कर्तव्य - 7 in Hindi Social Stories by Asha Saraswat books and stories Free | कर्तव्य - 7

कर्तव्य - 7

                 कर्तव्य (7)

      सुबह से ही हम सब भाई बहिन ने मिलकर योजना बनाई कि हम दिन में रामलीला का मंचन करेंगे।

   सुबह की दिनचर्या पूरी करने के बाद हमने भोजन किया और अपने आस-पास की मित्र मंडली को तैयार किया ।

         सभी तैयार होकर व्यवस्था में जुट गए,हमारे मित्र जिस पर जो उपलब्ध था पात्र के अनुसार वेशभूषा तैयार करने लगे।

    हमारे घर के ही पास एक परिवार रहता था, उनके बच्चे भी हमारी मित्र मंडली में शामिल थे । उन दोनों भाई बहन का नाम रोहित और रीति था । उनके पिता हमारे पिता के अधिकारी थे ,इसलिए वह जो कहते हम आसानी से मान जाते। उन्होंने अपने पसंदीदा पात्र चुने और उन्होंने हमें जो भी बनने को कहा, हम ख़ुशी से तैयार हो गये ।दशहरे के उपलक्ष्य में विद्यालय में अवकाश थे इसलिए हमारे पास समय की कोई कमी नहीं थी ।

     हमने उन को भी अपने घर पर बुला लिया और एक मीटिंग में तय किया कि कौन , किस पात्र का अभिनय करेगा। पात्र के अनुसार सभी ने अपने डायलॉग तैयार किए । 

   नियत समय पर रामलीला का मंचन होता,सभी बहुत ही मेहनत से अपने पात्र के अनुसार संवाद तैयार करके बोलते हुए यह भी याद रखते कि किस संवाद के बाद अपना संवाद बोलना है ।इस तरह सभी को बहुत आनंद मिल रहा था और रामायण के पात्रों के बारे में जानकारी बड़ी ही सरलता से सबको हो गई ।

    अपूर्व भैया ने बताया कि राम और सीता जी का स्वयंवर होगा फिर विवाह भी, इसलिए बारात का इंतज़ाम करना होगा ।

     रोहित और रीति ने कहा—“राम की बारात हम लोग लेकर आयेंगे,आप बारात का स्वागत करना सीता जी आप की होंगी ।”

    “ठीक है “ हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया और तैयारी में जुट गए । 

   हमारे एक मित्र राहुल ने बताया — “राम के साथ उनके भाई लक्ष्मण, भरत , शत्रुघ्न का भी स्वयंवर होगा और बारात में सब को आना अनिवार्य है ।”

   अब हमने कुछ और मित्र तैयार किए और धूमधाम से विवाह के साथ सभी का स्वागत किया ।

    बहुत ही आनंद लेते हुए सारे कार्य क्रम संपन्न हुए, हमारे परिवार के बड़े लोगों ने हमारी सहायता करते हुए सभी कार्य सफलता से पूरे करा दिए ।

                         अब दशहरे का दिन आ गया, हम सभी का मन बना कि रावण दहन कार्यक्रम किया जाये। हम सभी योजना बना रहे थे कि पिता जी ने बताया— 

“रावण दहन में आतिशबाजी का प्रयोग होता है, बच्चों द्वारा आतिशबाजी का प्रयोग कभी-कभी घातक सिद्ध होता है । आतिशबाजी बड़े मैदान में बड़े लोगों के द्वारा प्रयोग करना तो कुछ ठीक है लेकिन घर के ऑगन में बच्चों द्वारा इसका प्रयोग ठीक नहीं । कोई दुखद दुर्घटना भी हो सकती है । इसलिए आज हम सब लोग, जहाँ बड़े मैदान में रामलीला कमेटी द्वारा रावण दहन कार्यक्रम होगा वहाँ चलेंगे । शाम को पॉंच बजे सभी तैयार होकर चलेंगे ।”

     “ठीक है “ सभी ने एक स्वर में कहा ।

  शाम होने से पहले ही सभी तैयार होकर पिता जी का इंतज़ार कर रहे थे । हमने देखा कि पिता जी और पड़ौस के चाचा जी भी तैयार होकर हमारे पास आ गये ।

     “चलो बच्चों सभी गाड़ी में बैठ जाओ ।” चाचा जी ने कहा ।

    हम सभी दौड़कर चाचा जी की बड़ी गाड़ी में बैठ गए ।

     मैंने आगे की सीट लेनी चाही तो रोहित और रीति पहले ही दौड़ कर वहाँ बैठ गए । हम सब लोग जहाँ जिसे जगह मिली बैठ गए लेकिन पूरे रास्ते हमें बाहर का नजारा देखने को नहीं मिला, हम बीच में जो बैठे थे । जो मित्र साइड में बैठ कर जा रहे थे वह रास्ते के चलचित्र देखते हुए हमें बता कर पूरा आनंद ले रहे थे ।

   आगे से रोहित ने बताया— “अरे! चाचा जी आगे तो बहुत भीड़ है हम कैसे गाड़ी ले जायेंगे।”

   चाचा जी ने बताया—“बच्चों हमें अब गाड़ी पार्किंग में ले जानी होगी, उसके बाद हम सब पैदल ही जाकर रावण दहन कार्यक्रम का आयोजन देख सकते हैं ।”

     गाड़ी से उतरकर सभी एक दूसरे के साथ हाथ पकड़ कर चलने लगे ,तभी पिता जी ने कहा— 
 
    “सभी एक दूसरे का हाथ पकड़ कर रखना, वरना भीड़ में परेशानी हो सकती हैं ।”

     अभी कार्य क्रम शुरू नहीं हुआ था इसलिए हम सब एक साथ ही खड़े रहे । थोड़ी ही दूरी पर रावण और कुम्भकर्ण का पुतला दिखाई दिया ।

    एक तरफ़ कुछ दूरी पर मेला लगा हुआ था जिसमें सभी तरह के खेल-खिलौने और चाट पकोड़ी ,गोलगप्पे,
आइस्क्रीम,बुढ़िया के बाल की स्टाल लगीं थीं ।

   जब मैंने देखा तो मेरा मन हुआ कि वह सब ख़रीदा जाये । मै पिता जी से कहना चाह रही थी तभी अपूर्व भैया चिल्ला कर बोले— 
      
      “राम लक्ष्मण आ गये,अब वह तीर मार कर रावण और कुम्भकर्ण को जला देंगे ।”

  मैंने देखने की कोशिश में पैर के पंजे कुछ ऊपर किये लेकिन कुछ नहीं दिखाई दिया ।

   मैं थोड़ा आगे की ओर बढ़ी तो मैंने देखा कि पिता जी ने दो बच्चों को अपने कंधे पर बैठा लिया है और उन्हें सब कुछ दिखाई दे रहा है और वह आनंद से देख रहे हैं ।अपूर्व भैया लम्बे थे,मैं उनसे लंम्बाई में छोटी थी ।
बाक़ी मित्र भी अपने स्थान से देख कर आनंद लेते हुए ख़ुश थे ।

      मुझे चाचा जी नहीं दिखाई दिए,तो मैं उन्हें तलाशने आगे की ओर बढ़ने लगी , तभी मुझे चाचा जी सामने से दिख गये । जैसे ही मैं आगे बढ़ी,मेरा पैर में एक पत्थर से 
ठोकर लगी और मैं गिर गई । हिम्मत करके मैं उठी तो मैं सबसे बहुत दूर हो गई । जितना मैं आगे बढ़ने की कोशिश कर रही थी,भीड़ के कारण पीछे ही होती गई । 

    मैं घबराहट में रोने लगी, एक सज्जन व्यक्ति ने मुझे गोदी में उठाया और कंधे पर बैठा कर रावण दहन कार्यक्रम दिखाया । रावण में आग लगने के बाद बहुत ज़ोरों से आतिशबाजी की आवाज़ें आ रही थी,मैंने देखते हुए कान बंद किए और पूरा आनंद लिया । अब मैं अपने पिता जी और अपने साथियों को खोजने के लिए वहॉं से आगे बढ़ी । भीड़ अधिक होने के कारण मुझे कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था ।

     मेरे न मिलने पर पिता जी,चाचा जी, मेरे मित्र सभी परेशान होकर खोज रहे थे । थोड़ी देर में लाउडस्पीकर पर आवाज़ आई कि — 

       “एक बच्ची जिसका नाम गुड़िया है जिस किसी सज्जन को मिले कृपया पुलिस चौकी पर पहुँचाने का कष्ट करें ।” मेरा पूरा हुलिया भी बताया ।

      मैंने एक बड़े भैया को देख उनसे कहा—। “भैया मुझे पुलिस चौकी पर पहुँचा दीजिए ।”

    उन्होंने मेरा नाम पूछा— “ क्या नाम है तुम्हारा?

   मैंने उन्हें बताया और वह मुझे वहाँ ले गये जहाँ सभी मेरा इंतज़ार कर रहे थे ।  

    मेरे मित्रों की ऑंखें ऑंसुओं से गीली थी और पिता जी,चाचा जी के चेहरे पर घबराहट ।

  मुझे देख कर सब मित्र ख़ुश होकर बोले— “तुम कहाँ थी गुड़िया ?” पिता जी ने गले लगा कर कहा— 

     “भीड़ और मेले में अपनों का हाथ नहीं छोड़ना चाहिए,गुड़िया ।” 

  “मैं कभी ऐसा नहीं करूँगी ।” कहते हुए मुस्कान लिए हुए अपने मित्रों के साथ गाड़ी में घर जाने के लिए बैठ गई ।

 क्रमशः ✍️

 आशा सारस्वत