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काश 

प्यार था, ख़्याल था, चिंता भी थी किंतु यदि कुछ नहीं था तो समय नहीं था, जो कभी किसी के लिए नहीं रुकता। साहिल के पिता आकाश अपनी पत्नी को खो चुके थे इसलिए वह अपने पिता को अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहता था। साहिल की पढ़ाई पूरी होने के उपरांत उसे अमेरिका में बहुत ही अच्छी नौकरी मिल गई।


तब उसने आकाश से कहा, "पापा मैं आपको इस तरह अकेला छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।"


"क्यों बेटा, मुझे इतना मानसिक तनाव देना चाहते हो कि मैं हमेशा इस बोझ के तले दबा रहूं कि मेरी वजह से मेरे बेटे को कठिन परिश्रम के बाद मिली इतनी अच्छी नौकरी वह नहीं कर पाया?"


"नहीं पापा, यहां रह कर भी मैं अपना भविष्य अच्छा बना सकता हूं।"


"साहिल यही सब सोचकर, मैं कहीं बाहर नहीं गया और कम आय में घर चलाता रहा। तुम्हें अवसर मिला है तो उसका लाभ उठा लो।"


"मैं ऐसा नहीं कह रहा कि हमारे देश में रहकर आगे नहीं बढ़ सकते, बिल्कुल बढ़ सकते हैं किंतु तुम्हें वह अवसर मिला है जो आसानी से हर किसी को नहीं मिल पाता। अभी तो मैं एकदम स्वस्थ हूं चार छः साल में चाहो तो वापस आ जाना, फ़िर तो हमेशा साथ ही रहेंगे।"


"ठीक है पापा, किंतु आप अपना पूरा ख़्याल रखना।"


"बिल्कुल रखूँगा बेटे, मुझे अभी बहुत जीना है, अपने बेटे का उज्जवल भविष्य भी तो देखना है"


पिता की ज़िद के सामने उसकी एक न चल पाई, उनकी बात मान कर साहिल चला गया, वहां पहुंचकर वह हर दो-तीन दिन में अपने पापा को फोन करता था। धीरे-धीरे काम का बोझ कुछ ज्यादा ही बढ़ गया और फोन करने की नियमितता में कमी आने लगी।


वह अक़्सर फोन पर कहता, "सॉरी पापा, मैं फोन करने में लेट हो जाता हूँ।"


तब आकाश उसे कहते, "बेटा कोई बात नहीं, अपने काम पर ध्यान दो। मैं बिल्कुल ठीक हूँ, स्वस्थ हूँ, रामू काका आकर खाना बनाते हैं और साफ-सफाई भी कर देते हैं। तुम बिल्कुल चिंता नहीं करना, यहां सब ठीक है।"


अपने पिता की यह बात सुनने के बाद भी साहिल रामू काका से फोन पर हमेशा एक ही बात कहता, "रामू काका पापा का ख्याल रखना।"


रामू काका भी जवाब में एक ही बात कहते, "साहिल बेटा चिंता ना करो, साहब बिल्कुल स्वस्थ हैं।"


होली का समय था रामू काका ने आकाश से तीन-चार दिनों की छुट्टी मांगी, "साहब त्यौहार है, सोच रहा हूँ बीवी बच्चों को लेकर मां बाप से मिलने गाँव चला जाऊं, जल्दी ही वापस आ जाऊंगा, यदि आप हाँ कहें तो ?"


"अरे क्यों नहीं रामू काका, त्यौहार तो सभी के लिए होता है। चले जाओ, माता-पिता ख़ुश हो जाएंगे तुम्हारे।"


"लेकिन साहब आप अकेले ?"


बीच में ही आकाश ने बात काटते हुए कहा, "रामू काका जाओ, मेरी चिंता नहीं करो, तीन-चार दिनों में ही तो वापस आ जाओगे । मैं भी कुछ दिन होटल का खाना खाकर आनंद लूंगा, बहुत दिनों से तुम्हारे हाथ का खाना खाते-खाते बोर हो गया हूँ," कहकर आकाश और रामू काका दोनों हँसने लगे।


रामू काका होली मनाने के लिए अपने गाँव चले गए।


रामू काका के जाने के अगले दिन अचानक आकाश की तबियत बिगड़ गई, उनके सीने में इतना तीव्र दर्द उठा कि वह अपना फोन तक भी नहीं उठा सके। कुछ देर अकेले तड़प कर उनका दुःखद निधन हो गया। किसी को कुछ पता नहीं चला, दो दिन तक उनका पार्थिव शरीर ऐसे ही पड़ा रहा। तीसरे दिन होली का त्यौहार था। साहिल ने अपने पापा को होली की शुभकामनाएं देने के लिए फोन लगाया किंतु फोन तो स्विच ऑफ हो चुका था।


तब उसने रामू काका को फोन लगाया, "रामू काका पापा का फोन बंद आ रहा है, उनसे बोलो फोन को चार्जिंग में लगा दें और फ़िर मुझे कॉल करें। "


रामू काका ने कहा, "साहिल बेटा मैं तो तीन दिनों के लिए गाँव आया हूँ।"


"अरे रामू काका, आप लोगों ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया, मतलब पापा अकेले हैं ?"


"हां बेटा मैं कल वापस पहुंच जाऊंगा।"


साहिल बार-बार अपने पापा को फोन करता रहा लेकिन उधर से कोई आवाज़ नहीं आने पर साहिल की चिंता बढ़ने लगी। उसने अपने दोस्त विशाल को फोन लगाकर कहा, "विशाल यार पापा फोन नहीं उठा रहे, जल्दी घर जाकर देख क्या हुआ है? मुझे बहुत डर लग रहा है।"


विशाल तुरंत आकाश के घर आया, घर अंदर से बंद था और बेहद बदबू आ रही थी। विशाल ने पुलिस को बुलाकर दरवाज़ा खुलवाया, अंदर आकाश के पार्थिव शरीर को देखकर वह अवाक रह गया।
अपनी नम आँखों से तब उसने साहिल को फोन करके सारी घटना से अवगत कराया। साहिल टूट गया, उसके सारे सपने बिखर गए जो उसने अपने पिता के लिए देखे थे। वह अगली फ्लाइट से ही अपने घर आने के लिए निकल गया लेकिन भारत आने में उसे लगभग 24 घंटे लग गए। तब तक आकाश के पार्थिव शरीर को रख पाना असंभव था, अतः उनका अंतिम संस्कार हो चुका था।


आकाश जब आया तो उसे खाली घर मिला, जहां मेहमान थे, रामू काका थे पर जिसकी चाहत थी वही नहीं थे। पिता के पार्थिव शरीर के दर्शन तक ना कर पाने वाले साहिल के मन में यदि कुछ था तो केवल पश्चाताप । उसकी आँखों में आँसू थे और उन आँसुओं के बोझ को सहन कर पाना कितना कठिन था, यह शायद इस तरह की घटना का सामना करने वाला एक बेटा ही समझ सकता था। तब बार-बार उसके मन में केवल एक ही ख़्याल आ रहा था कि काश, काश मैं पापा से बात कर पाता। उस काश के साथ यदि कुछ था तो सिर्फ वह आँसू थे, जो शायद आँखों से तो सूख जाएंगे किंतु दिल से कभी भी सूख नहीं पाएंगे। दिल हमेशा अपने पिता की इस तरह की मृत्यु के लिए रोता रहेगा। उन्हें फोन नहीं कर पाने के दुःख में साहिल घुटता रहेगा और मन में बार-बार वही शब्द गूंजेगा काश, काश, काश।


रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक