Ek Yogi ki Aatmkatha - 15 in Hindi Spiritual Stories by Ira books and stories PDF | एक योगी की आत्मकथा - 15

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एक योगी की आत्मकथा - 15

{ फूलगोभी की चोरी }

“गुरुदेव! आपके लिये भेंट! इन छह बड़ी-बड़ी फूलगोभियों को मैंने अपने हाथों से लगाया था और इनकी देखभाल उसी ममता के साथ की थी जैसे कोई माँ अपने बच्चे की देखभाल करती है।” इतना कहकर मैंने बड़ी भाव भंगिमा के साथ गोभियों की टोकरी प्रस्तुत की।

“शाबाश!” श्रीयुक्तेश्वरजी ने सस्नेह मुस्करा कर अपनी स्वीकृति प्रकट की। “अभी इन्हें अपने कमरे में ही रखो; कल एक विशेष भोज में ये काम आ जायेंगी।”

कॉलेज की गर्मियों की छुट्टियाँ अपने गुरु के साथ उनके समुद्र तट पर स्थित पुरी आश्रम में बिताने के लिये मैं अभी-अभी पुरी पहुँचा था। गुरुदेव और उनके शिष्यों द्वारा निर्मित इस दोमंजिले छोटे-से सुन्दर आश्रम के सामने ही बंगाल की खाड़ी है।

खारी समुद्री हवा के झोंकों से और आश्रम के शान्त वातावरण से तरोताज़ा होकर दूसरे दिन प्रातः काल तड़के ही मैं जाग गया। गुरुदेव अपने कर्णमधुर स्वर में मुझे पुकार रहे थे। मैंने अपनी प्रिय फूलगोभियों पर एक दुलारभरी दृष्टि डाली और उन्हें हिफाजत से अपनी खटिया के नीचे रख दिया।

“आओ, समुद्र तट पर चलें।” गुरुदेव आगे-आगे चलने लगे। कई बालक शिष्य और मैं उनके पीछे फैले हुए झुण्ड में चलने लगे। गुरुदेव ने सौम्य आलोचना से भरी दृष्टि हम पर दौड़ायी।

“जब हमारे पाश्चात्य बंधुजन चलते हैं, तब सामान्यतया उन्हें तालबद्ध ढंग से चलना अभिमानास्पद लगता है। अब कृपया दो पंक्तियों में एक-दूसरे के साथ पग मिलाकर चलो।” जब इस आज्ञा का पालन करते हुए हम चलने लगे तो श्रीयुक्तेश्वरजी की दृष्टि हम पर जमी रही। उन्होंने गाना शुरू कर दिया: “लड़के चलते जाते हैं, पंक्ति में भाते हैं।” चुस्ती और फुर्ती से चलते अपने बालक शिष्यों के साथ जिस आसानी से पग मिलाकर श्रीयुक्तेश्वरजी चल रहे थे, उसे देखकर मैं विस्मित हुए बिना नहीं रह सका।

“ठहरो!” मेरे गुरु ने मेरी आँखों में आँखें गड़ा दीं। “तुमने याद से आश्रम के पिछवाड़े के दरवाज़े में ताला लगाया था ?”

“जहाँ तक मुझे लगता है, लगाया था गुरुजी!”

होठों पर दबी मुस्कुराहट लिये श्रीयुक्तेश्वरजी चन्द मिनटों के लिये चुपचाप खड़े रहे। “नहीं, तुम भूल गये,” आखिर वे बोले । “ईश-चिंतन को सांसारिक लापरवाही का बहाना नहीं बनाया जा सकता। तुमने आश्रम की सुरक्षा के अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की है। तुम्हें सजा मिलनी ही चाहिये।”

जब उन्होंने आगे कहा कि “तुम्हारी छह फूलगोभियाँ शीघ्र ही पाँच बन जायेंगी,” तो मुझे लगा वे कोई गूढ़ मज़ाक कर रहे हैं।

गुरुदेव का आदेश पाकर हम लोग वापस मुड़े और उसी प्रकार पंक्तिबद्ध चलते हुए आश्रम की ओर चल दिये। जब आश्रम के पास पहुँचे तो गुरुदेव ने कहा:

“यहाँ थोड़ी देर ठहरो। मुकुन्द! अपनी बायीं तरफ अहाते के उस पार की सड़क को देखते रहो। अभी वहाँ एक आदमी पहुँचेगा। वही तुम्हारी सज़ा का माध्यम बनेगा।”

इन अगम्य शब्दों पर मन में उत्पन्न हुई परेशानी को मैंने मन में ही दबा लिया। सड़क पर शीघ्र ही एक किसान दिखायी पड़ा; अपने हाथ इधर-उधर उछालकर निरर्थक अंगविक्षेप करता हुआ वह हास्यास्पद ढंग से नाच रहा था। कौतूहल से लगभग जड़ सा बना मैं उस हास्यप्रद दृश्य को एकटक देखता रहा। जैसे ही वह आदमी सड़क पर ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ से वह हमारी दृष्टि से ओझल हो जाता, श्रीयुक्तेश्वरजी ने कहा, “अब वह लौटकर वापस आयेगा।”

उस किसान ने तुरन्त अपनी दिशा बदल दी और आश्रम के पिछवाड़े की ओर चल पड़ा। रेत के एक मैदान को पार कर वह पीछे के दरवाजे से आश्रम में घुस गया। जैसा कि मेरे गुरु ने कहा था, मैंने दरवाजे में ताला नहीं लगाया था। शीघ्र ही वह आदमी मुझे बहुमूल्य लगने वाली मेरी एक गोभी हाथ में लिये बाहर आ गया। अब वह सम्पत्ति की महिमा से पूर्ण होकर सम्भ्रान्त ढंग से चलने लगा।

इस हास्य-नाटिका का घटनाक्रम, जिसमें मेरी भूमिका एक लूटे जा रहे किंकर्त्तव्यविमूढ़ व्यक्ति की-सी प्रतीत हो रही थी, इतना हतबुद्ध कर देने वाला भी नहीं था कि मैं ताव में आकर चोर का पीछा करना भूल जाऊँ। सड़क की ओर आधी दूर ही मैं पहुँचा था कि गुरुदेव ने मुझे वापस बुला लिया। हँसी के मारे सिर से पाँव तक उनका सारा शरीर हिल रहा था।

“बेचारे पगले को एक फूलगोभी चाहिये थी। मैंने सोचा उसे तुम्हारी असुरक्षित छोड़ दी गयी गोभियों में से एक मिल जाय तो अच्छा ही होगा!”

मैं दौड़कर अपने कमरे में पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि उस चोर ने, जो स्पष्टतः केवल सब्ज़ीचोर ही प्रतीत हो रहा था, कंबल पर खुले आम पड़ी मेरी सोने की अँगुठियों, घड़ी और पैसे को छुआ तक नहीं था। इस के बदले वह रेंगकर खटिया के नीचे घुस गया था जहाँ बाहर से बिलकुल भी दिखायी न देने वाली गोभियों की वह टोकरी थी जिसमें उसे अपनी एकमात्र मनोवांछित वस्तु मिल गयी।

उस दिन शाम को मैंने इस घटना को समझाने का अनुरोध श्रीयुक्तेश्वरजी से किया (मुझे लग रहा था कि इस घटना में कुछ सामान्य स्तर पर समझ में न आने वाली बातें थीं)।

मेरे गुरु ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। “किसी दिन यह बात तुम्हारी समझ में आ जायेगी। विज्ञान शीघ्र ही इन गुप्त नियमों में से अनेकों को खोज निकालेगा।”

कुछ वर्षों बाद जब रेडियो की चमत्कारपूर्ण ध्वनि विस्मयचकित विश्व में गूंजने लगी तो मुझे गुरुदेव की भविष्यवाणी स्मरण हो आयी।

काल और देश की युगों पुरानी कल्पना का उन्मूलन हो गया; किसी का घर इतना छोटा नहीं रहा कि उसमें लन्दन या कोलकाता प्रविष्ट न हो सके ! मानव की सर्वव्यापकता के एक पहलू के निर्विवाद प्रमाण के आगे मन्दतम बुद्धि भी विस्तारित हो गयी।

फूलगोभी हास्य-नाटिका के "कथानक" को रेडियो¹ की सादृश्यता से सर्वोत्तम ढंग से समझा जा सकता है। मेरे गुरु एक सर्वांगपूर्ण मानवरेडियो थे। विचार और कुछ न होकर केवल आकाश (Ether) में संचरण करने वाले सूक्ष्म स्पन्दन हैं। जिस प्रकार उचित स्वर-समंजन करते ही (स्टेशन मिलाते ही) हर दिशा से आनेवाले हज़ारों अन्य कार्यक्रमों में से आपको जो गाना सुनना है वही गाना रेडियो पकड़ लेता है, उसी प्रकार विचारों को प्रसारित करने वाले विश्व के मानव-मनों के असंख्य विचारों में से एक अचूक प्रसंगोचित विचार (फूलगोभी के लिये लालायित उस अर्द्धविक्षिप्त मनुष्य के विचार) के प्रति श्रीयुक्तेश्वरजी उस समय अत्यंतसंवेदनशील रूप से ग्रहणशील हो गये थे। समुद्र तट की ओर चलते समय जैसे ही गुरुदेव ने उस किसान की साधारण लालसा के विचार को पकड़ा वैसे ही वे उस लालसा की पूर्ति करने के लिये तैयार हो गये। उनकी दिव्य दृष्टि ने शिष्यों को दृष्टिगोचर होने के पहले ही सड़क पर नाचते आ रहे उस आदमी को देख लिया था। आश्रम के दरवाज़े में ताला लगाने की मेरी भूल से गुरुदेव को मुझे अपनी प्रिय गोभियों में से एकसे वंचित कर देने का सहज बहाना मिल गया था।

इस प्रकार एक ग्राही यंत्र का काम करने के बाद श्रीयुक्तेश्वरजी ने अपनी अत्यंत शक्तिशाली इच्छाशक्ति को प्रयुक्त कर एक प्रसारण-यंत्र का काम किया।² उस भूमिका में उन्होंने उस मनुष्य को अपनी दिशा बदलने और केवल एक फूलगोभी के लिये एक निश्चित कमरे में जाने का सफलतापूर्वक निर्देश दिया।

अंतर्ज्ञान आत्मा का मार्गदर्शन है, जो मनुष्य के मन में तब स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है जब वह शांत होता है। लगभग हर व्यक्ति को कभी न कभी कोई सच्चा “पूर्व संकेत” मिलने का अनुभव है, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं होता या कभी न कभी लगभग हर व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति को अपने विचार ऐसे के ऐसे सम्प्रेषित किये हैं।

चंचलता और अशान्ति की “खरखराहट” से मुक्त हुआ मानव मन जटिल रेडियो यन्त्रावलि के समस्त कार्य करने में समर्थ हो जाता है, जिसमें वह विचारों को भेज भी सकता है और ग्रहण भी कर सकता है। तथा अवांछनीय विचारों को अन्दर आने से रोक भी सकता है। जिस प्रकार किसी रेडियो प्रसारण केन्द्र की शक्ति वह कितनी विद्युत्शक्ति को काम में ला सकता है उस पर निर्भर करती है, उसी प्रकार मनुष्यरूपी रेडियो की परिणामकारिता हर व्यक्ति में विद्यमान इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।

सभी विचार हमेशा के लिये ब्रह्माण्ड में स्पन्दित होते रहते हैं। गहन एकाग्रता के द्वारा सिद्ध पुरुष किसी भी मनुष्य के विचारों को जान सकता है, चाहे वह मनुष्य जीवित हो या मृत । विचार किसी व्यक्ति में नहीं बल्कि सृष्टि में अवस्थित हैं; किसी सत्य का सृजन नहीं किया जा सकता, केवल उसे जाना जा सकता है। मनुष्य के गलत विचार उसके विवेक की छोटी बड़ी त्रुटि के परिणाम हैं। योग-विज्ञान का लक्ष्य मन को शान्त करना है, ताकि विकार रहित होकर वह अंतर्वासी परमात्मा की अमोघ मन्त्रणा सुन सके।

रेडियो और टेलिविजन के कारण लक्ष लक्ष लोग घर बैठे ही सुदूर स्थित लोगों की आवाज़ तत्क्षण सुन सकते हैं और उन्हें देख भी सकते हैं, जो इस बात का प्रथम अस्फुट-सा वैज्ञानिक संकेत है कि मनुष्य सर्वत्र व्याप्त आत्मा है। यद्यपि अहंकार बर्बरतम तरीकों से उसे अपना दास बनाये रखने का यत्न करता है, तथापि मनुष्य किसी स्थान में आबद्ध शरीर नहीं बल्कि तत्त्वरूप से सर्वव्यापी आत्मा है।

शरीर-विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त चार्ल्स राबर्ट रिशेट³ ने कहा है: “अत्यन्त विचित्र, अत्यन्त विस्मयकारी, अत्यन्त असम्भाव्य प्रतीत होने वाली बातें अभी भी प्रत्यक्ष सामने आ सकती हैं जिनके एक बार प्रतिष्ठापित हो जाने पर हमें उसी तरह आश्चर्य नहीं होगा, जिस तरह गत एक शताब्दी के दौरान विज्ञान द्वारा किये गये आविष्कारों पर नहीं होता। ऐसा मान लिया जाता है कि जिन चमत्कारिक घटनाओं को हम अब बिना विस्मित हुए स्वीकार कर लेतें हैं, वे हमारी उत्कंठा को इसलिये उत्तेजित नहीं कर पातीं, कि उन्हें हम भलीभाँति समझ चुके होते हैं। पर बात ऐसी नहीं है। यदि हमें अब वे चकित नहीं करतीं तो इस का कारण यह नहीं है कि वे भलीभाँति हमारी समझ में आ चुकी हैं, बल्कि उसका कारण यह है कि वे हमारे लिये अब परिचित हो चुकी है; क्योंकि यदि ऐसा हो कि जो बातें हमारी समझ में न आयें वे हमें चकित करती रहें, तो हमें हर बात पर–हवा में उछाले गये पत्थर के गिरने पर, बीज से वटवृक्ष बन जाने पर, गरमी पाकर पारे के फैलने पर, चुम्बक की ओर लोहे के खिंचने पर–आश्चर्यचकित होना चाहिये।

“आज का विज्ञान तो फिर भी एक साधारण बात है.. जिन आश्चर्यकारक सत्यों का हमारी आनेवाली पीढ़ियाँ आविष्कार करेंगी वे अभी भी हमारे चारों ओर विद्यमान हैं, और एक प्रकार से कहें तो हमारी आँखों में आँखें डालकर हमें घूर रहे हैं परन्तु फिर भी हम उन्हें नहीं देख पाते। केवल यह कहना कि हम उन्हें नहीं देख पाते, पर्याप्त नहीं है; हम उन्हें देखना ही नहीं चाहते, क्योंकि जैसे ही कोई अप्रत्याशित और अपरिचित तथ्य प्रकट होता है, हम उसे प्रचलित जानकारी की सर्वसामान्य चौखट में बिठा देने का प्रयास करते हैं, और कुपित हो उठते हैं कि यदि कोई उससे आगे के प्रयोग करने का दुस्साहस करता है !”

इतने अविश्वसनीय ढंग से मेरी गोभी की चोरी हो जाने के कुछ ही दिन बाद एक बड़ी ही विनोदी घटना घटी। मिट्टी के तेल का एक दीया ढूँढने पर भी नहीं मिल रहा था। अपने गुरु की सर्वदर्शी अंतदृष्टि का हाल ही में परिचय मिलने से मैंने सोचा कि वे प्रदर्शित कर देंगे कि उस दीये को ढूँढना उनके लिये बच्चों का खेल है।

गुरुदेव मेरे मन की बात ताड़ गये। अति गम्भीरता का दिखावा करते हुए उन्होंने सब आश्रमवासियों से पूछताछ की। एक बालशिष्य ने स्वीकार किया कि उसने पिछवाड़े के आँगन में स्थित कुएँ पर जाने के लिये उस दीये का उपयोग किया था।

श्रीयुक्तेश्वरजी ने धीर-गम्भीर स्वर में आदेश किया: “उस दीये को कुएँ के पास खोजो।”

मैं दौड़कर वहाँ पहुँचा; दीया नहीं ! छोटा-सा मुँह बनाकर अपने गुरु के पास लौट आया। अब वे मेरी प्रत्याशा धूल में मिलने पर बिना किसी खेद के ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे थे।

“अफ़सोस कि मैं तुम्हें खोये हुए दीये तक नहीं पहुँचा सका; मैं कोई ज्योतिषी तो हूँ नहीं!” उनकी आँखें चमक उठी थीं। उन्होंने आगे कहा, “मैं तो ठीक से शेरलॉक होम्स⁴ भी नहीं हूँ !”

मैं समझ गया कि गुरुदेव किसी के कहने से या तुच्छ बातों में अपनी शक्तियाँ कभी प्रदर्शित नहीं करेंगे।

हँसी-खुशी कई सप्ताह तेज़ी से बीत गये। श्रीयुक्तेश्वरजी का एक नगर संकीर्त्तन शोभायात्रा निकालने का विचार था। उन्होंने मुझ से नगर की सड़कों तथा समुद्रतट से शिष्यों की शोभायात्रा ले जाने के लिये कहा। उत्सव (कर्क संक्रान्तिः दक्षिणायन प्रारंभ) के दिन प्रातःकाल से ही भीषण गर्मी थी।

“गुरुजी ! मैं शिष्य-मण्डली को नंगे पाँव उस अंगारों की तरह तप्त रेत पर कैसे ले जा सकूँगा।” मैंने हताश हो कर पूछा।

“ मैं तुम्हें एक गुप्त बात बताता हूँ। प्रभु एक मेघ-छत्र भेज देंगे; तुम सत्र सुखद वातावरण में चलोगे,” गुरुदेव ने कहा।

मैंने खुशी-खुशी शोभायात्रा की तैयारी की। हमारा दल आश्रम से सत्संग⁵ की पताका लेकर रवाना हुआ। इस पताका की परिकल्पना श्रीयुक्तेश्वरजी द्वारा तैयार की गयी थी, जिस पर तृतीय नेत्र⁶ या दिव्यचक्षु का प्रतीक बना हुआ था।

जैसे ही हम लोग आश्रम से बाहर निकले, मानो जादू से आकाश मेघाच्छन्न हो गया। देखने वालों के मुँह से भी आश्चर्योद्गार निकल पड़े जब वर्षा की हल्की बौछार भी हो गयी, जिससे नगर की सड़कें और समुद्र तट की तप्त रेत भी शीतल हो गयी।

दो घण्टों की संकीर्तन-यात्रा के दौरान सुखद बूँदें पड़ती रहीं। जिस क्षण हमारा दल आश्रम में लौट आया, उसी क्षण बादल और वर्षा, दोनों लुप्त हो गये ।

गुरुदेव के पास जाकर जब मैंने कृतज्ञता व्यक्त की, तो उन्होंने कहाः “देखा, भगवान हमारा कितना ध्यान रखते हैं? वे सबको प्रत्युत्तर देते हैं और सबका काम करते हैं। जैसे उन्होंने मेरी प्रार्थना पर वर्षा भेज दी, वैसे ही वे किसी भी भक्त की कोई भी सच्ची इच्छा पूर्ण करते हैं। लोग कदाचित् ही समझ पाते हैं कि भगवान कितनी बार प्रायः उनकी प्रार्थनाओं को पूर्ण करते हैं। भगवान कुछ गिने-चुने लोगों की ही सुनते हैं ऐसा नहीं है, बल्कि जो भी श्रद्धा से उनके चरणों में जाता है, उस प्रत्येक मनुष्य की प्रार्थना वे स्वीकार करते हैं। उनकी सन्तानों को अपने सर्वव्यापी परमपिता की प्रेमपूर्ण कृपालुता में अटल विश्वास रखना चाहिये।”⁷

श्रीयुक्तेश्वरजी सम्पात (शारदीय विषुव और वासंतिक विषुव) और अयनसंधि ( मकर संक्रान्ति: उत्तरायण; कर्क संक्रान्तिः दक्षिणायन) के दिन चार वार्षिक उत्सवों का आयोजन करते थे। इन अवसरों पर आसपास के और दूर-दूर से भी उनके शिष्य एकत्रित होते थे। मकर संक्रान्ति का आयोजन श्रीरामपुर में होता था। मैंने सर्वप्रथम जब इसमें भाग लिया तो उससे मुझे एक स्थायी कल्याणकारी लाभ हुआ।

प्रातःकाल सड़कों पर नंगे पाँव शोभायात्रा के साथ उत्सव आरम्भ हुआ। सैंकड़ों शिष्य मधुर स्वर में भजन-कीर्तन कर रहे थे; कुछ वादक बाँसुरी और खोल-करताल पर उनकी संगत कर रहे थे। हमारी गूंजती हरिनाम-स्तुति की ध्वनि को सुनकर नगर जन खुशी से अपने नीरस कर्त्तव्यों को छोड़कर रास्ते में पुष्पवृष्टि कर रहे थे। अनेक रास्तों से घूमते हुए यह शोभायात्रा आश्रम के आँगन में आकर समाप्त हुई। वहाँ हम अपने गुरु को चारों ओर से घेर कर नाम गान करते रहे। उस समय ऊपर के बरामदों से कुछ शिष्य हम सब पर गेंदे के फूल बरसा रहे थे।

बहुत से अतिथि आश्रम में ऊपर गये जहाँ उन्हें पनीर और संतरे से बनी खीरनुमा मिठाई दी गयी। मैं अपने गुरुबन्धुओं की ओर चला गया जो आज रसोइयों का काम कर रहे थे। इतनी बड़ी संख्या में जब लोग आते थे तब खाना बाहर खुली जगह में ही बड़े-बड़े हंडों में बनाना पड़ता था।

ईंट-मिट्टी के चूल्हों में जलने वाली लकड़ियों से धुआँ उठ रहा था जिससे आँखों में पानी आ रहा था, पर हम अपने काम में प्रसन्नतापूर्वक लगे हुए थे। भारत में धार्मिक उत्सवों को कभी कष्टकर नहीं माना जाता; प्रत्येक भक्त अपना-अपना योगदान देता है– कोई पैसा देता है, कोई चावल या सब्जियाँ अथवा कोई व्यक्तिगत परिश्रम की सेवा अर्पण करता है।

भोज की तैयारी की हर छोटी-मोटी बात का स्वयं ध्यान रखने के लिये शीघ्र ही गुरुदेव भी हम लोगों के बीच आ पहुँचे। हर क्षण व्यस्त रहते हुए भी वे अत्यन्त फुर्तीले युवा शिष्यों के साथ-साथ परिश्रम कर रहे थे।

ऊपर की मंज़िल पर हारमोनियम और खोल की संगत के साथ संकीर्तन चल रहा था। श्रीयुक्तेश्वरजी कौतुक के साथ उसे सुन रहे थे; उन्हें संगीत का पूर्ण ज्ञान था।

“वे बेसुरा गा रहे हैं!” गुरुदेव रसोइयों को छोड़कर संगीतवालों के बीच पहुंच गये। संगीत की धुन फिर सुनायी दी, इस बार वह सही स्वरताल में थी।

संसार में संगीत-विज्ञान की सबसे पहली जानकारी सामवेद में उपलब्ध है। भारत में संगीत, चित्रकला एवं नाट्यकला को दैवी कलाएँ माना जाता है। अनादि अनंत त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और शिव आद्य संगीतकार थे। शास्त्र-पुराणों में वर्णन है कि शिव ने अपने नटराज या विराट्-नर्तक के रूप में ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और लय की प्रक्रिया के नृत्य में लय के अनंत प्रकारों को जन्म दिया । ब्रह्मा और विष्णु करताल और मृदंग पर ताल पकड़े हुए थे।

विद्याकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती को सभी तार वाद्यों की जननी वीणा को बजाते हुए दिखाया गया है। हिंदू चित्रकला में विष्णु के एक अवतार कृष्ण को बंसी बजैया के रूप में चित्रित किया गया है; उस बंसी पर वे माया में भटकती आत्माओं को अपने सच्चे घर को लौट आने का बुलावा देने वाली धुन बजाते रहते हैं।

राग-रागिनियाँ या सुनिश्चित स्वरक्रम हिन्दू संगीत की आधारशिलाएँ हैं। छह मूल रागों की १२६ शाखाएँ-उपशाखाएँ हैं जिन्हें रागिनियाँ (पत्नियाँ) और पुत्र कहते हैं। हर राग के कम-से-कम पाँच स्वर होते हैं: एक मुख्य स्वर (वादी या राजा), एक आनुषंगिक स्वर (संवादी या प्रधानमंत्री), दो या अधिक सहायक स्वर (अनुवादी या सेवक), और एक अनमेल स्वर (विवादी या शत्रु)।

छह रागों में से हर एक राग की दिन के विशिष्ट समय और वर्ष की विशिष्ट ऋतु के साथ प्राकृतिक अनुरूपता है और हर राग का एक अधिष्ठाता देवता है जो उसे विशिष्ट शक्ति और प्रभाव प्रदान करता है। इस प्रकार (१) हिंडोल राग को केवल वसन्त ऋतु में उषाकाल में सुना जाता है, इससे सर्वव्यापक प्रेम का भाव जागता है; (२) दीपक राग को ग्रीष्म ऋतु में सांध्य बेला में गाया जाता है, इससे अनुकम्पा या दया का भाव जागता है; (३) मेघ राग वर्षा ऋतु में मध्याह्न काल के लिये है, इससे साहस जागता है; (४) भैरव राग अगस्त, सितम्बर, अक्तूबर महीनों के प्रातः काल में गाया जाता है, इससे शान्ति उत्पन्न होती है; (५) श्री राग शरद ऋतु की गोधूलि बेला में गाया जाता है, इससे विशुद्ध प्रेम का भाव मन पर छा जाता है; (६) मालकौंस राग शीत ऋतु की मध्यरात्रि में गाया जाता है; इससे वीरता का संचार होता है।

प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति और मानव के बीच ध्वनि संबंधों के इन नियमों को खोज निकाला। चूँकि प्रकृति नादब्रह्म या प्रणव झंकार या ओंकारध्वनि का घनीभूत रूप है, अतः मनुष्य विशिष्ट मंत्रों के प्रयोग द्वारा सारी प्राकृतिक अभिव्यक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर सकता है।⁸ इतिहास में १६वीं शताब्दी के बादशाह अकबर के दरबारी गायक तानसेन की उल्लेखनीय शक्तियों का वर्णन है। एक बार दिन में ही बादशाह ने उन्हें एक रात्रिकालीन राग गाने का आदेश दिया तो तानसेन ने एक मंत्र का प्रयोग किया जिससे महल के सारे परिसर में तत्क्षण अंधेरा छा गया।

भारतीय संगीत में स्वर सप्तक को २२ श्रुतियों में विभक्त किया गया है। स्वर के इन सूक्ष्म अन्तरालों के कारण संगीत की अभिव्यक्ति में छोटे छोटे भेद भी संभव हो जाते हैं जो १२ श्रुतियों के पाश्चात्य स्वरक्रम में दुष्प्राप्य होते हैं। हिन्दू पुराणों में सप्तक के सात मूल स्वरों का एक-एक रंग तथा किसी पक्षी या पशु के प्राकृतिक स्वर के साथ सम्बन्ध बताया गया है– सा का हरे रंग और मोर के साथ, रे का लाल रंग और चातक पक्षी के साथ, ग का सुनहरे रंग और बकरे के साथ, म का पीली छटा लिये श्वेत रंग और सारस पक्षी के साथ, पका काले रंग और कोकिला के साथ, ध का पीले रंग और घोड़े के साथ, नी का सभी रंगों के मिश्रण के और हाथी के साथ।

भारतीय संगीत में ७२ थाट या आधार स्वर समूह हैं। संगीतज्ञ के लिये किसी राग को लेकर उस राग की सीमा के अंतर्गत अपनी प्रतिभा के अनुसार संगीत निर्माण करने की अनन्त सम्भावनाएँ रहती हैं; वह उस राग के भाव को केन्द्र में रखकर उसके चारों ओर अपनी मौलिकता की सीमा तक उसे सजाता है। हिन्दू संगीतज्ञ पहले ही निर्धारित किये जा चुके स्वरों को पढ़-पढ़ कर संगीत का निर्माण नहीं करता; वह हर वादन या गायन के समय राग के ढाँचे को नये सुरों के वस्त्र पहनाता है और यह प्रायः एक ही धुन को लेकर करता है जिसमें वह सूक्ष्म स्वरों और लय के विभिन्न प्रकारों को बार-बार प्रयुक्त कर उन्हें निखारता है।

पाश्चात्य संगीत- रचनाकारों में बाक (Bach) ने स्वल्प विविधता के साथ सैकड़ों जटिल तरीकों से सुरों की पुनरावृत्ति की सुन्दरता और उसकी शक्ति को पहचान लिया था।

संस्कृत साहित्य में १२० तालों का वर्णन है। परम्परा के अनुसार हिन्दू संगीत के प्रथम आचार्य माने जाने वाले भरत मुनि भारद्वाज के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने कोकिला के गीत में ही ३२ तालों का शोध किया था। ताल या लय का मूल मानव शरीर की गति पर आधारित है– चलने का दुगना समय तथा निद्रावस्था में श्वासोच्छ्वास का तिगना समय जब श्वास की लंबाई प्रश्वास से दुगनी होती है– में निहित है।

भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही मानव के कंठस्वर को ध्वनि का सर्वांगपूर्ण साधन माना गया है। अतः हिन्दू संगीत प्रधानतः कंठस्वर के तीन सप्तकों में ही प्रतिबद्ध है। इसीलिये हिन्दू संगीत में स्वरसंगति (एक साथ उत्पन्न होने वाले स्वरों का परस्पर संबंध) की अपेक्षा स्वरक्रम (क्रमानुसार उत्पन्न होने वाले स्वरों का परस्पर संबंध) पर बल दिया गया है।

हिन्दू संगीत स्वानुभूतिपरक, आध्यात्मिक तथा व्यक्तिपरक कला है जिसका लक्ष्य वाद्यवृन्द की प्रतिभा प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि परम-आत्मा के साथ अपना मेल बिठाना है। भारतवर्ष के सभी प्रख्यात गीतों की रचना भागवतों अर्थात् ईशभक्तों द्वारा की गयी है। “संगीतज्ञ” को संस्कृत में भागवतार कहते हैं, अर्थात् “जो भगवान का गुणगान करता है।”

संकीर्तन योग आध्यात्मिक साधना का एक प्रभावशाली प्रकार है जिसमें मूलविचार और ध्वनि में तीव्र एकाग्रता तथा तन्मयता आवश्यक होती है। मानव स्वयं नादब्रह्म या ओम् ध्वनि की एक अभिव्यक्ति है, इसलिये ध्वनि उस पर तत्काल प्रबल प्रभाव डालती है। पौर्वात्य और पाश्चात्य, दोनों ही प्रकार का भक्तिसंगीत मनुष्य में आनन्द उत्पन्न कर देता है क्योंकि इस प्रकार का संगीत मनुष्य के मेरुदण्ड में स्थित चक्रों में से किसी चक्र में उतने समय के लिये स्पन्दनात्मक जागृति उत्पन्न कर देता है।⁹ आनन्द के उन क्षणों में उसे अपने ईश्वरीय मूल का अस्फुटसा स्मरण हो आता है।

उत्सव के दिन श्रीयुक्तेश्वरजी की ऊपर की बैठक से आती संकीर्तन की ध्वनि खाना बना रहे शिष्यों को चारों ओर उबलते-खौलते बर्तनों के बीच भी प्रेरणा दे रही थी। मेरे गुरु भाई और मैं आनन्दित होकर हाथ से ताल बजाते हुए टेक गा रहे थे।

सूर्यास्त तक हम लोगों ने अपने सैंकड़ों अतिथियों को खिचड़ी, सब्जी और चावल की खीर का भोजन करा दिया था। आँगन में हमने सूती दरियाँ बिछा दी थीं। शीघ्र ही तारों से भरे आकाश के नीचे जनसमूह बैठ गया और श्रीयुक्तेश्वरजी के अमृतमय ज्ञानोपदेश को मनोयोगपूर्वक सुनने लगा। उनके सार्वजनिक प्रवचनों में क्रिया योग और आत्म-सम्मानपूर्ण जीवन, शान्ति, दृढ़संकल्प, सादा आहार और नियमित व्यायाम के महत्त्व पर विशेष बल दिया जाता था।

अत्यंत छोटी आयु के बालशिष्यों ने फिर स्तोत्रपाठ किया; उसके बाद उत्कट संकीर्तन के साथ सभा विसर्जित हुई। रात दस बजे से अर्द्धरात्रि होने तक आश्रमवासियों ने बर्तनों और कड़ाहियों को माँजधोकर साफ किया तथा आँगन को भी साफ किया। गुरुदेव ने मुझे अपने पास बुलाया।

“तुम्हारे आज के और तैयारी में लगे गत पूरे सप्ताह के सहर्ष परिश्रम से मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें अपने साथ चाहता हूँ; आज तुम मेरे साथ सो सकते हो।”

यह एक ऐसा सौभाग्य था जिसके प्राप्त होने की मैंने कभी आशा भी नहीं की थी। हम थोड़ी देर के लिये गहन दैवी प्रशान्ति में निमग्न बैठे रहे। सोने के लिये हम दोनों के लेट जाने के दस मिनट बाद ही गुरुदेव उठ गये और पूरे कपड़े पहनने लगे।

“क्या हुआ गुरुदेव ?” अपने गुरु के पास सोने के आनन्द में अचानक विघ्नता का अंश आ गया।

“मुझे लगता है कि कुछ शिष्य ठीक से गाड़ियाँ न मिलने के कारण अब कुछ ही समय में यहाँ पहुँचने वाले हैं। चलो, हमें उनके लिये कुछ भोजन तैयार करके रखना चाहिये।”

“गुरुजी ! रात में एक बजे कोई नहीं आयेगा !”

“तुम सो जाओ; तुमने बड़ा कठिन परिश्रम किया है। पर मैं खाना बनाने जा रहा हूँ।”

श्रीयुक्तेश्वरजी का दृढ़ स्वर सुनते ही मैं पलंग से कूद पड़ा और उनके पीछे-पीछे ऊपर के ही तल्ले पर अन्दर की ओर की बाल्कनी से लगे रसोईघर में जा पहुँचा। इस छोटे-से रसोईघर को हम दैनिक उपयोग में लाते थे। शीघ्र ही चावल और दाल उबल रहे थे।

मेरे गुरु स्नेहपूर्वक मुस्कराये। “आज रात तुमने थकान और कठोर परिश्रम के भय को जीत लिया है; भविष्य में इनसे तुम्हें कभी परेशानी नहीं होगी।”

उनके श्रीमुख से आजीवन आशीर्वाद के शब्द निकले ही थे कि आँगन में पगध्वनि सुनायी पड़ी। मैं दौड़कर नीचे गया और दरवाज़ा खोला तो शिष्यों का एक दल अन्दर प्रविष्ट हुआ।

उनमें से एक ने कहाः “प्रिय बन्धु! ऐसे समय गुरुदेव को कष्ट देना हमें अच्छा नहीं लगता, परन्तु क्या करते ? गाड़ियों के समय के बारे में हमसे भूल हो गयी, पर हमने सोचा कि यहाँ तक आने के बाद अपने गुरु के दर्शन किये बिना लौट जाना भी उचित नहीं होगा।”

“वे आप लोगों की प्रतीक्षा कर रहे हैं और आप के लिये भोजन भी बना रहे हैं।”

श्रीयुक्तेश्वरजी की स्वागत-वाणी गूंज उठी। मैं विस्मयचकित अतिथियों को रसोईघर में ले गया। गुरुदेव मेरी ओर मुड़े। उनकी आँखों में चमक नाच रही थी।

“अब जब तुमने उनसे बातें कर ली हैं तो निश्चय ही तुम्हारे सन्देह का निवारण हो गया होगा कि सचमुच उनकी गाड़ी छूट गयी थी !”

आधे घण्टे बाद मैं ईशतुल्य गुरु के पास सोने के सौभाग्य की सुखद आशा करता हुआ उनके पीछे-पीछे उनके शयन-कक्ष में पहुँच गया।






¹ [१९३९ में बनाये गये एक रेडियो सूक्ष्मदर्शी यंत्र ने तब तक अज्ञात किरणों का एक नया संसार प्रदर्शित कर दिया। एसोसिएटेड प्रेस ने अपनी वार्ता में लिखाः “स्वयं मनुष्य तथा सभी प्रकार के जड़ माने जाने वाले पदार्थ अनवरत रूप से किरणें उत्सर्जित करते हैं, जिन्हें यह यन्त्र 'देखता' है। जो लोग विचार सम्प्रेषण (दूर संपर्क, टैलिपैथी), दिव्य दृष्टि और पूर्वज्ञान में विश्वास करते हैं उनके लिये इस घोषणा में उन अदृश्य किरणों के अस्तित्त्व का प्रथम वैज्ञानिक प्रमाण है जो सचमुच एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक संचरण करती हैं। यह रेडियो सूक्ष्मदर्शी यंत्र वस्तुतः एक रेडियो- स्पंदनावृत्ति वर्णक्रमदर्शी (Radio - Frequency Spectroscope) यंत्र है। यह ठंडे पड़े, प्रभाहीन जड़ पदार्थों के साथ वही करता है जो एक वर्णक्रमदर्शी यंत्र (Spectroscope) तारों का निर्माण करने वाले अणु-परमाणुओं के साथ करता है। मानव प्राणी तथा सभी सजीव वस्तुओं से निकलने वाली ऐसी किरणों के अस्तित्त्व का अनुमान वैज्ञानिकों को अनेक वर्षों से था। आज उनके अस्तित्त्व का प्रथम प्रायोगिक प्रमाण प्राप्त हुआ है। इस आविष्कार से यह स्पष्ट हो गया है कि सृष्टि का प्रत्येक अणु और परमाणु (Molecule) एक अविरत रेडियो प्रसारण केन्द्र है। इस प्रकार मृत्यु के बाद भी वह पदार्थ जो कभी मनुष्य था, अपनी सूक्ष्म किरणें प्रसारित करता रहता है। इन किरणों का तरंग दैर्घ्य (Wave-length) अब रेडियो प्रसारण में उपयोग में लायी जाने वाली रेडियो तरंगों के सबसे छोटे तरंग दैर्घ्य से भी छोटा और सबसे बड़े तरंग दैर्घ्य से भी बड़ा हो सकता है। इन तरंगों का जाल लगभग अकल्पनीय है। उनकी संख्या लक्षानुलक्ष है। केवल एक बड़ा परमाणु (Molecule) एक साथ दस लाख विभिन्न तरंग दैर्घ्य की किरणों को छोड़ सकता है। इस प्रकार की लम्बे तरंग दैर्घ्य की किरणें रेडियो-किरणों जैसी ही सरलता और गति से संचरण करती हैं। इन नयी रेडियोकिरणों और प्रकाश जैसी परिचित किरणों में एक विस्मयकारी अन्तर है। वह यह कि दीर्घकाल तक, हजारों वर्षों तक ये रेडियो किरणें अविचल पदार्थ वस्तु से निकलती ही रहेंगी।”]

³ ["अवर सिक्स्थ सेन्स" के लेखक (लन्दनः राइडर एण्ड कंपनी)।]

⁴ [सर आर्थर कॉनन डॉयल द्वारा लिखित जासूसी कथाओं का नायक]

⁵ [“सत्” का शब्दशः अर्थ है “अस्तित्व” या “सत्ता,” अतः " सत्त्व, सत्य।" “संग” का अर्थ है “साथ।” श्रीयक्केश्वरजी अपने आश्रम के संगठन को “सत्संग” कहते थे अर्थात "सत्य का साथ।" ]

⁶ [“बाइबिल में तृतीय नेत्र को एकमात्र नेत्र कहा गया है।” इसलिये यदि तुम्हारी आँख एक हो जाय, तो तुम्हारा पूरा शरीर प्रकाश से भर जायेगा।”– मनी 6:22 (बाइबिल)। गहन ध्यान में यह तृतीय नेत्र या दिव्यचक्षु ललाट के मध्यभाग में दिखायी देने लगता है। इस सर्वदर्शी नेत्र का शास्त्रों में विभिन्न नामों से उल्लेख किया गया है: तृतीय नेत्र पूर्व का तारा, अंतर्चक्षु, स्वर्ग से उतरता कबूतर, शिवनेत्र अंतर्ज्ञान का नेत्र, दिव्यचक्षु आदि ।]

⁷ [ “जिसने कान दिया है, क्या वही नहीं सुन पायेगा? जिसने आँख दी है, क्या वही नहीं देख पायेगा ? जो मनुष्य का ज्ञान देता है, क्या उसे ही ज्ञान नहीं होगा ?”– भजन संहिता (Psalm) 94:9-10 (बाइबिल)।]

⁸ [सभी देशों की लोक कथाओं में प्रकृति पर नियंत्रण की शक्ति रखने वाले मंत्रों का उल्लेख है। अमेरिका के रेड इंडियन लोगों ने वर्षा और हवा के लिये ध्वनि पर आधारित एक अनुष्ठानपद्धति विकसित की थी। महान हिंदू संगीतज्ञ तानसेन अपने गायन की शक्ति से अग्नि को शान्त कर सकते थे। कैलिफोर्निया के प्रकृति-वैज्ञानिक चार्ल्स केलॉग ने १९२६ में न्यूयॉर्क के अग्निशमन दल के लोगों के समक्ष आग पर स्वर कंपन के प्रभाव का प्रदर्शन किया था। "वायलिन बजाने के लिये उसके तारों पर जिस प्रकार का गज फेरा जाता है उसी प्रकार के एक बड़े गज की ऐल्युमिनियम के एक स्वरित्र द्विभुज (Tuning Fork) पर तीव्र गति से फेर कर उन्होंने रेडियो की सीटी की तरह कर्कश ध्वनि निकाली। तत्क्षण ही शीशे के ट्यूब के अन्दर दहकती पीले रंग की दो फुट ऊँची गैस की ज्वाला छोटी होकर छह इंच की फरफराती नीली ज्वाला बन गयी। उन्होंने फिर एक बार गज फेरा, एक और कर्कश सीटी-सी ध्वनि की चीख उभरी और उसी के साथ आग पूरी तरह बुझ गयी।”]

⁹[ मस्तिष्क एवं मेरुदण्ड में स्थित गुप्त चक्रों को जगाना योगी का पवित्र लक्ष्य होता है। बाइबिल पर भाष्य करने वाले पाश्चात्य भाष्यकार यह नहीं समझ पाये हैं कि नये नियम (New Testament) के प्रकाशितवाक्य नामक प्रकरण में योग विज्ञान का एक प्रकार का प्रतीकात्मक वर्णन है जो ईसामसीह ने यूहन्ना और अन्य निकट शिष्यों को सिखाया था। यूहन्ना ने "सात तारों के रहस्य" और "सात चर्चों" का उल्लेख किया है (प्रकाशितवाक्य 120); ये सात ज्योतिर्मय कमलों के प्रतीक हैं, जिन्हें योग-ग्रन्थों में मेरुदण्ड और मस्तिष्क में स्थित सात "गुरु द्वार" कहा गया है। इन ईश्वर नियोजित “निर्गम द्वारों" से ही योगी वैज्ञानिक ध्यान द्वारा देहकारागार से निकल भागता है और ब्रह्म के रूप में अपनी सच्ची पहचान पुनः स्थापित कर लेता है (प्रकरण 26 दृष्टव्य )।
मस्तिष्क में स्थित सहस्रदल कमल या सहस्रार सातवाँ चक्र है जो अनन्त चैतन्य का सिंहासन है। दिव्य ज्ञान का प्रकाश जिसमें फैल गया हो ऐसे योगी के बारे में कहा जाता है कि वह ब्रह्म या ईश्वर का पद्मज (पद्म या कमल से उत्पन्न) के रूप में दर्शन करता है।
“पद्मासन" नाम इसलिये पड़ा है कि उस परम्परागत आसन में योगी मस्तिष्क एवं मेरुदण्ड में स्थित चक्रों के विविधरंगी पद्मों के दर्शन करता है। हर पद्म के दलों या किरणों की संख्या अलग-अलग होती है। ये किरणें प्राणशक्ति से बनती हैं। इन पद्मों को ही चक्र कहते हैं।
पद्मासन में मेरुदण्ड सीधा रहता है और शरीर इस प्रकार अवस्थित हो जाता है कि समाधि में पहुँचने पर भी आगे-पीछे गिरने का खतरा नहीं रहता; इसीलिये योगीजन ध्यान के लिये इसी आसन में बैठना पसन्द करते हैं। किन्तु नये साधक के लिये पद्मासन में बैठने में दिक्कतें हो सकती हैं, इसलिये हठ योग के किसी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के बिना यह आसन लगाने का प्रयास नहीं करना चाहिये।]