Kartvya - 3 in Hindi Moral Stories by Asha Saraswat books and stories PDF | कर्तव्य - 3

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कर्तव्य - 3

कर्तव्य (3)



मॉं रसोई में कुछ बना रहीं थीं , बहुत अच्छी ख़ुशबू आ रही थी; हम और भैया रसोई में गये तो देखा मॉं मिसरानी चाची के साथ पकवान और भोजन बनाने में लगीं थीं ।
मैंने मॉं से पूछा— मॉं खाना तो सुबह बन गया हम सबने खा लिया , अब आप किसके लिए खाना बना रहीं है?

मॉं तो अपने काम में लगीं थीं ।

मिसरानी चाची ने हमें बताया— आज कुछ मेहमानों के लिए नाश्ता बन रहा है ।

जब भी मॉं को रसोई का काम कुछ ज़्यादा करना होता
मिसरानी चाची को मॉं बुला लेती थी । हम उन्हें चाची कहा करते थे ।

एक दिन होली पर मिसरानी चाची हमारे घर पर गुझिया बनवाने के लिए आई थी । मावा में मेवा और बूरा मिला रहीं थीं, मेरा मन किया कि मैं थोड़ा चख लूँ; चाची से कहा— “चाची थोड़ा सा हमें भी चखा दीजिए ।”

मिसरानी चाची ने कहा— “नहीं, बेटा किसी को नहीं मिलेगा, पहले भगवान का भोग लगाकर फिर बाद में मिलेगा ; जाओ तुम बाहर खेलो ।

आज तो हमारी मिसरानी चाची से कहने की हिम्मत ही नहीं हुई, लेकिन ख़ुशबू से मन बहुत कर रहा था कि कुछ तो चखने को मिल जाये।

थोड़ी देर में हमारे घर बड़ी दीदी आ गई, हमें उन्हें देख कर बहुत अच्छा लगा ।

मैं और भैया जब दीदी के पास गये तो उन्होंने बताया कि शाम को हम सब लोग, बड़े भैया के लिए दुल्हन देखने जायेंगे। हम ख़ुशी से उछल पड़े ।

हमने कहा— “दीदी हम भी आप सभी के साथ भाभी जी को देखने चलेंगे ।”

दीदी— “ठीक है,तुम दोनों भी हमारे साथ चलना ।”

हम भी अपनी तैयारी में जुट गये।

शाम को हमारी होने वाली भाभीजी को रेल से आना था, उसके बाद मंदिर में देखने का प्रोग्राम था ।

हमारे मंझले भाई उन लोगों को स्टेशन से मंदिर के लिए लेने जा रहे थे ।हम लोग भी उनके साथ चले गए ।

हमारी होने वाली भाभीजी सीट से उतरी भी नहीं और मैं उनकी गोद में जाकर बैठ गई ।भैया को चिड़ाने लगी, मैं राजा- मैं राजा, मैं राजा ।

रेल से उतरने के बाद हम सब लोग मंदिर में चले गये जहाँ हमारी होने वाली भाभीजी को पिता जी, मॉं , दीदी सब लोग देखने के लिए बैठे थे ।

पहले सब को घर का बना हुआ नाश्ता कराया,फिर कार्यक्रम हुआ ।अब हमें भी दीदी ने नाश्ते के लिए बुलाया लेकिन हमें भाभीजी को देख कर ख़ुशी में नाश्ता करने का मन नहीं था ।

बड़े भैया ने देखा कि सब अपने काम में लगे हैं तो भाभीजी के पास चले गये और उन्हें निहारने लगे, तभी
दीदी ने आकर चुटकी ली ; अरे! लल्ला तुम यहाँ क्या कर रहे हो । बड़े भैया शरमा कर वहाँ से हट गए ।

अब देखने—दिखाने का कार्यक्रम हो गया तो भाभीजी को उपहार,साड़ी, गहने , मिठाई गोद में रखकर दिये गये । एक बार हमें फिर उनकी गोद में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । भैया ने देखा तो कुछ कह नहीं पाये लेकिन हमें घूर कर देख रहे थे ।

सब लोग हंसी-ख़ुशी विदा हो गये । भैया ने हमारे बहुत ही तेज़ी से फिर से कोहनी जमा दी , हमारी चीख निकल गई ।
दीदी ने कहा— “क्या हुआ गुड़िया?”
मैंने कहा— “दीदी भैया ने मारा मुझे ।”

भैया— “दीदी मैंने नहीं मारा ।”

दीदी—“लल्ला छोटी बहिन को नहीं मारते , कान पक जायेंगे।”

मैंने चिल्ला कहा— “दीदी मारा।”

दीदी ने भैया को फिर से डॉंटा , मुझे अच्छा लगा ।

हम लोग मेहमानों के जाने के बाद फिर से खेलने चले गए । बाहर जाने के बाद भैया को ग़ुस्सा आया और एक धप मेरी कमर पर रख दिया ।

फिर बोले— “बहुत राजा बन रही थी । अबकी बार मैं तुम्हें नहीं बैठने दूँगा, मैं बैठूँगा भाभीजी की गोद में ।”

भैया की शादी तय हो गई और घर में सारी तैयारी शुरू हो गई । अब हम सब के सुंदर-सुंदर ड्रेस भी तैयार हो रहे थे । हम लोग बहुत खुश थे क्योंकि घर में सभी सामान नया आ रहा था जो कि हमें बहुत अच्छा लग रहा था ।

बड़े भैया के कपड़े,मंझले भैया के कपड़े, हमारे कपड़े,नई भाभीजी के लिए कपड़े तैयार हो गये।

शादी की तारीख़ नज़दीक आने की वजह से सभी तैयारी में लगे हुए थे ।

सभी मेहमानों का आना शुरू हो गया । हमें बहुत ख़ुशी हो रही थी ।

बड़े भैया की बारात में शामिल होने का मौक़ा हम सभी बच्चों को मिला । बस द्वारा हम विवाह स्थल पर पहुँच गए । वहाँ सूक्ष्म जलपान करने के बाद सभी बच्चे घूमने के लिए निकल गये ।


क्रमशः ✍️

आशा सारस्वत