।” दीदी ने कहा ।

    “ दीदी भाभीजी तो भैया के साथ चलीं गई ।” मैंने उनकी बात का उत्तर दिया, तो वह बोलीं —“कोई बात नहीं है हम लोग उनके आ जाने के बाद ही आ जायेंगे।”
अब सब रिश्तेदार भी चले गये और हम प्रतिदिन विद्यालय जाने लगे।

     एक दिन हम और अपूर्व भैया स्कूल से आने के बाद खाना खा रहे थे, मॉं घर पर नहीं थीं । हमें लगा मॉं कहीं बाज़ार से कुछ लेने गई है, लेकिन मॉं शाम को भी नहीं आई तो हमने मंझले भैया से कहा— “मॉं कहॉं है भैया ?”

     “मॉं -पिता जी दौनों और पड़ौस वाले चाचा जी-चाची जी ख़ज़ांची भाभीजी के घर गये हैं ।”भैया बोले ।
हमने कहा— “क्यों?”

  जो उन्होंने हमें बताया उसे सुनकर हम स्तब्ध रह गए ।
“ख़ज़ांची भाईसाहब का अचानक हार्ट अटैक से देहावसान हो गया है ।सब वहाँ पर इकट्ठे हो कर गये हैं।”

    हमें कुछ समझ नहीं आया, यह सब इतनी जल्दी कैसे हो गया भाभीजी किसके साथ रहेंगी। उनके यहाँ कोई बालक भी नहीं ।

    कुछ दिनों तक उनके कुछ रिश्तेदार साथ में रहे, लेकिन ख़ज़ांची भाभीजी बहुत ही उदास रहने लगी ।

   कभी-कभी हम लोग भी उनके पास चले जाते,लेकिन उनके रिश्तेदार नहीं चाहते थे कि कोई अन्य व्यक्ति उनसे मिलने आये।

   बाक़ी सब कभी-कभी उनसे मिलने चले जाते तो वह कभी भी ख़ुश नहीं दिखाई देतीं ।

   सभी उनके घर से चले गये, एक परिवार उनके पास रहने लगा । वह परिवार ख़ज़ांची भाईसाहब के बड़े भाई का था। उन्होंने पूरे घर पर अधिकार कर लिया था ।

   ख़ज़ांची भाभीजी खाना भी ठीक से नहीं खातीं थी । कभी-कभी मॉं उनके घर समझा कर आतीं, और उनसे अपना ध्यान रखने को मनुहार करतीं । ख़ज़ांची भाभीजी कुछ न कहतीं सिर्फ़ ऑंसू ही निकलते रहते ।

    दिन पर दिन कमजोर होती जा रहीं थीं । जो भाभीजी हम बच्चों का बहुत ध्यान रखतीं, अब उनका ध्यान रखने वाला कोई नहीं था । परिवार का कोई व्यक्ति उनका ध्यान नहीं रखता ।

   कभी मैं उन्हें अपने रिश्तेदारों के साथ बैंक जाते देखती,तो मैं उन्हें अपने साथ घर लाने की ज़िद करती । कोई उन्हें हमारे घर नहीं आने देना चाहता ।

    उनका बैंक से सभी पैसा निकाल लिया गया और एक दिन जानकारी हुई कि ख़ज़ांची भाईसाहब के भाई ने वह मकान भी बेच दिया ।

     मॉं - पिता जी को जानकारी हुई तो हम सब लोग उनके घर मिलने गए । वह पहिचान में नहीं आई, पास जाकर देखा तो मैं उनसे लिपट गई । वह कुछ बोल नहीं पा रही थी, सिर्फ़ रो रही थी ।

     कुछ ही दिनों में ट्रक में सामान सहित सब लोग चले गये और हमारी प्रिय भाभीजी को भी ले गए ।

    उनके जाने के बाद हम लोग उनके घर की तरफ़ नहीं जा पायें , उधर जाने के लिए पैर ही नहीं पड़े । याद करके मैं भी रोया करती , अपूर्व भैया भी कोने में जाकर रोया करते । कोई देख न ले , तुरंत मुँह धो लिया करते । 

    एक दिन मैं बाहर खेल रही थी कि तभी एक सज्जन व्यक्ति हमारे घर की तरफ़ आ रहे थे ।उन्होंने हमारे घर का पता पूछा— “यही घर है “ मैंने बताया ।

    उनके हाथ में एक बड़ा थैला था, जिसमें कुछ पैकेट रखे थे । उन्होंने बताया कि ख़ज़ांची साहब का मकान हमने ही ख़रीद लिया है । 

    उन्होंने बताया— “हमने मकान तभी ख़रीद लिया था लेकिन हमारा आना नहीं हुआ । आज हमारे घर की सफ़ाई की जा रही थी, तभी काम करने वाले लोगों ने यह पैकेट हमें दिये जिसमें आपके यहाँ का पता लिखा है । साथ में लिखा है, अपूर्व और गुड़िया के लिए उपहार ।

   यह सब देख कर हम सभी दुखी होकर रोते हुए पैकेट को खोलकर देखने लगे । पैकेट खोलने पर उसमें एक सुंदर सी मेरे लिए,एक अपूर्व भैया के लिए ड्रेस थी ।दोनों बहुत सुंदर थी। 

   उसको खोलकर देखा तो उसमें एक काग़ज़ पर पता लिखा था । पता पढ़कर पिता जी ने मॉं को साथ लिया और पते वाले शहर में जा पहुँचे ।

    पता सही था जहॉं भाभी जी गई थी वहीं का था लेकिन वहाँ जाकर पता लगा कि भाभीजी कुछ दिनों पहले ही ख़ज़ांची भाईसाहब के पास चलीं गई जहां से कोई लौटकर नहीं आता । 

   दुःखी मन से मॉं पिता जी ने हमें बताया— “तुम्हारी भाभीजी,तुम्हारे भाईसाहब के पास चलीं गई अब उनका उपहार तुम्हारे पास रहेगा; भाभीजी नहीं ।”

   हम पैकेट के कपड़ों को सीने से लगाए,भाभीजी को गले लगाने का अहसास कर रहे थे । ऐसे लगा जैसे भाभीजी हमें गले लगा कर आशीर्वाद दे रहीं हैं ।

  क्रमशः ✍️

 आशा सारस्वत 





   



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