I can not live in Delhi in Hindi Moral Stories by prema books and stories PDF | दिल्ली में नहीं रहना

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दिल्ली में नहीं रहना

दिल्ली में नही रहना

मार्च 2020 अचानक एक दिन रात को 10:00 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा घोषणा होती है कि कल से भारतवर्ष में लॉकडाउन लग जाएगा. स्कूल,कॉलेज,सरकारी,अर्ध-सरकारी,गैर-सरकारी,दुकानें,मॉल ,बस,ट्रेन सब बंद रहेंगे. कब तक? ये नही कहा जा सकता. इस ख़बर का अंदेशा रमेश को पहले से ही था उसे पीएमओ में नौकरी करते सालों हो गये थे. लेकिन अचानक लॉकडाउन की खबर से वो भी हैरान था. रमेश मन ही मन गहरी सोच में डूबा था कि ‘माँ अब हमारे साथ दिल्ली कैसे रहेगी?’ लेकिन कुछ भी हो इस महामारी में मैं अब माँ को अकेले गाँव नही छोड़ सकता.

लॉक डाउन की खबर जंगल में आग की तरह सुबह होते-होते पुरे भारत में फ़ैल गई. खबर सुनते ही चारों ओर अफरा-तफरी मच गई. लॉक डाउन की अचानक ख़बर ने हर किसी को तत्काल फ़ैसला लेने के लिए मजबूर कर दिया था. सभी को परेशानी थी ऐसी विकट पारिस्थिति से सब जल्द से जल्द निज़ात पा लेना चाहते थे मतलब हर किसी को एक सुरक्षित जगह चाहिए थी जहाँ वो लॉक डाउन में रह सकें. ऐसे में अपना घर सबसे अच्छी जगह होती है. जो मजदूर मजदूरी के लिए दिल्ली,बैंगलोर मुंबई जैसी मेट्रो सिटी में काम की तलाश में आते थे वो जहां थे वहीं फंस गए. उस वक्त समाचार-पत्र,टीवी चैनलों पर एक ही खबर थी कि लॉकडाउन से अचानक लोगों को आज असुविधा और बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. दिल्ली आनंद विहार बस अड्डे पर लाखों की भीड़ जमा थी. यही हाल बोम्बे सिटी का भी था. अब हर कोई अपने अपने होम टाउन पहुंच जाना चाहता था.जिसको जहाँ कोई जुगाड़ दिखती घर जाने के लिए निकल पड़ता. लेकिन जो प्रवासी अपने बीबी बच्चों के साथ रह रहे थे उनके लिए घर वापिस लौट पाना बहुत मुश्किल था. अकेले और छड़े लोगों ने किसी की मदद न मिलने पर पैदल ही चलना ठीक समझा. भूखे प्यासे अपने अपने बोरी बिस्तरे को सर पर लाधे हर कोई बस अपने घर कैसे भी पहुँच जाना चाहता था. कोई दिल्ली सरकार को कोस रहा था तो कोई मोदी सरकार की यह कोई नई राजनीति है लोगों को बरगलाने की कह रहा था. लेकिन उनमें से कुछ अख़बार और न्यूज़ चैनल देखने वाले लोगों को अंदेशा हो गया था कि ये विदेशों में फैली कोई बिमारी है जिसने महामारी का रूप ले लिया है इसलिए इससे पहले बचना बहुत जरुरी है पहले जान बचाओ और अपने घर पहुंचों. जिन्दा रहें तो खा कमा तो कैसे भी लेंगें.

रमेश सुबह माँ के कमरे में गया ‘मां अब आपका हिमाचल जाना मुश्किल है प्रधानमंत्री मोदी जी ने घोषणा की है कि पूरे भारतवर्ष में लॉकडाउन लग गया है जो जहां है वहीं रहें’. माँ ने झठ से कहा ‘ऐसे कैसे हो सकता है मुझे दिल्ली नही रहना. तू मुझे अभी हिमाचल छोड़ आ’.

‘मां विदेशों में कोविड नामक महामारी फैल रही है जो विदेशी यात्रा के दौरान भारत में भी प्रवेश कर चुकी है अगर वह भारतवर्ष में फैल गई तो लाखों में लोग मारे जाएंगे उस महामारी से बचाव का एकमात्र उपाय सिर्फ लॉक डाउन है वह बीमारी छूने से फैलती है इसलिए लोगों के सम्पर्क में न आयें अपने अपने घर में ही रहें और अभी कुछ नही पता कि ये लॉक डाउन कब खुलेगा’.

‘लॉकडाउन तो अभी शुरू ही हुआ है तू ऐसा कर मुझे अभी रात को ही छोड़ आ’ ये कहते ही माँ अपने कपड़े तह लगा कर बैग में रखने लगी.

‘माँ आप वहां अकेली क्या करोगी हमारे साथ यहीं रहो. अगर कोई बात हो गई तो हम आपसे मिलने जल्दी नही आ सकेगें. आप समझ नही रहीं हो. विश्व में भयंकर महामारी फैली हुई है अब ये बिमारी भारत में भी प्रवेश कर चुकी है अब हम आपको हिमाचल अकेले नही छोड़ सकते’

माँ कुछ समझ नही पा रही थी वो एकदम बेचैन हो उठी ‘वहां सब छोड़ छाड़ कर मैं यहाँ कैसे रह सकूंगी तू तो जानता ही है यहाँ दिल्ली में मेरा दम घुटता है और मेरी तबियत ख़राब हो जाती’

‘माँ आपका ख्याल रखने को यहाँ हम सब हैं आप चिंता मत करो लेकिन अब आपका हिमाचल जाना नमुमकिन है’.

माँ सर पकड़ बेड पर उड़कु बन कर बैठ गई. माँ को अपने बाग-बगीचे, खेत-खलियान, पशु-पक्षी, पास-पड़ोसी, घर में रखी हुई उनकी चीजें तमाम ना जाने क्या-क्या याद आने लगा था माँ शांत होकर अपने बिस्तर में बिना कुछ खाए मौन की मुद्रा में लेंट गईं.

ज्यादातर रमेश अपनी बीवी के साथ हर 3 महीने या 6 महीने में हिमाचल घूमने जाया करता था यह पहली बार हुआ था कि माँ रमेश की बेटी की शादी में शामिल होने दिल्ली आई थी और अचानक लॉक डाउन लग जाने के कारण माँ को अब दिल्ली में ही रुकना पड़ रहा था. माँ को दिल्ली की हवा कभी पसंद ही नहीं थी. वह हमेशा कहती थी कि ‘रमेश दिल्ली की हवाओं में जहर घुला हुआ है यहां के पानी से मेरा पेट खराब हो जाता है मेरी तबीयत बिगड़ जाती है इसलिए तू ही यहाँ मुझसे मिलने आ जाएगा कर. अब मेरी जिंदगी ज्यादा नहीं बची है. क्या पता कब मर जाऊँ’ लेकिन पोती की शादी में आने के लिए वह 1 महीने पहले से ही सोच कर बैठी थी कि शादी में जरुर जाऊँगी और आने वाले सभी रिश्तेदारों से भी मिलूँगी. पता नही फिर कभी किसी से मुलाकात हो भी कि नही, अब उम्र हो चुकी है क्या पता कब ईश्वर पास बुला ले. लेकिन लॉक डाउन की बात से माँ बहुत उदास और परेशान हो गई थी

रमेश की दो बेटियां थी जो अमेरिका में जॉब करती थी रमेश ने शादी के लिए लड़का भी अमेरिका का ही देखा था उसकी जॉब भी वहीँ थी लेकिन उसकी फॅमिली बॉम्बे की रहने वाली थी होली से पहले ही रमेश ने अपनी छोटी बेटी की शादी कर उन्हें अमेरीका रवाना कर दिया लेकिन मां को होली त्योहार का वास्ता देकर रमेश की बीबी ने कुछ दिन और रुकने को कहा था और होली के तुरंत बाद ही पूरे भारतवर्ष में प्रधानमंत्री मोदी जी ने लॉक डाउन की घोषणा कर दी. मां अब बेटे रमेश के घर रहने के लिए विवश थी. ऐसा नहीं था कि मां को अपने बेटे और बहू से प्रेम नहीं था लेकिन मां अपने पूरे जीवन में कभी भी मेट्रो सिटी दिल्ली में इतने लंबे समय के लिए नहीं रही. रमेश के पिता हिमाचल में किसी सरकारी स्कूल के हिंदी के अध्यापक थे. पिता के स्वर्गवास के बाद रमेश ने माँ को कितना कहा साथ में दिल्ली रहने के लिए लेकिन माँ ने साफ़ मना कर दिया था उस समय वो बोली थी ‘मैं खुद को शहरी जीवन में ढाल नही पाती और मेरी वजह से तुम्हें परेशानी ही रहती है. देख यहाँ पूरा गाँव हैं मेरा ख्याल रखने को, ये सब लोग मेरा कितना ध्यान रखते हैं मुझे यहीं इन लोगों के बीच अच्छा लगता है तू मेरी बिल्कुल फ़िक्र मत किया कर’...

मां सवेरे पूजा के लिए गांव में बने दूर मंदिर में जाया करती थी. आते जाते वक्त लोगों से बात किया करती थी. जहां बैठी तो वहीं पर चाय नाश्ता माँ का हो जाया करता था. गाँव के लोगों के साथ बैठना उठाना माँ को पसंद था. मां के स्वभाव के कारण ही ना तो गांव वालों ने उन्हें शहर मेरे पास आने दिया और ना ही कभी माँ का मन हुआ कि गांव से सब कुछ खत्म कर वो मेरे साथ दिल्ली में ही रहे. अंत में उन्होंने यही स्वीकार किया कि तुम मुझसे यहीं मिलने आता जाता रहा कर और फोन पर रोज बात कर लिया कर. यहाँ मेरा ध्यान रखने वाले सब लोग है तुझे परवाह करने की जरूरत नहीं है.

रमेश जानता है कि माँ यहां नहीं रह पाएंगीं लेकिन अब कोई दूसरा उपाय नहीं है जब तक कि लॉक डाउन नहीं खुल जाता.

देखते ही देखते दिल्ली में रहते हुए मां को एक महीना हो गया था. रमेश मां के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करता था. रमेश की बीवी जैसे ही घर के कामों से फ्री होती वो मां के साथ कुछ ना कुछ बातें किया करती ताकि मां का मन लगा रहे. रमेश ने मां को एप्पल फोन खरीद के दिया था ताकि माँ का मन लगा रहे और वो कुछ न कुछ देखती सुनती रहें लेकिन मां जैसे ही फोन में न्यूज़ सुनती तो उसको कोविड की खबरें ही सुनने को मिलती. मां को पहले भी मोबाइल जैसी टेक्नोलॉजी चीजों से परहेज था. टीवी चलाते तो कोविड की तरह-तरह की भयंकर खबरें सुनने को ही मिलती. जिससे मन और ज्यादा दुखी हो जाता इससे मां अब और ज्यादा दुखी और परेशान रहने लगी.

देखते ही देखते दिल्ली में मां को रमेश के साथ 2 महीने बीत गए. अब दिल्ली में मां की पूरी दिनचर्या बदल चुकी थी मां का सोना,जागना, उठना, बैठना बातें करना, दिन-रात सब कुछ बदल गया था. माँ की गाँव में जो जीवनशैली थी उसका शहर की जीवनशैली से दूर दूर तक कोई वास्ता नही था. शुरू में माँ बहुत टीवी देखती लेकिन सारा दिन कोविड की खबरों से माँ का मन घबराने लगता. मन को थोड़ी बहुत शांति रामायण जैसे कुछ धारावाहिक देखकर मिलती लेकिन माँ को टीवी देखना एक लिमिट तक ही पसंद था.सारा दिन आप टीवी नही देख सकते. फिर माँ घंटो बालकॉनी में बैठी खाली पार्क में पेड़ पोधों को देखती रहती. जब थक जातीं तो अपने रूम में जाकर कुछ देर आराम कर लेती. कुछ समय बाद फिर उठती और खिड़की पर खड़े आते जाते लोगों को देखती रहती. रमेश और बहु ने माँ को बहार जाने के लिए सख्त मना किया हुआ था. लेकिन मां दो महीने बाद भी अपने आप को दिल्ली के वातावरण में एडजस्ट नहीं कर पा रही थी धीरे-धीरे माँ ने टीवी देखना बंद कर दिया, खिड़की से बाहर झांकना भी बंद कर दिया. रमेश ने माँ को जो एप्पल फ़ोन दिया था माँ ने अब फोन देखना भी बंद कर दिया. रमेश और बहु से भी बातें बहुत कम कर दी, खाना-पीना मां का पहले से और भी कम हो गया था.

मां हमेशा उदास रहती और अपने कमरे में लेटी रहती थी. घर में किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि माँ को क्या हो गया है? एक बार जब माँ सारे दिन अपने कमरे से बहार नहीं निकली तो रमेश और उसकी बीवी घबराकर उनके कमरे में गए तो देखते हैं कि मां सुध-बुध खोए औंधे मुंह बेड पर पड़ी है रमेश और उसकी बीवी घबरा गए उन्होंने तुरंत अपने घरेलू डॉक्टर को बुलाया जो उन्ही के पड़ोस में ही रहते थे और रमेश के अच्छे दोस्त भी थे. डॉक्टर ने माँ का बीपी, शुगर चेक किया जो कि नार्मल था. माँ को जुकाम-खांसी,बुखार भी नहीं था.

रमेश ने डॉ से पूछा ‘माँ को क्या हुआ है’?

‘मां एकदम स्वस्थ है लेकिन मैं कुछ और टेस्ट लिख देता हूँ तुम उसे आज ही करा लो और मझे शाम तक दिखा देना’

जिसे रमेश ने जल्दी से 24 घंटों में करवा लिया सभी रिपोर्ट भी नॉर्मल थी जब रमेश ने अपने दोस्त डॉक्टर से मां के बारे में पूछा तो डॉक्टर ने बताया कि मां एकदम नॉर्मल है मां को कोई भी बीमारी नहीं है बस उनको दुख सता रहा है वो यहां ऐसे वातावरण में अपने आप को रहने के लिए एडजस्ट नहीं कर पा रहीं हैं. मुझे लगता है मां को डिप्रेशन हो गया है डॉक्टर ने कहा जितना ज्यादा हो सके माँ के साथ रहो. उनके साथ बैठो और बातें करो उनको अकेला मत छोड़ो.

लेकिन सच तो यह है कि रमेश और उसकी बीवी हमेशा मां के आस-पास ही रहते थे शायद माँ ही उनका साथ देने में कहीं ना कहीं अपने आप को असमर्थ पाती थी ऐसे ही एक महीना और निकल गया एक दिन सुबह जब माँ अपने कमरे से नाश्ता करने नही आई और दिन के 11 बज गये तो रमेश की बीबी माँ के रूम में गई और जाते ही ज़ोर से उसके मुंह से चीख निकल पड़ी. रमेश चीख़ने की आवाज़ सुन कर माँ के रूम में आया तो देखता है कि माँ वैसे ही सुध-बुध खोये सीधे बेड पर बिना कोई हलचल किए लेटी हुई थी. माँ के रूम का दरवाज़ा और सारी खिड़कियाँ खुली थी न जाने कब माँ सबको छोड़ जा चुकी थी. डॉ ने बताया माँ को सोते समय हार्टअटैक हुआ होगा. बाद में माँ की रिपोर्ट में आया कि आचानक दिल की धड़कन बंद होने से मौत हो गई.

लेकिन रमेश जानता है कि माँ की मौत यहाँ रहने के कारण हुई अगर माँ हिमाचल होती तो आज जीवित होती. हम माँ को कोविड से बचाने में लगे रहे पर माँ खुद को बाचने के लिए मुझ से हिमाचल जाने की गुहार लगाती रही.

@---प्रेमा---@