Kya karan apne ghar ko bachayega. books and stories free download online pdf in Hindi

क्या करण अपने घर को बचाएगा

लगभग दो वर्ष बीत चुके थे रूपा और करण को एक दूसरे की ज़िंदगी में आए हुए, दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते थे। करण रूपा की हर ख़्वाहिश पूरी करता, फ़िल्म देखना, मॉल में जाना और बाइक पर लॉन्ग ड्राइव पर जाना रूपा को बहुत पसंद था। वक़्त आगे बढ़ता ही जा रहा था, अब रूपा करण को विवाह करने के लिए कहने लगी। जब भी करण कोई उपहार लाता, रूपा कहती अब तो मुझे सिर्फ़ एक ही उपहार चाहिए करण और वह है मंगल सूत्र। क्या तुम्हें नहीं लगता कि अब हमें विवाह कर लेना चाहिए? आखिरकार करण ने अपने माता-पिता को रूपा के विषय में बता दिया। रूपा ने भी अपने परिवार में करण के विषय में बता दिया, दोनों ही परिवार बच्चों की ख़ुशी में ख़ुश थे।

इस तरह बड़ों के आशीर्वाद के साथ करण और रूपा हमेशा के लिए एक हो गए। विवाह के सात फेरे होते से ही रूपा प्रेमिका से पत्नी बन गई और करण प्रेमी से पति। करण का परिवार पुरुष प्रधान परिवार था, जहाँ हमेशा उसके पिता की ही चलती थी। करण की माँ को हर बात में पति की हाँ में हाँ ही मिलाना होता था। कर्त्तव्य सारे थे किंतु अधिकारों का हिस्सा खाली था। अधिकारों से वंचित करण की माँ वर्षों से केवल अपने कर्त्तव्य ही तो निभा रही थी।

बचपन से परिवार में जो माहौल था करण भी उसी रंग में रंगा हुआ था। विवाह होते से ही करण में भी अपने पिता का प्रतिबिंब नज़र आने लगा। वह रूपा के साथ बिल्कुल वैसा ही व्यवहार करने लगा जैसा उसके पिता उसकी माँ के साथ करते थे।

धीरे-धीरे रूपा ने घर की सारी जिम्मेदारियाँ उठाना शुरू कर दीं। रूपा का पूरा दिन काम में ही व्यतीत हो जाता था। शाम को करण के आने के बाद रूपा जब कभी भी करण से बाइक पर थोड़ा घूम कर आने के लिए कहती, करण अधिकतर उसे मना कर देता था। सुबह से शाम तक थकी हुई रूपा करण के मुंह से इस तरह ना सुन कर दुःखी हो जाती थी। रूपा चाहे कितनी भी व्यस्त हो, वह सभी का काम ख़ुशी से करती रहती थी। धीरे-धीरे करण का पुरुष प्रधान स्वभाव रूपा के सामने आने लगा।

मटके के पास खड़े होकर भी रूपा को दूसरे कमरे से बुलाकर पानी माँगना, करण की आदतों में शामिल था। हर छोटा बड़ा काम रूपा से करवाना करण अपना हक़ समझता था। करण में आए हुए इस परिवर्तन को रूपा प्रति दिन महसूस कर रही थी।

एक दिन रूपा ने करण से कहा, "करण कितने दिन हो गए हम कोई फ़िल्म देखने नहीं गए, चलो ना आज बाहर खाना खाएँगे और फ़िल्म देखकर वापस आएँगे। मैं पापा मम्मी के लिए खाना बना कर रख दूँगी ताकि उन्हें परेशानी ना हो।"

"नहीं-नहीं रूपा आज फ़िल्म देखने नहीं जाना है, फिर किसी दिन चलेंगे। आज तुम घर में ही कुछ बढ़िया से व्यंजन बनाओ, बाहर जाने का बिल्कुल मूड नहीं है।"

रूपा हैरान होकर करण की ओर देखने लगी किंतु मौन रही। कुछ देर चुप रहने के उपरांत उसने कहा, "अच्छा ठीक है, आज मैं तुम्हें तुम्हारी पसंद का खाना खिलाऊँगी, लेकिन करण बहुत दिन हो गए मैं कुछ दिनों के लिए अपने पापा मम्मी के पास जाना चाहती हूँ"

"अरे नहीं रूपा यहाँ घर कौन संभालेगा? माँ से अब इतना काम नहीं होता, फिर कभी चली जाना।"

वक़्त गुजरता रहा लेकिन वह दिन कभी नहीं आया, जब करण अपने मुँह से यह कह देता, चलो फ़िल्म देखने चलते हैं या अपने पापा मम्मी से मिल आओ। देखते-देखते छः महीने बीत गए, रूपा को अपने घर जाने की बेचैनी होने लगी।

तभी उसकी मम्मी का कॉल आया, "रूपा बेटा बहुत दिन हो गए, हम आज ही तुझे लेने आ रहे हैं। एक ही शहर में रहकर भी हम मिल ही नहीं पाएँगे ऐसा तो नहीं सोचा था।"

रूपा ने बात को संभालते हुए कहा, "हाँ-हाँ मम्मी आ जाओ आप लोग, करण मुझे लेकर आने वाले थे पर ऑफिस से आने में आजकल रोज़ ही देर हो जाती है।"

उसी दिन रूपा के पापा मम्मी शाम को रूपा को लेने आ गये। करण के माता-पिता ने उनका अच्छे से स्वागत किया। शाम को करण ऑफिस से आया तो उन्हें देखकर थोड़ा हैरान हो गया।

"अरे पापा मम्मी आप लोग अचानक! कैसे हैं आप लोग?"

"हम ठीक हैं बेटा, बहुत समय हो गया रूपा से नहीं मिले, इसलिए सोचा चलो सब से मुलाकात हो जाएगी और कुछ दिनों के लिए रूपा को भी ले जाएँगे।"

"अरे पापा, रूपा तो आपकी ही बेटी है, जब मन चाहे आकर आप उससे मिल सकते हैं, लेकिन यदि आप उसे लेकर जाएँगे तो यहाँ बहुत मुश्किल हो जाएगी।"

करण के इन शब्दों को सुनकर रूपा के मम्मी पापा अवाक रह गए। रूपा का क्रोध आज पहली बार उसके चेहरे पर अपनी हाज़िरी दे रहा था। रूपा का चेहरा क्रोध से लाल हो गया, किंतु इस वक़्त उसने चुप रहना ही ठीक समझा। अपने मम्मी पापा को उसने इशारा करते हुए सांत्वना दी, मानो कह रही हो ऐसे ही बोल रहे हैं।

रूपा और करण दोनों के माता-पिता बैठकर बातें कर रहे थे, तभी करण अंदर अपने कमरे में चला गया उसके साथ ही रूपा भी कमरे में चली गई।

कमरे में पहुँचते ही रूपा ने कहा, "करण पिछले कई महीनों से मैं तुम्हारी सब की इतनी सेवा कर रही हूँ, दिन रात एक कर देती हूँ। लेकिन तुम लोगों को शायद एहसास ही नहीं कि मैं भी इस घर की सदस्य हूँ, तुमने तो मुझे गुलाम बनाकर ही रख दिया है।"

यह सुनते ही करण का हाथ आज पहली बार रूपा की तरफ़ उठा लेकिन रूपा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, "करण ऐसा सोचना भी मत, तुम एक बहुत अच्छे प्रेमी थे लेकिन तुम एक अच्छे पति ना बन पाए। अग्नि के सात फेरों के तुरंत बाद ही तुम्हारा पति होने का किरदार तुम पर हावी हो गया। क्या प्रेमिका और पत्नी में इतना अंतर होता है करण? मैं इतने दिनों से सोच रही थी कि शायद मेरे प्यार से तुम एक दिन अवश्य ही बदल जाओगे लेकिन मैं तुम्हें नहीं बदल पाई, मुझे ही बदलना पड़ रहा है।"

रूपा ने आगे कहा, "तुम से विवाह करके मैं हमारा घर ख़ुशियों से भरने आई थी लेकिन तुमने तो मुझे बंधक ही बना लिया। मेरी झोली में तुमने सिर्फ़ कर्तव्य ही डाले, अधिकारों से वंचित कर दिया। मैं तो अब भी शायद चुप रहती लेकिन आज मेरे पापा मम्मी को यह एहसास दिला कर कि वह एक बेटी के पिता हैं इसलिए उन्हें तुम से अनुमति लेनी होगी, अपनी बेटी को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाने के लिए, तुमने मुझे मजबूर कर दिया करण।"

करण कुछ बोलना चाह रहा था पर उसे इशारे से रोकते हुए रूपा ने कहा, "मैं सीता माँ की तरह महान नहीं जो बिना ग़लती के सब ज़ुल्म सहन कर लूँ। मैं आज की नारी हूँ, यदि कर्तव्य निभाना जानती हूँ तो अपने अधिकारों की रक्षा और अपने माता-पिता के सम्मान को बचाना भी जानती हूँ। मैं टूटना नहीं चाहती करण और ना ही अपने परिवार को तोड़ना चाहती हूँ, लेकिन अब हमारे पास दो ही रास्ते हैं।"

"कौन से दो रास्ते रूपा?”, करण ने कहा।

"मुझे वह सारे अधिकार चाहिए करण जो एक पत्नी के होते हैं। मुझे सब का प्यार और अपना मान भी चाहिए। मुझे परिवार में बेटी का स्थान चाहिए, क्या यह सब मुझे मिल सकता है?"

आज करण स्तब्ध था, रूपा का ऐसा ओजस्वी रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था। करण कुछ बोले उससे पहले ही रूपा ने दूसरे रास्ते का भी ज़िक्र कर दिया।

"यदि तुम्हें यह मंज़ूर नहीं तो मैं यह परिवार को छोड़कर चली जाऊँगी। मैं अपनी पूरी ज़िंदगी घुट-घुट कर बंधक बन कर नहीं निकाल सकती करण।"

इतना कहकर रूपा सोचने लगी कि अब करण को दो रास्तों में से किसी एक रास्ते को चुनना है। क्या करण अपने परिवार को बचाएगा या पति होने के घमंडी एहसास के कारण अपने परिवार को मिटाएगा। मर्द होकर अपनी गलती को स्वीकार करना इतना आसान नहीं होता लेकिन साथ ही रूपा यह भी सोचने लगी कि हर इंसान के लिए उसके परिवार से बड़ा और कुछ भी नहीं होता।

रूपा के मुँह से कड़वा सच सुनकर करण कुछ भी नहीं कह पाया। शायद उसके पास कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं बची थी।

तभी रूपा ने करण को वह दिन याद दिलाये जब वह प्रेमी प्रेमिका थे, "याद करो करण हमें आपस में कोई शिकायत नहीं थी प्यार ही प्यार तो था तो अब क्या बदल गया है, हम क्यों पहले की तरह नहीं रह सकते। अग्नि के समक्ष लिए हुए सात फेरों में बहुत ताकत, बहुत विश्वास, बहुत सारा प्यार और बहुत सारा कर्तव्य छुपा होता है और सबसे महत्त्वपूर्ण एक दूसरे के प्रति मान-सम्मान छुपा होता है, जिसे शायद तुम भूल गए करण।"

आज रूपा ने करण को सच का आईना दिखा कर उसे सोचने को मजबूर कर दिया। रूपा की बातें सुनकर करण की आँखें खुल गईं, अपने अंदर आए इस परिवर्तन को शायद वह महसूस ही नहीं कर पाया लेकिन आज वह बहुत शर्मिंदा था। उसे अपनी ग़लतियों का एहसास हो रहा था। अब बिना देर लगाए ही करण रूपा के मम्मी पापा के पास जाकर बैठ गया और बोला, "पापा आप आज यहाँ पर ही रुक जाइए, कल रूपा को भी कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाना। रूपा बहुत ख़ुश हो जाएगी और आप लोगों को भी अच्छा लगेगा।"

रूपा ने करण का यह रूप देखा तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। वह जानती थी कि उसके परिवार की ख़ुशियों को बरकरार रखने के लिए करण में परिवर्तन लाना बहुत ज़रूरी था।

आज रूपा सोच रही थी कि शायद इसमें करण की ग़लती इतनी ज़्यादा नहीं थी। हमारे समाज ने यह प्रथाएँ बना रखी हैं कि बस पति ही सब कुछ है पत्नी उसके लिए एक झुनझुना मात्र है, जो हमेशा पति की मुट्ठी में ही रहता है। ग़लती तो हम जैसी स्त्रियों की भी है, जिन्होंने कभी भी अपने अस्तित्व को पहचाना ही नहीं। कर्त्तव्य तो निभाए किंतु अपने मान सम्मान और अधिकारों की हमेशा ही आहुति देती रहीं।

इतने में तभी करण ने आकर रूपा को अपनी बाँहों में भर लिया और कहने लगा, "मुझे माफ़ कर दो, मैं बहक गया था। शायद इस पुरुष प्रधान समाज में रहकर अनजाने में ही मानसिकता इतनी सिमट गई थी। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि तुम्हें अब इस परिवार में मान-सम्मान, प्यार सब मिलेगा और हाँ बेटी का स्थान भी ज़रूर मिलेगा। अब कभी तुम अपने अधिकारों से वंचित नहीं रहोगी। मैं एक अच्छा प्रेमी था, तुमने ही कहा था, अब मैं उससे भी अच्छा पति बनकर दिखाऊँगा।"

अब रूपा बहुत ही ख़ुश थी उसके पास भी इस उलझन के समय केवल दो ही रास्ते थे। एक तो यह कि वह पूरा जीवन घुट-घुट कर जिये और दूसरा पूरी शक्ति लगाकर अपने अधिकारों की रक्षा करे। रूपा ने दूसरा रास्ता अपनाया। इस तरह पूरे परिवार को ख़ुश रखने के कर्तव्य निभाते हुए, ख़ुद भी ख़ुश रहने का रास्ता खोज निकाला इसलिए उसका जीवन सफल हो सका। अतः हर नारी को अपने अंदर एक रूपा को जन्म अवश्य ही देना चाहिए।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक