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उजाले की ओर –संस्मरण

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स्नेही मित्रो

सस्नेह नमस्कार

एक नवीन दिवस का आरंभ, एक नवीन चिंतन का उदय हमें परमपिता को प्रत्येक पल धन्यवाद अर्पित करने का अवसर प्रदान करता है। हम करते भी हैं,कितना कुछ प्रदान किया है उसने जिसने ज़िन्दगी जैसी अनमोल यात्रा का अनुभव कराया है। लेकिन हम कहीं न कहीं चूक जाते हैं, हम अपने वर्तमान में रहकर भी वर्तमान में नहीं रह पाते। हम वर्तमान में रहकर भी न जाने कहाँ कहाँ भटकते रहते हैं। यह मस्तिष्क का स्वभाव है, वह कभी शांत तथा स्थिर नहीं रह पाता। जीवन में कितनी भी आपा-धापी क्यों न चल रही हो अथवा कितनी भी जटिलता क्यों न हो अथवा कितना ही सब-कुछ क्यों न मिल गया हो मस्तिष्क अपनी परिस्थिति व परिवेश से हटकर न जाने कितनी भिन्न सोचों में डूबा रहता है।

मुझे लगता है जैसे - जैसे हम अधिकाधिक संसाधनों को प्राप्त करते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारी भूख बढ़ती जा रही है। हम अतृप्त रहते हैं जिससे हम अधिक असहज हो जाते हैं और वर्तमान का सुख भी पूर्णतया नहीं भोग पाते।

मैं सामने वाले उस आदिवासी परिवार की ओर कई दिनों से देख रही हूँ जो भीषण गर्मी में सड़क की खुदाई का काम कर रहा है,जिनका नन्हा शिशु एक वृक्ष की टहनी पर फटे हुए कपड़े के बनाए गए झूले में झूलता रहता है। एक तीनेक वर्ष का बच्चा उस झूले को झुलाता रहता है, कभी-कभी तपती सड़क पर लोट-पोट होकर अपने लिए सामने वाली लारी पर से बर्फ़ का गोला या कुछ और खाने की चीज़ लेने की ज़िद करता भी नज़र आता है। कभी उसे माँ की घुड़की मिलती है तो कभी पिता का थप्पड़!

लू के थपेड़ों को खाते हुए यह परिवार निरंतर अपने कार्य में लीन है। इस प्रकार के कई परिवार सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त हैं। मेरे घर के बाहर से यह दृश्य मुझे हर समय दिखाई देता है। प्रतिदिन दिन में कई बार उन कार्यरत लोगों में से कोई न कोई ठंडा पानी लेने आता है,मैं कोशिश करती हूँ कि उन्हें कुछ खाद्य-पदार्थ दे सकूंँ। केवल प्याज़ के अतिरिक्त वे रोटी किसी और चीज़ से भी खा सकें शायद उनका स्वाद भी कुछ बदल जाए। कभी अचार या कोई बची हुई सब्ज़ी देकर मानो मैं बहुत बड़ा उपकार कर देती हूँ। कभी माँ का आँचल पकड़े हुए बच्चे को केला अथवा बिस्किट भी दे देती हूँ। ठंडा पानी पीकर एक तृप्ति का अहसास मैंने उनके मुखों पर कई बार देखा है।

हमें इस प्रकार के अनुभव न जाने जीवन में कितनी बार होते ही रहते हैं। फिर भी हम अपने पास जो है उससे संतुष्टि नहीं रह पाते। पूजा-अर्चना करते हुए भी मेरे बंद नेत्रों के समक्ष न जाने कितने ऐसे लोग गुज़रते रहते हैं और मुझे लगता है कि मैं तो उस प्रभु का ठीक से धन्यवाद अर्पण भी नहीं कर पाती जिसने मुझे इतना कुछ दिया है।

हम अपने लिए और अपने आपमें इतने व्यस्त रहते हैं कि दूसरों की मजबूरी समझने की चेष्टा भी नहीं कर पाते। यदि हम उनके स्थान पर स्वयं को खड़ा करके देखें तो पाएँगे कि हम कितना सुख लेकर इस दुनिया में आए हैं। मैंने उन कार्यरत मजदूरों की निश्छल हँसी को देखा है, महसूस किया है और पाया है कि उनकी वह निश्छल हँसी ईश्वर का उनके लिए वह वरदान है जिससे वे अपने प्रभु का धन्यवाद प्रदान करते हैं। मेरे मन में प्रश्न उपजता है ‘मैं इतनी निश्छल हँसी क्यों नहीं हँस पाती ?अधिकांश हम सब या मैं क्यों दुविधा में रहती हूँ ?’

ईश्वर हमसे क्या चाहता है ? केवल हमारे चेहरों पर एक मुस्कान !एक संतुष्टि का भाव !एक संतुष्टि भरा ह्रदय !

ईश्वर की सौगात सब,जान सके तो जान

हर प्राणी में ‘वो’ बसे, मान सके तो मान

आवश्यक है एक संवेदना हम सबके भीतर हो और हमारे पास जो कुछ भी हो उसके लिए हम अपने पालनहार का प्रतिपल धन्यवाद अर्पित करते रहें।

 

आप सबकी मित्र

डॉ.प्रणव भारती