Ek Yogi ki Aatmkatha - 10 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 10

{ अपने गुरु श्रीयुक्तेश्वरजी से मेरी भेंट }

“ईश्वर में श्रद्धा कोई भी चमत्कार कर सकती है, केवल एक को छोड़कर – अध्ययन के बिना परीक्षा में उत्तीर्ण होना।” झुंझलाकर मैंने वह “प्रेरणाप्रद” पुस्तक बंद कर दी जिसे मैंने खाली समय में एक दिन उठा लिया था।

“लेखक का यह अपवाद कथन उसकी ईश्वर में श्रद्धा का पूर्ण अभाव दर्शाता है”, मैंने सोचा। “बेचारा! रात-रात भर पढ़ाई करने में उसे अत्यधिक विश्वास है!”

मैंने पिताजी को वचन दे रखा था कि मैं अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूर्ण करूँगा। मैं परिश्रमी विद्यार्थी होने का दावा नहीं कर सकता। महीने पर महीने बीतते गये थे पर मैं क्लास रूम में कम और कोलकाता के स्नान घाटों के आस-पास सुनसान जगहों पर अधिक होता था। उन घाटों के पास स्थित श्मशान, जो रात में और भी अधिक भयावह बन जाते हैं, योगी को अत्यंत आकर्षित करते हैं। जिसे अमर तत्त्व की खोज करनी हो, उसे कतिपय अनलंकृत नरकपालों को देखकर विचलित नहीं होना चाहिये । विभिन्न प्रकार की अस्थियों से व्याप्त उस विषादालय में मानवी अपूर्णता उजागर होती है। इस प्रकार मेरा रात्रि जागरण विद्यार्थियों के रात्रि जागरण से भिन्न प्रकार का था।

हिन्दू हाई स्कूल की वार्षिक परीक्षा का सप्ताह तेजी से निकट आ रहा था। परीक्षा का यह समय भी भूत-प्रेतों से युक्त उन श्मशानों की तरह ही एक सुपरिचित दहशत मन में उत्पन्न करता है। फिर भी मेरा मन शान्त था। भूत-पिशाचों के क्षेत्र में जा जाकर मैं एक ऐसे ज्ञान को खोद कर निकाल रहा था जो स्कूली कक्षाओं में कभी नहीं मिल सकता। परन्तु मेरे पास स्वामी प्रणवानन्दजी का कौशल नहीं था जो एक ही समय में दो स्थानों पर आसानी से उपस्थित हो सकते थे। मेरा तर्क (यद्यपि अनेक लोगों को, अफसोस ! यह कुतर्क लगता है) यह था कि प्रभु मेरी दुविधा को समझकर मुझे उससे उबार लेंगे। विपत्तियों से तत्क्षण उबारने के ईश्वर के हज़ारों स्पष्टीकरणातीत कारनामों से भक्त के मन में ऐसी तर्कशून्यता आ जाती है।

“अरे, मुकन्द! आजकल तो तुम्हारे दर्शन ही नहीं होते!” एक दिन अपराह्न गड़पार रोड पर मेरी ही कक्षा के एक सहपाठी से अचानक भेंट हुई तो उस ने मुझ से कहा।

“ओह, नंतू! लगता है स्कूल में मेरी अनुपस्थिति ने मुझे निश्चित तौर पर कठिन परिस्थिति में डाल दिया है।” मैंने उसकी स्नेहपूर्ण दृष्टि के आगे अपने हृदय का भार हल्का किया।

नंतू, जो एक तीक्ष्ण बुद्धि छात्र था, दिल खोलकर हँसने लगा; आखिर मेरी परिस्थिति भी हास्यजनक ही थी।

“वार्षिक परीक्षा के लिये तो तुम बिल्कुल भी तैयार नहीं हो!” उसने कहा। “लगता है अब मुझे ही तुम्हारी सहायता करनी होगी!”

नंतू के ये सहज-सरल शब्द दैवी आश्वासन बनकर मेरे कानों में उतरे। तत्परता के साथ मैं उसके घर गया। परीक्षा में जिन प्रश्नों के पूछे जाने की सम्भावना उसे प्रतीत हो रही थी उनके उत्तर उसने मुझे समझा दिये ।

“ये प्रश्न ऐसे दाने हैं जो अनेक भोले-भाले विद्यार्थियों को परीक्षा के जाल में फँसा लेंगे। मेरे उत्तरों को ठीक से याद करोगे तो तुम उस जाल से सही सलामत निकल जाओगे।”

जब मैं उसके घर से निकला तब काफी रात बीत गयी थी। उधार की विद्वत्ता से लबालब भरा हुआ मैं पूरे भक्तिभाव के साथ प्रार्थना कर रहा था कि अगले कुछ संकटपूर्ण दिनों में वह पांडित्य मुझ में बना रहे। मुझे अपने विभिन्न विषयों में नंतू ने परीक्षा के लिये तैयार कर दिया था, परन्तु समयाभाव के कारण संस्कृत को भूल गया था। मैंने उत्कटतापूर्वक भगवान को इस भूल की याद दिला दी।

दूसरे दिन प्रातःकाल मैं चलते कदमों की लय पर अपना नया ज्ञान आत्मसात् करता हुआ सैर कर रहा था। रास्ते के छोर पर पहुँचकर कोने पर स्थित खाली भू-खण्ड की घास-पात में से मैं चल पड़ा कि अचानक मेरी दृष्टि कुछ छपे हुए बिखरे पड़े कागजों पर पड़ी। मैंने झपटकर कागज़ उठा लिये। मेरा झपटना सार्थक भी हुआ। मेरे हाथ में संस्कृत श्लोक थे ! उनका अर्थ लगाने के अपने उगमगाते प्रयासों में सहायता के लिये मैंने एक पंडित को पकड़ा। उनकी मधुर वाणी ने वातावरण को उस प्राचीन भाषा¹ के निनादी, मधुर सौन्दर्य से भर दिया।

“इन असामान्य श्लोकों को सीखकर संस्कृत की तुम्हारी परीक्षा में कोई सहायता नहीं हो सकती।” पंडित ने उन श्लोकों को निश्चयपूर्वक मेरे लिये बेकार ठहराया।

परन्तु उन श्लोकों का अर्थ जानने के कारण ही दूसरे दिन मैं संस्कृत की परीक्षा में पास हो सका। नंतू ने अपनी दूरदृष्टि से जो सहायता मुझे दी थी, उसके कारण मुझे अपने अन्य सभी विषयों में भी उत्तीर्णांक मिल गये।

पिताजी खुश हुए कि मैंने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने का अपना वचन निभाया था। मेरी कृतज्ञता ईश्वर के चरणों में समर्पित हुई। मैं जानता था कि केवल उनकी प्रेरणा के कारण ही मैं नंतू के घर पहुँचा था और कूड़े से भरे भू-खण्ड के अप्रचलित मार्ग से भी उन्हीं की प्रेरणा से गया था। उन्होंने अपनी लीला करते हुए मुझे उबारने की अपनी यथासमय योजना की दुहरी अभिव्यक्ति प्रदर्शित की थी।

निरर्थक मानकर रख दी हुई उस पुस्तक पर मेरी दृष्टि पड़ी जिसके लेखक ने परीक्षा भवन में ईश्वर की महत्ता को अपर्याप्त माना था। मेरे मन में उठे इस विचार पर मैं अपनी हँसी को रोक नहीं पाया :

“यदि मैं इस लेखक को बता दूँ कि मृतदेहों के अवशेषों के बीच बैठकर ईश्वर का ध्यान करना हाई स्कूल परीक्षा पास करने का सहज उपाय है तो उसकी उलझनें और अधिक बढ़ जायेंगी !”

नयी प्रतिष्ठा से गौरवान्वित होकर अब मैं खुले रूप से घर छोड़ने की योजना बनाने लगा। अपने एक समवयस्क मित्र जितेन्द्र मजूमदार² के साथ वाराणसी के एक आश्रम, श्री भारत धर्म महामंडल में जाकर रहने का और वहाँ आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करने का मैंने निश्चय किया।

अपने परिवार से वियोग की कल्पना एक दिन गहरा विषाद बन कर मुझ पर छा गयी। माँ के स्वर्गवास के बाद मेरे दो छोटे भाइयों सनन्द और विष्णु तथा सबसे छोटी बहन थामू के लिये विशेष रूप से मेरा प्रेम तीव्र हो गया था। मैं शीघ्रतापूर्वक अपने एकान्त स्थान, उस छोटी-सी अटारी में जा पहुँचा जो मेरी आकुल साधना के अनेकानेक प्रसंगों की साक्षी थी। दो घंटों के अश्रुपात के बाद मैंने अपने में एक अपूर्व परिवर्तन अनुभव किया, जैसे किसी चमत्कारी परिष्कारक तत्त्व से मेरा अन्तर धुलकर एकदम साफ हो गया हो। सारी आसक्ति³ हवा हो गयी। मित्रों के मित्र ईश्वर की खोज करने का मेरा निश्चय और भी दृढ़ हो गया।

“मैं तुमसे आखिरी बार अनुरोध करता हूँ।” मैं पिताजी के समक्ष उनका आशीर्वाद लेने के लिये खड़ा था, तब उन्होंने मर्माहत होकर कहा। “मेरा और अपने शोकाकुल भाई-बहनों का त्याग मत करो।”

“पूज्य पिताजी, मैं आपके प्रति अपने प्रेम को किन शब्दों में व्यक्त कर सकता हूँ? परन्तु उस परमपिता के लिये मेरा प्रेम उससे भी बढ़कर है, जिसने मुझे इस लोक में आप जैसा आदर्श पिता प्रदान किया। मुझे जाने दीजिये ताकि मैं किसी दिन अधिक दिव्य ज्ञान के साथ आपके पास लौट सकूँ।”

पिताजी की अनिच्छापूर्ण स्वीकृति के साथ मैं वाराणसी के आश्रम में पहले ही पहुँच चुके जितेन्द्र के साथ होने के लिये निकल पड़ा। वहाँ पहुँचने पर आश्रम के युवा अधिपति स्वामी दयानन्दजी ने हृदयपूर्वक मेरा स्वागत किया। लम्बे, छरहरे बदन के, चिन्तनशील मुखाकृति वाले स्वामीजी के प्रति मेरे मन में अनुकूल धारणा उत्पन्न हुई। उनकी गौरवर्ण मुखाकृति पर बुद्धसमान भाव था।

मुझे यह देखकर खुशी हुई कि मेरे इस नये घर में भी एक अटारी थी। भोर और प्रातःकाल का समय मैं वहीं व्यतीत करने लगा। आश्रमवासियों को ध्यानाभ्यास का अत्यल्प ज्ञान था, अतः उनका विचार था कि मुझे अपना सारा समय आश्रम के प्रबन्धात्मक कार्यों में लगाना चाहिये। अपराह्न उनके कार्यालय में मैं जो काम करता था उसके लिये वे मेरी सराहना करते थे।

“ईश्वर को इतनी जल्दी पकड़ने का प्रयास मत करो!” एक दिन मैं भोर में अटारी की ओर जा रहा था तब एक आश्रमवासी ने मेरा उपहास किया। मैं दयानन्दजी के पास गया जो गंगा का दृश्य प्रस्तुत करने वाले अपने छोटे-से कक्ष में व्यस्त थे।

“स्वामीजी, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यहाँ मुझसे क्या अपेक्षा की जाती है। मुझे ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति की जिज्ञासा है। ईश्वर के अतिरिक्त मैं किसी और चीज से सन्तुष्ट नहीं हो सकता – न अच्छे कार्यों के साथ जुड़ने से, न उनके सिद्धान्त से, न उन्हें करने से।”

गेरुआ वस्त्रधारी स्वामीजी ने स्नेहपूर्वक मेरा कन्धा थपथपाया। निकट ही खड़े कुछ शिष्यों को नकली फटकार का ढोंग रचाते हुए उन्होंने डाँटाः “मुकुन्द को परेशान मत करो। हमारे तौर-तरीके वह सीख लेगा ।”

मैंने शिष्टतापूर्वक अपना सन्देह भीतर ही दबा लिया। शिष्यगण कक्ष से बाहर चले गये; डाँट का उनपर कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं हो रहा था। दयानन्दजी को अब मुझसे कुछ कहना था।

“मुकुन्द, मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारे पिताजी तुम्हें नियमित रूप से पैसा भेजते हैं। वह पैसा उन्हें लौटा दो; यहाँ तुम्हें किसी पैसे की आवश्यकता नहीं। यहाँ तुम्हारे नियम पालन में दूसरी बात भोजन से संबंधित है। तुम कितने ही भूखे क्यों न हो, उसके विषय में कभी किसी से मत कहो।”

मेरी आँखों में क्षुधार्तता प्रकट हो रही थी या नहीं, मैं नहीं जानता। लेकिन इतना अवश्य जानता था कि मुझे भूख लगी हुई थी। आश्रम में दिन के प्रथम भोजन का नियत समय १२ बजे का था। अपने घर में प्रातः ९ बजे ही भरपेट नाश्ता करने का मैं आदी था।

तीन घंटों का यह अन्तर मुझे दिन पर दिन अधिकाधिक लम्बा प्रतीत होने लगा। कोलकाता के वे दिन अब चले गये थे जब दस मिनट की देरी के लिये भी मैं रसोइये पर बरस पड़ता था। अब मैं अपनी भूख को नियंत्रित करने की चेष्टा करने लगा; मैंने चौबीस घंटे का उपवास पूरा किया। दुगुने चाव और उत्कंठा के साथ मैं दूसरे दिन के मध्याह्न की प्रतीक्षा करने लगा।

“दयानन्दजी की ट्रेन विलम्ब से चल रही है; उनके आने तक भोजन नहीं होगा।” जितेन्द्र ने आकर यह दारूण वार्ता मुझे सुनायी। दो सप्ताहों तक बाहर रहे स्वामीजी के स्वागत सम्मान में अनेक स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर तैयार रखे हुए थे। उनकी भूख बढ़ाने वाली सुगंध से वातावरण भर गया था। निगलने के लिये और कुछ भी न मिल पाने पर अब मैं बीते हुए कल के उपवास के दम्भ के अतिरिक्त और निगल ही क्या सकता था?

“हे प्रभो ! कुछ ऐसा करो कि ट्रेन जल्दी आ जाय!” मैंने सोचा, किसी के पास भूख का ज़िक्र न करने की जो निषेधाज्ञा दयानन्दजी ने मुझे दे रखी थी उसमें अवश्य ही वह परमदाता तो शामिल नहीं होगा! परन्तु उस परमदाता का ध्यान भी उस समय कहीं और था; घड़ी मंथर गति से घंटों पर घंटें दर्शाती गयी। जब हमारे प्रमुख महाराज ने मुख्यद्वार से प्रवेश किया तब अंधेरा छा रहा था। मैंने आनन्दातिरेक के साथ उनका अभिवादन किया।

“दयानन्दजी अब स्नान करेंगे, तत्पश्चात् ध्यान करेंगे और तब जाकर भोजन परोसा जायेगा।” जितेन्द्र किसी अपशकुन सूचक पक्षी की तरह फिर मेरे पास आ गया था।

मैं लगभग गिरने जैसा हो गया। निराहार रहना मेरे युवा उदर के लिये नया अनुभव था; पेट में दौड़ने वाले चूहे अब उसे कुतरने लग गये थे और पेट पूरी शक्ति के साथ विद्रोह कर रहा था। दुर्भिक्ष-पीड़ितों के जो चित्र मैंने देखे थे वे प्रेतात्माओं की तरह मेरे सामने से गुजरने लगे।

“दुर्भिक्ष से वाराणसी में अगली मृत्यु अब किसी भी क्षण इसी आश्रम में होने वाली है”, मैं सोच रहा था। सम्भावित मृत्यु नौ बजे टल गयी। खाने का बुलावा जैसे साक्षात् स्वर्गीय भोज का निमंत्रण बन कर आया ! उस रात का भोजन मेरी स्मृति में जीवन के सबसे सार्थक अवसरों में से एक बनकर स्पष्ट रूप से बैठ गया है।

भोजन में प्रगाढ़ तल्लीनता भी मुझे यह देखने से नहीं रोक पायी कि दयानन्दजी का मन खाने में नहीं था। वे स्पष्टतया मेरी स्थूल सुखानुभूतियों से ऊपर थे।

“स्वामीजी, क्या आपको भूख नहीं लगी थी?” पेट फटने तक खाकर तृप्ति का सुख अनुभव करता हुआ मैं उनके काम करने के कमरे में उनके साथ अकेला था।

“हाँ, भूख तो अवश्य लगी थी!" उन्होंने कहा। "पिछले चार दिनों से मैंने कुछ भी खाया-पिया नहीं था। मैं ट्रेन में कभी कुछ नहीं खाता क्योंकि वहाँ का वातावरण संसारी लोगों के विविध प्रकार के स्पन्दनों से भरा रहता है। मेरे सम्प्रदाय के संन्यासियों के लिये निर्धारित सारे शास्त्रीय⁴ नियमों का मैं कड़ाई से पालन करता हूँ।

“आश्रम की कुछ समस्याएँ मेरे मन पर छायी हुई थीं। इसीलिये आज रात भोजन में मेरा मन नहीं था। जल्दी भी क्या है ? कल मैं ठीक से भोजन करने का ध्यान रखूँगा।” वे हँस पड़े।

लज्जा के मारे मेरा दम घुटने लगा। परन्तु कल की यन्त्रणा को आसानी से भुला भी तो नहीं दिया जा सकता था! मैंने और एक बात कहने का साहस किया।

“स्वामीजी, आपके आदेश से मैं उलझन में पड़ गया हूँ। कल्पना कीजिये कि मैं कभी खाना न माँगु और कोई अपने आप मुझे खाना न दे। तब तो मैं भूख से मर ही जाऊँगा।”

“तब मरो!” इस भयंकर उपदेश ने जैसे वातावरण में विस्फोट कर दिया। “यदि मरना ही पड़ा तो मर जाओ, मुकुन्द! कभी भी यह मत मानो कि तुम भगवान की शक्ति से नहीं; अन्न की शक्ति से जीवित रहते हो! जिसने भरण-पोषण के सब प्रकारों का सृजन किया है, जिसने भूख दी है, वह भगवान अपने भक्तों का भरण-पोषण भी अवश्य करेगा। कभी यह कल्पना भी मत करना कि तुम चावल से जीवित हो या रुपया-पैसा या लोग तुम्हारा पालन-पोषण करते हैं। यदि प्रभु तुम्हारी प्राणशक्ति को वापस ले लें तो क्या इनमें से कोई तुम्हारी सहायता कर सकेगा? ये सब तो उस भगवान के ही साधन मात्र हैं। क्या इस में तुम्हारा कोई अपना कर्तृत्व है कि अन्न का तुम्हारे पेट में पाचन होता है ? विवेक की तलवार का उपयोग करो, मुकुन्द ! माध्यम की जंजीरों को काट दो और उस सब के पीछे विद्यमान ‘परम कारण’ को पहचानो!”

उनके वेधक शब्द मुझे अपनी किसी गहरी मज्जा में उतरते प्रतीत हुए। तहस-नहस हो गयी प्राचीन काल से चली आ रही वह भ्रांति जिसके कारण शरीर के आदेश आत्मा को झुका देते थे। वहीं, उसी क्षण मैंने परमात्मा की सर्वसमर्थता का रसास्वादन किया। आगे के मेरे अविराम भ्रमणशील जीवन में कितने ही अपरिचित शहरों में वाराणसी के उस आश्रम में प्राप्त उपदेश की उपयोगिता को सिद्ध करने के कितने ही अवसर आये।

कोलकाता से अपने साथ लायी हुई मेरी एकमात्र दौलत थी साधु का वह चांदी का तावीज जो माँ ने मेरे लिये रख छोड़ा था। वर्षों तक सम्भालकर रखते हुए अब मैंने उसे आश्रम में अपने कमरे में सावधानीपूर्वक छुपा कर रखा था। तावीज रूपी प्रमाण को देखकर मुझे होने वाले आनंद को फिर से ताज़ा करने के लिये मैंने एक दिन प्रातः उस बंद डिबिया को खोला। सीलबंद लिफ़ाफ़ा तो जैसा का वैसा था, परन्तु आश्चर्य! तावीज गायब था। शोकाकुल होकर मैंने हर सन्देह को मिटाने के लिये लिफ़ाफ़ा फाड़कर देखा। साधु की भविष्यवाणी के अनुसार, जिस शून्य से साधु ने उसे आमंत्रित किया था उसी शून्य में वह वापस चला गया था।

दयानन्दजी के शिष्यों के साथ मेरे सम्बन्ध क्रमशः अधिकाधिक बिगड़ते चले गये। मेरी दृढ़ उदासीनता से चिढ़कर सारे आश्रमावासी मुझसे दूर होते गये। जिस ‘आदर्श’ के लिये मैंने अपने घर को और अपनी सारी लौकिक आशा-आकांक्षाओं को छोड़ दिया था, उस आदर्श का ध्यान करने की मेरी दृढ़ नियमनिष्ठा पर चारों ओर से छिछली तानाकशी होने लगी।

दारुण आत्मिक दुःख से व्यथित होकर एक दिन भोर में ही मैंने यह निश्चय करके अटारी में प्रवेश किया कि जब तक उत्तर नहीं मिलेगा तब तक मैं प्रार्थना करता ही जाऊँगा।

“हे करुणामयी जगन्माते! या तो तुम स्वयं ही दिव्य दर्शनों के माध्यम से मुझे सिखाओ, या फिर जिस के माध्यम से सिखाओगी उस गुरु को भेज दो!”

कई घंटें बीत गये पर सुबक सुबक कर की जा रही मेरी प्रार्थनाओं का कोई उत्तर नहीं आया। अचानक मुझे ऐसा लगा मानो मैं सशरीर ऊपर उठता हुआ असीम महाशून्य में पहुँच गया हूँ।

“तुम्हारे गुरु आज आयेंगे।” महाशून्य में मानो सब तरफ से, पर न जाने कहाँ से एक दिव्य नारी स्वर गूँजा ।

इतने में असीम जगत् के उस दिव्य अनुभव को एक निश्चित स्थान से आयी चीख ने छिन्न भिन्न कर दिया। नीचे रसोईघर से हबू नाम का एक युवा पुजारी मुझे पुकार रहा था।

“मुकुन्द, बहुत हो गया ध्यान! यहाँ एक काम पर तुम्हें जाना है।”

कोई दूसरा दिन होता तो मैंने पलटकर जवाब दे दिया होता; परन्तु अब मैंने अपना अश्रुसिक्त, रो-रोकर सूजा हुआ चेहरा पोंछा और चुपचाप उसके पास चल दिया। हबू और मैं वाराणसी में हमारे आश्रम से दूर स्थित बंगाली टोले के बाज़ार में जाने के लिये निकले। हम बाजार में सामान खरीद रहे थे; सूर्य तप तो रहा था, पर अभी मध्याह्न नहीं हुआ था, इसलिये उसने अपना उग्र रूप अभी धारण नहीं किया था। हम दोनों गृहिणियों, गाईडों, पंडे-पुरोहितों, सादे वस्त्र धारण कर रखी विधवाओं, सम्माननीय ब्राह्मणों और वाराणसी में सर्वत्र विचरणशील साँडों की रंग-बिरंगी भीड़ में से रास्ता निकालते जा रहे थे। हम आगे-आगे बढ़ते ही जा रहे थे कि मैंने अपनी गर्दन घुमाकर एक आसानी से ध्यान में भी न आनेवाली संकरी गली की ओर देखा।

गली के छोर पर स्वामियों का गेरूआ परिधान धारण किये एक महापुरुष निश्चल खड़े थे। उन पर दृष्टि पड़ते ही मुझे ऐसा लगा मानो युगयुगान्तर से मैं उन्हें जानता था। एक क्षण के लिये मेरी प्यासी आँखों ने उनका लोलुपता से पान किया। परन्तु फिर मन में संशय जाग उठा।

मेरा मन कहने लगा, “इस परिव्राजक संन्यासी का चेहरा तुम्हारे किसी परिचित से शायद मिलता-जुलता है। स्वप्नदर्शी, चलते चलो।”

दस मिनट पश्चात् मेरे पाँव सुत्र हो गये। ऐसा लगा जैसे दोनों पाँव पत्थर बन गये हों और अब मेरा भार आगे ढोने में असमर्थ हो गये हों। बड़े परिश्रम से मैं पीछे की ओर मुड़ा, तुरन्त दोनों पाँव स्वाभाविक अवस्था में आ गये। फिर पीछे मुड़ने पर पुनः वही विचित्र भारीपन लौट आया।

“वह महापुरुष मुझे चुंबकीय ढंग से अपनी ओर खींच रहे हैं!” इस विचार के मन में आते ही मैंने अपने थैले हबू के हाथ में थमा दिये। वह आश्चर्य से मेरे पाँवों का नाच देख रहा था। अब वह खिलखिलाकर हँस पड़ा।

“तुम्हें क्या तकलीफ़ है? पागल तो नहीं हो गये हो ?”

मेरे मन में तुमुल मचा रही भावना के कारण मैंने कोई उत्तर नहीं दिया; चुपचाप तेजी से चल दिया।

मैं ऐसे वापस चला जैसे मुझे पंख लग गये हों और शीघ्र ही उस गली में जा पहुँचा। उस ओर दृष्टि उठाते ही मैंने देखा कि वह शांत मूर्त्ति स्थिर दृष्टि से मेरी ही दिशा में देख रही थी। कुछ ही उत्कंठापूर्ण कदम मैंने उठाये तो सीधे उनके चरणों में पहुँच गया।

“गुरुदेव!” यह दिव्य चेहरा वही था जिसे मैंने हज़ार बार दिव्य दर्शनों में देखा था। नुकीली दाढ़ी और लहाराते केशों से सज्जित सिंह समान मस्तक में स्थित उन शांत, तेजस्वी नेत्रों ने प्रायः मेरे रात्रिकालीन विश्रृंखल ध्यान के धुंधलेपन से ऐसे झाँककर देखा था जैसे उनमें कोई आश्वासन झलक रहा हो, जिसे मैं पूरी तरह समझ नहीं पाता था।

“ओ मेरे प्रिय, तुम मेरे पास आ गये!” आनन्दकंपित स्वर में मेरे गुरु बंगाली भाषा में बार-बार यह कह रहे थे। “कितने वर्षों से मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था !”

निःशब्दता की एकता में हम दोनों एक हो गये; शब्दों का प्रयोजन निकृष्टतम प्रतीत होने लगा। कायल करनेवाला संवाद गुरु के हृदय से शब्दरहित सान्त्वना बन कर शिष्य के हृदय में समाता चला गया। अपने अंतर्मन में मैं निर्विवाद रूप जान गया कि मेरे गुरु ईश्वर को जानते हैं और मुझे ईश्वर तक पहुँचा सकते हैं। इस जीवन का अन्धकार पूर्व जीवन की स्मृतियों के मधुर अरुणोदय में अदृश्य हो गया। रोमांचक समय ! भूत, वर्तमान और भविष्य कालचक्र पर चक्राकार घूमते दृश्य हैं। सूर्य इन पवित्र चरणों में मुझे पहली बार नहीं देख रहा था !

मेरा हाथ पकड़कर मेरे गुरु मुझे काशी के राणामहल क्षेत्र में स्थित अपने डेरे पर ले गये। उनका बलवान शरीर दृढ़ कदमों से आगे बढ़ता था। इस समय उनकी आयु लगभग पचपन वर्ष की थी परन्तु उनकी लम्बी और सीधी देह में युवकों की-सी चपलता और कार्यक्षमता थी। उनकी काली, विशाल, सुन्दर आँखों में अथाह ज्ञान का तेज था । हल्के-से घुंघराले केश उनके रौबीले मुख को सौम्यता प्रदान कर रहे थे। उनमें शक्ति और सौम्यता का सूक्ष्म संगम था।

जब गंगा किनारे स्थित एक मकान की पत्थर से बनी बाल्कनी, जहाँ से गंगा साफ दिखायी देती थी, की ओर हम जा रहे थे, तब उन्होंने प्यार से कहा:

“मैं अपने आश्रम और जो कुछ भी मेरा है, वह सब तुम्हें दे दूँगा।” “गुरुदेव, मैं केवल ज्ञान और ईश्वरप्राप्ति के लिये आपके पास आया हूँ। मुझे आपका केवल वही गुप्तधन चाहिये!”

मेरे गुरु ने जब पुनः बोलने के लिये मुँह खोला तब तक सांध्य आलोक की धूमिलता आधी उतर आयी थी। उनकी आँखों में अथाह स्नेह झलक रहा थी।

“मैं तुम्हें अपना निःस्वार्थ प्रेम प्रदान करता हूँ।”

अमूल्य शब्द! मेरे कानों में दोबारा उनके प्रेम का यह रस पड़ने तक एक चौथाई शताब्दी बीत गयी। उनके होंठ भावोत्कटता प्रकट करने में अनभिज्ञ थे; उनके सागर समान विशाल हृदय को मौन प्रिय था।

“क्या तुम भी मुझे वैसा ही निःस्वार्थ प्रेम दोगे?” वे शिशुसुलभ आशा के साथ मेरी ओर देख रहे थे।

“मैं आपसे सदा सर्वदा के लिये प्रेम करूंगा, गुरुदेव!”

“साधारण प्रेम स्वार्थी होता है, उसका मूल कामनाओं और तृप्तियों की दलदल में स्थित होता है। दिव्य प्रेम में कोई शर्त नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती, कोई परिवर्त्तन नहीं होता। शुद्ध प्रेम के स्तम्भनकारी स्पर्श से मानवी हृदय में नित्य होने वाले परिवर्त्तन सदा के लिये रुक जाते हैं।” विनम्रतापूर्वक उन्होंने आगे कहा, “यदि कभी भी तुम मुझे ईश्वरप्राप्ति की अवस्था से गिरता देखो, तो मुझे वचन दो कि तुम मेरा सिर अपनी गोद में लेकर मुझे उस प्रियतम प्रभु के पास लौटा लाने में सहायता करोगे, जिसे हम दोनों पूजते हैं।”

फैलते हुए अन्धकार में वे उठकर खड़े हुए और मुझे अन्दर एक कमरे में ले गये। हम आम और बादाम की कुछ मिठाईयाँ खाने लगे। साथ-साथ वार्तालाप चल रहा था। अपने वार्तालाप में उन्होंने बिना किसी आलोचनात्मक रूख के, सहजभाव से मेरे स्वभाव का गहरा ज्ञान व्यक्त किया। उनकी अन्तर्जात विनम्रता और अगाध ज्ञान के प्रताप को देखकर मैं विस्मय-विभोर हो गया।

“अपने तावीज़ के लिये दुःख मत करो। उसका उद्देश्य पूरा हो चुका है।” किसी दैवी दर्पण की भाँति मेरे गुरु ने स्पष्टतया मेरे सम्पूर्ण जीवन के प्रतिबिंब को देख लिया था।

“गुरुदेव, आपकी उपस्थिति की जीवन्त सच्चाई का आनन्द किसी भी प्रतीक से कहीं बढ़कर है।”

“जहाँ तक आश्रम में तुम्हारी दुःखद परिस्थिति का सम्बन्ध है, तो उसमें परिवर्तन का समय आ गया है।”

मैंने अपने जीवन का कोई भी उल्लेख नहीं किया था, उस का कोई भी उल्लेख अब निरर्थक प्रतीत हो रहा था! उनके सहज साधारण ढंग को देखते हुए यह बात मेरी समझ में आ गयी थी कि उनकी दिव्य दृष्टि पर किसी प्रकार का विस्मय प्रकट करना उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।

“तुम्हें कोलकाता लौट जाना चाहिये। मानवजाति के प्रति अपने प्रेम से अपने रिश्तेदारों को ही क्यों वंचित करों ?”

उनके इस सुझाव से मैं निराश हो गया। मेरे परिवार के घर लौट आने का अनुरोध करने वाले अनेक पत्रों की मैं उपेक्षा करता रहा था, तब भी परिजन मेरे लौटने की भविष्यवाणी कर ही रहे थे। अनंत ने तो कहा था, “इस पक्षी शावक को आध्यात्मिक आकाश में उड़ लेने दो। वहाँ के भारी वातावरण में इसके पंख थक जायेंगे। तब हम इसे घर की ओर नीचे झपट्टा मारते और अपने पंख समेटकर चुपचाप अपने पारिवारिक घोंसले में आराम करते देखेंगे।” उत्साह भंग करने वाली यह तुलना मेरे मन में अभी ताज़ी थी और मैं कोलकाता की दिशा में कोई “झपट्टा न मारने” के लिये कृतसंकल्प था।

“गुरुदेव, मै लौटकर घर वापस नही जाऊंगा परंतु मैं आपके साथ कही भी आने के लिये तैयार हूँ। कृपा करके मुझे अपना नाम और पता बता दीजिये ।”

“स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि। मेरा मुख्य आश्रम श्रीरामपुर में रायघाट लेन में है। यहाँ मैं केवल थोड़े दिनों के लिये अपनी माँ से मिलने आया हूँ।”

भगवान की अपने भक्तों के साथ गूढ़ लीला देखकर मैं हैरान था। श्रीरामपुर कोलकाता से केवल बारह मील दूर है, फिर भी उस इलाके में कभी मुझे अपने गुरु की झलक नहीं मिली। एक दूसरे से मिलने के लिये हमें यात्रा करके लाहिड़ी महाशय की स्मृतियों से पुनीत प्राचीन नगरी काशी आना पड़ा। इस नगरी की धरती को बुद्ध, शंकराचार्य⁵ और अनेकानेक योगियों, अवतारों की चरणरज ने भी पवित्र किया है।

“तुम चार सप्ताहों में मेरे पास आ जाओगे।” श्रीयुक्तेश्वर के स्वर में पहली बार कठोरता आ गयी थी। “अब जब कि मैंने तुम्हें अपने चिरंतन प्रेम के बारे में बता दिया है और तुम्हें पाने पर अपना हर्ष प्रकट कर दिया हैं, तो तुम मेरे अनुरोध की अवहेलना करने पर तुले हुए हो। अगली बार जब हम मिलेंगे, तब तुम्हें अपने में मेरी रुचि को पुनः जागृत करना पड़ेगा। मैं आसानी से तुम्हें शिष्य रूप में स्वीकार नहीं करूँगा: मेरी कठोर शिक्षा के आज्ञापालन द्वारा सम्पूर्ण समर्पण तुम्हें करना होगा।”

मैं दुराग्रहपूर्वक चुप रहा। मेरे गुरु ने शीघ्र ही मेरी समस्या को पहचान लिया।

“तुम समझते हो कि तुम्हारे रिश्तेदार तुम पर हँसेंगे ?”

“मैं लौटकर नहीं जाऊँगा।”

“तुम तीस दिन में लौट जाओगे।”

“कदापि नहीं।”

इस वादविवाद से उत्पन्न तनाव में कोई कमी नहीं आयी। मैंने उनके चरणों में आदरपूर्वक प्रणाम किया और वहाँ से चल दिया। अर्द्धरात्रि के अन्धकार में आश्रम की ओर चलता हुआ मैं सोचता जा रहा था कि हमारी इस अद्भुत भेंट का अन्त इतना बेसुरा क्यों हुआ? माया का तराजू प्रत्येक आनन्द के साथ समतुल्य दुःख भी तौल देता है! मेरा किशोर हृदय अभी मेरे गुरु की रूपांतरकारी अँगुलियों के लिये पर्याप्त मुलायम नहीं बना था।

दूसरे दिन सुबह मैंने देखा कि आश्रमवासियों का मेरे प्रति द्वेषभाव और भी अधिक बढ़ गया है। वे नित्य अशिष्टताओं से मुझे दिन भर सताने लगे। तीन सप्ताह इस प्रकार बीत गये; फिर दयानन्दजी एक सम्मेलन में भाग लेने के लिये मुम्बई चले गये। मुझ अभागे के सिर पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा।

“मुकुन्द परजीवी है। आश्रम की सुविधाओं का तो लाभ उठा रहा है पर बदले में आश्रम के लिये कुछ नहीं करता।” एक दिन मुझ पर चल रही यह टीका-टिप्पणी मेरे कानों में पड़ी तो पहली बार मुझे खेद हुआ कि मैंने सारा पैसा पिताजी को वापस भेज देने के आदेश को मान लिया था। भारी हृदय से मैं अपने एकमात्र मित्र जितेन्द्र के पास जा पहुँचा।

“मैं आश्रम छोड़कर जा रहा हूँ। जब दयानन्दजी लौट आयें तो उनके चरणों में मेरा प्रणाम कहकर मेरी ओर से क्षमा माँग लेना।”

“मैं भी यह आश्रम छोड़कर आ रहा हूँ। यहाँ मेरे ध्यान करने के प्रयासों पर प्रतिक्रिया का हाल भी तुम्हारे जैसा ही है।” जितेन्द्र निश्चयपूर्वक बोल रहा था।

“मैं एक ईश्वरप्राप्त संत से मिला हूँ। चलो हम उनके पास श्रीरामपुर चलते हैं।”

और इस प्रकार "पक्षी" कोलकाता के संकटजनक रूप से निकट "नीचे झपटने" की तैयारी कर रहा था।





¹ [संस्कृत – “परिष्कृत. पूर्ण” संस्कृत सभी इंडो-यूरोपियन भाषाओं की अग्रजा है। उसकी लिपि को देवनागरी कहा जाता है जिसका शब्दश: अर्थ है “देवों के नगर की”। प्राचीन भारत के महान् व्याकरणकर्त्ता पाणिनी ने संस्कृत की गणितशास्त्रीय और मानसशास्त्रीय दृष्टि से पूर्णता का गौरव करते हुए कहा था, “जो मेरे व्याकरण को समझ लेगा वह भगवान को समझ जायेगा।” जो भाषा के मूल तक पहुँच जायेगा वह सचमुच सर्वज्ञ बन जायेगा।]

² [यह जितेन्द्र वो जतिनदा (जतिन घोष) नहीं थे जो बाघों से अपनी यथासमय विमुखता के लिये पाठकों को याद होंगे।]

³ [हिन्दू शास्त्रों में कहा गया है कि पारिवारिक प्रीति यदि समस्त वरदानों के दाता – जिसके वरदानों में सगे-सम्बन्धियों से प्रेम करना भी शामिल है, स्वयं जीवन के वरदान के बारे में तो कहना ही क्या – को पाने में बाधा बनती है तो वह प्रीति भी मायावी है। ईसा मसीह ने भी इसी प्रकार कहा था “जो मुझसे अधिक अपने माता या पिता से प्रेम करता है वह मेरे योग्य नहीं।” — मत्ती 10:37 (बाइबिल)]

⁴ [शास्त्रविहित। शास्त्र का शब्दशः अर्थ है “पवित्र ग्रंथ”, जिसके चार प्रकार हैं: श्रुति, स्मृति, पुराण, तंत्र। इन विस्तृत ग्रन्थों में धार्मिक और सामाजिक जीवन से सम्बन्धित प्रत्येक पहलु का तथा विधि, चिकित्सा, स्थापत्य कला, कला विज्ञान आदि क्षेत्रों का आधार है। श्रुति वे हैं जो सीधे सुने गये – वेद। स्मृति जनश्रुति में चली आ रही कहानियों का संकलन है जो प्राचीन काल में कभी अंततः लिख ली गयीं। इन में संसार के सबसे लम्बे महाकाव्य रामायण और महाभारत हैं। पुराण का शब्दशः अर्थ है प्राचीन रूपक। ये अठारह हैं। तन्त्र का शब्दशः अर्थ है धर्म-कर्म या अनुष्ठान पद्धति या कर्मकाण्ड। इन ग्रन्थों में गहन सत्यों को विस्तृत प्रतीकात्मकता के पर्दे में ढंककर प्रस्तुत किया गया है।]

⁵ [भारत के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक श्रीमद् शंकराचार्य गोविन्द यति के शिष्य थे। गोविन्द यति गौड़पाद के शिष्य थे। शंकराचार्य ने गौड़पादकृत माण्डूक्य कारिका पर अपना सुविख्यात भाष्य लिखा। अखंडनीय तर्क और अत्यंत सुन्दर शैली में शंकराचार्य ने वेदान्त दर्शन की अद्वैतवादी भाव में व्याख्या की उस महान अद्वैतवादी ने भक्ति-प्रेममूलक काव्यों की भी रचना की है। उनके 'देव्यपराध क्षमापन' स्तोत्र का ध्रुवपद है, 'कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति', अर्थात् कुपुत्र तो कभी हो भी सकता है, परन्तु कुमाता कभी नहीं हो सकती।
शंकराचार्य के एक शिष्य सनन्दन ने 'ब्रह्मसूत्र' पर एक भाष्य लिखा। इस भाष्य की पांडुलिपि आग में जल गयी परन्तु शंकराचार्य ने (उन्होंने एक बार उस पर नज़र घुमायी थी) अपने शिष्य को उसका एक-एक शब्द बता दिया। 'पंचपदिका' नामक उक्त भाष्य का आज भी विद्वान लोग अध्ययन करते हैं।
एक अलौकिक घटना के पश्चात् शिष्य सनन्दन को नया नाम मिला। एक दिन नदी तट पर वे बैठे थे तभी उन्हें नदीपार से शंकराचार्य द्वारा बुलाये जाने की आवाज सुनायी दी। सनन्दन ने तुरन्त नदी में प्रवेश किया। उनकी श्रद्धा और उनके पाँव, दोनों को ही तब मजबूत आधार मिला जब शंकराचार्य ने प्रचंड वेग से बहते जल में उनके प्रत्येक पदक्षेप के नीचे एक कमल उत्पन्न कर दिया। अब शिष्य को पद्यपाद कहा जाने लगा, अर्थात् कमल चरण।
पंचपदिका में पद्मपाद ने विविध प्रकार से अपने गुरु के प्रति भक्ति और प्रेम व्यक्त किया है। शंकराचार्य ने स्वयं ये सुन्दर पंक्तियाँ लिखी थीं:
दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः स्पर्शक्षेत्तत्र कल्प्यः स नयति यदहो स्वर्णतामश्मसारम् । न स्पर्शत्वं तथाऽपि श्रितचरणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये स्वीयं साम्यं विधत्ते भवति निरूपमस्तेन वाऽलौकिकोऽपि ॥ (शत श्लोकी – श्लोक १)
अर्थात्, मध्ये गुरु के समतुल्य त्रिभुवन में कुछ भी नहीं है। पारसमणि के अस्तित्व की कल्पना को भी यदि सच मान लिया जाय तो वह भी लोहे को केवल सोना बना सकती है, दूसरी पारसमणि नहीं बना सकती। किन्तु पूज्य सद्गुरु के चरणों में जो शिष्य आश्रय लेते हैं उन्हें सदगुरु अपने समान ही बना देते हैं। इसलिये गुरु अनुपम है, बल्कि अलौकिक है।
भगवान शंकराचार्य में संतत्व, पांडित्य और कर्मठता का दुर्लभ मिलाप हुआ था। केवल बत्तीस वर्ष ही ये इस जगत् में रहे. परन्तु उसमें से भी अनेक वर्ष अपने अद्भुत मत का भारत के कोने-कोने में प्रसार करते हुए उन्होंने सम्पूर्ण देश की यात्राएँ करने में विताये। वे जहाँ भी जाते, उनके अधरों से निःमृत होने वाले ज्ञानामृत का पान करने के लिये विशाल जनसमुदाय एकत्रित होते।
शंकराचार्य ने देश की उन्नति के लिये जो अनेकानेक सुधार किये उनमें प्राचीन स्वामी परम्परा का पुनर्गठन भी सम्मिलित है। उन्होंने देश के चार कोनों में चार मठों की भी स्थापना की– दक्षिण में श्रृंगेरी में, पूर्व में पुरी में, पश्चिम में द्वारका में तथा उत्तर में बद्रीनाथ में।
राजाओं और जनसामान्य का आश्रय एवं समर्थन प्राप्त ये मठ संस्कृत व्याकरण, तर्कशास्त्र तथा वेदान्त दर्शन में विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करते हैं। भारत के चार कोनों में अपने मठ बनाने के पीछे शंकराचार्य का मुख्य हेतु यह था कि इस विशाल देश में धार्मिक और राष्ट्रीय एकता बढ़े। अभी भी भारत में तीर्थयात्रियों को विविध धर्मदाय संस्थाओं या धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों द्वारा संचालित धर्मशालाओं में निःशुल्क निवास की व्यवस्था प्राप्त होती है।]