Me Papan aesi jali - 18 books and stories free download online pdf in Hindi

मैं पापन ऐसी जली--भाग(१८)

अपने माँ बनने की खबर सुनकर सरगम बहुत डर गई और फूट फूटकर रोने लगी,सिमकी भी इस बात से बहुत परेशान हो उठी और उसने सरगम को दिलासा देते हुए कहा....
"घबराओ नहीं दीदी!सब ठीक हो जाएगा"
"कैसे ठीक होगा सिमकी.....कैसे ठीक होगा",सरगम कहते कहते और भी जोर से रो पड़ी....
गनपत को सरगम के रोने की आवाज़ बाहर तक सुनाई दी,लेकिन वो मारे संकोच के कमरें के भीतर ना आया,उसने सोचा हो रही होगी आपस में कोई बात ,महिलाओं के बातों के बीच में क्या पड़ना,लेकिन सरगम का रोना उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,उसने मन में सोचा कोई ना कोई बात जरूर है तभी सरगम दीदी रो रहीं हैं और वो सरगम के बाहर आने का इन्तजार करने लगा ताकि वो सरगम के जाने के बाद सिमकी से पूछ सकें कि सरगम दीदी क्यों रो रही थी....
सरगम को रोता देख सिमकी ने सरगम को गले से लगाकर कहा....
"बस!दीदी!कुछ दिनों की बात और है,छोटे मालिक जाऐगें तो तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी,बच्चे वाली बात सुनकर वो तुम्हें जरूर अपना लेगें",
"सिमकी!मैं कैसें भरोसा करूँ उस इन्सान पर कि वो मुझे अपना लेगा"?,सरगम बोली...
"दीदी!धीरज धरो!,ऐसा ही होगा,वो तुम्हें जरूर अपनाऐगें",सिमकी बोली....
"दो महीने से धीरज ही तो धरे थी लेकिन अब ये मनहूस खबर सुनकर मेरा धीरज टूट गया है",सिमकी बोली....
"नहीं!दीदी!उस नन्ही सी जान को मनहूस मत कहो",सिमकी बोली...
"ये खुशखबरी नहीं सिमकी! पाप है...पाप!",सरगम बोली....
"ऐसा मत कहो दीदी! अपने आप को सम्भालो ",सिमकी बोली...
"अब सम्भालने को कुछ नहीं बचा सिमकी!,सब बिखर चुका है,मेरी एक गलती ने मेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी,"सरगम बोली....
"नहीं!दीदी!तुम जैसा सोच रही हो बात उतनी नहीं बिगड़ी है,छोटे मालिक को आ जाने दो,तब तुम कुछ ऐसा सोचना",सिमकी बोली...
"अगर उन्होंने मुझे नहीं अपनाया तो तब क्या होगा?ये खबर सुनकर तो मेरी माँ जीते जी मर जाएगी", सरगम बोली....
"तुम कुछ ज्यादा ही सोच रही हो दीदी!",सिमकी बोली...
"मुझे कुछ ठीक होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं सिमकी !,मेरी हिम्मत जवाब दे रही है",सरगम बोली...
"पहले तुम अपने आँसू पोछ लो और यहीं बैठकर ठण्डे दिमाग से थोड़ी देर सोचो,तब तक मैं खाना बना लेती हूँ तो तुम खाना खाकर ही वापस जाना,क्योंकि हमें पता है कि तुम यहाँ से जाकर खाना नहीं खाओगी", सिमकी बोली...
"नहीं!मैं खाना-वाना नहीं खाऊँगी,मेरा मन नहीं है सिमकी!",सरगम बोली...
"नहीं!तुम खाना खाकर ही जाओगी,तुम आराम करो,मैं तब तक खाना बनाती हूँ",
और ऐसा कहकर सिमकी खाना बनाने लगी और उसने सरगम को खाना खिलाकर ही वापस भेजा,खाना खाकर जैसे ही सरगम बंगले में पहुँची तो शीतला जी ने उससे कहा....
"आज बड़ी देर कर दी तुमने,इतनी देर तक नौकरों के यहाँ नहीं बैठा करते,पता है आज महाराज से खाना बनवाना पड़ा",
"जी!देर हो गई,उसे पढ़ा रही थी",सरगम बोली...
"कोई बात नहीं,चलो खाना खाते हैं",शीतला जी बोलीं....
"जी!मैं आप सबको खाना परोस देती हूँ,मैं तो खाना नहीं खाऊँगीं",सरगम बोली...
"तुम खाना क्यों नहीं खाओगी ",शीतला जी ने पूछा...
"जी!मुझे आज सिमकी ने खाना खिला दिया है",सरगम बोली....
अब शीतला जी अपने गुस्से पर काबू नहीं रख सकीं और सरगम से बोलीं....
"उसे पढ़ाने तक तो ठीक था लेकिन अब तुम उसके यहाँ खाना भी खाने लगी,रहती यहाँ हो और हिमायती बनती हो उन लोगों की"
"गलती हो गई चाची जी!",सरगम बोली...
"ठीक है...ठीक है,अब अपने कमरें में जाओ,खाना हम माँ बेटी खुद ही परोसकर खा लेगें",
और फिर ऐसा कहकर शीतला जी खाने की टेबल पर जा बैठीं और सरगम अपने कमरें में चली गई,उस समय तो भानुप्रिया अपनी माँ से कुछ ना बोली लेकिन जब सरगम अपने कमरें में चली गई तो भानूप्रिया ने अपनी माँ शीतला से पूछा....
"माँ!आप सरगम दीदी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहीं थीं"?
"तू क्यों उसकी तरफदारी कर रही है",?शीतला जी ने भानुप्रिया पूछा...
"मुझे अच्छा नहीं लगा इसलिए पूछ लिया",भानुप्रिया बोली....
तब शीतला जी बोलीं....
"वो मुफ्त में हमारे घर पर रहती है,यहाँ का खाती है और यहाँ का पहनती है और अगर वो यूँ ही नौकरों की ज्यादा फिकर करेगीं तो उसे डाँटना जरूरी है",
"लेकिन वो यहाँ मुफ्त में तो नहीं रहतीं,सारे घर का काम वो ही अकेले सम्भालतीं हैं",भानुप्रिया बोली...
"तो कोई एहसान करती है क्या हम पर?,दिल्ली जैसी जगह में ना ऐसा रहने को मिलता और ना ही ऐसा खाने को,वो तो तेरे पापा हैं जो सब पर अपनी दया के फूल बरसाते फिरते हैं,एक गरीब लड़की को सिर पर बैठाकर रखा है उन्होंने",शीतला जी बोलीं...
ये सुनकर भानुप्रिया को कुछ अच्छा नहीं लगा और उसने माँ शीतला से पूछा....
"माँ!एकाएक आज तुम्हें हो क्या गया है? अभी तक तो तुम सरगम दीदी के साथ अच्छे से पेश आती थी लेकिन आज तुम उनके बारें में ऐसी बातें क्यों कर रही हो?"
तब शीतला जी बोलीं....
"दोपहर में आदेश का फोन आया था और उसने कहा कि सरगम अच्छी लड़की नहीं है,उसने कई बार अकेले में सरगम को कमलकान्त के साथ गुलछर्रे उड़ाते हुए देखा है,ये बात कमलकान्त ने खुद भी आदेश को बताई है कि सरगम के साथ उसका चक्कर है,क्या पता और ना जाने किस किस के साथ वो मुँह काला कर चुकी हो,ऐसी लड़कियों का कोई ठिकाना नहीं होता",
अब ये बात सुनकर भानुप्रिया के मन में शक़ का बीज पनप गया और उसने मन में सोचा,सरगम दीदी को तो पता है कि मैं कमलकान्त को पसंद करती हूँ तब भी उन्होंने ऐसा किया,उन्होंने मुझसे मेरा प्यार छीन लिया,अब मैं सरगम दीदी को कभी भी माँफ नहीं करूँगी,काश ! मैनें पहले ही कमलकान्त से अपने प्यार का इजहार कर लिया होता तो ये नौबत ना आती,सरगम दीदी मेरे प्यार को मुझसे छीन ना पाती और यही सब सोच सोचकर जैसे तैसे भानुप्रिया ने अपना खाना खतम किया और वो अपने कमरें में चली....
और अब आदेश ने सरगम से पीछा छुड़ाने के लिए जो तीर छोड़ा था वो सीधा निशाने पर लगा था,उस तीर से शीतला जी और भानुप्रिया दोनों के मन में अब सरगम के लिए ना तो प्यार रह गया और ना ही हमदर्दी,अब दोनों ही सरगम को नापसंद करने लगीं थीं और उधर बेचारे कमलकान्त को भी आदेश ने बदनाम कर दिया था...
और शीतला और भानूप्रिया का ऐसा व्यवहार सरगम ने भी महसूस किया,उसे समझ नहीं आ रहा था कि दोनों उससे कटीं-कटीं क्यों रहने लगी हैं,लेकिन उसने उस वक्त उन दोनों से कुछ भी पूछना मुनासिब नहीं समझा,क्योंकि वो ये सब पूछकर उन सब के सामने बुरा नहीं बनना चाहती थी और वो यूँ ही आदेश के आने का इन्तज़ार करती रही और फिर दो चार दिन बाद आदेश घर लौटा और फिर रात के समय खाने की टेबल पर सदानन्द जी ने आदेश से पूछा....
"तो तुम्हें कैसीं लगी ओमप्रकाश जोशी जी की बेटी मालविका"?
"जी!अच्छी है",
"तो दो महीने उसके साथ विदेश घूमकर उसे समझ ही गए होगें कि उसका व्यवहार कैसा है?",सदानन्द जी बोले...
"जी!",,आदेश बोला...
"इसलिए तो मैनें तुम्हें वहाँ भेजा था",सदानन्द जी बोलें...
"ये बिल्कुल सही किया आपने इसी बहाने दोनों की जान पहचान हो गई",शीतला जी बोलीं....
"तो फिर ये रिश्ता पक्का कर दें",सदानन्द जी बोले...
"जैसी आपकी मर्जी",आदेश बोला...
तब सदानन्द जी बोले...
"ओमप्रकाश जी हमारी तरह बहुत बड़े उद्योगपति हैं,अचल सम्पत्ति हैं उनके पास और उनकी बेटी मालविका उनकी इकलौती सन्तान है,उस सम्पत्ति की अकेली वारिस",
"अब उससे क्या पूछ रहें ,जब लड़की और खानदान दोनों अच्छे हैं तो फिर फौरन ही ये रिश्ता पक्का कर दीजिए",शीतला जी बोलीं....
"तो फिर मैं जल्द ही इस मसले पर ओमप्रकाश जी से बात करता हूँ",सदानन्द जी बोले...
अब ये खबर सुनकर तो जैसे सरगम के ऊपर परमाणु बम ही गिर पड़ा था,लेकिन उसने जैसे तैसे खुद को सम्भालते हुए सबके सो जाने का इन्तजार किया, फिर रात का खाना खा लेने के बाद जब सब अपने अपने कमरें में चले गए तो सरगम मजबूरी में आदेश के कमरें के पास पहुँची और उसके कमरें के दरवाजे पर दस्तक देते देते हुए धीरे से बोली....
"आदेश जी!मैं सरगम! प्लीज दरवाजा खोलिए"
और फिर आदेश ने दरवाजा खोला तो सरगम उसके सीने से लगते हुए बोली....
"मैं कब से आपका इन्तज़ार कर रही थी,आखिर आप आ ही गए"

क्रमशः....
सरोज वर्मा....