Me Papan aesi jali - 17 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(१७)

आदेश एयरपोर्ट जाने के लिए कार में बैठ गया और सदानन्द जी भी उसके साथ उसे एयरपोर्ट छोड़ने चले गए,इस बीच आदेश ने सरगम से ना आँखें मिलाईं और ना ही कुछ कहा,सरगम आदेश के विदेश जाने की बात से एकदम हिल सी गई थी लेकिन फिर भी खुद को संतुलित करते हुए उसने शीतला जी से पूछा...
"लेकिन चाचीजी! आदेश जी ने तो अपने विदेश जाने के बारें में तो किसी से कुछ कहा ही नहीं"
"ये बात तो उसके पापा ने उसे एक महीने पहले ही बता दी थी कि उसे कारोबार के सिलसिले में दो महीनों के लिए विदेश जाना पड़ेगा,शायद वो ये बात बताना भूल गया होगा", शीतला जी बोलीं....
अब शीतला जी की बात सुनकर सरगम के पैरों तले से जमीन खिसक गई और उसने मन में सोचा कि इसका मतलब है कि आदेश ने मुझसे झूठ बोला,वो जानता था कि वो विदेश जाने वाला है इसलिए उसने मुझसे झूठी शादी की और मेरी देह के साथ खिलवाड़ किया,उसने कभी मुझसे प्यार किया ही नहीं था, इसका मतलब है कि कमलकान्त बाबू आदेश के बारें में सही कह रहे थे लेकिन मैनें उनकी बात नहीं सुनी और अपनी जिन्दगी के साथ खिलवाड़ कर बैठी,अब सरगम को खुद से घिन आ रही थी कि वो क्यों आदेश के करीब गई,लेकिन अब उसके पास सिवाय पछतावें के कुछ और बचा भी नहीं था....
वो बोझिल मन से अपने कमरें में आई और बिस्तर पर आकर लेट गई और कुछ ही देर में उसके आँसुओं से तकिया भींग गया,सरगम को खुद पर भी गुस्सा आ रहा था कि क्यों उसने आदेश पर भरोसा करके उसे अपना शरीर सौंप दिया,क्यों वो उसके प्यार के झूठे जाल में फँस गई और वो यूँ ही रोती रही ,फिर कुछ देर में दीवार घड़ी ने शाम के पाँच बजा दिए और फिर सरगम बिस्तर से उठी और उसने मुँह धोया फिर अपना दुपट्टा डालकर और कुछ किताबें लेकर वो सिमकी को पढ़ाने सरवेन्ट क्वार्टर की ओर चल पड़ी,वो वहाँ पहुँची तो सरगम की आँखों को देखकर सिमकी ने पूछा....
"क्या हुआ दीदी?तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है"?
"कुछ नहीं ऐसे ही घर की याद आ रही थी",सरगम ने झूठ बोलते हुए कहा...
"नहीं!दीदी! ये बात तो नहीं लग रही ,बात कुछ और ही है",सिमकी बोली....
"नहीं!कुछ और नहीं है",
और इतना कहते कहते सरगम की आँखें भर आईं तो सिमकी बोली....
"बता दो ना दीदी कि क्या बात है"?
"अब क्या बताऊँ तुम्हें"
और इतना कहकर सरगम फूट फूटकर रोने लगी,सरगम का रोना देखकर सिमकी ने उसे अपने सीने से लगा लिया और बोली.....
"दीदी!तुम हम पर भरोसा कर सकती हो,बता दो ना कि क्या बात है"?
"सिमकी!मेरी जिन्दगी बरबाद हो गई",
ये कहकर सरगम दोबारा फूट फूटकर रोने लगी,सिमकी ने उसे दोबारा अपने सीने से लगाया और सरगम के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली....
"ना!दीदी!ऐसे रोते नहीं हैं,हिम्मत से काम लो और बताओ कि का हुआ है तुम्हारे साथ"
जब हम किसी दर्द में होते हैं तो लगता है कि बस कोई हमारी बात सुन ले,हम वहाँ पर सही थे या गलत,इसका फैसला ना करते हुए बस कोई हमारे आँसू पोछकर हमें सीने से लगा ले और उसके सामने हम अपने सारे दर्द और दुःख को उड़ेल दें और यही हो रहा था आज सरगम के साथ ,सिमकी उसकी हमदर्द बनकर उसका दुख बाँट रही थी और सरगम एक छोटी बच्ची की तरह अपनी तकलीफ़ें ,अपना ग़म कह रही थी,फिर सरगम ने सिसकते हुए सिमकी को सारा हाल कह सुनाया,सारी बात सुनकर सिमकी बोली.....
"दीदी!ये का कह रही हो और तुमसे शादी करके छोटे मालिक विदेश भाग गए",
"हाँ!मुझे बताया भी नहीं कि वो विदेश जा रहे हैं",सरगम बोली....
"केवल शादी बस की कि और कुछ भी हुआ है तुम दोनों के बीच",सिमकी बोली....
"उसी बात का तो रोना है सिमकी कि उन्होनें मुझे कहीं का नहीं छोड़ा",सरगम बोली....
"रोओ मत दीदी!,धीरज से काम लो"सिमकी बोली...
"धीरज कैसे धरूँ सिमकी?कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं अब क्या करूँ?,सरगम बोली...
"कोई ना कोई उपाय तो निकालना ही होगा",सिमकी बोली....
"उन्होंने मेरे लिए कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा,आज सुबह वो सबको हमारे रिश्ते के बारें में बताने वाले थे,लेकिन सुबह नाश्ते की टेबल पर वो नहीं आएं और दोपहर तक वो विदेश भी रवाना हो गए,मुझे बात करने का मौका भी नहीं दिया,कहकर गए हैं कि दो महीने बाद लौटेगें",सरगम बोली....
"तब तो बहुत बुरा हुआ ,अब तो तुम्हारे पास उनका इन्तजार करने सिवाय और कोई रास्ता भी नहीं है",सिमकी बोली....
"हाँ!और मैं ये बात किसी से कह भी नहीं सकती,क्योंकि मेरी बात पर कोई भरोसा भी नहीं करेगा,सबको लगेगा कि मैं झूठ बोल रही हूँ,उनकी दौलत देखकर मेरे मन में लालच समा गया है और मैं उनके इकलौते बेटे को फँसाने की कोशिश कर रही हूंँ ताकि उससे शादी करके मैं इस घर और जमीन जायदाद की मालकिन बन सकूँ",सरगम बोली...
"दीदी!सही कह रही हो तुम,लोगों का कोई भरोसा नहीं है कि कब,कौन,किसको गलत समझ बैठे,फिर तुम चाहे जितने भी अच्छे क्यों ना हो", सिमकी बोली...
"जब उनका बेटा ही मेरे साथ ऐसा परायों जैसा बर्ताव कर रहा था तो फिर घर के लोग तो मुझसे ना जाने कैसा बर्ताव करेगें",सरगम बोली...
"तो तुम छोटे मालिक को चिट्ठी लिखकर सब पूछ क्यों नहीं लेती कि उन्होंने तुम्हारे साथ ऐसा क्यों किया"? सिमकी बोली...
"मुझे उनका पता ठिकाना मालूम नहीं है और मैं किसी से पूछ भी नहीं सकती,अच्छा नहीं लगेगा उनका पता ठिकाना पूछना,",सरगम बोली...
"तो दीदी!फिर दो महीने इन्तजार करना होगा तुम्हें",सिमकी बोली...
"लगता है यही करना होगा",सरगम बोली...
और फिर सरगम दो महीनों तक यूँ ही घुटती रहती,जलती रही,उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हो रहा था,वो दिनबदिन कमजोर भी होती जा रही थी,जब भी उसका मन भारी होता तो वो सिमकी के पास चली जाती और उससे अपने मन की बात कहकर मन हल्का कर लेती,ऐसे ही दो महीने बीतने को आए थे और एक दिन टेलीफोन आया कि आदेश एक हफ्ते बाद वापस आने वाला है,ये खबर सुनकर सरगम के मन को कुछ ढ़ाढ़स बँधा और उसने सोचा आदेश के आते ही वो उससे कहेगी कि इस रिश्ते के बारें में सबको बता दे और ये खबर बताने वो सिमकी के पास जा ही रही थी कि वो उसके क्वार्टर पर थोड़ी दूर जाकर चक्कर खाकर गिर पड़ी,
वहीं बगीचे में कुर्सी डाले गनपत बैठा था और जब सरगम चक्कर खाकर गिरी तो गनपत ने सिमकी से पानी लाने को कहा,सिमकी जल्दी से पानी लेकर आई और उसने सरगम को सम्भाला और उसके मुँह पर पानी के छींटे डाले,फिर जब सरगम को होश आ गया तो वो उसे सहारा देकर अन्दर ले गई और फिर सरगम वहाँ थोड़ी देर बैठी ही थी कि उसे बहुत जोर की उल्टी आई और वो बाथरूम की ओर भागी, सरगम को यूँ चक्कर आना,फिर उल्टी आना ये देखकर सिमकी को किसी बात का अंदेशा हुआ और जब सरगम बाथरूम से बाहर आई तो उसने सरगम से कहा...
"दीदी!तुम पहले चटाई पर लेट जाओ"
"क्या हुआ सिमकी?मैं ठीक हूँ!परेशान मत हो",सरगम बोली...
"नहीं!दीदी!तुम पहले लेटो",सिमकी बोली.....
और फिर सरगम लेटी तो सिमकी ने सरगम के पेट को सहलाकर ध्यान से देखा और उसे जिस बात का अंदेशा था वही हुआ था और फिर सिमकी सरगम से बोली....
"दीदी!तुम माँ बनने वाली हो"
ये सुनकर सरगम के चेहरे का रंग उड़ गया और उसने सिमकी से पूछा....
"लेकिन तुम्हें कैसे पता चला"?
तब सिमकी बोली....
"गाँव में मेरी दादी दाईअम्मा थी और ये गुण मैनें उनसे ही सीखा है,इसलिए जान पाई कि तुम माँ बनने वाली हो",सिमकी बोली....
अब तो इस बात ने सरगम की मुसीबत को और भी बढ़ा दिया था....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....