Ek Yogi ki Aatmkatha - 27 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 27

{ रांची में योग-विद्यालय की स्थापना }

“तुम संगठनात्मक कार्य के इतने विरुद्ध क्यों हो ?”

गुरुदेव के इस प्रश्न से मैं कुछ अचम्भित हुआ। यह सच है कि उस समय मेरा व्यक्तिगत मत यही था कि संगठन “बर्रो के छत्ते” मात्र होते हैं।

“यह ऐसा कार्य है, गुरुदेव, कि व्यक्ति चाहे जो करे, या न करे, उसके सिर केवल दोष ही मढ़ा जाता है।”

“तो क्या सारी दिव्य मलाई तुम अकेले ही खा जाना चाहते हो?” यह प्रश्न करते समय मेरे गुरु कठोर दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे। “यदि उदार हृदय गुरुओं की लम्बी परम्परा अपना ज्ञान दूसरों को देने की इच्छुक नहीं होती, तो क्या तुम या कोई दूसरा योग के द्वारा कभी ईश्वर के साथ तादात्म्य कर पाता?” वे कहते गये: “ईश्वर शहद है, संगठन मधुमक्खियों के छत्ते हैं; दोनों की ही आवश्यकता है। निस्संदेह आत्मा के बिना शरीर व्यर्थ है, परन्तु आध्यात्मिक शहद से भरे हुए कार्यव्यस्त मधुछत्तों का निर्माण तुम क्यों नहीं कर सकते ?”

उनके उपदेश का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा। मैंने प्रकट रूप से तो कोई उत्तर नहीं दिया, पर मेरे हृदय में एक दृढ़ संकल्प उभर आयाः समस्त मानवजाति में मैं यथाशक्ति इन मुक्तिदायक सत्यों को वितरित करूँगा, जिन्हें मैंने अपने गुरु के चरणों में बैठकर प्राप्त किया है। मैंने प्रार्थना की: “हे प्रभु! मुझे आशीर्वाद दो कि तुम्हारा प्रेम मेरी भक्ति की वेदी पर सदा आलोकित रहे और मैं तुम्हारे प्रेम को सभी हृदयों में जगा सकूँ।”

मेरे संन्यास ग्रहण के पहले एक बार श्रीयुक्तेश्वरजी ने एक अत्यंत अनपेक्षित बात कही थी।

उन्होंने कहा थाः “वृद्धावस्था में तुम्हें पत्नी के साथ का अभाव कितना खलेगा! तुम्हें नहीं लगता कि पत्नी और बच्चों के पालन-पोषण के सार्थक काम में व्यस्त गृहस्थ मनुष्य ईश्वर की दृष्टि में प्रशंसनीय भूमिका निभाते हैं?”

मैंने भयचकित होकर कहा था: “गुरुदेव! आप जानते हैं कि इस जीवन में मेरी एकमात्र इच्छा उस विराट् प्रेमी को प्राप्त करने की है।”

गुरुदेव इतने मुक्त हृदय से हँसे थे कि मैं समझ गया उन्होंने केवल मेरी परीक्षा लेने के लिये ही ऐसा कहा था।

फिर उन्होंने धीरे-धीरे कहा था: “इसे याद रखो कि जो मनुष्य अपने सांसारिक कर्त्तव्यों को त्याग देता है वह अपने उस त्याग को तभी उचित सिद्ध कर सकता है जब वह उससे कहीं अधिक बृहद् परिवार का कोई उत्तरदायित्व स्वीकार करता है।”

बच्चों की सही शिक्षा का आदर्श मुझे सदा ही प्रिय रहा था। केवल शरीर और बुद्धि के विकास पर ही सारा ध्यान लगाने वाली साधारण शिक्षा के रूखे परिणाम मुझे साफ दिखायी दे रहे थे। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों, जिन्हें समझे बिना कोई मनुष्य सुख के पास फटक भी नहीं सकता, का प्रचलित पाठ्यक्रम में अभी भी अभाव था। मैंने एक ऐसे विद्यालय की स्थापना करने का दृढ़ संकल्प किया, जिसमें बच्चे पूर्ण मानव में विकसित हो सकें। बंगाल के एक छोटे से गाँव दीहिका में सात बच्चों के साथ मैंने उस दिशा में अपना पहला कदम उठाया।

एक वर्ष पश्चात् १९१८ में कासिम बाज़ार के महाराजा सर मणीन्द्र चन्द्र नन्दी की उदारता के कारण मैं अपने तेज़ी से बढ़ते शिष्यवृन्द को राँची स्थानान्तरित कर सका। कोलकाता से करीब दो सौ मील दूर, बिहार में स्थित इस शहर की जलवायु भारत की सबसे स्वास्थ्यप्रद जलवायुओं में से एक है। राँची का कासिम बाज़ार पैलेस मेरे नये विद्यालय, जिसे मैंने “योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय” नाम दिया था, का मुख्य भवन बना।¹

मैंने प्राथमिक एवं उच्च विद्यालय की शिक्षाओं की व्यवस्था की। इसमें कृषि, औद्योगिक, व्यावसायिक तथा अन्य शिक्षण विषयों के पाठ्यक्रम का समावेश था। ऋषियों की शिक्षा पद्धति का (जिनके अरण्याश्रम भारत के बच्चों के लिये सांसारिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के प्राचीन धाम थे) अनुसरण करते हुए मैंने कक्षाओं की अधिकांश पढ़ाई खुले आकाश के नीचे कराने की व्यवस्था की।

राँची के विद्यालय के छात्रों को यौगिक ध्यान तथा स्वास्थ्य एवं शारीरिक विकास की अपूर्व “योगदा” पद्धति की, जिसके सिद्धान्तों का मैंने १९१६ में आविष्कार किया था, शिक्षा दी जाती है।

जब मैंने यह देखा कि मनुष्य का शरीर भी एक विद्युत् बैटरी की तरह ही है, तब मैंने विचार किया कि सीधे मानवीय इच्छाशक्ति से शक्तिसंचार द्वारा इसे भी रिचार्ज किया जा सकता है। इच्छा के बिना कोई भी कार्य संभव नहीं है, अतः गति प्रदान करने वाली इस मुख्य शक्ति, इच्छाशक्ति को ही मनुष्य अन्य किसी भारभूत यंत्रसामग्री या यांत्रिक व्यायामों की सहायता के बिना अपने शरीर में नवशक्ति का संचार करने के लिये प्रयुक्त कर सकता है। सरल योगदा प्रविधियों के द्वारा कोई भी सचेत रूप से तत्क्षण अपनी (मेरुशीर्ष में केन्द्रित) प्राणशक्ति को महाप्राण की असीम आपूर्त्ति से पुनः रिचार्ज कर सकता है।

योगदा प्रशिक्षण से राँची के छात्र अच्छी उपलब्धियाँ अर्जित करने लगे। शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में प्राणशक्ति को स्थानान्तरित करने की तथा कठिन आसनों में पूर्ण स्थिर रहते हुए बैठे रहने की असाधारण क्षमता उन्होंने विकसित कर ली। शारीरिक बल तथा सहनशक्ति के ऐसे ऐसे करतब वे करते थे कि बलवान युवक भी उन्हें नहीं कर पाते थे।

मेरा सबसे छोटा भाई विष्णु चरण घोष भी उसी विद्यालय में पढ़ा और बाद में शरीर सौष्ठव एवं बल संवर्द्धन के क्षेत्र में विख्यात प्रशिक्षक बना। उसने और उसके एक चेले ने १९३८-३९ में पाश्चात्य देशों की यात्रा की और शारीरिक बल एवं स्नायु-नियंत्रण के प्रयोगों के प्रदर्शन किये। शरीर पर मन के नियंत्रण की शक्ति का वह प्रभाव देखकर न्यू यॉर्क की कोलंबिया युनिवर्सिटी तथा अमेरिका एवं यूरोप के अनेक विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक आश्चर्यचकित हो गये।²

राँची में एक वर्ष के अंत में ही प्रवेश पाने के लिये आवेदनों की संख्या दो हज़ार तक पहुँच गयी। परन्तु उस समय विद्यालय में केवल आवासीय छात्रों की ही व्यवस्था थी और मात्र एक सौ छात्रों की ही व्यवस्था हम कर सकते थे। इसके बाद शीघ्र ही प्रतिदिन अपने घर से आकर शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों की भी व्यवस्था की गयी।

विद्यालय में मुझे छोटे-छोटे बच्चों के माता-पिता की भूमिका भी निभानी पड़ती थी और अनेक संगठनात्मक समस्याओं से भी निबटना पड़ता था। ईसामसीह के वे शब्द मुझे प्रायः याद आते: “ ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसने मेरी और धर्मवचनों की खातिर अपने भाइयों या बहनों या पिता या माता या पत्नी या बच्चों या ज़मीन-जायदाद को छोड़ दिया हो और उसे सौ गुने घर, भाई, बहन, माता, बच्चे, जमीन-जायदादें और उन्हीं के साथ लोगों का उत्पीड़न और परलोक में चिरंतन जीवन न मिला हो। ³

श्रीयुक्तेश्वरजी ने इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार बताया थाः “जो साधक लोकसमाज (सौ गुने घर, भाई, बहन) की महत्तर जिम्मेदारियों को उठाने की खातिर विवाह तथा कुटुम्ब पालन आदि साधारण भोगों में नहीं पड़ता, वह ऐसा कार्य करता है, जिसे न समझ पाने के कारण समाज उसे उत्पीड़ित करता है। परन्तु ऐसी महत्तर एकात्मता साधक की स्वार्थपरता से ऊपर उठने में सहायता करती है और ईश्वर की कृपा को उस की ओर आकर्षित करती है।”

एक दिन पिताजी अपना आशीर्वाद प्रदान करने राँची पधारे, जो उन्होंने इतने लम्बे समय से इसलिये नहीं दिया था कि मैंने बंगाल-नागपुर रेलवे में पदग्रहण करने के उनके आग्रह को अस्वीकार कर उन्हें दुःख पहुँचाया था।

उन्होंने कहाः “बेटा, तुमने जीवन का जो रास्ता चुना है, उसके लिये तुम्हारे प्रति मेरी नाराजगी अब दूर हो गयी। इन आनन्दी, उत्साही बच्चों के बीच तुम्हें देखकर मुझे हार्दिक आनन्द हो रहा है। तुम्हारा स्थान रेलवे टाईम टेबलों के प्राणविहीन आँकड़ों में नहीं, बल्कि यहीं है।” मेरे पीछे पीछे फिर रहे दर्जन भर छोटे-छोटे बच्चों की ओर उन्होंने इशारा किया। “मेरे तो केवल आठ ही बच्चे थे,” कहते हुए उनकी आँखों में चमक आ गयी, “पर मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ!”

हमें दी गयी बीस एकड़ उपजाऊ जमीन में छात्रगण, शिक्षकगण और मैं प्रतिदिन बाग़-बग़ीचे के काम का और अन्य बाह्य कार्यों का आनन्द लिया करते थे। हमने अनेक पालतू पशु पाल रखे थे, जिनमें एक हिरन का बच्चा भी था। सभी बच्चे हिरन के इस बच्चे से बहुत प्यार करते थे। मुझे भी उस मृग शावक से इतना प्यार हो गया था कि मैं उसे अपने कमरे में ही सोने देता था। भोर का उजाला फूट पड़ते ही वह शावक दुलार पाने के लिये डगमगाता हुआ मेरे बिस्तर के पास आ जाता था।

एक दिन मुझे किसी काम से राँची शहर में जाना था, इसलिये मैंने उस शावक को रोज़ के समय से पहले ही दूध पिला दिया। बच्चों से मैंने कह दिया कि मेरे लौटकर आने तक उस हिरन को कोई कुछ न पिलाए। एक बच्चे ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर ही दिया और हिरन को काफी बड़ी मात्रा में दूध पिला दिया। जब शाम को मैं लौट कर आया, तो दुःखद समाचार मेरी प्रतीक्षा ही कर रहा था: “हिरन का बच्चा ज्यादा दूध पिला देने के कारण मरणासन्न है।”

आँसू बहाते हुए मैंने अपने उस प्रिय शावक के मृतप्राय शरीर को अपनी गोद में ले लिया अत्यंत दयनीय होकर मैं ईश्वर से उस बछड़े के जीवन का दान माँगने लगा। कई घंटे बीत जाने के बाद वह नन्हा सा बच्चा आँखें खोलकर उठ खड़ा हुआ और अत्यंत अशक्त कदमों से चलने लगा। पूरा विद्यालय आनन्द से भर गया।

परन्तु उसी रात मुझे एक गहरी शिक्षा मिली, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। मैं रात दो बजे तक हिरन के बच्चे के साथ जागा, फिर मुझे नींद आ गयी। स्वप्न में वह हिरन आया और उसने मुझसे कहाः

“आपने मुझे रोक रखा है। कृपा कर मुझे जाने दीजिये; जाने दीजिये!”

“ठीक है,” स्वप्न में मैंने कहा।

तुरन्त ही जाग कर मैं चीख उठाः “बच्चों, हिरन मर रहा है!” बच्चे तुरन्त दौड़कर मेरे पास आ गये।

मैं कमरे के उस कोने की ओर भागा जहाँ मैंने हिरन को रखा था। उसने उठने का एक आखिरी प्रयास किया, मेरी ओर लड़खड़ाया और मर कर मेरे कदमों में गिर पड़ा।

पशुओं की नियति का संचालन और नियमन करने वाले सामूहिक कर्मों के अनुसार उस हिरन का जीवन काल समाप्त हो गया था और वह उच्चतर योनि में जाने के लिये तैयार हो गया था। परन्तु अपनी गहरी आसक्ति (बाद में मेरे ध्यान में आया कि यह मेरी स्वार्थपरता थी) और अपनी तीव्र प्रार्थनाओं के द्वारा मैं उसे उस पशु रूप के बंधन में जकड़े रखने में सफल हो रहा था, जिससे मुक्त होने के लिये उसकी आत्मा तड़प रही थी। उस आत्मा ने मेरे स्वप्न में आकर मुझसे अनुरोध किया क्योंकि मेरी सप्रेम अनुमति के बिना या तो वह जाना नहीं चाहती थी या जा नहीं सकती थी। जैसे ही मैं मान गया, वह चली गयी।

मेरा सारा शोक दूर हो गया। फिर एक बार यह बात मेरी समझ में आ गयी कि ईश्वर की इच्छा यह है कि उसकी संतानें सबको उसका अंश समझकर प्रेम करें और भ्रम में यह न मानें कि मृत्यु के साथ ही सब कुछ समाप्त हो जाता है। अज्ञानी मनुष्य मृत्यु की केवल दुर्लंघ्य दीवार को ही देख पाता है जो उसके प्रियजनों को सदा के लिये छिपा देती प्रतीत होती है। परन्तु दूसरों को ईश्वर की अभिव्यक्तियाँ मानकर उनसे प्रेम करने वाला अनासक्त मनुष्य जानता है कि उसके प्रियजन केवल थोड़े-से समय के लिये ही ईश्वर के आनन्द का उपभोग करने के लिये मृत्यु के अधीन हुए हैं।

राँची का विद्यालय एक छोटी-सी, सादी-सी शुरूआत से विकसित होकर अब बिहार एवं बंगाल में सुपरिचित संस्था बन गया है। विद्यालय के अनेक विभाग ऋषियों के शिक्षा आदर्शों को चलाते रहने की इच्छा रखने वाले लोगों के स्वैच्छिक दान से चलते हैं। मिदनापुर एवं लखनपुर में विद्यालय की विकासोन्मुख शाखाएँ स्थापित हो गयी हैं।

राँची के मुख्यालय में एक चिकित्सा विभाग भी चलाया जाता है, जहाँ उस क्षेत्र के गरीबों को निःशुल्क चिकित्सा एवं दवाइयाँ उपलब्ध करायी जाती हैं। विद्यालय ने खेलकूद प्रतिस्पर्द्धाओं के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी छाप बनायी है, जहाँ विद्यालय से निकलने वाले अनेक छात्रों ने बाद में विश्वविद्यालयीन जीवन में अच्छी ख्याति प्राप्त की है।

गत तीन दशकों में अनेक सुविख्यात पौर्वात्य और पाश्चात्य स्त्रीपुरुषों ने राँची के विद्यालय को भेंट देकर उसका मान बढ़ाया है। वाराणसी के “द्विशरीरी संत” स्वामी प्रणवानन्दजी १९१८ में कुछ दिन के लिये राँची आये थे। बाहर खुले मैदान में वृक्षों के नीचे चल रही कक्षाओं के सुन्दर दृश्य को और संध्या समय छोटे-छोटे बच्चों को घंटों यौगिक ध्यान में निस्तब्ध बैठे देखकर वे अत्यन्त प्रभावित हुए।

उन्होंने कहाः “बच्चों की सही शिक्षा के लाहिड़ी महाशय के आदर्शों का इस संस्था में पालन होता देखकर मुझे अत्यन्त आनन्द हो रहा है। इस संस्था को मेरे गुरुदेव के आशीर्वाद प्राप्त हों।”

मेरे पास बैठे एक बच्चे ने योगिराज से एक प्रश्न पूछने का साहस कर लिया।

“स्वामीजी!” उसने कहा, “क्या मैं संन्यासी बनूँगा? क्या मेरा जीवन केवल ईश्वर के लिये है ?”

यूँ तो स्वामी प्रणवानन्दजी मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे, परन्तु उनकी दृष्टि भविष्य को भेद रही थी ।

उन्होंने कहाः “बेटा, जब तुम बड़े हो जाओगे तब एक सुन्दर वधू तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही होगी।” (वर्षों संन्यास लेने की इच्छा रखने बाद उस लड़के ने विवाह कर ही लिया।)

स्वामी प्रणवानन्दजी के राँची से प्रस्थान करने के थोड़े दिन बाद मैं उनसे मिलने अपने पिताजी के साथ कोलकाता में उस घर में गया जहाँ वे कुछ दिन के लिये ठहरे हुए थे। कई वर्षों पहले की हुई प्रणवानन्दजी की भविष्यवाणी अचानक मेरे मन में उभर आयी: “मैं बाद तुमसे मिलूँगा जब तुम अपने पिताजी के साथ आओगे।”

जैसे ही पिताजी ने स्वामीजी के कमरे में प्रवेश किया, उस महान योगी ने अपने आसन से उठकर मेरे पिताजी का प्रेमादर के साथ आलिंगन किया।

उन्होंने पिताजी से कहाः “भगवती ! तुम स्वयं अपने लिये क्या कर रहे हो? क्या तुम देखते नहीं तुम्हारा बेटा किस तेजी के साथ अनंत ईश्वर की ओर बढ़ रहा है ?” अपने पिता के समक्ष अपनी प्रशंसा सुनकर मैं शरमा गया। स्वामीजी आगे कहते गये: “तुम्हें याद है हमारे गुरु बार-बार कहा करते थे: 'बनत बनत बन जाय ?'⁴ इसलिये क्रिया योग का अनवरत अभ्यास करते चलो और जल्दी से जल्दी भगवान के द्वार पर पहुँच जाओ।”

वाराणसी में उनके साथ मेरी पहली विस्मयकारी भेंट के समय इतने स्वस्थ और बलवान दिखते उनके शरीर पर अब वृद्धावस्था के स्पष्ट लक्षण प्रकट हो गये थे, तथापि शरीर अभी भी एकदम सीधा था।

मैंने सीधे उनकी आँखों में आँखें डालते हुए पूछा: “स्वामीजी, कृपया मुझे एक बात बताइये। क्या वृद्धावस्था का आप पर प्रभाव नहीं पड़ रहा है ? शरीर के दुर्बल होते जाने से क्या आपकी ईश्वरानुभूतियों में कोई कमी आ रही है ?”

अत्यन्त मधुर मुस्कान के साथ उन्होंने कहाः “प्रियतम प्रभु अब मेरे और निकट आ गये हैं।” उनके पूर्ण आत्मविश्वास ने मुझे विभोर कर दिया। वे कहते गये: “मुझे अभी भी दोनों पेन्शनें मिल रही हैं— एक इन भगवती से और दूसरी ऊपर से।” ऊपर की ओर उँगली उठाते हुए थोड़ी देर के लिये वे समाधि अवस्था में चले गये, उनके मुखमण्डल पर दिव्य तेज झलकने लगा। मेरे प्रश्न का कितना सार्थक उत्तर !

प्रणवानन्दजी के कमरे में अनेक पौधे और बीजों के पैकेट देखकर मैंने उनके प्रयोजन के विषय में जिज्ञासा प्रकट की।

उन्होंने बतायाः “ मैंने काशी हमेशा के लिये छोड़ दी है और अब हिमालय की ओर जा रहा हूँ। वहाँ मैं अपने शिष्यों के लिये एक आश्रम खोलूँगा। इन बीजों से पालक और कुछ अन्य साग-सब्जियाँ पैदा होंगी। मेरे प्रिय शिष्य पूर्ण सादगी के साथ रहेंगे और अपने समय को ईश्वर के साथ तादात्म्य बनाये रखने में बितायेंगे और किसी चीज़ की आवश्यकता ही नहीं है।”

पिताजी ने अपने गुरुभाई से पूछा कि वे फिर कब कोलकाता आयेंगे।

“अब कभी नहीं,” प्रणवानन्दजी ने उत्तर दिया। “इसी वर्ष के बारे में लाहिड़ी महाशय ने मुझे बताया था कि मैं सदा के लिये अपनी प्राणप्रिय काशी को छोड़कर हिमालय में जाकर देहत्याग करूँगा।”

उनके शब्दों को सुनकर मेरी आँखें छलछला उठीं परन्तु स्वामीजी के चेहरे पर शान्त मुस्कराहट थी। उन्हें देखते हुए मुझे ऐसा लग रहा था मानो जगज्जननी की गोद में सुरक्षित बैठा स्वर्गलोक का कोई नन्हा शिशु हो। परम उच्च आध्यात्मिक शक्तियों पर अपना अधिकार बनाये रखने की महान योगियों की क्षमता पर वृद्धावस्था का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। वे जब चाहे अपने शरीर का कायाकल्प कर सकते हैं; परन्तु फिर भी कभी-कभी वे वार्धक्य की प्रक्रिया को रोकने की कोई चेष्टा नहीं करते, बल्कि फिर नये जन्म में कर्मों के बचे-खुचे अवशेषों को भोगने की आवश्यकता को मिटा देने के लिये अपने वर्तमान शरीर को समय बचाने के एक साधन के रूप में प्रयुक्त करते हुए कर्मों को मिट जाने देते हैं।

इस घटना के कुछ महीनों बाद मेरी मुलाकात एक पुराने मित्र सनन्दन से हो गयी, जो प्रणवानन्दजी का एक अंतरंग शिष्य था।

“मेरे पूज्य गुरुदेव चले गये,” सिसकते हुए उसने मुझे बताया । “ऋषिकेश के पास उन्होंने एक आश्रम बनाया और अत्यंत प्रेम के साथ हमें शिक्षा देते रहे। जब हम लोग जरा ठीक से स्थिरस्थावर हो गये और उनके सान्निध्य में तीव्र गति से आध्यात्मिक उन्नति कर रहे थे, तो एक दिन उन्होंने ऋषिकेश में बहुत बड़े जनसमूह को भोज देने का मन्तव्य प्रकट किया। मैंने उनसे पूछा कि लोगों की इतनी बड़ी संख्या उन्हें किस लिये चाहिये ।

“ ‘यह मेरा अंतिम उत्सव है,’ उन्होंने कहा। उनके शब्दों का पूरा अर्थ मेरी समझ में नहीं आया।

“प्रणवानन्दजी ने बहुत बड़ी मात्रा में खाना बनाने में हम लोगों का हाथ बटाया। करीब दो हज़ार लोगों को हमने खाना खिलाया। भोज के उपरान्त एक ऊँचे मंच पर विराजमान हो कर उन्होंने अनन्त परमात्मा पर अत्यन्त प्रेरणास्पद प्रवचन किया। मैं मंच पर उनके पास ही बैठा हुआ था। प्रवचन के अन्त में हज़ारों लोगों की आँखों के सामने उन्होंने मेरी ओर मुड़कर असाधारण प्रबलता के साथ कहा:

‘‘ 'सनन्दन, तैयार हो जाओ! मैं अब इस शरीर को छोड़ने वाला हूँ।' “थोड़ी देर अवाक् रहने के बाद मैं जोर से चीख उठाः ‘गुरुदेव! ऐसा मत कीजिये! कृपा करके ऐसा मत कीजिये, मत कीजिये !’ जनसमूह मेरे शब्दों पर आश्चर्य करता हुआ चुपचाप बैठा रहा। प्रणवानन्दजी मेरी ओर देखकर मुस्कराये, पर उनकी दृष्टि पहले ही अनन्त में लग चुकी थी।

“उन्होंने कहा: ‘स्वार्थी मत बनो और न ही मेरे लिये शोक करो। मैंने लम्बे समय तक खुशी के साथ तुम सब की सेवा की है; अब तुम लोग खुशी के साथ मुझे विदा करो। मैं अपने विराट् प्रेमी से मिलने जा रहा हूँ।’ फिर धीरे से उन्होंने कहाः ‘मैं जल्दी ही फिर जन्म लूँगा। अनन्त परमानन्द में थोड़ा समय बिताने के बाद मैं इस लोक में वापस आऊँगा और बाबाजी⁵ के साथ मिल जाऊँगा। तुम्हें जल्दी ही पता चल जायेगा कि मेरी आत्मा ने कब और कहाँ नया जन्म लिया है।’

“वे पुनः जोर से बोले : ‘सनन्दन ! अब मैं दूसरी क्रिया के द्वारा शरीर छोड़ता हूँ।’

“उन्होंने हमारे सामने बैठे जनसागर की ओर देखकर आशीर्वाद दिया। अपनी दृष्टि को दिव्य चक्षु की ओर मोड़कर वे निश्चल हो गये। विस्मित जनसमूह सोच ही रहा था कि वे समाधि में निमग्न हो गये हैं, परन्तु वे हाड़-मांस के शरीर को छोड़कर अपनी आत्मा को अनंतता में विलीन कर भी चुके थे। शिष्यों ने पद्मासन में स्थित उनके शरीर का स्पर्श किया, पर अब वह उष्ण नहीं था। अब वहाँ केवल सख्त हुआ ढाँचा रह गया था; उसमें वास करने वाला तो अमर्त्य लोक में चला गया था।”

जब सनन्दन ने अपना वृत्तान्त पूरा किया, तो मेरे मन में विचार आया: “द्विशरीरी संत जितने जीवन में, उतने ही मृत्यु में भी नाटकीय थे!”

मैंने पूछा कि प्रणवानन्दजी पुनर्जन्म कहाँ लेने वाले थे ।

“मैं उस सूचना को अत्यन्त पवित्र धरोहर मानता हूँ,” सनन्दन ने कहा। “मुझे किसी से वह कहना नहीं चाहिये। शायद तुम्हें किसी और तरीके से पता चल ही जायेगा।”

अनेक वर्षों बाद मुझे स्वामी केशवानन्दजी⁷ से पता चला कि प्रणवानन्दजी नया जन्म लेने के कुछ वर्ष बाद हिमालय में बदरीनारायण चले गये और वहाँ महान् गुरु बाबाजी के साथ रहने वाले सन्तों में शामिल हो गये।





¹ यहाँ ब्रह्मचर्य से तात्पर्य है मानव जीवन की वैदिक रूपरेखा के अंतर्गत चतुराश्रम में से एक, जिसके चार आश्रम या अवस्थाएँ हैं: (१) ब्रह्मचर्य, (२) गृहस्थ, (३) वानप्रस्थ, (४) संन्यास।
इस आदर्श जीवन व्यवस्था का आधुनिक भारत में व्यापक पैमाने पर पालन तो नहीं हो रहा है, तथापि अभी भी इस व्यवस्था का दृढ़ता से पालन करने वालों की भी कमी नहीं है। जीवन भर गुरु के मार्गदर्शन में इन चार अवस्थाओं का पूर्ण पालन किया जाता है। राँची के योगदा सत्संग विद्यालय की अधिक जानकारी प्रकरण ४० में दी गयी है।

² विष्णु चरण घोष का ९ जुलाई १९७० को कोलकाता में देहांत हो गया।

³ मरकुस १० : २९-३० (बाइबिल)

⁴ यह लाहिड़ी महाशय के प्रिय वाक्यों में से एक था, जो वे अपने शिष्यों को ध्यान में अथक प्रयास करने में प्रोत्साहित करने के लिये कहा करते थे।

⁵ लाहिड़ी महाशय के गुरु जो अब भी जीवित हैं। (प्रकरण ३३ देखें)

⁶ प्रणवानन्दजी द्वारा प्रयुक्त यह प्रविधि योगदा सत्संग पथ के उच्चतर क्रियाओं में दीक्षित लोगों को तृतीय क्रिया के नाम से परिचित है। जब स्वामी प्रणवानन्दजी को श्री श्री लाहिड़ी महाशय द्वारा यह प्रविधि दी गयी, तो उन्हें उस योगावतार से मिलने वाली यह द्वितीय प्रविधि थी। इस प्रविधि में जो पारंगत हो गया हो वह सचेत रहते हुए कभी भी शरीर को छोड़ सकता है और कभी भी उसमें वापस आ सकता है। उन्नत योगी इस क्रिया प्रविधि को महाप्रयाण के समय प्रयोग करते हैं – उस क्षण में, जिसका उन्हें पहले से ज्ञान होता है।
महान योगी आध्यात्मिक चक्षु रुपी तारे के आकार के प्राणशक्ति द्वार से अन्दर-बाहर आते-जाते हैं। ईसामसीह ने कहा था: “मैं हो द्वार हूँ यदि कोई मेरे द्वारा अन्दर प्रवेश करे तो उसका उद्धार हो जायेगा और अन्दर-बाहर जा पायेगा और उसे चरागाह मिल जायेगा। चोर (माया) किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और जीवन का घात करने और नष्ट करने के लिये आता है। मैं (क्राईस्ट चैतन्य या कूटस्थ चैतन्य ) इसलिये आया हूँ कि लोगों को जीवन मिले और अधिक पूर्णता के साथ मिले।” (यूहन्ना १० : ९-१०, बाइबिल)

⁷ स्वामी केशवानन्दजी के साथ मेरी भेंट का वर्णन प्रकरण
४२ में दिया गया है।