Hanuman Prasad Poddar ji - 52 books and stories free download online pdf in Hindi

हनुमान प्रसाद पोद्दार जी (श्रीभाई जी) - 52

श्रीराधाष्टमी महोत्सव के उद्दाम नाम संकीर्तनमें सम्मिलित होने का अद्भुत चमत्कार

यह घटना सं० 2018 (सन् 1961) की है। हमलोग लगभग 30-35 व्यक्ति कलकत्ते से राधाष्टमी महोत्सवमें सम्मिलित होने जा रहे था। हमारे साथ एक लड़का था जिसे रीढ़ की हड्डीमें बोन टी०बी० होने के कारण एक लोहे और चमड़ेका पट्टा हर समय पीठपर बाँधना पड़ता था। उसके हटानेपर बिना किसी सहारे के वह न बैठ सकता, न खड़ा हो सकता था। रास्तेमें काशीमें सब लोगोंने गंगाजीमें स्नान किया तो उसकी अत्यधिक इच्छा होने से दो व्यक्तियों ने सावधानी पूर्वक उसे पकड़कर गंगाजीमें स्नान करवाया। जिस दिन ये लोग गोरखपुर पहुॅचे, रात्रि के प्रवचनमें भाईजी ने कहा कि मुझे किसी विश्वस्त व्यक्ति ने बताया है कि राधाष्टमीका महोत्सव देखने के लिये श्रीकृष्ण 7-8 दिनों से यहाँ घूम रहे हैं एवं 3-4 दिन और घूमेंगे। किसी की तीव्र उत्कण्ठा हो तो उसे दर्शन भी दे सकते हैं। इस लड़के की उत्कण्ठा कलकत्तेसे ही थी और इसीलिये महोत्सवकी विशेषता सुनकर पहली बार गोरखपुर आया था।

श्रीराधाष्टमी महोत्सव के दूसरे दिन सदा की भाँति उद्दाम–नाम–संकीर्तन हो रहा था। यह लड़का भी पट्टा बाँधे ही बड़ी मस्तीसे नाचते हुए "राधे-राधे" का संकीर्तन कर रहा था। बीचमें ही वह बेहोश होकर गिर गया। लोगों ने उसके साथियोंसे कहा तो वे लोग उसे उठाकर पंडाल के पीछे ले गये और एक स्थानपर लिटा दिया। कुछ लोग डाक्टर को बुलाने गये, कुछ लोग भाईजी को। भाईजीने कहा--कोई बात नहीं। उसे बाह्य-ज्ञान सर्वथा नहीं था पर जीभ से "राधे-राधे" का उच्चारण हो रहा था। थोड़ी देर बाद भाईजी आये और उसके कानमें बोले -- देखा, मैं आ गया हूँ। हम लोगोंने उसे बैठा दिया। उसने भाईजी के चरण पकड़ लिये। भाईजी ने कहा— उठो, तुम्हें विशेष वस्तु प्राप्त हो गयी है। फिर हमलोगों को कहा– इसे पंडाल से बाहर नहीं लाना चाहिये था। डाक्टर की कोई आवश्यकता नहीं है। उसका हाथ पकड़कर भाईजी उसे पुनः पंडालमें ले आये। उसके निरन्तर अश्रुपात हो रहा था और भाईजी के चरण पकड़कर वह बैठ गया। फिर भाईजी की गोदमें अपना सिर रख दिया। भाईजी ने उसके कानमें एक-दो बार कुछ बात कही और गद्गद् होकर अपने गले की तुलसी की माला उसे पहना दी। फिर प्रवचनमें बोले -- यह लड़का अभी बेहोश था। इसे मैंने अभी पूछा नहीं है पर मेरा विश्वास है इसे विशेष अनुभूति हुई है। कोई चाहे तो इससे पूछ सकता है। कौन अधिकारी है? इसे कौन जानता है? इतना कहते-कहते भाईजी गद्गद् हो गये और चुप हो गये। इसके पश्चात् लगभग 40 घण्टे तक वह लड़का अर्ध-चेतनामें रहा।

उसे विशेष–अनुभूति की बात तो वह जाने। पर यह तो हम सबने अपनी आँखोंसे देखा कि जो बिना पट्टे के बैठ भी नहीं सकता था, वह इस घटना के बाद बिना पट्टे के अच्छी तरह घूमने लगा। उसके साथ आनेवालों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। अन्तमें पट्टा गोरखपुरमें ही छोड़कर वह लौट गया। पता नहीं उसकी टी०बी० हठात् कहाँ चली गयी ?

संकल्प-शक्ति का चमत्कार

श्रीभाईजी कई बार अपनी संकल्प-शक्ति से अनहोनी लगने वाली बातें सहज संभव कर देते थे। पर उन्होंने ऐसे प्रसंगोंको सर्वदा गुप्त रखने का प्रयास किया। कभी-कभी किसी कारणवश कोई प्रसंग प्रकट हो जाता था। एक ऐसा ही प्रसंग यहाँ प्रस्तुत है --

वृन्दावन के श्रीघनश्यामजी शर्मा उस समय कलकत्ता गये हुए थे। पहले ये रासलीलामें ठाकुर बनते थे और उसी समयसे पू० बाबाके अत्यन्त स्नेहपात्र बन गये थे। इसीलिये सब लोग इन्हें ठाकुरजी ही कहते हैं। बाबा ने इन्हें राधाष्टमीपर गोरखपुर आने का नियम दिला रखा था।
कलकत्तेमें इनकी माताजी रुग्ण हो गयी इसलिये उन्हें सँभालनेके लिये इनका कलकत्ता रहना जरूरी था। बात सन् 1959 की है और श्रीराधाष्टमी निकट आ गई थी। इनका मन राधाष्टमीपर गोरखपुर पहुँचनेका था। उधर माताजीको सँभालने कलकत्ते रहना जरूरी था। इसी परिस्थितिमें उन्होंने भाईजीको पत्र लिखा कि इस विवशताके कारण मैं राधाष्टमीपर गोरखपुर नहीं पहुँच सकूँगा। पत्र पहुँचा राधाष्टमीसे दो दिन पूर्व ललिताषष्ठी को। भाईजीने सारी बातें राधाबाबाको बताई। उन दिनों बाबा मौन थे एवं केवल श्रीभाईजी से ही बात करते थे। बाबाने उन्हें कहा– “ठाकुरका राधाष्टमीपर आना आवश्यक है। उसके नहीं आनेसे मेरा खेल बिगड़ जायगा। अब समय भी नहीं है कि उसे संदेश भेजा जा सके। अतः आप अपनी संकल्प-शक्तिसे उसे बुलाइये।”

भाईजीने बाबाकी बात सुन ली और बिना कुछ उत्तर दिये अपने कमरेमें लौट आये। भाईजीने कैसे संकल्प शक्ति का प्रयोग किया ये तो भाईजी ही जानें पर उसी दिन बिना रिजर्वेशन की व्यवस्था हुए वे गोरखपुर पहुँचनेके लिये ट्रेनमें बैठ गये। गोरखपुर पहुँचकर वे सीधे भाईजीके पास गये। प्रणाम करनेपर भाईजी मुसकुराते हुए बोले--तुमने तो लिखा था मैं राधाष्टमीपर पहुँच नहीं सकूँगा, अब कैसे पहुँच गये ? वे इतना ही बोल सके कि परिस्थिति तो आने लायक नहीं थी पर आपने खींच लिया। तब भाईजीने स्नेहवश सारी बातें बताई और कहा स्नानादि पीछे करना, पहले चलो मेरे साथ बाबासे मिल लो। कुटियामें जाकर भाईजीने कहा--बाबा ! आपका ठाकुर आ गया। बाबाको बड़ी प्रसन्न्ता हुई। उन दिनों भाईजी श्रीराधाष्टमी महोत्सवपर गाने के लिये प्रतिवर्ष कुछ नये पदोंकी रचना करते थे। उन्हीं पदोंको श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामीके साथ गानेके लिये बाबाने इन्हें बुलाया था। और श्रीभाईजीने अपनी संकल्प-शक्तिसे क्या-क्या किया। इसे वे ही जानें।