Veer Savarkar - 5 in Hindi Biography by Veer Savarkar books and stories PDF | वीर सावरकर - 5 - इंगलैण्डआन्दोलन

Featured Books
Share

वीर सावरकर - 5 - इंगलैण्डआन्दोलन

श्री सावरकर जी श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा की छात्रवृत्ति द्वारा
उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये बम्बई से 9 जून सन् 1906 को चलकर 2-3 जुलाई को इंगलैण्ड पहुॅचे। जहाज पर भी सावरकर जी ने अपना कार्य जारी रखा। इंगलैण्ड जाने वाले भारतीय यात्रियों से देश तथा धर्म के विषय में वाद-विवाद करना उनका स्वभाव था। जहाज में आपकी एक बंगाली युवक रमेशदत्त तथा एक पंजाबी युवक हरनामसिंह से विशेष भेंट हुई। हरनामसिंह इंगलैण्ड पहुँचने भी न पाया था कि रास्ते से ही उसका विचार वापिस भारतवर्ष लौटने का हो गया। परन्तु
सावरकर जी ने उससे आग्रह किया और अपना उद्देश्य समझाया कि वहां हम भारत की स्वतन्त्रता के लिये उद्योग करेंगे तो वह भी इंगलैण्ड चलने पर उद्यत हो गया और वहां पहुँचकर हरनामसिंह ने सावरकर जी के कार्यों में बहुत सहायता दी।
सावरकर जी ने जहाज में ही महाराणी पद्मिनी के सतीत्व पर एक ओजस्वी कविता लिखी, जिसका यात्रियों पर बहुत प्रभाव पड़ा। इंगलैण्ड पहुँचने पर पं० श्याम जी कृष्ण वर्मा ने
सावरकर जी का शानदार स्वागत किया और उनको बड़े प्रेम से
अपने ‘इण्डिया हाउस’ में ले गये। यहीं सावरकर जी के रहने का प्रबन्ध था। पं० श्यामजी कृष्ण वर्मा उन दिनों इंगलैण्ड में
‘होमरूल’ का आन्दोलन बड़े जोरों से कर रहे थे और अपने विचारों के प्रचार के लिये वे अपना एक पत्र ‘इण्डियन सोशलिजिस्ट’ भी प्रकाशित करते थे ।
सावरकर जी अपने यूनिवर्सिटी के समय से अतिरिक्त
समय में राजनीति आदि विषयों के ग्रन्थ पढ़ा करते और
आयरलैण्ड, फ्रांस, इटली और चीन आदि की राजनीति पर मनन किया करते थे। जब सावरकर जी इंगलैण्ड पहुॅचे तब उसी वर्ष पार्लियामेण्ट में भारत के बजट का विषय प्रस्तुत था, उसका भी सावरकर जी पर बहुत प्रभाव पड़ा। सावरकर जी ने
सन् 1906 में एक पुस्तक ‘सिखों का इतिहास’ लिखी, जो उन्होने अपने दो वर्ष की आयु वाले पुत्र प्रभाकर को समर्पित की। इटली के निर्माता श्री मेजिनी का जीवन चरित्र भी सावरकर जी ने इंगलैण्ड में लिखा, किन्तु वह मरहठी मे था, इसलिये नासिक में छपा । इस पुस्तक का इतना मान था कि यह वेद की तरह पूजी जाती थी। सावरकर जी ने इनके अतिरिक्त
एक और पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था ‘1857 की कहानी’ । यह महान् आश्चर्य की बात है कि पुस्तक का छपना तो अलग, वह अभी पूरी लिखी भी नहीं गई थी कि, सरकार ने यह समझ कर कि मेजिनी के जीवन चरित्र की तरह यह भी आग लगाने वाली ही होगी, उसे पहले ही जब्त कर लिया। निदान वह पुस्तक युरोप के किसी अन्य देश में छपी और वहीं से बह इधर-उधर प्रचलित हुई। उसकी कुछ प्रतियां भारत में भी पहुँच गई थी । पुस्तक की जिल्द पर युरोप के प्रसिद्ध लेखकों की प्रसिद्ध
पुस्तकों का नाम लिख दिया गया था – किसी पर कुछ और किसी पर कुछ। और वह मित्रों को भेट स्वरूप दी गई और इस प्रकार भारत पहुॅचीं। उस पुस्तक की इतनी मांग थी कि
अमेरिका में उसकी एक प्रति 130) रुपये में बिकी थी।
पहले तो सावरकर जी 'होमरूल' आन्दोलन में ही कार्यं करते रहे किन्तु एक वर्ष के बाद हीं राजनैतिक क्षेत्र में इतने परिवर्त्तन हुए कि 'होमरूल का आन्दोलन व्यर्थं प्रतीत होने लगा और सावरकर जी ने अपनी एक संस्था 'फ्री इण्डिया सोसाइटी' स्थापित कर दी। इसमें सभी भारतीय भाग ले सकते थे। 'फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना 1906 में हुई और उसकी
स्थापना में जिन्होंने मुख्य सहयोग दिया उनमें से श्री हरनामसिंह, खान, जायसवाल, सेन, मदनलाल धींगरा, कोरगांवकर, मणिलाल,
श्री हरदयाल, भाई परमानन्द, बावा जोशी, बापट और महेश चरण सिन्हा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। सप्ताह में एक दिन इस सोसायटी की पब्लिक मीटिंग हुआ करती थी । सावरकर जी उस सभा में इटली, फ्रान्स तथा अमेरिका के इतिहास तथा
संसार की क्रान्तियों के विषय में बड़ी प्रभावशाली वक्तृता दिया
करते थे। इस संस्था के द्वारा ही लोगों के विचारों का पता लगाकर श्री सावरकर जी अपनी पुरानी 'अभिनव भारत' संस्था में पक्के देशभक्तों को भरती किया करते थे। इसी प्रकार बहुत ही शीघ्र कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, मैनचेस्टर तथा अन्य स्थानों के
भारतीय विद्यार्थियों में क्रान्ति की भावना प्रबल रूप में जागृत हो गई ।
'अभिनव भारत' का इंगलैण्ड में क्या कार्य था यह आपको अगली पंक्तियों से विदित हो जायेगा। सावरकर जी के विचारों ओर 'अभिनव भारत' की प्रगति से प्रभावित होकर श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपने पत्र 'इंडियन सोशलिजिस्ट' में लिखा कि मैं भी अब क्रान्तिकारी हो गया हूँ। आपने रूस की क्रान्ति की सारी कथा लिखकर यह लिखा कि भारत को भीीस्वराज्य इसी प्रकार प्राप्त हो सकता है। यह घोषित करके आप
इंगलैण्ड छोड़कर फ्रांस चले गये। उन्होंने अपना होमरूल का
कार्य बन्द कर दिया और 'इण्डिया हाउस' का सारा कार्य सावरकर जी के सुपुर्द कर दिया । इंग्लिश पत्रों ने लिखा कि सावरकर जी पं० श्यामजी कृष्ण वर्मा के लेफ्टिनेण्ट हो गये हैं। किन्तु
लेफ्टिनेण्ट कैसे ? पं० श्यामजी ही सावरकर जी के विचारों से
प्रभावित हुए थे। सावरकर जी और पं० श्यामजी ने मिलकर जो कार्यं किये उन सबका उल्लेख करना असम्भव है। प्रसिद्ध देशभक्त श्री ला० हरदयाल जी इंगलैण्ड में आई० सी० एस० की शिक्षा प्राप्त करने के लिये आये थे, किन्तु वे भी सावरकर जी के विचारों से प्रभावित होकर 'अभिनव भारत में सम्मिलित
हो गये । परिणाम यह हुआ कि उनको गवर्नमेण्ट और यूनिवर्सिटी से मिलने वाली छात्रवृत्ति बन्द हो गई और उन पर भारत न जाने का प्रतिबन्ध लग गया, इस प्रकार वे भारत से निर्वासित कर दिये गये । श्रीमती सरोजनी नायडू के भाई श्री चट्टोपाध्याय
तथा मिस्टर बी० एस० अय्यर जैसे सुप्रसिद्ध विद्वानों और योग्य व्यक्तियों ने भी अपना सब कुछ त्याग कर सावरकर जी के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर 'अभिनव भारत' में कार्यं किया। फलस्वरूप इस संस्था की शक्ति भारतीय राजनैतिक क्षेत्र
में इतनी बढ़ गई कि ब्रिटिश सरकार को अपनी बहुत-सी शक्ति पर्याप्त काल तक इस संस्था को दबाने में व्यय करनी पड़ी।
'अभिनव भारत' ने बम और बन्दूक आदि का काम सीखने के लिये एक मद्रासी, एक बंगाली और एक मरहठा तीन युवक
रूस भेजे। वे अपनी पढ़ाई-लिखाई सारा कुछ छोड़कर रूस जाने लगे । उन्हें फ्रांस में एक रूसी युवक मिल गया, उसी से उन्होंने
बम आदि बनाना सब कुछ सीख लिया। उसने ही एक पुस्तक भी इन्हें इस विषय की दी थी । 'अभिनव भारत' ने उस पुस्तक को छपवाकर अपने सब सदस्यों को बांटा, जिससे सबने यह काम आसानी से सीख लिया। 'अभिनव भारत' के सदस्य फ्रांस में भी थे । लन्दन और फ्रांस के सब सदस्यों को इसी पुस्तक के द्वारा बम का काम सिखाया गया था। सावरकर जी ने स्वयं भी यह सब काम सीखा और दूसरों को भी सिखाया। सावरकर जी ने आयरलैण्ड की पार्टी सेनफेन से भी अपना सम्बन्ध जोड़ना
प्रारम्भ कर दिया और धीरे-धीरे चीन, मिस्र, आयरलैण्ड और भारत आदि सभी इंगलैण्ड विरोधी देशों से सम्पर्क बढ़ाने लगे। इंगलैण्ड के भारतीय युवकों में इस समय इतना जोश आ
गया था कि वे चौबीस घण्टे स्वदेश के विषय में ही सोचा करते थे। इस प्रकार इंगलैण्ड की राजनैतिक परिस्थिति दिन प्रतिदिन गर्मं होती गई। और भारतीय सरकार भी बेचैन होने लगी । सावरकर जी और उनकी पार्टी के विषय में इंगलैण्ड के
समाचारपत्रों में आन्दोलन आरम्भ हुआ। पत्र के प्रतिनिधियों का तांता सावरकर जी के पास लगा रहता था। भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्न पूछे जाते और समाचार पत्रों के पृष्ठ उनसे रंगे जाते थे। इस सम्बन्ध में एक मनोरंजक घटना का उल्लेख कर देना भी आवश्यक है । एक प्रसिद्ध पत्र का प्रतिनिधि एक बार सावरकर जी से मिलने आया। जब उसने उनकी नौकरानी से
पूछा कि मि० सावरकर कहां है ? तो उसने, जहां सावरकर जी अपने कार्य में व्यस्त थे वहां अन्दर ले जाकर कहा कि मि० सावरकर ये हैं। प्रतिनिधि को नौकरानी पर बहुत क्रोध आया और बोला कि तुम मुझसे मजाक करती हो ! मुझे एक खूबसूरत
सा छोटा सा लड़का दिखाकर कहती हो कि मि० सावरकर ये हैं। क्या प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सावरकर ये हैं ? सावरकर जी प्रतिनिधि को शान्त करते हुए बोले– मिस्टर, शान्त रहिये, क्रोध न कीजिये, सावरकर मैं ही हूँ । प्रतिनिधि को इस पर बहुत
आश्चर्य हुआ सिंह का छोटा बच्चा भी मस्त हाथी पर
आक्रमण कर ही देता है। तेजस्वी पुरुष आयु के आश्रित नही रहा करते। सावरकर जी के लेख इंगलैण्ड, अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और स्पेन के प्रमुख पत्रों में प्रकाशित होते रहते थे। और भारत के भी कलकत्ता के युगान्तर और बम्बई के बिहारी
पत्रों में उनके लेख छपते थे। उनसे ही अन्य समाचारपत्र भी ले लेते थे। सारे संसार की आंखे सावरकर तथा 'अभिनव भारत' के सदस्य नवयुवको की ओर खिंच गई। 'अभिनव-भारत' की शाखायें फ्रान्स, जर्मनी आदि देशों में कार्य कर रही थीं। यूरोप में इनके कई समाचारपत्र भी निकलते थे । साबरकर
जी की लिखी हुई विभिन्न भाषाओ की पुस्तिकायें समय-समय
पर भारत भी आया करती थी, जिससे भारतीयों में भी बह अग्नि भभक उठी कि ब्रिटिश सरकार सहम गई।
सावरकर जी एक बार लण्डन के घण्टाघर में शिवाजी महाराज के ‘बाघनख' को देखने गये। वहां उन्हें शिवाजी के 'बाघनख' तो न दिखाई दिये किन्तु किसी और के ही दीख पड़े। हां, टीपू सुलतान की एक तलवार उन्होंने वहां अवश्य देखी। उस तलवार को देखकर सावरकर जी का खून खौल पड़ा और उनके हृदय में वही भावनायें लहर मारने लगीं जिन भावनाओं से प्रेरित होकर टीपू सुलतान ने एक अंग्रेज को अपनी इस तलवार के हाथ दिखाये थे। सावरकर जी ने अपने एक भारतीय मित्र को एक पत्र में लिखा कि अच्छा ही हुआ कि घण्टाघर में शिवाजी का बाघनख नहीं दीखा। क्योंकि जब टीपू सुलतान की तलवार देखकर ही मेरा खून खौलने लग गया तो यदि छत्रपति शिवाजी महाराज का बाघनख मैं देख लेता तो उसे देखकर तो न जाने मेरी क्या अवस्था हो जाती !
एक बार बड़ौदा के महाराजा श्रीमन्त सयाजीराव महाराज गायकवाड़ इंगलैण्ड गये। सावरकर जी और उनकी पार्टी के युवकों का एक शिष्टमण्डल उनसे मिला और उन्हें बहा कि जैसा राज्य आजकल भारत मे चल रहा है, ऐसे राज्य की आवश्यकता नहीं। उन्होंने अपनी सब योजना बताकर उनसे कहा कि आप भारत में इसकी तैयारी करें और हम भी भारत आकर इसमें
'आपका पूर्ण सहयोग देंगे। सन 1908 में नेपाल के महाराजा चन्द्र शमशेरजंग बहादुर राणा इंगलैंण्ड गये। उनके भवन पर नेपाल के स्वतन्त्र राज्य की ध्वजा फहराया करती थी। उसे देखकर सावरकर जी और उनके साथी फूले न समाते । सावरकर जी और उनके साथियो ने एक पत्र नैपाल के महाराजा के पास अपने विचारों और भारत की स्वतन्त्रता के विषय मे भेजा और
उनसे सहायता चाही । उस पत्र पर सबने अपने खून से हस्ताक्षर किये थे, जिनमे सबसे प्रथम मदनलाल धींगरा का नाम था। नेपाल के महाराजा ने उस पत्रका केवल यही उत्तर दिया कि जो परमात्मा की इच्छा होगी, वही होगा।
सन् 1857 के गदर का नाम सावरकर जी ने 'स्वातन्त्र्य-युद्ध' रखा था। इस स्वातन्त्र्य युद्ध की स्मृति में 'अभिनव भारत' ने बैज बनवाये। उन पर '1857 के शहीदों की जय' ये शब्द अंकित करवाये गये । इनकी पार्टी के सब सदस्य और भारतीय
विद्यार्थी उन बैजों को लगाकर यूनिवर्सिटी जाते तो प्रोफेसर और अंग्रेज उन पर क्रुद्ध होते कि ये वैज तुमने क्यों लगाये
है ? प्रोफ़ेसर यह भी कहते कि वे शहीद नहीं थे, वे तो डाकू थे । इस पर विद्यार्थी बिगड़ जाते और प्रोफेसरों से कहते कि आपने हमारे वीरों का अपमान किया है इसलिये हमसे क्षमा मांगो। प्रोफेसर क्षमा क्या मांगते । फलस्वरूप भारतीय विद्यार्थी यूनिवर्सिटीज़ से विरोध स्वरूप निकल गये । इंगलैण्ड में सनसनी फैल गई कि एकदम यह नई क्या बात हो गई कि सब भारतीय विद्यार्थी चले गये । सन् 1857 के उपलक्ष्य में 'अभिनव भारत' की ओर से सन् 1907 मे स्थान-स्थान पर जलसे किये जाते
थे | कभी नानासाहिब के नाम से, कभी झांसी की रानी के नाम से, कभी सरदार कुमारसिंह और कभी तात्या टोपे के नाम से जलसे होते थे और सन् 1857 में अपने देश के लिये बलिदान
हुए हुतात्माओं का इस प्रकार स्मरण करके उनको श्रद्धांजलियां भेंट की जाती थीं। तात्या टोपे के नाम से जलसा करने में सबको भय प्रतीत होता था किन्तु सावरकर जी ही एक सबसे अधिक निर्भय थे । उन्होंने कहा कि हम क्यों न इनके नाम से भी जलसा करें ? उन्होंने उनके नाम से भी जलसा किया।
सन् 1907 में 10 मई के दिन स्वातन्त्र्य दिवस मनाया गया और उसमें छत्रपति शिवाजी महाराज के उपलक्ष्य में सभा हुई। इससे अगले ही दिन 11 मई को 'अभिनव भारत' की एक बैठक हुई और उसमें निश्चय किया गया कि श्री बापट को बम आदि का सब काम सीखने के लिये फ्रांस भेजा जाय । फ्रांस में हेमचन्द्रदास और मिर्जा अब्बास पे रस मे रहते ही थे। बापट वहा गये और अपना कार्य किया । इण्टरनेशनल कान्फ्रेन्स में फ्रांस, भारत के प्रतिनिधि श्री राणाजी और श्री मैडम कामाबाई सम्मिलित हुए थे। मैडम कामाबाई ने वहां भारत की स्वतन्त्रता का विचार उपस्थित किया और भारत का राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शित किया। सावरकर जी आदि उनसे भी मिले थे ।
एक बार सावरकर जी ने सन् १८५७ का अभिनय 'इण्डिया हाउस' में किया। इण्डिया हाउस १८५७ के शहीदों के चित्रों से
बहुत अच्छे प्रकार से सुशोभित किया गया था। उस अभिनय के सभापति श्री राणा जी बनाये गये थे।
'अभिनव भारत' की ओर से एक बार इंगलैण्ड मे विजया-਼दशमी महोत्सव मनाया गया। समस्या यह थी कि इसका सभा-पति किसे बनाया जाय। जिससे भी सभापति बनने के लिये कहा जाता बही मना कर देता। सबको यही भय था कि इनकी सभी सभाओ मे क्रान्तिकारी व्याख्यान होते है। अन्ततोगत्वा
सावरकर जी गांधी जी के पास गये और इनसे सभापति बनने के लिये अनुरोध किया। गांधी जी ने कहा कि यदि सभा मे क्रान्तिकारी व्याख्यान न हों तो मै सभापति बन सकता हूँ । सावरकर जी ने उनकी बात मान ली और विजयादशमी महोत्सव गांधी जी के सभापतित्व में हुआ । इस उत्सव मे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन और रामायण के महत्व आदि विषयों पर व्याख्यान दिये गये ।
इस प्रकार 'अभिनव भारत' का समस्त देशों पर ऐसा
प्रभाव पड़ा कि दूसरे देशों की रुचि भी भारत की स्वतन्त्रता के लिये उत्पन्न हो गई । जर्मनी के बादशाह कैसर ने, अमेरिका के प्रेसिडेंट विल्सन को पत्र लिखा और कहा कि संसार की शान्ति तब तक सर्वथा असम्भव है, जब तक भारतवर्षं को स्वतन्त्रता नहीं दे दी जाती। 'अभिनव भारत' के दो भाग थे। एक बहिरंग मण्डल और दूसरा अन्तरंग मण्डल । बहिरंग मण्डल का काम तो सभा उत्सब आदि करना तथा आन्दोलन करना था और अन्तरंग मण्डल का कार्य बम आदि की शिक्षा प्राप्त करना था।
'लण्डन टाइम्स' आदि पत्रो मे कई बार एम० ए० कैण्टन आदि के लेख सावरकर जी और 'अभिनव भारत' के विरुद्ध निकला करते थे, किन्तु उस समय उनकी कौन सुनता था। सावरकर जी अपनी योग्यता, देशभक्ति और गुणों के कारण उस समय सबके
हृदयों में अपना स्थान कर चुके थे।