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अलविदा माला

क़ाज़ी वाजिद की कहानी-प्रेम कथा

प्रलय काल था। आकाश के तारे गायब। धरती के सब प्रदीप बुझे हुए थे। आंधी बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। भूस्खलन भी शुरू हो गया था। कुछ माह पहले ही शशिकांत वकील मुझे ब्याह कर इस पहाड़ी पर लाए थे। वह मुकदमे के सिलसिले में हाई कोर्ट गए हुए थे। मैं घर के बाहर खड़ी उस मलवे को ताकती जो ऊचाई से खिसकता हुआ मेरी ओर आ रहा था। तभी मुझे एक घबराई हुई आवाज़ सुनाई पड़ी, जो मुझे बचपन के दोस्त नरेंद्र की लगी। उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लेकर भागने लगा। कुछ पत्थर हम तक आ गए थे जिनसे नरेंद्र घायल हो गया था। घायलावस्था में वह मुझे अपने स्कूल ले गया, जिसके क्वार्टर में वह रहता था‌। उसके घावों से रक्त रिसाव बढ़ रहा था, जिसे रोकने का मैं असफल प्रयास कर रही थी। मदद के लिए घर से निकलती, दूर तक जाती फिर निराश लौट आती। उसने मुझे एक पत्र दिया, कराहते हुए कहा, ' पढ़ो!'
...वह मेरे साथ चमोली के सरकारी स्कूल में पढ़ी थी और लुका छिपी खेली ‌‌थी। उसके घर जाने पर उसकी मां मुझे बड़ा प्यार करतीं और हम दोनों को साथ बिठा कर कहतीं, 'वाह कितनी सुंदर जोड़ी है।' ... मैं रोब-दाब से उससे अपनी हर बात मनवाता था और वह भी मेरी हर फरमाइश पूरी करती। मुहल्ले में उसके रूप की प्रशंसा थी, किंतु मेरी नज़र में उसके सौंदर्य का कोई महत्व नहीं था।
... फिर मुझे नैनीताल पढ़ने भेज दिया गया। बात उस समय की है जब मैंने बीएससी पास कर लिया था और कम्पीटीटिव एग्जाम दे रहा था। ... सर्दियों की खूबसूरत दोपहर औली में सर्दी बहुत तेज़ थी। माला ने मेरी बांह पकड़ रखी थी। उसके घुंघराले बालों में बर्फ इस तरह जम गई थी कि वे चांदनी की तरह झलकने लगे थे। होठों के ऊपर भी बर्फ की एक लकीर सी दिखाई देने लगी थी। हम एक पहाड़ी पर खड़े हुए थे। हमारे पैरों के नीचे मैदान की ढलान पसरी हुई थी, जिसमें सूरज की रोशनी ऐसे चमक रही थी, जैसे उसकी परछाई शीशे पर पड़ रही हो। हमारे पैरों के पास ही एक स्लेज पड़ी हुई थी। -चलो माला, एक बार फिसलें। -मैंने माला से कहा -सिर्फ एक बार! घबराओ नहीं, हमें कुछ नहीं होगा, हम ठीक-ठाक नीचे पहुंच जाएंगे।
लेकिन माला डर रही थी। यहां से, पहाड़ी के कगार से, नीचे मैदान तक का रास्ता उसे बेहद लंबा लग रहा था। वह भय से पीली पड़ गई थी जैसे उसका दम निकल रहा है। ... 'मेरी बात मान लो! ...'नहीं नरेश।' उसने कहा। ...'नहीं- नहीं, डरो नहीं, तुममें हिम्मत की कमी है क्या?' आख़िरकार मौत का ख़तरा मोल लेकर उसने मेरी बात मान ली। मैं उसे स्लेज पर बैठाकर, उसके कंधों पर अपना हाथ रखकर उसके पीछे बैठ जाता हूं। हम उस अथाह गहराई की ओर फिसलने लगते हैं। स्लेज गोली की तरह बड़ी तेज़ी से नीचे जा रही है। बेहद ठंडी हवा हमारे चेहरे को चोट कर रही है। हवा ऐसे चिंघाड़ रही है कि लगता है, मानो वह हमारे सिर उतार लेना चाहती है‌। आसपास की सारी चीज़ें जैसे एक तेज़ी से भागती हुई लकीर में बदल गई है‌।
'मैं तुमसे प्यार करता हूं, माला।' मैं धीमे ् से कहता हूं। स्लेज की गति धीरे-धीरे कम हो जाती है। हवा का गरजना और स्लेज का गूंजना अब इतना भयानक नहीं लगता। हमारे दम में दम आता है और आख़िरकार हम नीचे पहुंच जाते हैं‌। माला अधमरी सी हो रही थी। वो सफेद पड़ गई थी। उसकी सांसें भी बहुत धीमी-धीमी चल रही थी ... मैं उसकी स्लेज से उठने में मदद करता हूं।
'अब चाहे जो भी हो जाए, मैं कभी नहीं फिसलूंगी, हरगिज़ नहीं! आज तो मैं मरते- मरते बची हूं।' मेरी ओर देखते हुए उसने कहा, पर थोड़ी ही देर बाद वो सहज हो गई और मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखने लगी। क्या उसने सचमुच वे शब्द सुने थे या उसे ऐसा बस महसूस हुआ था, सिर्फ हवा की गूंज थी वह? मैं माला के पास ही खड़ा था। वह मेरा हाथ अपने हाथ में ले लेती है और हम देर तक पहाड़ी के आसपास घूमते रहते हैं। यह पहेली उसको परेशान कर रही थी। यह शब्द,... जो उसने पहाड़ी से नीचे फिसलते हुए सुने थे, सच में कहे गए थे या नहीं? यह सच हैं या झूठ? माला मुझे अपनी उदास नज़रों से ताकती है, मानो मेरे अंदर की बात भांपना चाहती हो। वह इस इंतज़ार में है कि मैं उससे फिर यही बात शुरू करूं। मैं उसके चेहरे को ध्यान से देखता हूं,- अरे, इसके चेहरे पर यह कैसे भाव हैं? वह कुछ पूछना चाहती थी लेकिन झेंप रही थी, उसे अपनी ही खुशी तंग कर रही है...। 'सुनिए।' वह मुंह चुराते हुए मुझसे कहती है। ... 'क्या?', मैं पूछता हूं। ... 'स्लेज में आपने मुझसे कुछ कहा था?' ... 'नहीं।' मैंने सीरियस होकर कहा।
इसके बाद माला मुझसे कतराने लगी थी। कुछ दिनों बाद समाचार मिला, माला का किसी वकील से विवाह हो गया‌। ऐसा लगा, मानो दिल बैठ गया।
... पापा मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे। उनकी मृत्यु के बाद प्रॉपर्टी के बखेड़े शुरू हो गए। मां और दो बहनों की जिम्मेदारी भी निभाना थी‌। इसी लिए माला को 'आई लव यू' बोलने के बाद झुठला दिया था।
वकील शशिकांत स्कूल के पास ही में रहते थे। प्रापर्टी संबंधित मशवरा करने उनके घर गया। वहां माला को देखा तो पता चला, वह वकील साहब की पत्नी बन चुकी थी‌। मुझे देख कर अनजान- सी बनी रही। ठीक ही किया था उसने!
...माला के घर से लौट कर घर आ गया, किन्तु वह व्यथा बनी रही। पढ़ना- लिखना जो भी करता किसी तरह मन का भार दूर न हो पाता। शाम के समय में कुछ शांत-चित होकर सोचने लगा कि आख़िर ऐसा हुआ क्यों। उत्तर में मन बोल उठा, तुम्हारी वह माला कहां गई?'
मैंने कहा, 'वह क्या मेरे लिए ही बैठी रहती।' ... मन के भीतर से कोई बोला, ' उस समय जिसे चाहते ही पा सकते थे, अब उसे सिर पटक कर मर जाने पर भी एक बार देखने तक का अधिकार तुम्हें नहीं मिल सकता। बचपन की वह माला तुम्हारे कितने ही पास क्यों न रहे, तुम उसकी चूड़ियों की खनक सुनते रहो, उसके बालों की सुगंध की महक पाते रहो किंतु तुम्हारे बीच में एक दीवार बराबर बनी रहेगी।'
मैंने कहा, 'जाने भी दो, 'वह मेरी कौन है।'
उत्तर मिला, 'आज माला तुम्हारी कोई नहीं है, लेकिन माला तुम्हारी क्या नहीं हो सकती थी?'
सच बात है, माला मेरी क्या नहीं हो सकती थी। जो मेरी सबसे अधिक अंतरंग, सबसे क़रीबी, मेरे जीवन के समस्त सुख दुख की सहभागिनी हो सकती थी। वह अब इतनी पराई हो गई है कि आज उसको देखना और बात करना भी अपराध है, उसके विषय में सोचना भी पाप है।
तबसे और किसी भी काम में मन नहीं लग सका। दोपहर के समय क्लास में जब छात्र गुनगुनाते रहते, बाहर सन्नाटा छाया रहता, तब भीतर कुछ होता। मन कुछ चाहता मगर उसका रूप साफ न होता। स्कूल की छुट्टी होने पर अपने बड़े कमरे में मन न लगता, लेकिन यदि कोई मिलने चला आए, तो भी मन बड़ा अझेल हो जाता। संध्या समय झरने किनारे वृक्षों की मर्मर ध्वनि सुनते-सुनते सोचता, 'मनुष्य- समाज एक कठिन भ्रमजाल है। ठीक समय पर ठीक काम करना किसी को नहीं सूझता। बाद में अनुपयुक्त समय पर अनुचित इच्छा लेकर अस्थिर होकर मर जाता है।'
एक बड़े मुकदमे में शशिकांत कुछ दिनों के लिए हाई कोर्ट गया था। मैं अपने स्कूल- भवन में जिस तरह अकेला था, शायद उस दिन माला भी अपने घर में उसी तरह अकेली थी। ... सवेरे से मूसलाधार बारिश हुई और आंधी चलने लगी। ज्यों-ज्यों रात होने लगी बारिश और आंधी का वेग भी बढ़ने लगा।
उस रात सोने का प्रयत्न करना व्यर्थ था। माला का घर जिस पहाड़ी पर था, वहां से भूस्खलन की आवाजें आ रही थी‌। ख्याल आया, ' इस आफत के समय माला घर में अकेली हैै।' हमारा स्कूल भवन उसके घर की अपेक्षा कहीं अधिक मज़बूत था, कई बार मन में आया उसे स्कूल भवन में बुला लाऊं और मैं बाहर झरने के किनारे रात बिता लूं। किंतु लोक लाज के कारण ऐसा नहीं कर पाया। आधी रात को फिर एक बार भूस्खलन की आवाज़ सुनाई पड़ी और मैं माला के घर की ओर चल पड़ा ...।
पत्र पढ़ने के बाद मेरे आंसू बहने लगे। रूंधे गले से मैंने नरेंद्र से कहा, 'मैं नादान थी, तुम्हारी मजबूरी को समझ नहीं सकी, तुम्हें फ्लर्ट ब्याय समझ बैठी, मुझे माफ कर देना।' नरेंद्र के चेहरे पर संतोष झलकने लगा और हल्की सी मुस्कुराहट के साथ 'अलविदा माला' कहा। फिर उसकी सांस थमने लगी। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया और उसे दिलासा देने लगी।
रात बीत चुकी थी। आंधी- पानी रुक गया था। मेरा मन जोगन बनकर, उसकी यादों के सहारे ज़िंदगी काटने के लिए मचल रहा था। परंतु यह संभव नहीं था।
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