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मेरी दादी और जमीला

क़ाज़ी वाजिद की कहानी- प्रेम कथा

दादी अभी अचार डाल रही थीं कि वो आ निकली। वो दुविधा में पड़ गई कि वापस चली जाए या रूकी रहे। 'बैठ जाओ जमीला।'दादी ने कहा। 'कैसी हो?' जी अच्छी हूं वो वहीं बैठ गई, जहां खड़ी थी। कुछ देर के बाद दादी बोली, 'अब मैं अचार डालने लगी हूं, बुरा न मानना, नियत बुरी न हो, तब भी नज़र लगती है। पिछले दिनों रब्बो ने मुझे अचार डालते देखा, पूरा-का-पूरा फफूंदया गया। ... नज़र तो मेरी भी कभी-कभी लगती है बीबी जी! इससे पहले आपका एक ग्लास तोड़ चुकी हूं।' ...हां हां!' दादी को याद आ गया। ...'लो! अब परली तरफ देखो!'और वो मुस्कुराती हुई एक तरफ घूम गई और सामने देखने लगी, सामने मैं बैठा था। मुझे देखते ही वो दुपट्टे का पल्लू आधे सिर पर से खींचकर माथे तक ले आई और बोली, 'बीबी जी! अंदर छोटे मियां जी तो नहीं बैठे?'
'अरी! वही यूसुफ तो है! रात आया है।' जमीला उठकर दरवाजे़ तक आई। ... 'कैसी हो जमीला?' मैंने पूछा। ... 'जी अच्छी हूं।' वह बोली। फिर उसके चेहरे पर शरारत चमकी, 'पहले तो मैं आपको पहचानी ही नहींं! मैं समझी, कोई बच्चा मूछें लगाए बैठा है।' ...इस पर दादी को हंसी छूट गई, तौबा है। कमबख्त ऐसी बातैं करती है कि ...तौबा है। ...जमीला दहलीज पर यूं बैठ गई‌ कि उसका एक पांव बाहर सेहन में था और एक कमरे के अंदर। 'युसूफ मियां! परदेस में आप क्या करते है?' उसने मुझ से यूं पूछा जैसे चौपाल में बैठी गप लड़ा रही है। ...मैंने कहा, 'नौकरी करता हूं, रुपया कमाता हूं।' ... 'बीबी जी को कितना भेजते हैं?' उसने शरारत से मुस्कुरा कर पूछा। ... 'ऐ लड़की! दादी ने उसे डांटा, 'अपनी उम्र के लड़कों से यूं बातें नहीं करते। अब तू छोटी नहीं है।'
'अम्मा-अब्बा होते तो बताते। उन्हें तो ख़ुदा के पास जाने की इतनी जल्दी पड़ी थी, कि मेरे सिर पर से अपना हाथ उठाया तो इंतिज़ार भी नहीं किया कि कोई इस लड़की के सिर पर हाथ रखे तो चलें।' जमीला की आवाज़ को आंसुओं ने भिगो दिया था। मैंने कहा, 'जमीला, तुम्हारी अम्मा तो कब की चल बसी थी। क्या बाप भी...?'‌‌ वो बोली, 'जी! वो भी चला गया। मैं लड़का होती, तो शायद मुझे कपड़े सीना सिखा जाता, पर वह मुझसे रोटियां ही पकवाता रहा।'
'तो क्या हुआ?' दादी बोली ! तुझे कपड़े सीना नहीं आते न! बाक़ी तो सब काम आते हैं। अपनी मेहनत से कमाती और खाती हो। सारा गांव तुम्हारी तारीफ करता है।' वो जाने लगी, मगर चंद क़दमों के बाद एकदम रुक गई, बोली, 'आज भी चक्की पीसने आ जाऊं बीबी जी?'
'आ जाना!' दादी बोली‌।...'जी अच्छा।' वह बोली, फिर वही खड़े-खड़े मुझसे पूछा, 'यूसुफ मियां! आप कितनी छुट्टी पर आए हैं?' मैंने कहा, 'बहन की शादी है, बुलावा देना आया हूं, तुम्हें भी आना है।' ... 'मुझे! सचमुच।'
मैं जब गांव में बुलावा देकर वापस आया तो वो अंदर एक कोठरी में बैठी चक्की पीस रही थी। ओढ़नी उसके सिर पर से उतर गई थी और खुले बाल चक्की के हर चक्कर के साथ उसके चेहरे को छुपा और खोल रहे थे, उसने एक टांग को पूरा फैला रखा था...। मैंने इधर- उधर देखा! दादी कहीं नज़र न आई, तो मैं पंजों के बल कोठरी तक गया। दरवाज़े से आती हुई रोशनी एकदम कम हुई, तो उसने चौक कर देखा, चक्की रोक ली, बालों को झुककर समेटा और ओढ़नी को सिर पर खींच लिया, मगर फैली हुई टांग को फैला रहने दिया। फिर वह चक्की के हत्थे को थामकर आहिस्ता- आहिस्ता घुमाने लगी ओर मेरी तरफ देखती चली गई। ...उसके चेहरे पर शरारत थी और इस डर के मारे कि वो कोई फिकरा न मार दे, मैंने पूछा, 'दादी कहां हैं?' वह बोली, तो क्या आप बीबी जी को देखने यहां तक आए थे?'
'तो क्या तुम्हें देखने आया था? फिर वो कुछ कहने ही लगी थी कि मैंने फिर पूछा, 'दादी कहां हैं?' ...'यहीं हवेली में हैं।' उसने कहा। 'आपके चचा की बेटी बीमार हैं, उन्हें देखने गईं हैं।'
फिर चक्की रोक कर उठ खड़ी हुई और दरवाज़े की तरफ बढ़ी। मैं एक तरफ हटा तो बाहर आ गई और बोली, 'प्यास लगी है। पर बीबी जी का कटोरा झूठा हो जाएगा। मुझे चुल्लू में पिला दीजिए! ...'तुम कटोरे में ही पी लो।' मैंने कहा, और फिर डांट के लहजे में कहा, 'चलो! उठाओ कटोरा पियो पानी!' उसकी मुस्कुराहट कितनी गुलाबी थी। वो पानी पी चुकी, तो कटोरे को खंगालने के लिए उसमें ज़रा सा और पानी डाला। मैंने कहा, 'भर दो कटोरा।' वह समझी मैं शायद कटोरे को पूरी तरह पाक करना चाहता हूं। कटोरा भर गया तो उसने मेरी तरफ देखा और कटोरा मैंने उसके हाथ से उचक कर मुंह से लगा लिया।
'यूसुफ मियां जी' वह इंतिहाई हैरत और सदमे से बोली, वो हैरानी से मेरी तरफ देखती रही और जब मैंने खाली कटोरा वापस किया तो उसके हाथ में कम्पन था और उसकी आंखों में नमी थी।
फिर एक दिन मैं इधर-उधर घूमकर आया तो वो दरवाज़े से निकल रही थी। चेहरा बिल्कुल तपा हुआ था। आंखें भी लाल हो रही थी। मैं चौका और पूछा, 'क्या बात है जमीला? तुम रोती रही हो?' वह हंसने लगी और बोली, 'रोएं मेरे दुश्मन, मैं क्यों रोऊं। मैं तो मिर्ची कूटती रही हूं, यूसुफ मियां।'
'तुम मिर्चें भी कूट लेती हो?' मैंने पूछा 'कोई ऐसा काम भी है, जो तुम्हें करना, न आता हो ...।' वो बोली, 'रुपया कमा रही हूं। आप तो जानते हैं रुपये वाले लोग गरीब लड़कियों को ख़रीद लेते हैं। मेरे पास रुपया होगा, तो मुझ पर नज़र उठाने की किसी की मजाल नहीं होगी ...। फिर वो मेरे करीब आकर चुपके से बोली, 'मैंने आपके कुर्ते के लिए मलमल ख़रीदी है। इस पर बेल बूटे काढ़ रही हूं।'
'ये गलत बात है।' मैंने एतराज़ किया, 'तुम्हारी मेहनत से' कमाए रुपये से ख़रीदा हुआ कुर्ता मुझे काटेगा।' ...'मैं किसी को बताऊंगी थोड़ी।' वह बोली, 'आप भी न बताइएगा, फिर नहीं काटेगा।' वह मटकी फिर एकदम घबरा गई, हाय मैं मर जाऊं।' ...'कहीं बीबी जी तो नहीं सुन रहीं।' मेरे जिस्म में भी सनसनी दौड़ गई। अंदर झांका तो सहन खाली था, पलट कर देखा तो वो जा चुकी थी।
गांव में जवान लड़की का एक-एक कदम गिना जाता है ...इरफान, आदिल और मेरे बहुत से दोस्त बैठे थे, लड़कियों का ज़िक्र हो रहा था, फला, फला के साथ है। मैंने कहा, 'एक लड़की जमीला भी तो है ...। इस पर सब हंसने लगे, 'वो ...।' उन्होंने कहा, 'वो किसी काम की नहीं है। घर घर में काम करती-फिरती है, रुपया कमा रही है, खूबसूरत है पर निकम्मी है।'
....मैंने कहा, 'अगर वह मेहनती लड़की है तो उसकी इज़्ज़त करना चाहिए।' इरफान बोला, 'वो इज़्ज़त तो नहीं करने देती।' इस पर सबको हंसी का दौरा पड़ा। आदिल बोला, 'तुम्हारे यहां तो वो बहुत कामकाज करती है, कभी उसकी इज़्ज़त करके देखो, खाल उतार लेगी।' वो फिर हंसने लगे और मुझे, फीकी हंसी के साथ उनकी हंसी में शरीक होना पड़ा।
दादी ने जमीला से शादी में साथ चलने को कहा। ...'बीबीजी मेरे पास अच्छे कपड़े भी नहीं हैं।' ... बीबी जी ने कहा, 'तुम तो हर कपड़े में अच्छी लगती हो, वह वाले पहन लेना जो ईद को पहने थे। इसी बहाने देख लोगी शहर की चकमक।' ...पहली बार मोटर में बैठकर जमीला बहुत इठला रही थी। मैरिज होम पहुंच कर जमीला बोली, ' बीबीजी देखो दीवारें कितनी रंगीन है?' ' हां देख रही हूं।' देखो बीबी जी देखो! इस दीवार पर तो अपने गांव के पहाड़, फूल, बगीचे सब बने हैं, बीबी जी को एक तरफ खीचते हुए, वो देखो छत पर कांच का कितना बड़ा गुलदस्ता है, जो गिरा तो मैं तो गई काम से!' ...'अरे बेवकूफ यह झाड़ फानूस हैं, गिरता थोड़ी ना।' बीबीजी बोली़।
निकाह, खाना- पीना होने के बाद, जूता चुराई की रस्म हो रही थी। अचानक दादी को लगा कि जमीला दिखाई नहीं दे रही है। 'कहां गई होगी?' इधर- उधर देखा, घर के सब लोगों से पूछा। सब यही कह रहे थे कि अभी तो यहीं थी।
उधर मैं इरफान और आदिल को ढूंढने में लगा था। जब मुझे जमीला के गुम होने का पता चला तो याद आया कि मैंने ही तो जमीला को उनके साथ शादी के तोहफे रखने भेजा था। मैं मैरिज होम की हद जानता था। सो खोजते- खोजते देखा की जमीला को दोनों नोचने मसलने की फिराक में है। मैंने दोनों को ज़ोर का धक्का दिया और वह चीखते हुए मुझ से चिपक गई।
मन-ही-मन मैनें सोचा इन दोनों से तो बाद में निबटुंगा। फिलहाल तो मैं इसे दादी के पास ले चलता हूं। दादी तो बेहाल थी कि क्या मुंह दिखायेंगी गांव पहुंचकर लोगों को? ... विदाई के बाद वह फिर दादी को दिखाई नहीं दी। 'अब कहां चली गई? 'मैं उसे ढूंढने लगा। एक गार्ड ने मुझे बताया, 'उसने सीढ़ियों से एक लड़की को ऊपर जाते देखा है।' फुर्ती से मैरिज होम की छत पर गया। उसे अपनी क़सम देकर ख़ुदकशी करने से बचा लिया और अपने साथ लेकर आया।
रोती-बिलखती जमीला को देख कर सभी पूछने लगे, 'क्या हो गया?' और मुझे सब कुछ बताना पड़ा। सबकी ज़ुबान पर एक ही सवाल था, 'इससे अब कौन शादी करेगा?'
दिन भर के हंगामे के बाद एक बहुत भारी सन्नाटा घर पर टूट पड़ा था। ज़िंदगी में शायद पहली बार दादी का लिहाज़ किए बगैर मैं उनसे पूछ बैठा, 'जमीला कहां है?' मगर दादी इस सवाल से बिल्कुल नहीं चौकी, बोली, 'वह लड़की हीरा है बेटा! मेरी तो आंखे बाज़ू सब कुछ वही है। आज तो उसने खाना भी नहीं खाया। जिन लोगों को हंसने की आदत होती है न, उन्हें जब रोना भी आता है तो वो हंसने लगते हैं। तुमने दर्ज़न समझकर जमीला की इज्जत नहीं की, बस उसके जज़्बात से खेलते रहे। गांव की भोली-भाली लड़की जवान लड़कों की फरेबी बातों को प्यार समझ बैठती हैं। तुम्हारी प्यार भरी बातों से जमीला भी तुमसे प्यार करने लगी है। उसने तुम्हारे लिए कुर्ता सिया, उस पर बेल बूटे काढ़े, तुमने पहना तक नहीं। कल सुबह वह जा रही है। वह क्या याद करेगी तुम्हें ...? जाओ!' उसे कम से कम एक बार कुर्ता पहन कर दिखा दो।' मैंने जमीला के कमरे के पास जाकर उसे आहिस्ता से पुकारा, तो वो तड़पकर यूं खड़ी हो गई, जैसे उसके करीब कोई गोला फटा है। 'युसूफ मियां जी।' वो बोली, 'कुर्ता दिखाने आए होंगे।' मैंने कहा, 'हां कुर्ता ही दिखाने आया हूं।' पहले पहन लेते तो ज़्यादा अच्छा लगता। वैसे अब भी अच्छा लग रहा है। मैं कल वापस जा रही हूं।'
'वह मुझे मालूम है।' मैंने कहा। 'तुम किस मिट्टी की बनी हो जमीला।'
वह ख़ामोश खड़ी रही फिर दो क़दम उठा कर मेरे करीब आ गई कि मुझे अपनी गर्दन पर उसकी सांसे महसूस होने लगीं। कुछ पल मेरी आंखों में देखती रही, फिर आंखें इस तरह बंद कर ली, जैसे मुझे आंखों में क़ैद कर लिया।
वो चांदी के बुत की तरह मेरे सामने‌ बेजान-सी खड़ी थी। मैंने कहा, 'तुम कहीं नहीं जाओगी मुझे छोड़कर।' उसकी आंखें अब भी बंद थी, जैसे हसीन ख्वाब देख रही है। फिर उसके होठों पर मुस्कुराहट आई, जैसे ख़ुदा ने सारी कायनात की दौलत उसकी झोली में डाल दी।'
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