Ek Yogi ki Aatmkatha - 31 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 31

{ पुण्यशीला माता से भेंट }

“पूज्य माताजी, मैं जब नन्हा-सा था, तभी आपके अवतारी पति का आशीर्वाद मुझे प्राप्त हो गया था। वे मेरे माता-पिता और मेरे गुरु श्रीयुक्तेश्वरजी के भी गुरु थे। अतः क्या आप अपने पावन जीवन के कुछ प्रसंग सुनाकर मुझे धन्य करेंगी ?”

मैं लाहिड़ी महाशय की धर्मपत्नी श्रीमती काशीमणि से बात कर रहा। मैं थोड़े समय के लिये बनारस में था, अतः इस पूज्य महिला से मिलने की अपनी चिरकालीन आकांक्षा पूर्ण कर रहा था।

बनारस के गरुड़ेश्वर मुहल्ले में लाहिड़ी परिवार के घर में उन्होंने अत्यंत प्रेम के साथ मेरा स्वागत किया। वृद्ध होने पर भी वे कमल की तरह खिली हुई थीं, आध्यात्मिक सुगंध उनसे निःसृत होती थी। उनका शरीर मध्यम आकार का, गौरवर्ण था, गर्दन पतली और नेत्र विशाल, तेजस्वी थे।

“तुम्हारा यहाँ स्वागत है बेटा। ऊपर चलें।”

माताजी मुझे अपने साथ एक अत्यंत छोटे कमरे में ले गयीं, जहाँ कभी वे अपने पति के साथ रहती थीं। उस पवित्र स्थल के दर्शन कर मैं धन्य हुआ, जहाँ अद्वितीय गुरु ने वैवाहिक जीवन की मानवी लीला करना स्वीकार किया था। दयामयी माता ने उनके पास ही एक छोटी-सी गद्दी पर बैठने का मुझे संकेत किया।

“कई वर्षों बाद ही मुझे अपने पति की दैवी महानता की पहचान हो पायी,” उन्होंने बताया। “एक रात इसी कमरे में मुझे एक स्पष्ट स्वप्न दिखा। तेजस्वी देवता अकल्पनीय मोहकता के साथ मेरे सिर के ऊपर हवा में तैर रहे थे। वह दृश्य इतना वास्तविक लग रहा था कि मैं तत्काल जाग उठी; बड़ी विलक्षण बात थी, कि यह कमरा दीप्तिमान प्रकाश से भर गया था।


“पद्मासन में स्थित मेरे पतिदेव कमरे के बीचोबीच देवताओं से घिरे हवा में थे। अत्यंत विनम्रता के साथ देवता दोनों हाथ जोड़कर मेरे पति का पूजन कर रहे थे।

“मैं इतनी विस्मित हुई कि मुझे लगा मैं अभी भी स्वप्न में ही हूं।

“तभी लाहिड़ी महाशय ने कहा: ‘नारी! तुम सपना नहीं देख रही हो। अपनी निद्रा हमेशा हमेशा के लिये त्याग दो।’ जब वे धीरेधीरे ज़मीन पर उतर आये, तो मैंने उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।

“मैंने कहाः ‘मेरे गुरुदेव! आपके चरणों में मैं बारंबार प्रणाम करती हूँ। अब तक मैंने आपको अपना पति माना, इसके लिये क्या आप मुझे क्षमा करेंगे? यह जानकर मैं लज्जा से मरी जा रही हूँ कि मैं एक दिव्य रूप से जागृत पुरुष के साथ रहते हुए भी अज्ञान की नींद में सोती रही। इस रात से आप मेरे पति नहीं, गुरु हैं। क्या आप इस तुच्छ अबला को अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार करेंगे ?’ ¹

“गुरुदेव ने मुझे सप्रेम स्पर्श किया। ‘पवित्र आत्मा, उठो। तुम्हें स्वीकार किया जाता है। उन्होंने देवताओं की ओर इंगित किया। इन पूज्य सन्तों में से प्रत्येक को बारी-बारी से प्रणाम करो।’

“जब मैंने विनम्रता से सबको प्रणाम कर लिया तो एक साथ सभी देवताओं की वाणी गूंजी, जो प्राचीन वेदघोष के समान थी।

“ ‘इस दिव्य पुरुष की अर्धांगिनी! आप धन्य हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं।’ उन्होंने मेरे चरणों में प्रणाम किया और आश्चर्य! उनके दिव्य शरीर अदृश्य हो गये। कमरे में अन्धेरा छा गया।

“मेरे गुरुदेव ने मुझसे क्रिया योग दीक्षा लेने के लिये कहा।

“ ‘बेशक!’ मैंने कहा। ‘मुझे खेद है कि इससे पहले ही मैंने इस सौभाग्य को क्यों नहीं प्राप्त किया।’

“ ‘तुम्हारा समय नहीं आया था।’ लाहिड़ी महाशय ने मुस्कराते हुए मुझे सांत्वना दी। ‘तुम्हारे बहुत से कर्मों को नष्ट करने में मैं चुपचाप चुपचाप तुम्हारी सहायता कर रहा था। अब तुम इच्छुक भी हो और तैयार भी।’

“उन्होंने मेरे ललाट का स्पर्श किया। घूमते हुए प्रकाश पुंज मुझे दिखायी देने लगे; धीरे-धीरे वह सारा प्रकाश जगमगाते नीले रंग के आध्यात्मिक नेत्र में परिवर्तित हो गया जिसके चारों ओर सुनहरा गोल था और बीच में एक सफेद पंचकोणीय तारा।

‘‘ ‘अपनी चेतना को उस तारे में से अनंत के साम्राज्य में ले जाओ।’ मेरे गुरु के स्वर में एक नवीनता थी। जो दूर से सुनायी दे रहे संगीत के समान कोमल लग रही थी।

“एक के बाद एक दृश्य समुद्र की फेनिल लहरों के समान मेरी आत्मा के तट से आकर टकराने लगे। अन्ततः चारों ओर दिखते उन दृश्यों के मंडल परमानन्द के सागर में विलीन हो गये। नित्य हिलोरें मारतीं उन आनन्द लहरों में मैं खो गयी। कई घंटों बाद जब मैं इस जगत् की चेतना में लौट आयी, तो गुरुदेव ने मुझे क्रियायोग की प्रविधि बतायी।

“उस रात के बाद लाहिड़ी महाशय फिर कभी मेरे कमरे में नहीं सोये। वे उसके बाद कभी सोये ही नहीं। दिन-रात नीचे सामने के कमरे में अपने शिष्यों के साथ ही रहते थे।”

इतना बताने के बाद माता काशीमणि चुप हो गयीं। उस महान योगी के साथ उनके संबंध की अद्वितीयता को समझते हुए मैंने झिझकते हुए उनसे कुछ और घटनाएँ बताने का अनुरोध किया।

“तुम बहुत लोभी हो, बेटा! फिर भी तुम्हें एक और कहानी अवश्य बताऊँगी।” वे संकोच से मुस्करायीं। “यहाँ मैं अपने एक पाप को स्वीकार करूंगी, जो मैंने अपने गुरु-पति के विरुद्ध किया था। मेरी दीक्षा के कुछ महीने बाद मैं असहाय और उपेक्षित अनुभव कर रही थी। एक सुबह लाहिड़ी महाशय इस छोटे से कमरे में कोई वस्तु लेने के लिये आये। मैं तुरन्त उनके पीछे ही यहाँ पहुँच गयी। माया के वशीभूत होकर मैंने उन्हें अत्यंत कठोर शब्दों में सम्बोधित किया।

“ ‘आप अपना सारा समय अपने शिष्यों के साथ बिताते हैं। अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति आपके दायित्वों का क्या ? मुझे खेद है कि परिवार के लिये अधिक धन इकट्ठा करने में आपको कोई रुचि नहीं’

“गुरुदेव ने एक पल के लिये मुझे निहारा, फिर लो, वे अदृश्य हो गये। विस्मयचकित और भयग्रस्त, मुझे एक आवाज कमरे के प्रत्येक भाग से गूंजती सुनायी दी:

“ ‘क्या तुम देखती नहीं कि यह सब केवल शून्य है? मुझ जैसा शून्य तुम्हारे लिये धन कैसे उत्पन्न कर सकता है?’

“मैं बिलख उठी: ‘गुरुजी! मैं लक्ष लक्ष बार आपसे क्षमा मांगती हूँ! मेरी पापी आँखें आपको अब देख नहीं पा रही हैं। कृपा कर अपने पवित्र रूप में प्रकट होइये।’

“ ‘मैं यहाँ हूँ।’ यह उत्तर मेरे ऊपर से आया। मैंने ऊपर दृष्टि घुमायी तो गुरुदेव को हवा में प्रकट होते देखा, उनका सिर छत को छू रहा था। उनकी आँखें चौंधिया देने वाली अग्निज्वालाओं के समान थीं। जब वे चुपचाप जमीन पर उतर आये, तो मैं भयाक्रान्त होकर सिसकते हुए उनके चरणों में लोट गयी।

“उन्होंने कहाः ‘नारी! तुच्छ सांसारिक चमक-दमक की नहीं, दिव्य परम धन की कामना करो। जब अंतर की निधि को पा लोगी तो बाह्य पूर्ति सदैव अपने आप होते देखोगी।’ फिर उन्होंने कहा, 'मेरा एक आध्यात्मिक पुत्र तुम्हारी व्यवस्था कर देगा।'

“मेरे गुरु के शब्द सत्य तो सिद्ध होने ही थे; एक शिष्य हमारे परिवार के लिये काफी धन दे गया।”

मुझे अपने अद्भुत अनुभव बताने के लिये मैंने माता काशीमणि का धन्यवाद किया।² दूसरे दिन मैं फिर उनके घर गया और कई घण्टों तक तीनकौड़ी तथा दुकौड़ी लाहिड़ी के साथ ज्ञान चर्चा का आनन्द लेता रहा।

भारत के महान योगी के ये दो सन्तवत् बेटे अपने पिता के आदर्श पदचिह्नों पर चल रहे थे। दोनों ही गौरवर्ण, लम्बे कद के, मजबूत कद-काठी के थे और घनी दाढ़ी रखते थे। दोनों की आवाजें सौम्य थीं, आचार-व्यवहार की दोनों की शैली पुराने जमाने की थी।

लाहिड़ी महाशय की पत्नी ही उनकी एकमात्र शिष्या नहीं थीं, सैंकड़ों अन्य महिलाएँ भी उनकी शिष्याएँ थीं, जिनमें से एक मेरी माँ भी थी। एक बार एक शिष्या ने लाहिड़ी महाशय से उनकी एक फोटो माँगी। उन्होंने उसे एक फोटो देते हुए कहा: “तुम इसे यदि अपना रक्षा कवच मानोगी तो यह रक्षा कवच ही सिद्ध होगा, नहीं तो यह एक चित्र मात्र ही रहेगा।”

कुछ दिन बाद वही शिष्या लाहिड़ी महाशय की बहू के साथ एक टेबल के पास बैठकर भगवद्गीता का अध्ययन कर रही थी। टेबल के पीछे लाहिड़ी महाशय की वह फोटो टंगी हुई थी। अचानक भयंकर आँधी शुरू हुई और बिजलियाँ कड़कड़ाने लगीं।

“लाहिड़ी महाशय, हमारी रक्षा कीजिये!” दोनों महिलाएँ फोटो के सामने नतमस्तक हो गयीं। तभी टेबल पर पड़ी पुस्तक पर बिजली गिरी, उन दोनों को कोई चोट नहीं पहुँची।

“मुझे ऐसा लगा मानों उस तीव्र उष्णता से बचाने के लिये मेरी चारों ओर बर्फ की परतें खड़ी कर दी गयी थीं,” उस शिष्या ने बाद में बताया।

लाहिड़ी महाशय ने अपनी एक शिष्या अभया से संबंधित दो चमत्कार किये थे। एक दिन अभया अपने पति के साथ, जो कोलकाता में वकील थे, गुरु-दर्शन के लिये काशी जाने घर से चल पड़ी। अत्यंत व्यस्त यातायात के कारण उनकी घोड़ागाड़ी को स्टेशन पहुँचने में विलम्ब हुआ। वे लोग जिस समय हावड़ा स्टेशन पर पहुँचे, उस समय काशी जाने वाली ट्रेन छूटने के लिये सीटी दे रही थी।

अभया टिकट-घर के पास चुपचाप खड़ी हो गयी।

“लाहिड़ी महाशय! मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इस गाड़ी को कृपा करके रोकिये।” वह मन ही मन प्रार्थना कर रही थी। “आपके दर्शन के लिये और एक दिन रुकने की कसक मैं सहन नहीं कर सकती।”

छुक-छुक करती गाड़ी के चक्के गोल-गोल घूमते रहे, पर गाड़ी आगे नहीं बढ़ी। गाड़ी का ड्राइवर और यात्री गण यह अद्भुत घटना देखने के लिये प्लेटफार्म पर उतर पड़े। रेलवे का एक अंग्रेज़ गार्ड अभया और उसके पति के पास आया। सारी मान्यताओं के विपरीत उसने अपनी सेवाएँ दी। उसने कहा: “बाबू! पैसा मुझे दीजिये। मैं आपके टिकट लेता हूँ, तब तक आप लोग गाड़ी में चढ़िये।”

जैसे ही वह दम्पति गाड़ी में बैठ गये और उनके टिकट उनके हाथ में आ गये, ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। जल्दी जल्दी में ड्राइवर और यात्रीगण अपनी-अपनी जगह की ओर दौड़ पड़े। उनमें से कोई यह समझ नहीं सका कि गाड़ी अचानक कैसे चल पड़ी और पहली बात तो, वह रुकी ही क्यों थी।

काशी में लाहिड़ी महाशय के घर पहुँचने पर अभया ने चुपचाप लाहिड़ी महाशय के आगे साष्टांग प्रणिपात किया और उनके चरण छूने का प्रयास करने लगी।

तभी लाहिड़ी महाशय बोल पड़े: “अपने आप को सम्भालो, अभया! मुझे कष्ट देने में तुम्हें कितना आनन्द आता है! जैसे कि तुम यहाँ अगली गाड़ी से आ ही नहीं सकती थी!”

अभया एक अन्य स्मरणीय अवसर पर लाहिड़ी महाशय के पास आयी थी। इस बार उसे उनकी मध्यस्थता ट्रेन के लिये नहीं, बल्कि संतान के लिये चाहिये थी।

“मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि मेरी नौवीं सन्तान बच जाये,” उसने कहा। “मुझे आठ बच्चे हुए और सभी जन्म के शीघ्र ही बाद मर गये।”

लाहिड़ी महाशय सहानुभूतिपूर्वक मुस्कराये। तुम्हारी होने वाली संतान बच जायेगी। मेरे निर्देशों का अत्यंत सावधानी से पालन करना। यह संतान एक बच्ची होगी और इसका जन्म रात को होगा। इस बात का ध्यान रखना कि तेल का दीया सूर्योदय तक जलता रहे। बीच में सो मत जाना जिससे दीये को बुझने का अवसर मिल जाए।”

ठीक जैसा कि सर्वज्ञ गुरु ने पहले ही देख लिया था, अभया को बच्ची ही हुई और उसका जन्म रात को ही हुआ। अभया ने अपनी दाई को दीये में तेल डालते रहने के लिये कह रखा था। दोनों महिलाओं ने करीब भोर तक जाग कर अनिवार्य पहरा रखा, परन्तु आखिर सो गयीं। दीये का तेल लगभग समाप्त हो ही गया था, उसकी ज्योत मंद होकर फड़फड़ा रही थी। कमरे के द्वार की कुण्डी खुल गयी और ज़ोर की आवाज के साथ दरवाजा खुल गया चकित महिलाएँ जाग गयीं। उनकी आश्चर्यचकित आँखों ने लाहिड़ी महाशय के स्वरूप को देखा।

“अभया! देखो, दीया लगभग बुझ ही गया है!” उन्होंने दीये की ओर इशारा किया जिसमें दाई तुरन्त तेल डालने लगी। जैसे ही दीये की लौ तेज हो गयी, लाहिड़ी महाशय अन्तर्धान हो गये। दरवाजा अपने आप बन्द हो गया, कुण्डी बिना किसी दृश्यमान साधन के, अपने आप लग गयी।

अभया की नौवीं सन्तान बच गयी; १९३५ में जब मैंने उसके बारे में पूछताछ की, तब भी वह जीवित थी।

लाहिड़ी महाशय के एक शिष्य आदरणीय श्री कालीकुमार राय ने मुझे गुरु के साथ बिताये अपने जीवन के अनेक रोचक किस्से सुनाये थे।

राय ने मुझे बतायाः “ मैं प्रायः वाराणसी में लाहिड़ी महाशय के घर एक साथ कई सप्ताहों तक अतिथि बनकर रहता था। मैं देखा करता था कि अनेक साधु संत, दण्डीस्वामी ³ आदि रात्रि की नीरवता में गुरुदेव के चरणों में बैठने के लिये आते थे। कभी-कभी वे ध्यान की या दार्शनिक तत्त्वों की चर्चा भी छेड़ देते थे। अरुणोदय के आसपास वे सब महात्मा गण वहाँ से प्रस्थान करते थे। मैं जब-जब वहाँ रहा, तब-तब मैंने देखा कि लाहिड़ी महाशय एक बार भी कभी सोने के लिये नहीं लेटे।

“गुरुदेव के साथ सम्बन्ध के प्रारम्भिक काल में मुझे अपने मालिक का विरोध सहना पड़ा। मेरे मालिक घोर भौतिकवादी थे।

“ ‘अपने कर्मचारियों में मुझे कट्टर धर्मान्ध लोग नहीं चाहिये,’ वे तिरस्कार के साथ कहा करते थे। ‘तुम्हारे पाखंडी गुरु से कभी मेरी मुलाकात हो गयी, तो मैं उसे कुछ ऐसा सुनाऊँगा कि उसे याद रहेगा।’

“इस धमकी का मेरे नियमित कार्यक्रम पर कोई असर नहीं पड़ा; मैं प्रायः प्रतिदिन की शाम अपने गुरु की सेवा में व्यतीत करता। एक शाम मेरे मालिक मेरे पीछे-पीछे आये और धृष्टता से लाहिड़ी महाशय की बैठक में घुस गये। बेशक वे अपने कथन के अनुसार लाहिड़ी महाशय को कुछ उल्टा-सीधा कहने के लिये ही आये थे। जैसे ही वे वहाँ बैठ गये, लाहिड़ी महाशय ने वहाँ उपस्थित लगभग बारह शिष्यों के दल को सम्बोधित करना शुरू किया।

“ ‘तुम सबको सिनेमा देखना है ?’

“जब हम लोगों ने हाँ में सिर हिलाया, तो उन्होंने बैठक में अंधेरा करने के लिये कहा। ‘मण्डलाकार में एक के पीछे एक बैठ कर अपने हाथ अपने आगे बैठे आदमी की आँखों पर रखो,’ उन्होंने कहा।

“मुझे यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मेरे मालिक भी, अनिच्छापूर्वक ही क्यों न हो, लाहिड़ी महाशय के निर्देशों का पालन कर रहे थे। कुछ क्षण बीतने के बाद लाहिड़ी महाशय ने हमसे पूछा कि हमें क्या दिखायी दे रहा था?

“मैंने उत्तर दिया: 'गुरुदेव! एक सुन्दर स्त्री दिख रही है। उसने लाल किनारे की साड़ी पहन रखी है। वह समुद्रसोख की बेल के पास खड़ी है।' अन्य सब शिष्यों ने भी यही वर्णन किया। गुरुदेव मेरे मालिक की ओर मुड़े। क्या आप उस स्त्री को पहचानते हैं?'

“ ‘जी।’ स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि वे उन भावनाओं से जूझ रहे थे, जो उनके स्वभाव के लिये नयी थीं। ‘घर में साध्वी पत्नी के होते हुए भी मैं मूर्खों की तरह उस पर अपना धन लुटा रहा हूँ। मैं जिस उद्देश्य से यहाँ आया था, उसके लिये बहुत शर्मिन्दा हूँ। क्या आप मुझे क्षमा कर शिष्य रूप में मुझे स्वीकार करेंगे ?’

“ ‘तुम यदि छह महीनों तक सदाचारपूर्ण जीवन व्यतीत करोगे तो मैं तुम्हें स्वीकार कर लूँगा।’ और फिर गुरुदेव ने कहाः ‘अन्यथा मुझे तुमको दीक्षा देनी ही नहीं पड़ेगी।’

“तीन महीनों तक तो मेरे मालिक ने किसी प्रकार अपने आपको संयत रखा; फिर उसी स्त्री के साथ दोबारा अपना सम्बन्ध बना लिया। दो महीने बाद उनका देहान्त हो गया। तब उनको दीक्षा देने की अनिश्चितता के बारे में गुरुदेव की गुप्त भविष्यवाणी का अर्थ मेरे समझ में आया।”

सुप्रसिद्ध त्रैलंग स्वामी लाहिड़ी महाशय के मित्र थे जिनकी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक होने की मान्यता थी। दोनों योगी कई बार साथ-साथ ध्यान में बैठते थे। त्रैलंग स्वामी की ख्याति इतनी दूर तक फैली हुई थी कि शायद ही कोई हिन्दू कभी उनके विस्मयकारी चमत्कारों की किसी कहानी पर सन्देह करता। यदि ईसा मसीह वापस धरती पर लौटें, और न्यू यॉर्क की सड़कों पर अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रदर्शन करते घूमें तो लोगों में वही श्रद्धा और विस्मयाकुलता उत्पन्न होगी जो कुछ ही दशकों पहले वाराणसी की भीड़ भरी गलियों से गुजरते हुए त्रैलंग स्वामी ने उत्पन्न की थी। वे उन सिद्ध पुरुषों में से थे, जिन्होंने समय के क्षयकारी प्रभाव के विरुद्ध भारत को मजबूत बना रखा है।

कई बार देखा गया कि घातक विषों को पीने पर भी त्रैलंग स्वामी पर उनका कोई असर नहीं हुआ। हजारो लोगों ने, जिनमें से कुछ आज भी जीवित हैं, त्रैलंग स्वामी को गंगा के पानी के ऊपर तिरते देखा है। कई-कई दिनों तक वे पानी के ऊपर बैठे रहते या बहुत दिनों तक लहरों के नीचे छिपे रहते। भारतीय सूर्य की निर्दयी धूप में मणिकर्णिका घाट के दहकते प्रस्तर-खंडों पर निश्चल अवस्था में त्रैलंग स्वामी की निर्वस्त्र मूर्ति दिखायी देना एक सामान्य सी बात थी।

इन असाधारण कृतियों से त्रैलंग स्वामी लोगों को यह सिखाना चाहते थे कि मानव जीवन का आक्सीजन या किन्हीं विशेष परिस्थितियों और सावधानियों पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं है। चाहे योगिराज पानी के ऊपर रहते हों या पानी के नीचे, चाहे उनका शरीर उग्र सूर्य किरणों को
ललकारता हो या नहीं, उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वे ईश-चैतन्य के द्वारा जीते थे: मृत्यु उनका स्पर्श नहीं कर सकती थी।

ये योगिराज केवल आध्यात्मिक रूप से ही नहीं बल्कि शारीरिक रूप से भी विशाल थे। उनका वजन तीन सौ पौंड से अधिक था: उनके जीवन के प्रत्येक वर्ष का एक पाँड! रहस्य और भी बढ़ जाता है, क्योंकि वे शायद ही कभी कुछ खाते थे। किन्तु सिद्ध पुरुष तो सहज ही स्वास्थ्य के साधारण नियमों का जब चाहे किसी विशेष कारण के लिये उल्लंघन कर देता है। प्रायः यह कारण सूक्ष्म होता है जो केवल उसी को ज्ञात होता है।

जो महान संत विश्व - माया के स्वप्न से जाग जाते हैं और इस सत्य को पहचान लेते हैं कि यह विश्व तो ईश्वर के मन की केवल एक कल्पना है, वे शरीर के साथ जो चाहे कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह ज्ञान हो जाता है कि शरीर ऊर्जा का केवल एक ऐसा घनीभूत या संघनित रूप है जिसमें जैसा चाहे परिवर्तन किया जा सकता है। यूँ तो वैज्ञानिकों की समझ में भी यह बात अब आ गयी है कि घन पदार्थ और कुछ न होकर केवल घनरूप ऊर्जा है, परन्तु सिद्ध पुरुष पदार्थजगत् के नियंत्रण के मामले में केवल सैद्धान्तिक ज्ञान को पार कर व्यावहारिक प्रयोग के क्षेत्र में उतर चुके हैं।

त्रैलंग स्वामी हमेशा पूर्ण निर्वस्त्र रहते थे। वाराणसी की त्रस्त पुलिस उन्हें बौखलाने वाले शरारती बच्चे के समान मानने लगी थी। प्राकृतिक अवस्था में रहना उनके लिये सहजात था, ईडेन के गार्डन में रहने वाले प्रथम मानव आदम की भाँति ही उन्हें भी अपनी नग्नावस्था का भान नहीं था। परन्तु पुलिस को पूरा भान था और उन्होंने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया। इससे पुलिस ही मुश्किल में पड़ गयीः त्रैलंग स्वामी की महाकाय देह शीघ्र ही अपनी सम्पूर्ण नित- सामान्य अवस्था में जेल की छत पर दिखायी देने लगी। उनकी कोठरी पर लगा ताला ज्यों का त्यों था, वे बाहर कैसे निकले, किसी को समझ नहीं आ रहा था।

हतोत्साहित पुलिस अधिकारियों ने एक बार फिर अपना कर्तव्य पूरा किया। इस बार उनकी कोठरी के सामने एक सिपाही को भी खड़ा कर दिया गया। सत्य के सामने शक्ति को फिर एक बार मात खानी पड़ी। महान योगिराज शीघ्र ही अपने निश्चिन्त भाव से छत पर टहलते दिखायी दिये। न्यायदेवी आँखों पर पट्टी बांधे रहती हैं; त्रैलंग स्वामी के मामले में निरुत्तर हुई पुलिस ने न्यायदेवी का ही अनुसरण करने का फैसला कर लिया।

त्रैलंग स्वामी हमेशा मौन रहते थे। ⁴ गोल-गोल चेहरा और बड़े पीपे की तरह विशाल पेट होते हुए भी वे कभी-कभी ही खाते थे। कई सप्ताहों तक निराहार रहने के बाद वे हाँड़ियाँ भर-भरकर भक्तों द्वारा अर्पित किया गया दही खाकर अपना उपवास तोड़ते। एक बार एक नास्तिक ने त्रैलंग स्वामी को पाखण्डी सिद्ध करने का निश्चय किया। उसने दीवारों की सफेदी के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला चूना घोलकर एक बाल्टी भर उनके सामने रख दिया।

फिर उसने बड़ी श्रद्धा का ढोंग करते हुए कहा: “महात्मन्! मैं आपके लिये कुछ दही लाया हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।”

त्रैलंग स्वामी ने बिना किसी हिचक के उस जलते हुए चूने के कई लीटर की आखरी बूँद तक पी ली। कुछ ही मिनटों में वह कुकर्मी पीड़ा से छटपटाते हुए भूमि पर लोटने लगा।

“बचाइये, स्वामीजी, बचाइये!” वह चीखने लगा। “मेरा शरीर जल रहा है! मेरी कुटिल परीक्षा के लिये क्षमा कर दीजिये !”

महान योगिराज ने अपना मौन भंग किया और कहा: "शैतान" उन्होंने कहा “तुमने जब यह विष मुझे पीने के लिये दिया तब तुम्हारी समझ में यह नहीं आया कि मेरा जीवन तुम्हारे जीवन के साथ एक है। यदि मुझे यह ज्ञान नहीं होता कि मेरे पेट में ईश्वर उसी तरह विद्यमान है, जिस तरह वह ब्रह्माण्ड के हर अणु-परमाणु में है, तब तो चूने के घोल ने मुझे मार ही डाला होता। अब तो कर्म का दैवी अर्थ तुम्हारी समझ में आ गया है, इसलिये फिर कभी किसी के साथ चाल चलने की कोशिश मत करना।”

त्रैलंग स्वामी के इन शब्दों के साथ ही वह पापी कष्टमुक्त हो गया और चुपचाप वहाँ से चला गया।


त्रैलंग स्वामी के बजाय उस आदमी पर पीड़ा का उलटना योगिराज की अपनी इच्छा के कारण नहीं हुआ था, बल्कि सृष्टि के दूर से दूर स्थित पिंडों के भी आधारभूत विधि के नियम के कार्यान्वित होने से हुआ था। त्रैलंग स्वामी जैसे आत्मदर्शी पुरुषों के मामले में यह नियम तत्क्षण कार्यान्वित हो जाता है, क्योंकि उन्होंने उसके कार्यान्वयन में बाधक अहंकार के एक-दूसरे को काटने वाले प्रवाहों को पहले ही हमेशा के लिये नष्ट कर दिया होता है।

ईश्वरीय न्याय की स्वयंचालित व्यवस्था (जो प्रायः अनपेक्षित प्रकार से प्रकट होती है, जैसा त्रैलंग स्वामी और उनका हत्यारा बनने जा रहे आदमी के मामले में हुआ) में विश्वास मानवी अन्याय के प्रति हमारे उतावले क्रोध को शान्त करता है। "प्रतिशोध लेना मेरा काम है; प्रभु कहते हैं, मैं ही प्रतिशोध लूँगा।"⁵ मानव के क्षुद्र साधनों की आवश्यकता ही क्या है ? प्रतिशोध के लिये ब्रह्माण्ड स्वयं ही अपने आप व्यवस्था करता है।

नासमझ लोग ईश्वरीय न्याय, प्रेम, सर्वज्ञता, अमरत्व आदि के होने की सम्भावनाओं पर विश्वास नहीं करते। "शास्त्रों के खयाली पुलाव!" इस प्रकार के नासमझ दृष्टिकोण वाले लोगों को ब्रह्माण्ड के विराट प्रपंच के प्रति कोई आदर श्रद्धा नहीं रहती, और अपने जीवन में वे ऐसी असंगत घटनाओं का चक्र शुरू कर देते हैं कि वही चक्र आखिर उन्हें विवेक और ज्ञान को ढूंढ़ने पर विवश कर देता है।

ईसा मसीह ने येरुसेलम में अपने विजय प्रवेश के अवसर पर ईश्वरीय विधान की सर्वशक्तिमत्ता के बारे में कहा था। जब उनके शिष्य और जनसमुदाय हर्षध्वनि कर रहे थे और नारे लगा रहे थे: "स्वर्ग में शान्ति और ईश्वर की महिमा हो," तो कुछ रूढ़िवादी फरीसियों ने इसे अशोभनीय दृश्य कहकर ईसा के पास जाकर इसका विरोध किया। उन्होंने कहा: "हे गुरु! अपने शिष्यों को डाँटिये।"

परन्तु ईसा ने कहा कि यदि उनके शिष्यों को चुप कर भी दिया गया, "तो पत्थर तुरन्त नारे लगाने लगेंगे।"

फरीसियों को लगाई हुई इस फटकार में ईसा मसीह यह स्पष्ट कर रहे थे कि ईश्वरीय न्याय केवल प्रतीकात्मक अमूर्तता नहीं है जो कभी प्रकट नहीं हो सकती, और शान्त रहने वाले मनुष्य की जीभ जड़ से उखाड़ दी जाये, तब भी उसे स्वयं विधि के विधान से, जो सृष्टि का आधार है, वाणी एवं सुरक्षा प्राप्त हो जायेगी।

ईसा मसीह कह रहे थे: “तुम शान्ति प्रिय लोगों को चुप करना चाहते हो? यह तो स्वयं उस ईश्वर की आवाज को दबा देने की आशा करने के समान है, जिसके पत्थर भी उसकी महिमा और उसकी सर्वव्यापिता का गुणगान करते हैं। क्या तुम लोग यह माँग करोगे कि मनुष्य मिलकर स्वर्ग की शान्ति के आदर में उत्सव न मनायें? क्या तुम लोग उन्हें केवल पृथ्वी पर युद्ध के समय ही एकत्रित होकर अपनी एकता व्यक्त करने का उपदेश दोगे? यदि ऐसा है, तो हे उपदेशकों, विश्व के आधार को उखाड़ फेंकने की अपनी तैयारी कर लो; क्योंकि सदाचारी मनुष्य ही नहीं, बल्कि पत्थर या पृथ्वी, और जल, और अग्नि, और वायु भी सृष्टि में दिव्य सामंजस्य का प्रमाण देने के लिये तुम्हारे विरुद्ध उठ खड़े होंगे।”

अवतारी पुरुष त्रैलंग स्वामी की एक बार मेरे एक मामा पर भी कृपा हुई थी। एक दिन प्रातःकाल मामा ने त्रैलंग स्वामी को बनारस के एक घाट पर भक्तों की भीड़ के बीच बैठे देखा। मामा किसी प्रकार भीड़ में से रास्ता बनाकर त्रैलंग स्वामी के पास पहुँच गये और उन्होंने भक्तिभाव से उनका चरणस्पर्श कर लिया। यह देखकर मामा आश्चर्यचकित रह गये कि वे उसी क्षण अपने एक व्यथाजनक जीर्ण रोग से मुक्त हो गये। { त्रैलंग स्वामी एवं अन्य महान गुरुओं का जीवन ईसामसीह के शब्दों का स्मरण दिलाता है " और जिनमें श्रद्धा है, उनमें ये लक्षण प्रकट होंगे मेरे नाम (क्राईस्ट चैतन्य) से वे भूत-प्रेतों को निकाल देंगे; वे नयी-नयी भाषाओं में बोलेंगे; वे साँपों को उठा लेंगे; और यदि वे कोई घातक विष भी पी लें, तो उससे उन्हें कोई हानि नहीं होगी; वे रोगियों का स्पर्श करेंगे तो रोगी तुरन्त ठीक हो जायेंगे।" – मरकुस १६:१७-१८ (बाइबिल)}

त्रैलंग स्वामी के ज्ञात शिष्यों में से केवल एक महिला, शंकरी माई जिऊ, {जिऊ: आदरसूचक 'जी' शब्द के लिये बंगाली भाषा का शब्द} जीवित है। त्रैलंग स्वामी के एक शिष्य की पुत्री होने के कारण शंकरी माई को बचपन से ही स्वामी की शिक्षा-दीक्षा प्राप्त हुई। वे चालीस वर्षों तक बदरीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ तथा पशुपतिनाथ के पास हिमालय की अनेक गुफाओं में रहीं। इस ब्रह्मचारिणी का जन्म १८२६ में हुआ था, अब उनकी उम्र सौ साल से अधिक है। परन्तु दिखने में वृद्धा नहीं लगतीं, उनके केश पूर्ण काले हैं, दाँत चमकदार सफेद हैं और उनमें गजब की फूर्ति है। वे निर्धारित वर्षों में होने वाले कुंभ मेले जैसे धार्मिक मेलों में सम्मिलित होने के लिये कुछ-कुछ वर्षों के बाद अपने एकान्तवास से बाहर आती हैं।

यह महिला संत प्रायः लाहिड़ी महाशय के पास आया करती थीं। उन्होंने बताया कि एक दिन वे कोलकाता के निकट बैरेकपुर क्षेत्र में लाहिड़ी महाशय के साथ बैठी थीं, तब लाहिड़ी महाशय के महान गुरु बाबाजी चुपचाप उस कमरे में आये और उन्होंने उन दोनों के साथ वार्तालाप किया। वे स्मरण करती हैं: "अमर गुरुदेव (बाबाजी) एक गीला वस्त्र पहने हुए थे, जैसे वे नदी में स्नान करके अभी-अभी बाहर आये हों। उन्होंने मुझपर कुछ आध्यात्मिक उपदेशों की कृपा भी की।"

एक विशिष्ट अवसर पर त्रैलंग स्वामी ने लाहिड़ी महाशय का सबके सामने सम्मान करने के लिये अपना मौन तोड़ दिया। उनके एक शिष्य ने इस पर आपत्ति जताई।

उसने कहाः “गुरुदेव! एक स्वामी और संन्यासी होते हुए भी आप एक गृहस्थ के प्रति इतना आदर क्यों दिखाते हैं ?”

त्रैलंग स्वामी ने कहाः “वत्स! लाहिड़ी महाशय एक दिव्य बिल्ली के बच्चे के समान हैं, बिल्ली का बच्चा जैसे उसकी माँ जहाँ उसे रख देती है वहीं रहता है, उसी प्रकार लाहिड़ी महाशय भी जहाँ जगज्जननी उन्हें रख देती हैं, वहीं रहते हैं। कर्तव्यपालन की खातिर सांसारिक मनुष्य की भूमिका निभाते हुए भी उन्होंने वह पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है, जिसे प्राप्त करने के लिये मुझे सब कुछ त्याग देना पड़ा यहाँ तक की अपनी लंगोटी भी!”


¹ “पुरुष केवल ईश्वर के लिये, स्त्री, पुरुष में स्थित ईश्वर के लिये।”– मिल्टन

² पूज्य माताश्री ने २५ मार्च १९३० को बनारस में देह त्याग किया।

³ दण्डीस्वामी विशिष्ट संन्यास परंपरा के संन्यासी होते हैं जो ब्रह्मदण्ड स्वरूप एक ठंडा अपने पास रखते हैं। मानव शरीर में मेरुदण्ड ही ब्रह्मदण्ड है। मेरुदण्ड और मस्तिष्क में स्थित सात चक्रों का भेदन करना ही अनन्त साम्राज्य का मार्ग है।

⁴ “वे एक ऐसे 'मुनि' या संन्यासी थे, जो 'मौन,' (आध्यात्मिक शान्ति) रखते थे। संस्कृत शब्द 'मुनि,' ग्रीक शब्द मोनोस (monos), से साम्य रखता है, जिसका अर्थ है, "अकेला, एक," और जिससे अंग्रेजी शब्द जैसे मंक (monk) और मोनिज्म (monism) लिये गये हैं।

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