love wins in Hindi Moral Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | प्यार की जीत  

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प्यार की जीत  

एक अत्यंत ही मध्यम वर्गीय शिक्षक की बेटी अंजलि विवाह के बाद अपने साथ दहेज में कुछ ज़्यादा ना ला पाई, यदि कुछ लाई थी तो वह था उसका प्यारा सा मन और विनम्र स्वभाव। अंजलि और अजय का प्रेम विवाह था। वे पिछले 3 साल से एक-दूसरे को जानते थे। अंजलि को जीवन साथी के रूप में पाकर अजय तो बहुत ही ख़ुश था किंतु उसकी माँ सरिता को अपनी बहू अंजलि के दहेज ना लाने की टीस सताए जा रही थी।


सरिता की सहेली ऊषा के बेटे का विवाह अभी पिछले माह ही तो हुआ था। उसकी बहू दहेज में बहुत कीमती सामान लेकर आई थी। उसके आने के बाद तो ऊषा के घर का नक़्शा ही बदल गया था। ऊषा की शान-शौकत देखकर, दहेज की लालसा ने अनजाने में ही सरिता के अंदर प्रवेश कर लिया था। उसी चकाचौंध में उसकी आँखें अपने घर के लिए भी वही कल्पना कर रही थी। घर के सामने बड़ी-सी गाड़ी, अत्यंत कीमती वस्तुएँ और ख़ूब सारा पैसा, पर हो गया सरिता की इच्छा के एकदम विपरीत।


अजय और संजय दोनों जुड़वा भाई थे। सरिता अब यह सोच रही थी कि अजय ने तो प्रेम विवाह किया है लेकिन संजय का विवाह किसी संपन्न परिवार में करुँगी । जो मन की मुराद अभी पूरी ना हो पाई वह दूसरे बेटे के विवाह में तो पूरी हो ही जाएगी। इस बार भाग्य ने भी सरिता का साथ दिया। संजय के लिए ऐसे ही संपन्न परिवार से रिश्ता आ गया। इतना अच्छा लड़का और अच्छा परिवार देखकर लड़की वाले भी तैयार हो गए। संजय के साथ सुजाता का विवाह भी संपन्न हो गया। सुजाता अपने साथ दहेज में बहुत-सी कीमती वस्तुएँ, आभूषण, महँगी कार और सरिता के लिए भी सोने का हार और कीमती साड़ियाँ सब कुछ ले कर आई । इतना कुछ पाकर सरिता की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।


पिछले सात-आठ महीनों से दहेज के लिए सासू माँ के ताने सुनने वाली अंजलि सोच रही थी, बाप रे इतना कीमती सामान अब तो माँ और भी बदल जाएँगी। फिर ख़ुद ही ख़ुद को समझाती कि वह भी तो दहेज में ढेर सारा प्यार लेकर आई है बस उसी प्यार से माँ को अपना बना कर रखेगी।


सरिता का व्यवहार भेद भाव पूर्ण था। वह हमेशा सुजाता को ज़्यादा मान-सम्मान देती थी। यह भेद भाव अंजलि तो महसूस कर ही रही थी उसके साथ ही साथ सुजाता भी महसूस कर रही थी। अंजलि के इतने प्यारे स्वभाव के कारण वह अंजलि को बहुत ज़्यादा पसंद करती थी। दोनों हम उम्र थीं, पढ़ी-लिखी थीं, दोनों के बीच अच्छा तालमेल था, अच्छी बनती थी। दोनों बिल्कुल सहेलियों की तरह रहती थीं।


एक दिन सुजाता ने संजय से कहा, “संजय! अंजलि दीदी कितनी अच्छी हैं ना, लेकिन पता नहीं क्यों माँ का व्यवहार उनके साथ ठीक नहीं रहता है। दीदी हमेशा हँसती रहती हैं, ख़ुश रहती हैं। माँ की बातों का यूँ तो वह बुरा नहीं मानतीं पर दिल में उन्हें इस बात का दर्द तो अवश्य ही होता होगा। वह किसी को दिखाती नहीं पर ख़ुद से तो छुपा भी नहीं सकती ना? कोई और होता ना संजय तो माँ को जवाब देकर झगड़ा तक कर लेता। माँ को ऐसा नहीं करना चाहिए। संजय मुझे लगता है, हमारा इतना प्यारा परिवार है, ऐसे में तो कभी ना कभी टूट जाएगा।”


“तुम ठीक कह रही हो, सुजाता मौका देखकर मैं माँ को समझाऊँगा।”


जिस रात सुजाता और संजय में यह बात हुई, उसी रात को घर में कुछ और भी हुआ। अपना-अपना कमरा बंद करके सभी सो रहे थे। हॉल और किचन की लाइट भी बंद हो चुकी थी। सरिता के पति विजय गहरी नींद में सो चुके थे। तभी सरिता को प्यास लगी, देखा तो आज अंजलि पानी की बोतल रखना भूल गई थी। सरिता पानी लेने के लिए उठी और रसोई की तरफ़ जा ही रही थी। तभी उन्हें अंजलि और अजय की बात करने की आवाज़ आई। उनके पाँव वहाँ पर ही अटक गए। वह कान लगाकर सुनने लगीं कि इतनी रात को क्या बात कर रहे हैं यह लोग।


“अंजलि तुम्हें क्या लगता है, मैं कुछ जानता नहीं। अपनी पत्नी के विनम्र स्वभाव को क्या मैं पहचानता नहीं? तुम ना बताओ फिर भी मैं जानता हूँ, आज फिर माँ ने तुम्हें कुछ कहा है। पानी अब सर के ऊपर निकल रहा है अंजलि। मुझे लगता है अब हमें अलग हो जाना चाहिए। मैं जानता हूँ, माँ को क्या अखर रहा है?"

"नहीं अजय! तुम यह क्या कह रहे हो? ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे मेरी मम्मी की याद आ रही थी बस और कुछ नहीं। इसलिए मन थोड़ा भारी हो रहा था।”


“झूठ मत बोलो अंजलि, जीवनसाथी हूँ तुम्हारा। पिछले 5 वर्षों से तुम्हें जानता हूँ, तुम्हें प्यार करता हूँ। मैंने तुम्हें शादी के पहले ऐसा उदास कभी नहीं देखा। तुम यह सब कब तक छिपाओगी? कब तक घुट-घुट कर इस तरह रहोगी? मैं आज ही माँ से बात करता हूँ।”


“नहीं अजय हम सब एक दूसरे के सुख-दुख के साथी हैं। ऐसी छोटी-छोटी सी बात से नाराज़ होकर हम अलग नहीं हो सकते। तुम्हारा सोचना ग़लत है अजय! वह माँ हैं हमारी, अगर कुछ बोल भी दिया तो क्या हुआ? पापाजी भी मुझे कितना प्यार करते हैं। संजय और सुजाता भी कितने प्यार से मुझसे बातें करते हैं, मस्ती करते हैं। मैं पापाजी से अलग होकर रहने का तो कभी सपने में भी नहीं सोच सकती।”


“अंजलि मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाला। तुम्हारा यदि बार-बार अपमान होगा तो मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। माँ से ना सही, मैं कल ही पापा जी से बात करूँगा। उनसे कहूँगा कि वह माँ को समझाएँ।”
“अजय अपने दिमाग़ से यह गलतफहमी निकाल दो, मैं सच में बहुत खुश हूँ। माँ भी मुझे बहुत प्यार करती हैं।”


“अजय तुम्हें तो पता है ना, सुजाता प्रेगनेंट है इस समय। अभी तो घर का माहौल ख़ुशियों भरा होना चाहिए।”


“…और तुम्हारा मन अंजलि, मैं जानता हूँ अपने कमरे से बाहर तुम कितना हँसता हुआ चेहरा लेकर जाती हो। तुम्हारे मन की गहराई को मैं पढ़ सकता हूँ। अंजलि अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाला। कल सुबह मैं पापा जी से बात करूँगा।”


“ठीक है अजय तुम्हें जो बात करना है, कर लो। लेकिन इस घर से अलग तुम अकेले ही चले जाना। मैं तुम्हारे साथ बिल्कुल नहीं आऊँगी।”


इतना सुनते ही सरिता वहाँ से चली गई। आज उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि कितना फ़र्क़ है, उसकी और अंजलि की सोच में। सरिता अपने आप को कोस रही थी। आज उसे अपने पति विजय की समझाई हुई बातें याद आ रही थीं कि सरिता तुम्हें यदि अपने बेटे को हमेशा अपना बना कर रखना है तो पहले बहू को बेटी बनाना होगा। उसे दिल से अपनाना होगा। जीवन संगिनी है वह अजय की। वह भी बार-बार उसका अपमान सहन नहीं कर पाएगा। सरिता के मन में आज पहली बार अंजलि के लिए प्यार के बादल उमड़-घुमड़ कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो अंजलि को देखते ही आज यह प्यार के बादल फट ही पड़ेंगे। सरिता के मन ने अंदर से अपनी ग़लती स्वीकार कर ली थी। वह सोच रही थी थोड़े से पैसे और चंद वस्तुओं के लिए वह इतना गिर गई थी । उनकी असली दौलत अंजलि और उसका बेशकीमती प्यार है, जिसे दुर्भाग्य वश उन्होंने कभी महसूस ही नहीं किया। वह प्यार लुटाती रही और वह उसके बदले हमेशा उसे नीचा दिखाती रही।


अपनी पत्नी की बातें सुनने के बाद अजय के मन में उसके लिए और भी ज़्यादा इज़्ज़त बढ़ गई। अंजलि और अजय देर रात तक बातें करते रहे, इसलिए दूसरे दिन सुबह अंजलि रोज़ की तरह जल्दी उठ ना पाई। सरिता भी रात भर बेचैनी में करवट बदलती रही। वह सोच रही थी इतने दिनों तक उसे अंजलि की अच्छाइयाँ क्यों दिखाई नहीं दी? क्यों उसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी? क्यों उसके दिलो-दिमाग पर दौलत छाई हुई थी? आज यदि अजय की बात मानकर अंजलि तुरंत ही हाँ कह देती तो अजय अपना अलग परिवार बना लेता, उनसे दूर हो जाता। तब निःसंदेह लोग उन्हें ही बुरा कहते, खासतौर पर अंजलि को लेकिन उसकी असली गुनहगार तो वह ख़ुद ही थी।


इतने में विजय ने करवट ली और कहा, “सरिता जाग रही हो क्या?”


“हाँ क्या हुआ?”


“थोड़ा पानी पिला दो।”


पानी देने के बाद वह वापस सोच में पड़ गई। इतनी पढ़ी-लिखी हो कर भी उसने यह क्या कर डाला। वह ख़ुद भी तो एक मध्यम वर्गीय शिक्षक की ही बेटी है। वह भी दहेज में चार जोड़ी कपड़े और दो-चार बर्तन ही तो लेकर आई थी फिर भी सासु माँ ने कभी उसे कुछ नहीं कहा और ना ही कभी ताना मारा। इतना सोचते-सोचते सरिता उठ बैठी। उसने सोचा कि अब उसे जल्दी से जल्दी अपनी ग़लती सुधारनी होगी। उसका व्यवहार जैसा छोटी बहू सुजाता के साथ है वैसा ही अंजलि के साथ भी होना चाहिए। इन्हीं सब ख़्यालों को अपने अंदर संजोए सरिता सुबह होते ही उठ गई और आज सबसे पहले रसोई में भी पहुँच गई। जैसे रोज़ अंजलि सबके लिए चाय बनाती है, उसी तरह आज सरिता ने सभी के लिए चाय बनाई। चाय की ट्रे लेकर सबसे पहले वह अंजलि के कमरे में गई और दरवाज़ा खटखटाया।


“अंजलि बेटा उठो, दरवाज़ा खोलो।”


अंजलि घबरा कर उठी और दरवाज़ा खोला। सामने सरिता को देखा जो चाय की ट्रे लेकर खड़ी थी, “अरे माँ आप? मुझे उठा लेतीं तो मैं चाय बना लाती।”


“क्यों बेटा? माँ हूँ तुम्हारी, क्या मैं चाय बनाकर नहीं ला सकती?”


सरिता की आवाज़ सुनकर अजय भी उठ बैठा। अंजलि आश्चर्य भरी नजरों से सरिता को देखे ही जा रही थी। उसकी आँखों की पुतलियाँ मानो एक ही जगह अटक कर रह गईं थीं और वह कहीं ख़्यालों में खो गई थी।


सरिता ने कहा, “अंजलि बेटा कहाँ खो गईं, यह लो अजय के साथ बैठकर चाय पी लो वरना ठंडी हो जाएगी।”


अंजलि और अजय अपनी माँ का नया और परिवर्तित रूप देखकर फूले नहीं समा रहे थे। अंजलि को तो मानो बिना मांगे भगवान ने सब कुछ दे दिया हो ऐसा लग रहा था। यह परिवर्तन एक ही रात में कैसे आ गया, यह सोचने-समझने की उन्होंने कोशिश भी नहीं की।


अपने अंदर के इस परिवर्तन से सरिता को इतनी ख़ुशी मिल रही थी, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। अपने मन से द्वेष, लालच, भेद भाव वह सब कुछ निकाल कर आज सरिता बहुत हल्का महसूस कर रही थी। सरिता को दो साल लग गए अंजलि को बहू से अपनी बेटी बनाने में। लालच में लिपटे दहेज के पेड़ को जड़ से ख़त्म करने में। दहेज में लाए हुए बेशुमार प्यार के बाद भी अंजलि को दो साल लग गए अपनी सासू माँ का हृदय परिवर्तन करने में। लेकिन उसने वह किया और वह कामयाब भी हुई। यह उसके प्यार की जीत थी। उसके विश्वास और विनम्र स्वभाव की जीत थी।


अजय सोच रहा था यह अंजलि का धैर्य और बड़प्पन ही था, जिसने इस घर को टूटने से बचा लिया। विजय अपनी पत्नी का बदला हुआ रूप देखकर बहुत ख़ुश थे। सरिता अब जितना प्यार सुजाता से करती उतना ही अंजलि से भी करती। दोनों बहुओं को एक जैसा मान-सम्मान भी देती।


एक दिन सरिता ने विजय से कहा, “विजय जानते हो जिस वक़्त मैंने अजय और संजय को जन्म दिया था मैं तब जितनी ख़ुश थी ना, उतनी ही ख़ुशी आज मुझे अंजलि और सुजाता को पाकर होती है। पहले दो बेटे और अब दो बेटियों को पाने की ख़ुशी।”


“यह तो बहुत ही अच्छी बात है सरिता। तुमने मेरी बात मान ली। मैंने जो भी समझाया, तुम समझ गईं, तो देखो आज घर में एक और बेटी का जन्म हुआ है और वह है ख़ुशी। यह हमारे पैदा करने से आती है और यदि इसे संभाल कर रखो तो यह कहीं भी नहीं जाती। हमेशा हमारे साथ रहती है जो हमें शक्ति भी देती है।”


सरिता विजय की बातें सुन कर मुस्कुरा रही थी मगर उसने विजय की इस ख़ुशी को बिल्कुल ख़त्म नहीं होने दिया कि वह उनके समझाने से समझ गई। उस राज़ को सरिता ने राज़ रखना ही ठीक समझा।



रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक