Ek Yogi ki Aatmkatha - 34 books and stories free download online pdf in Hindi

एक योगी की आत्मकथा - 34

हिमालय में महल का सृजन

“बाबाजी (महाअवतारी बाबा) के साथ लाहिड़ी महाशय की प्रथम भेंट एक रोमांचक कहानी है और यह उन कई कहानियों में से केवल एक है जिनसे उस मृत्युंजय महागुरु की विस्तृत झाँकी मिलती है।”

ये उस अद्भुत कहानी को शुरू करने से पहले स्वामी केवलानन्दजी के प्रस्तावना शब्द थे। पहली बार उन्होंने जब यह कहानी मुझे बतायी थी, तो मैं अक्षरशः मंत्रमुग्ध हो गया था। अन्य कई अवसरों पर भी मैं अपने शान्त प्रकृति संस्कृत शिक्षक को यह कहानी फिर से मुझे सुनाने के लिये मना लिया करता था। बाद में श्रीयुक्तेश्वरजी से भी मुझे लगभग उन्हीं शब्दों में वह फिर से सुनने को मिली लाहिड़ी महाशय के इन दोनों शिष्यों ने यह रोमांचक कहानी सीधे अपने गुरु के मुँह से सुनी थी।

लाहिड़ी महाशय ने बताया था: "बाबाजी के साथ मेरी पहली भेंट मेरे तैंतीसवें वर्ष में हुई थी। १८६१ के शरद ऋतु में मैं दानापुर में सरकार के मिलिटरी इंजिनियरिंग विभाग में एकाउण्टेण्ट के पद पर कार्यरत था। एक दिन सुबह ऑफिस मैनेजर ने मुझे अपने ऑफिस में बुलाया।

" 'लाहिड़ी', उन्होंने कहा, 'अभी-अभी हमारे मुख्यालय से एक तार आया है। आपका स्थानांतरण रानीखेत कर दिया गया है, जहाँ सेना का एक कैम्प स्थापित किया जा रहा है।'

“एक नौकर को साथ लेकर मैं उस ५०० मील की यात्रा पर निकल पड़ा। घोड़े और बग्घी से यात्रा करते हुए हम लोग तीस दिन में हिमालय में स्थित रानीखेत पहुँच गये।

“ऑफिस में मेरा काम बहुत भारी नहीं था, अतः उन भव्य पर्वतों में कई घंटों तक घूमते रहने का समय मेरे पास था। एक अफवाह मैंने सुनी कि बड़े-बड़े सन्त उस क्षेत्र में निवास करते थे। उनके दर्शन करने की तीव्र इच्छा मेरे मन में जागी। एक दिन दोपहर में मैं पहाड़ों में यूँ ही भ्रमण कर रहा था, कि अचानक ऐसा लगा कि दूर कहीं से कोई मेरा नाम लेकर मुझे पुकार रहा है। मैं चौंक गया। द्रोणगिरि पर्वत पर जल्दी-जल्दी चढ़ते जाना मैंने जारी रखा। यह सोचकर मन में थोड़ी-सी बेचैनी अवश्य हो रही थी कि जंगल में अन्धेरा छा जाने से पहले मैं वापस नहीं लौट पाऊँगा।

“आखिरकार एक छोटी-सी खुली जगह में पहुँच गया, जिसकी दोनों ओर गुफाएँ थीं। वहीं पर बाहर को निकली एक चट्टान पर एक युवक मुस्कराते हुए स्वागतार्थ हाथ फैलाये खड़ा था। देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि ताम्रवर्ण केशों को छोड़कर वह दिखने में बिलकुल मेरे जैसा ही था।

“ ‘लाहिड़ी*, तुम आ गये!’ उस सन्त ने हिन्दी में मुझसे कहा। ‘यहाँ इस गुफा में आराम करो। वह मैं ही था जिसने तुम्हें पुकारा था।’

*[वास्तव में बाबाजी ने "गंगाधर" कहा था, जो लाहिड़ी महाशय का पिछले जन्म का नाम था।]


“मैंने एक छोटी-सी, साफ-सुथरी गुफा में प्रवेश किया, जिसमें कई ऊनी कम्बल और कुछ कमंडलु रखे हुए थे।

“ ‘लाहिड़ी, तुम्हें वह आसन याद है?’ उस योगी ने एक कोने में रखे कंबल की ओर हाथ दिखाया।

“ ‘नहीं, महाराज!’ अपनी इस साहसिक यात्रा की विचित्रता पर मैं कुछ हक्काबक्का-सा हो रहा था। मैंने आगे कहा: ‘अब मुझे अन्धेरा होने के पहले निकलना होगा। सुबह ऑफिस में काम है।’

“उस रहस्यमय सन्त ने अंग्रेजी में उत्तर दिया: The office was brought for you, and not you for the office.' (ऑफिस को तुम्हारे लिये लाया गया है, तुम्हें ऑफिस के लिये नहीं)।

“‌ ‘मैं अवाक् रह गया कि यह वनवासी तपस्वी न केवल अंग्रेज़ी बोलता है, बल्कि ईसा मसीह के शब्दों का अर्थ भी इसके शब्दों में ध्वनित हो रहा है।

“ ‘मैं देख रहा हूँ कि मेरे तार ने अपना काम किया है।’ योगी की इस टिप्पणी का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया। मैंने उनसे इसका अर्थ पूछा।

“ ‘ मैं उस तार की बात कर रहा हूँ, जिसके कारण तुम इस निर्जन प्रदेश में पहुँच गये हो। मैंने ही तुम्हारे वरिष्ठ अधिकारी के मन को गुप्त रूप से यह सुझाव दिया था कि तुम्हारा स्थानान्तरण रानीखेत कर दिया जाय। जब कोई मनुष्य मानव मात्र के साथ एकता अनुभव करता है, तब उसके लिये सभी मानव-मन संचार केन्द्र बन जाते हैं, और वह उनके माध्यम से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर सकता है।’ फिर उन्होंने कहाः ‘लाहिड़ी, निश्चय ही यह गुफा तो तुम्हें सुपरिचित प्रतीत होती होगी ?’

“जब मैं हतप्रभ होकर चुपचाप खड़ा रहा, तो उस सन्त ने मेरे पास आकर मेरे माथे पर धीरे-से आघात किया। उनके चुंबकीय स्पर्श से मेरे दिमाग में एक अद्भुत प्रवाह बह पड़ा, जिसने मेरे पूर्वजन्म की मधुर स्मृतियाँ जगा दीं।

“ ‘मुझे याद आ गया!’ आनन्द के आवेग से मेरा कंठ अवरुद्ध सा हो गया। 'आप मेरे गुरु बाबाजी हैं, जो सदा ही मेरे रहे हैं! अतीत के दृश्य मेरे मन में स्पष्टता के साथ उभर रहे हैं; यहाँ इसी गुफा में मैंने अपने पिछले जन्म के कई वर्ष बिताये थे!' वर्णनातीत स्मृतियों से भावविभोर होकर मैंने अश्रुपात करते हुए अपने गुरुदेव के चरणों का आलिंगन किया।

“ 'तीन दशकों से भी अधिक समय से मैं तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।' स्वर्गीय प्रेम से बाबाजी की आवाज झंकृत हो रही थी।

" 'तुम निकल गये और मृत्योपरान्त जीवन की प्रचण्ड लहरों में खो गये। तुम्हारे कर्मों की जादुई छड़ीने तुम्हारा स्पर्श किया और तुम चले गये। तुम्हारी दृष्टि मुझसे हट गयी, पर मेरी दृष्टि से तुम कभी ओझल नहीं हुए! उस सूक्ष्म ज्योति-सागर में भी मैं तुम्हारे पीछे था, जहाँ तेजस्वी देवता विचरते हैं। अपने बच्चे की रक्षा करने वाले पक्षी को तरह मैं अन्धकार, तूफान, उथल-पुथल और प्रकाश में सतत तुम्हारे पीछे-पीछे चलता रहा। जब तुम मानव गर्भावस्था में थे और जब शिशुरूप में तुमने जन्म लिया, तब भी मेरी दृष्टि लगातार तुम पर लगी हुई थी। जब तुम घुरनी की नदी में अपने नन्हे शरीर को पद्मासन में स्थिर कर बालु से ढँक लेते थे, तब भी अदृश्य रूप से मैं वहाँ उपस्थित रहता था। महीनों पर महीने और वर्षों पर वर्ष इसी शुभ दिन की प्रतीक्षा करता हुआ मैं तुम पर दृष्टि रखता आया हूँ। अब तुम मेरे पास आ गये हो! यह रही तुम्हारी गुफा, जो तुम्हें कभी इतनी प्रिय थी। मैंने तुम्हारे लिये सदा इसे साफ-सुथरी, तैयार रखा है। यह रहा तुम्हारा पवित्र कंबल - आसन, जिस पर बैठकर तुम प्रतिदिन अपने विस्तारित होते हृदय में भगवान को भर लेते थे। यह रहा तुम्हारा कटोरा, जिससे तुम मेरे बनाये हुए अमृत का पान करते थे। देखो इस पीतल के कटोरे को मैंने कैसा चमकाकर रखा है, ताकि किसी दिन फिर से तुम उसका उपयोग कर सको। मेरे अपने पुत्र, क्या अब तुम्हारी समझ में आ गया ?'

“ 'मेरे गुरुदेव! मेरे पास कहने के लिये और क्या हो सकता है?' गद्गद् स्वर में मैं धीरे-से बोला। 'कहीं किसी ने कभी ऐसे अमर प्रेम के बारे में सुना भी है?' मैं अपने शाश्वत धन, जीवन एवं मरण में अपने साथ रहने वाले अपने गुरु की ओर आनन्दविभोर होकर लम्बे समय तक देखता रहा।

“ ‘लाहिड़ी, तुम्हारी शुद्धि आवश्यक है। इस कटोरे में रखा तेल पी लो और जाकर नदी किनारे लेटे रहो।' इस बात की स्मृति मन में जागते ही मेरे होठों पर एक क्षण के लिये मुस्कराहट आ गयी कि बाबाजी की व्यावहारिकता सदैव सर्वोपरि रहती थी।

“मैंने उनके निर्देशों का पालन किया। हिमालय की अति ठंडी रात गहरी होनी शुरू हो गई थी, फिर भी मेरे भीतर एक सुखद उष्णता फैल रही थी। मुझे आश्चर्य हुआ। क्या उस अज्ञात तेल में दिव्य उष्णता का कोई गुण था ?

“अन्धकार में चारों ओर से बर्फीली हवाएँ मुझे थपेड़े मार-मार कर चीखती हुई भयंकर रूप से ललकार रही थीं। पथरीले किनारे पर सीधे लेटे मेरे शरीर से गगास नदी की लहरें बार-बार टकराने लगीं। आस-पास बाघों की गर्जना सुनायी दे रही थी, पर मेरा हृदय भय से पूर्ण मुक्त था। मुझमें उत्पन्न होती जा रही नवजात शक्ति मुझे अभेद्य सुरक्षा के प्रति आश्वस्त कर रही थी। कई घंटे बड़ी तेज़ी से बीत गये। गत जन्म की अस्पष्ट स्मृतियाँ अपने गुरु के साथ पुनर्मिलन के मेरे वर्तमान उज्ज्वल विचारों में घुलमिलने लगीं।

"किसी के निकट आने की आहट से एकान्त में पड़े-पड़े चल रही मेरी विचारधारा भंग हो गयी। अंधेरे में एक आदमी के हाथ ने मुझे खड़ा होने में सहायता दी और कुछ सूखे वस्त्र दिये।

“ ‘आओ, बन्धु,’ उस आदमी ने कहा। ‘गुरुदेव तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’ जंगल में मुझे रास्ता दिखाता हुआ वह मेरे आगे-आगे चलने लगा। जब हम अपने रास्ते के एक मोड़ पर पहुँचे, तब अचानक दूर दिखायी देने वाले एक स्थिर प्रकाश से रात में उजाला हो गया।

" 'क्या सूर्योदय हो रहा है ?' मैंने पूछा । 'पूरी रात तो अवश्य ही नहीं बीती है?'

" 'मध्यरात्रि का समय है।' मेरा मार्गदर्शक मृदुल हँसी हँसते हुए बोला। 'वहाँ दूर जो प्रकाश दीख रहा है, वह एक स्वर्ण महल की आभा है, जिसका सृजन अद्वितीय महागुरु बाबाजी ने आज रात किया है। सुदूर अतीत में कभी तुमने महल के सौन्दर्य का आनन्द लेने की इच्छा व्यक्त की थी। हमारे गुरुदेव आज तुम्हारी वह इच्छा पूरी कर तुम्हें अपने कर्मों के आखिरी बंधन से मुक्त कर रहे हैं।'* फिर उसने कहा 'वह भव्य महल आज रात तुम्हारी क्रिया योग दीक्षा का साक्षी बनेगा। यहाँ के तुम्हारे सब भाई तुम्हारे वनवास की समाप्ति पर आनन्द मनाते हुए तुम्हारा स्वागत कर रहे हैं। देखो!'

*[कर्म-विधान के अनुसार मनुष्य की प्रत्येक इच्छा की अंतिम पूर्ति होना आवश्यक है। इस प्रकार अनाध्यात्मिक इच्छा-आकांक्षाएँ एक ऐसी श्रृंखला है जो मनुष्य को पुनर्जन्म के चक्र से बांध देती है।]

“ हमारे सामने देदिप्यमान स्वर्ण का एक विशाल महल खड़ा था। अगणित रत्न उसमें जड़े थे। कलाकौशलपूर्ण सुन्दर उद्यानों के बीच खड़े उस महल का शान्त जलाशयों में पड़ता प्रतिबिम्ब अभूतपूर्व दृश्य प्रस्तुत कर रहा था। रास्ते में ऊँची-ऊँची कमानों में अत्यन्त सुन्दर बारीक नक्काशी में अमूल्य हीरे, माणिक, पन्ने और तरह-तरह के रत्न जड़े हुए थे। उज्ज्वल माणिकों की लाल-लाल आभा से देदीप्यमान लगते द्वारों पर देवताओं जैसे दीखने वाले दिव्य कांतिमान पुरुष खड़े किये गये थे।

“अपने साथी के पीछे-पीछे मैं एक प्रशस्त दीवानखाने में पहुँचा। धूप और गुलाबों की सुगन्ध से वहाँ का वातावरण महक रहा था; मन्द दीपों का रंगबिरंगी प्रकाश फैला हुआ था। वहाँ भक्तों की छोटी-छोटी मंडलियाँ बैठी हुई थीं, जिनमें कुछ भक्त गौर वर्ण थे, तो कुछ श्यामल वर्ण। उनमें से कुछ धीमे स्वर में मंत्रोच्चारण कर रहे थे, तो कुछ आंतरिक शान्ति में मग्न होकर चुपचाप ध्यानस्थ बैठे हुए थे। समस्त वातावरण आनन्द से भरा हुआ था।

“यह सब देखकर मेरे मुँह से कुछ आश्चर्योद्गार फूट पड़े; जिन्हें सुनकर मेरे साथी ने सहानुभूतिपूर्ण मुस्कराहट के साथ कहाः 'देख लो, अपनी आँखों को तृप्त कर लो; इस महल की कलाकृति की भव्यता का पूरा-पूरा आनन्द लो, क्योंकि केवल तुम्हारे सम्मान में ही इसका सृजन किया गया है।'

“मैंने कहाः ‘बंधु ! इस महल का सौन्दर्य मानव-कल्पना से परे है। कृपा करके इसकी उत्पत्ति का रहस्य मुझे समझाओ।'

“उसकी काली आँखें ज्ञान के तेज से चमक उठी। उसने कहाः 'मैं सहर्ष तुम्हें सब कुछ समझा दूँगा। इस महल के प्रकटीकरण में समझ में न आनेवाली कोई बात ही नहीं है। सारा ब्रह्माण्ड विधाता के विचार का मूर्त रूप है। अंतरिक्ष में भ्रमण करता पृथ्वी का यह भारी गोला ईश्वर का एक स्वप्नमात्र है। भगवान ने सभी कुछ मात्र अपने मन से निर्मित किया, ठीक उसी प्रकार, जैसे मनुष्य अपने स्वप्न में स्वप्न सृष्टि की रचना करता है और उस सृष्टि में सृष्टजीवों को भी भर देता है।

“ 'परमात्मा ने पहले केवल पृथ्वी की कल्पना की। फिर उसने उस कल्पना को गति प्रदान की, जिसके फलस्वरूप अणुशक्ति और फिर पदार्थजगत अस्तित्व में आया। तत्पश्चात् उसने पृथ्वी के अणुओं को एकत्रित किया और ठोस गोला बनाया। इस गोले के सारे अणु ईश्वर की इच्छाशक्ति से ही एकत्रित हुए हैं। जब भगवान अपनी इच्छाशक्ति को वापस निकाल लेंगे, तब पृथ्वी के सारे अणु ऊर्जा में रूपान्तरित हो जायेंगे। वह आण्विक ऊर्जा अपने मूल स्रोत चैतन्य में वापस चली जायेगी। पृथ्वी की कल्पना अपना मूर्त रूप छोड़कर अमूर्त हो जायेगी।

“ 'स्वप्नकर्ता के अवचेतन विचार से ही स्वप्नसृष्टि मूर्त रूप धारण करके रहती है। जागृतावस्था में जब वह एकत्रित पकड़ रखने वाला विचार वापस खींच लिया जाता है, तो स्वप्न और उस स्वप्न के तत्त्व विलीन हो जाते हैं। मनुष्य आँखें बन्द कर स्वप्न सृष्टि खड़ी कर लेता है, जो जागने पर वह बिना किसी प्रयास के विसर्जित कर देता है। वह मूल ईश्वरीय प्रारूप का ही अनुकरण करता है। इसी प्रकार, जब वह ब्रह्मचैतन्य में जागता है, तो इस ब्रह्म स्वप्नसृष्टि के भ्रम को अनायास ही विसर्जित कर देता है।

“ ‘परमात्मा की अनंत सर्वार्थसाधक इच्छाशक्ति के साथ एक होने के कारण बाबाजी मूलभूत अणु-परमाणुओं को एकत्रित कर कोई भी आकार धारण करने की आज्ञा दे सकते हैं। क्षण भर में मूर्त रूप दिया गया यह स्वर्णमहल उतना ही वास्तविक है, जितनी वास्तविक यह पृथ्वी है। बाबाजी ने उसी प्रकार इस महल का सृजन अपने मन से किया है और अपनी इच्छाशक्ति से उसके अणुओं को एकत्रित पकड़कर रखा है, जिस प्रकार ईश्वर के विचार ने पृथ्वी का सृजन किया और उसकी इच्छाशक्ति इसके अस्तित्व को बनाये हुए है।’ फिर उसने कहा: 'जब इस महल की निर्मिती का उद्देश्य पूरा हो जायेगा, तब बाबाजी उसे विसर्जित कर देंगे।'

"जब मैं विस्मय और आदर से अवाक् रहा, तो मेरे उस साथी ने महल की ओर हाथ दिखाते हुए कहा: 'नाना प्रकार के रत्नों से सजाया हुआ यह जगमगाता महल मानव प्रयासों से निर्मित नहीं हुआ है; इसका सोना और जवाहरात परिश्रमपूर्वक खानों से नहीं निकाला गया है। यह विशाल महल मानव के समक्ष विशाल चुनौति के रूप में खड़ा है। जो कोई भी अपने को ईश्वर के पुत्र रूप में पहचान लेगा, जैसे बाबाजी ने अपने को पहचान लिया है, वह अपने अन्दर छिपी अनन्त शक्तियों के द्वारा कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है। सामान्य पत्थर में भी विराट् परमाण्विक शक्तियाँ छिपी हुई हैं,** उसी प्रकार क्षुद्रतम मर्त्य मानव भी ईश्वरीय शक्तियों का भण्डार है।'

**[पदार्थ के आण्विक गठन के सिद्धान्तों की वैशेषिक दर्शन और न्याय दर्शन में व्याख्या विवेचना की गयी है। "प्रत्येक अणु के अन्दर की खोखली में नाना प्रकार के विराट् विश्व स्थित हैं, जैसे किसी सूर्यकिरण में नाना प्रकार के रजकण होते हैं।" –योग वशिष्ठ]

“उस महात्मा ने पास ही खड़ी एक मेज से एक अत्यंत सुन्दर फूलदान उठा लिया, जिसकी मूठ उसमें जड़े हीरों से जगमगा रही थी। 'हमारे महान गुरु ने मुक्त विचरण करती कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड-रश्मियों को घनीभूत कर इस महल का सृजन किया है,' वह कहता गया। 'इस फूलदान को और इन हीरों को स्पर्श करके देखो, वे इंद्रियानुभूति की हर कसौटी पर खरे उतरेंगे।'

“मैंने फूलदान का परीक्षण किया; उसके हीरे किसी महाराजा के विशेष संग्रह में रहने लायक थे। चमकते हुए स्वर्ण से निर्मित मोटी-मोटी दीवारों पर भी मैंने हाथ फेरा। मेरे मन में गहरी तृप्ति छा गयी। साथ ही ऐसा लगा कि मेरे पूर्वजन्मों से मेरे अवचेतन मन में छिप कर बैठी एक इच्छा तृप्त होकर खत्म हो गयी।

“वह तेजस्वी पुरुष मुझे अलंकृत कमानों और दालानों में से ले जाता हुआ ऐसे अनेक कमरों में ले गया, जो किसी सम्राट् के महल के कमरों के समान साज-सामान से सजाये हुए थे। फिर हमने एक अत्यंत विशाल
हॉल में प्रवेश किया। उस हॉल के बीचोबीच एक स्वर्ण
सिंहासन रखा हुआ था, जिसमें जड़े हुए रत्न रंग-बिरंगी छटाएँ फेंक रहे थे। उस सिंहासन पर पद्मासन में बैठे थे महानतम बाबाजी। मैंने उनके सामने चमकती फर्श पर सिर लगाकर उन्हें प्रणाम किया।

“ ‘लाहिड़ी! क्या स्वर्ण महल की अपनी स्वप्न आकांक्षाओं की पूर्ति में अभी भी तुम्हें आनन्द आ रहा है ?’ मेरे गुरु की आँखें उनके ही द्वारा सृष्ट रत्नों की भाँति चमक रही थीं। ‘जागो! तुम्हारी सारी ऐहिक तृष्णाएँ अब सदा-सदा के लिये तृप्त होने वाली हैं।’ उन्होंने आशीर्वादस्वरूप कुछ गूढ़ मंत्रों का धीमे स्वर में उच्चारण किया। ‘मेरे पुत्र! उठो क्रिया योग की दीक्षा ग्रहण कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करो।’

“बाबाजी ने अपना हाथ उठाया। धधकती अग्नि ज्वालाओं से युक्त एक हवन कुंड तत्क्षण वहाँ प्रकट हुआ। हवन कुंड के चारों ओर फलफूल सजे हुए थे। इस अग्नि-वेदी के समक्ष मुझे मुक्तिदायक क्रियायोग की दीक्षा मिली।

“भोर होते-होते सारे विधि-संस्कार संपन्न हो गये। परमानन्द की उस अवस्था में मुझे निद्रा की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई। दीक्षा के बाद मैं महल के अमूल्य वस्तुओं और उत्कृष्टतम कलाकृतियों से सुसज्जित कमरों में भटकता हुआ उद्यानों में गया। वहाँ आसपास वही गुफाएँ और पर्वत-शिलाएँ मुझे दिखायी दीं जो मैंने कल देखी थीं; परन्तु कल वे किसी महल या पुष्पोद्यान के समीप तो नहीं लगी थीं !

“हिमालय के शीतल सूर्य प्रकाश में वह महल अब कल्पनातीत आभा के साथ चमक रहा था। मैं महल में वापस जाकर अपने गुरु के सामने खड़ा हो गया। वे अभी भी सिंहासन पर विराजमान थे और उनके इर्दगिर्द अनेक शिष्य चुपचाप बैठे हुए थे।

“ 'लाहिड़ी, तुम्हें भूख लगी है।' बाबाजी ने फिर कहा, 'अपनी आँखें बन्द करो।'

“जब मैंने पुनः आँखें खोलीं, तो अपने उद्यानों सहित वह मंत्रमुग्ध कर देने वाला महल अदृश्य हो गया था। मैं बाबाजी और उनके सभीशिष्य अब केवल भूमि पर, ठीक उसी स्थान पर बैठे हुए थे, जहाँ थोड़ी देर पहले तक वह अद्भुत महल खड़ा था। यह स्थान सूर्यप्रकाश में स्पष्ट दिखते गुफाओं के प्रवेश द्वारों से दूर नहीं था। मुझे याद आया कि मेरे उस पथ प्रदर्शक ने मुझे बताया था कि महल विसर्जित कर दिया जायेगा, उसमें पकड़कर रखे हुए सब अणु-परमाणुओं को मुक्त कर उनके मूल विचार स्वरूपों में विलीन कर दिया जायेगा, जहाँ से वे आये थे। मैं स्तम्भित हो गया था, फिर भी मैंने पूर्ण विश्वास के साथ अपने गुरु की ओर देखा। चमत्कारों से भरे इस दिन आगे क्या होने वाला है, मालूम नहीं था।

“ ‘जिस उद्देश्य के लिये महल का सृजन किया गया था, वह उद्देश्य पूरा हो चुका है,' बाबाजी ने स्पष्ट किया। उन्होंने भूमि से एक हाँडी उठायी।

" 'इस पर अपना हाथ रखो और जो भी खाने की तुम्हारी इच्छा होगी, वह इसमें से निकाल लो।'

“मैंने उस चौड़ी, खाली हाँडी का स्पर्श किया। घी में तली गरमगरम पूरियाँ, रस्सेदार भाजी और मिठाइयाँ उसमें प्रकट हो गयीं। जैसेजैसे मैं खाता जा रहा था, मैंने देखा कि हाँडी सदा वैसी की वैसी भरी ही रहती थी। जब भोजन पूरा हो गया, तो मैं पानी के लिये इधर-उधर देखने लगा। मेरे गुरु ने मेरे सामने रखी हाँडी की ओर इशारा किया। सारे खाद्य पदार्थ उसमें से गायब हो गये थे और उनके स्थान पर अब शुद्ध, निर्मल जल उसमें दिखायी दे रहा था।

" 'बहुत ही थोड़े मर्त्य मानवों को यह ज्ञात है कि ईश्वर के राज्य में ऐहिक परिपूर्तियाँ भी सम्मिलित है।,' बाबाजी ने कहा। 'दैवी जगत् की सत्ता इहलोक में भी चलती है, परन्तु इहलोक का स्वरूप ही भ्रमात्मक होने के कारण उसमें सत्य के दैवी तत्त्व का अभाव है।'

"परमप्रिय गुरुदेव ! गत रात्रि को आपने मेरे लिये पृथ्वी पर स्वर्ग के सौन्दर्य को प्रकट किया!' अदृश्य हुए महल की स्मृति में मैं मुस्कराने लगा; निश्चय ही किसी साधारण योगी ने ब्रह्म के श्रद्धास्पद गूढ़ तत्त्वों की खोज का आरम्भ इतनी विलास-ऐश्वर्यपूर्ण परिस्थितियों में नहीं किया होगा! अब उसके पूर्णतः विपरीत दिखने वाले दृश्य को मैं शान्त दृष्टि से निहारने लगा। नीचे सूखी, सख्त भूमि, ऊपर आकाश की छत, सामने आदिकालीन स्तर का आसरा प्रदान करती गुफाएँ – सब कुछ मेरे चारों ओर बैठे दिव्य संतों के योग्य रमणीय नैसर्गिक परिस्थितिगत लग रहा था।

"उस दिन दोपहर को मैं पिछले जन्म की दैवी उपलब्धियों से पुनीत हुए अपने कंबल पर बैठा। मेरे ईश्वरतुल्य गुरु मेरे पास आये और उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। मैं निर्विकल्प समाधि में पहुँच गया और सात दिन तक उसी परमानन्द की अखंड अवस्था में रहा। आत्मज्ञान के एक के बाद एक आने वाले स्तरों को पार करते हुए मैंने अंतिम, अक्षय सत्य की अनुभूति कर ली। माया के सभी बन्धन टूट कर गिर गये और मेरी आत्मा परमात्मा की वेदी पर पूर्ण रूप से प्रतिष्ठापित हो गयी।

“आठवें दिन मैं अपने गुरु के चरणों में लोट गया और मुझे इस पवित्र वन में सदा अपने पास ही रखने का उनसे अनुरोध करने लगा।

“बाबाजी ने मुझे अपने आलिंगन पाश में बांधते हुए कहा: 'मेरे पुत्र ! इस जन्म में तुम्हें जनसाधारण की आँखों के सामने ही अपनी भूमिका निभानी है। इस जन्म से पूर्व अनेक जन्मों में निर्जन प्रदेशों में तपस्या कर तुम धन्य हो चुके हो, अब तुम्हें मनुष्यों के संसार में जाकर उनमें मिल जाना होगा।'

" 'इस बात के पीछे एक गहरा उद्देश्य था कि इस जन्म में तुम विवाह कर गृहस्थ बनने और परिवार एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों से घिरे जाने से पहले मुझसे नहीं मिले। हिमालय में हमारी इस गुप्त मंडली में शामिल होने का विचार तुम्हें त्यागना ही पड़ेगा। तुम्हारा जीवन आदर्श गृहस्थ-योगी का उदाहरण बनकर शहरों की भीड़भाड़ के बीच रहने के लिये है।

“वे आगे कहते गये 'व्याकुल संसारी नर-नारियों का आर्तनाद महापुरुषों के कानों से टकराकर अनसुना नहीं हो गया तुम्हें सच्चे जिज्ञासुओं को क्रियायोग के माध्यम से आध्यात्मिक दिलासा देने के लिये चुना गया है। पारिवारिक बन्धनों और भारी सांसारिक कर्त्तव्यों से दबे लक्ष-लक्ष लोगों को उनके समान ही गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले तुम से नयी हिम्मत मिलेगी। यह समझने में तुम्हें उनकी सहायता करनी होगी कि उच्चतम यौगिक उपलब्धियाँ गृहस्थों के लिये दुष्प्राप्य नहीं हैं। संसार में रहकर भी जो योगी व्यक्तिगत स्वार्थ और आसक्तियों को त्याग कर पूर्ण निष्ठा के साथ अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करता है, वह ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के सुनिश्चित मार्ग पर ही चल रहा होता है।

" 'तुम्हारे लिये संसार को त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आन्तरिक स्तर पर तुमने पहले ही इसके प्रत्येक कर्म-बन्धन को तोड़ दिया है। इस संसार के न होते हुए भी तुम्हें उसी में रहना है। अभी कई वर्षों तक तुम्हें पूर्ण अन्तःकरणपूर्वक अपने पारिवारिक, व्यावसायिक, नागरिक और आध्यात्मिक कर्त्तव्यों को पूरा करना है। संसारी मनुष्यों के रुक्ष हृदयों में एक नयी मधुर दिव्य आशा का संचार करना है। तुम्हारे संतुलित जीवन से यह बात उनकी समझ में आ जायेगी कि मुक्ति बाह्य त्याग पर नहीं, बल्कि आंतरिक वैराग्य पर निर्भर करती है।

“जब मैं हिमालय के उच्च निर्जन प्रदेश में अपने गुरु की बातें सुन रहा था, तब मेरा परिवार, ऑफिस, संसार कितना सुदूर लग रहा था ! फिर भी उनके शब्दों में वज्रसत्य तो था ही; अतः विवश हो कर मुझे शान्ति के उस स्वर्ग को छोड़कर जाने की बात माननी ही पड़ी | गुरु से शिष्य को योगविद्या के दिये जाने के संबंध में बाबाजी ने मुझे प्राचीन कठोर नियमों का ज्ञान कराया।

"उन्होंने कहाः 'केवल योग्य शिष्यों को ही क्रिया की यह कुंजी देना। ध्यान के विज्ञान द्वारा जीवन के अंतिम रहस्यों का पता लगाने के लिये केवल वही योग्य है, जो ईश्वर की खोज में अन्य सब कुछ त्याग देने का संकल्प करता है।'

" 'दयामय गुरुदेव ! विलुप्त हुई क्रियायोग विद्या का पुनरुद्धार कर आपने पहले ही मानवजाति पर इतनी बड़ी कृपा की है। अब शिष्यत्व की कठोर आवश्यकताओं को शिथिल करके क्या और थोड़ी कृपा नहीं करेंगे ?' मैं अनुनयपूर्वक बाबाजी की ओर देखता रहा। 'मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे सभी सच्चे जिज्ञासुओं को क्रियायोग सिखाने की अनुमति प्रदान करें, भले ही वे प्रारम्भ में पूर्ण आन्तरिक वैराग्य की प्रतिज्ञा न कर पाएँ। संसार के त्रिविध तापों से त्रस्त नर-नारियों को विशेष प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। यदि क्रिया दीक्षा से उन्हें वंचित रखा जाय, तो शायद वे कभी मुक्ति के मार्ग पर चलने का प्रयास ही न करें।'

“ ‘तथास्तु ! तुम्हारे माध्यम से ईश्वरीय इच्छा प्रकट हुई है। जो भी विनम्रता के साथ तुमसे सहायता की याचना करें, उन सब को क्रिया दे दो,' करुणामय गुरुदेव ने कहा*


*[ पहले महावतार बाबाजी ने केवल लाहिड़ी महाशय को ही दूसरों को क्रियायोग सिखाने की अनुमति दी थी। तब योगावतार ने अनुरोध किया कि उनके कुछ शिष्यों को भी क्रिया योग सिखाने का अधिकार दिया जाये। बाबाजी ने मान लिया और यह आदेश दिया कि भविष्य में क्रिया योग केवल वही लोग सिखाएँ, जो क्रियायोग के अभ्यास में उन्नत हो चुके हों और उन्हें लाहिड़ी महाशय या उनके द्वारा अधिकार दिये गये शिष्यों की किसी प्रस्थापित प्रणालिका ने उसका अधिकार दिया हो। बाबाजी ने दयापूर्वक उन समस्त निष्ठावान क्रियायोगियों के जन्मजन्मान्तर के आध्यात्मिक कुशलक्षेम का दायित्व स्वीकार किया, जिन्होंने अधिकृत क्रिया शिक्षकों से क्रिया योग दीक्षा ली हो।
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया तथा सेल्फ़ रियलाइजेशन फ़ेलोशिप से क्रियायोग दीक्षा लेने वालों के लिये एक प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य होता है कि वे दूसरों को क्रिया योग प्रविधि का ज्ञान नहीं देंगे। इस प्रकार क्रिया की सरल परन्तु निश्चित प्रविधि अनधिकृत शिक्षकों द्वारा किये जा सकने वाले परिवर्तनों और विकृतियों से सुरक्षित रह कर अपने मूल, शुद्ध रूप में बनी रहती है।
बावाजी ने संसार त्याग और तपस्या की प्राचीन पाबन्दियों को तो हटा दिया ताकि जनसाधारण को क्रियायोग का लाभ प्राप्त हो सके, परन्तु लाहिड़ी महाशय और उनके समस्त उत्तराधिकारियों पर उन्होंने यह शर्त लगायी कि उनके पास क्रियायोग की दीक्षा के लिये जो भी आये, उसे वे क्रियायोग अभ्यास की पूर्वतैयारी के रूप में पहले कुछ समय तक विशेष आध्यात्मिक प्रशिक्षण दें। क्रिया जैसी अत्यंत उच्च प्रविधि का अभ्यास उच्छृंखल या अनियंत्रित आध्यात्मिक जीवन से मेल नहीं खा सकता। क्रियायोग केवल एक ध्यान पद्धति या साधना पद्धति नहीं है, बल्कि इससे कहीं बढ़कर वह एक संपूर्ण जीवन पद्धति है और इसमें दीक्षित होने वाले को कुछ आध्यात्मिक विधि-निषेधों का पालन करना पड़ता है। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया और सेल्फ-रियलाइज़ेशन फेलोशिप ने महावतार बाबाजी, लाहिड़ी महाशय, स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी तथा परमहंस योगानन्द जी के माध्यम से प्राप्त हुए इन निर्देशों का निष्ठापूर्वक पालन किया है। योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ-रियलाइज़ेशन फेलोशिप के पाठों में और इन संस्थाओं के अधिकृत प्रतिनिधियों द्वारा क्रियायोग की पूर्वतैयारी के रूप में सिखायी जाने वाली हंसः एवं ओम् (ॐ) प्रविधियाँ क्रियायोग मार्ग के अभिन्न अंग हैं। साधक की चेतना की आत्मज्ञान के लिये उन्नत करने में तथा आत्मा को बंधनों से मुक्त करने में ये प्रविधियाँ अत्यंत प्रभावी हैं। (प्रकाशक की टिप्पणी) ]


" 'थोड़ी देर मौन रहकर बाबाजी ने कहाः ‘अपने प्रत्येक शिष्य को भगवद्गीता का वह अमर वचन अवश्य बताना: “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।’ ” [इस धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु के चक्र में निहित महान् भय से तुम्हारी रक्षा करेगा।]

“दूसरे दिन प्रातःकाल जब मैं विदा लेने के लिये गुरुदेव के चरणों में प्रणाम कर रहा था, तब उन्हें छोड़कर जाने में मेरी गहरी अनिच्छा को उन्होंने भाँप लिया।

“ ‘हम लोगों के लिये कोई वियोग नहीं है, प्रिय वत्स !’ उन्होंने प्रेम से मेरे कन्धे का स्पर्श किया। 'तुम जहाँ कहीं भी रहोगे, जब भी मुझे बुलाओगे, तब मैं तत्क्षण तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगा।'

“उनके इस अमूल्य वरदान से आश्वस्त होकर और ब्रह्मज्ञान के नवप्राप्त स्वर्ण से समृद्ध होकर मैं पर्वत से नीचे उतरने लगा। ऑफिस में मेरे सहयोगियों ने मेरा स्वागत किया; दस दिन तक वे सोच रहे थे कि मैं हिमालय के जंगलों में खो गया था। इसके शीघ्र बाद ही मुख्यालय से एक पत्र आया।

“उस पत्र में लिखा था: ‘लाहिड़ी को दानापुर कार्यालय में वापस लौट जाना चाहिये। उनका रानीखेत स्थानांतरण गलती से हुआ है। रानीखेत में किसी दूसरे आदमी को भेजा जाना चाहिये था।’

“भारत के इस दूरतम स्थान में मुझे पहुँचा देने वाली घटनाओं के पीछे छिपे गुप्त प्रवाहों का विचार कर मैं मुस्कराया।

“दानापुर वापस लौटने के पहले मैं मुरादाबाद के एक बंगाली परिवार के घर में कुछ दिन रहा। वहाँ छह मित्र मुझसे मिलने आये । जब मैंने चर्चा का रूख आध्यात्मिक विषयों की ओर मोड़ दिया, तो जिसके घर में मैं ठहरा था, उस व्यक्ति ने उदास स्वर में कहा:

“ ‘ओह! आजकल भारत संतों से विहीन हो गया है!’

"मैंने जोर से उसका विरोध किया: 'बाबू! अभी भी इस भूमि में महान् संत विद्यमान हैं!'

"आध्यात्मिक उत्साह के कारण हिमालय के अपने चमत्कारपूर्ण अनुभवों का वर्णन करने की उत्कट प्रेरणा मेरे मन में जाग गयी। मित्रमंडली ने विनम्रतापूर्वक अविश्वास व्यक्त किया।

" 'उनमें से एक ने सांत्वना के स्वर में कहाः 'लाहिड़ी! पर्वतों की विरल हवा में तुम्हारे मस्तिष्क पर दबाव पड़ा है। तुमने अभी जो बताया है, वह कोई दिवास्वप्न है।'

"सच्चाई के जोश में मैंने बिना सोचे समझे बोल दिया: 'यदि मैं अपने गुरु को पुकारूँ, तो वे अभी इसी घर में प्रकट हो जायेंगे।'

"सबकी आँखें कौतूहल से चमक उठीं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि वे सब ऐसी किसी घटना को देखने के लिये उत्सुक थे। कुछ अनिच्छापूर्वक हो मैंने एक शांत कमरे और दो नये ऊनी कम्बलों की व्यवस्था करने के लिये कहा।

" 'गुरुदेव हवा में से यहाँ प्रकट होंगे,' मैंने कहा। 'दरवाजे के बाहर शांत बैठे रहो; मैं जल्दी ही आप लोगों को बुला लूँगा।'

"ध्यान की अवस्था में डूबकर मैं विनम्रतापूर्वक गुरुदेव का आवाहन करने लगा। अंधेरे कमरे में मंद शांतिदायक प्रकाश भर गया; बाबाजी की तेजस्वी ज्योतिर्मय मूर्ति प्रकट हो गयी।

" 'लाहिड़ी! क्या तुम मुझे ऐसी फालतू बातों के लिये बुलाते हो?' गुरुदेव की दृष्टि कठोर थी। 'सत्य सच्चे साधकों के लिये है, व्यर्थ कुतूहल वालों के लिये नहीं। देखने के बाद विश्वास करना तो आसान है, उसमें फिर किसी आत्मशोध की आवश्यकता ही नहीं रहती। इंद्रियातीत सत्य की खोज केवल वही लोग कर पाते हैं, जो अपनी स्वाभाविक संसारजन्य शंका-कुशंकाओं से ऊपर उठते हैं, और केवल वही इसके अधिकारी भी हैं।' फिर उन्होंने गम्भीर होकर कहाः 'मुझे जाने दो!'

"मैं अनुनय-विनय करता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा। 'पूज्य गुरुदेव ! अपनी गहरी भूल मेरी समझ में आ गयी है; मैं उसके लिये आपसे क्षमा मांगता हूँ। इन आध्यात्मिक दृष्टि से अंधे लोगों के हृदय में विश्वास जगाने के लिये ही मैंने आपको बुलाने का साहस किया। अब जब आप मेरी प्रार्थना पर कृपा कर यहाँ पधारे ही हैं, तो कृपया मेरे मित्रों को आशीर्वाद दिये बिना चले मत जाइये। वे अविश्वासी भले ही हों, परन्तु कम-से-कम मेरे अद्भुत कथन की जाँच करने के लिये तो तैयार थे।'

" 'ठीक है, मैं थोड़ी देर रुक जाता हूँ। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे मित्रों के सामने तुम्हारी बात मिथ्या सिद्ध हो।' बाबाजी का चेहरा अब नरम पड़ गया था, परन्तु उन्होंने सौम्य स्वर में आगे कहा: 'इसके बाद, मेरे पुत्र, मैं तभी आऊँगा, जब तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी; जब-जब तुम बुलाओगे तब-तब सदैव ही नहीं आऊँगा।'

"जब मैंने दरवाजा खोला, तब बाहर बैठी छोटी-सी मंडली में तनावपूर्ण सन्नाटा छाया हुआ था। मेरे मित्र कंबल के आसन पर विराजमान ज्योतिर्मय मूर्ति की ओर ऐसे देख रहे थे, मानो उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा हो।

" 'यह सामूहिक सम्मोहन है!' एक आदमी उद्धत भाव से हँसा। 'हमें पता चले बिना कोई भी इस कमरे में नहीं जा सकता था!'

“बाबाजी मुस्कराते हुए आगे बढ़े और उनमें से प्रत्येक को आकर अपने उष्ण, ठोस शरीर का स्पर्श करके देखने के लिये उन्होंने इशारा किया। सारे सन्देह मिट गये; मेरे मित्रों ने पश्चात्ताप विदग्ध श्रद्धा और आदर के साथ उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया।

“ ‘हलवा बनाया जाय,’ बाबाजी ने कहा। मैं समझ गया कि उन लोगों को अपने स्थूल शरीर की वास्तविकता का और अधिक विश्वास दिलाने के लिये ही बाबाजी ने वह आदेश दिया था। जब तक हलवा तैयार हो रहा था, महागुरु विनम्रता के साथ बातें करते रहे। उन संशयात्माओं का दृढ़ भक्तों में रूपान्तरण देखते ही बनता था। हलवा खाने के बाद बाबाजी ने हम सब को एक-एक कर आशीर्वाद दिया। अचानक प्रकाश कौंधा; हम सबने बाबाजी के शरीर के विद्युत् तत्वों को पल भर में रसायन-विकर्षित होकर फैलते जाते बाष्पमय प्रकाश में परिवर्तित होते देखा। महागुरु की ईश्वर के साथ एकरूप हुई इच्छाशक्ति ने उनके शरीर के रूप में एकत्रित पकड़ रखे आकाशतत्त्व के अणुओं पर अपनी पकड़ ढीली कर दी और उसी के साथ कोट्यवधि प्राणकणिकाओं के स्फुल्लिंग अनन्त ब्रह्म सागर में विलीन हो गये।

“ 'स्वयं अपनी आँखों से आज मैंने मृत्यु पर विजय पाने वाले को देख लिया।' उस मंडली में से मैत्र* नामक एक व्यक्ति ने अत्यंत श्रद्धा के साथ कहा। नवजागृति के आनन्द से उनका चेहरा ही बदल गया था। 'परम गुरु देश और काल के साथ ऐसा खिलवाड़ कर गये, जैसे कोई बच्चा पानी के बुलबुलों के साथ खेलता है। मैंने ऐसे पुरुष का दर्शन कर लिया, जिनके हाथ में स्वर्ग और पृथ्वी की कुंजियाँ हैं।'

*[ बाद में मैत्र महाशय के नाम से प्रतिष्ठित हुए इस व्यक्ति ने आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ऊँची अवस्था प्राप्त कर ली। हाइस्कूल से पास हो जाने के थोड़े ही दिन बाद मेरी मैत्र महाशय से भेंट हुई थी। जब मैं वाराणसी के महामंडल आश्रम में रह रहा था, तब वे वहाँ पधारे थे तब उन्होंने मुझे मुरादाबाद में उस मंडली के सामने बाबाजी के प्रकट होने की घटना सुनायी थी। फिर उन्होंने कहा: “उस चमत्कार के कारण हो मैं लाहिड़ी महाशय का आजीवन शिष्य बना।” ]

लाहिड़ी महाशय ने अन्त में कहा था: “इसके बाद शीघ्र ही मैं दानापुर चला गया। परमतत्त्व में दृढ़ता के साथ स्थिर होकर मैंने पुनः गृहस्थ के बहुविध पारिवारिक एवं व्यावसायिक दायित्वों को अंगीकार कर लिया।”

लाहिड़ी महाशय ने स्वामी केवलानन्दजी और स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी को बाबाजी के साथ अपनी एक और भेंट की कहानी भी बतायी थी। वह अवसर उन अनेक अवसरों में से एक था, जब परम गुरु ने अपना वचन निभाया था कि “मैं तभी आऊँगा, जब तुम्हें मेरी आवश्यकता होगी।”

“घटना स्थल था इलाहाबाद का एक कुंभ मेला,” लाहिड़ी महाशय ने अपने शिष्यों को बताया था। ऑफिस की थोड़े दिनों की छुट्टियों में मैं वहाँ गया था। कुम्भ मेले में सम्मिलित होने के लिये दूर-दूर से आये साधु-संन्यासियों के बीच मैं घूम रहा था, तभी मेरी दृष्टि भस्म रमाये, हाथ में भिक्षापात्र लिये एक साधु पर पड़ी। तुरन्त ही मेरे मन में विचार उठा कि वह साधु पाखण्डी है, जिसने वैराग्य के बाह्य चिह्न तो धारण कर रखे हैं, पर अन्तर में उन चिह्नों से संबंधित चारूता नहीं है।

“इस साधु से आगे बढ़ा ही था कि मेरी विस्मित दृष्टि बाबाजी पर पड़ी। वे एक जटाधारी संन्यासी के आगे नतमस्तक थे।

“ 'गुरुजी!' मैं क्षणभर में उनके पास पहुँच गया। 'प्रभु! आप यहाँ क्या कर रहे हैं?'

“ ‘मैं इस संन्यासी का पद-प्रक्षालन कर रहा हूँ और इसके बाद मैं इनके खाना पकाने के बर्तन माँजूँगा।’ बाबाजी मेरी ओर देखकर किसी नन्हें शिशुकी तरह मुस्कराये; मैं समझ गया कि वे मुझे सूचित कर रहे थे कि मैं कभी किसी की आलोचना न करूं, बल्कि सभी देह-मन्दिरों में समान रूप से वास करने वाले ईश्वर को देखूँ, वह देह मन्दिर चाहे उच्च व्यक्ति का हो या नीच व्यक्ति का।

“और फिर परम गुरु ने कहाः ‘ज्ञानी-अज्ञानी साधुओं की सेवा करके मैं उस सबसे बड़े सद्गुण को सीख रहा हूँ, जो ईश्वर को अन्य सभी सद्गुणों से अधिक प्रिय है – विनम्रता।’ ”*

*[ "स्वर्ग और पृथ्वी की सब बातों को देखने के लिये वे विनम्र बनते हैं" – (भजन संहिता ११३:६, बाइबिल)। “जो कोई अपने आप को बड़ा बनायेगा, उसे छोटा किया जायेगा; और जो कोई अपने आप को छोटा बनायेगा, उसे बड़ा किया जायेगा" (मत्ती २३:१२, बाइबिल)।
अहंकार को नष्ट करना ही अपनी शाश्वत पहचान को प्राप्त करना है।