Prem Ratan Dhan Payo - 31 in Hindi Fiction Stories by Anjali Jha books and stories PDF | Prem Ratan Dhan Payo - 31

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Prem Ratan Dhan Payo - 31







जानकी उसके पास चली आई । उसने ड्रेस की गले वाले हिस्से पर लगे स्टीकर को दिखाते हुए कहा " हमने इसकी कीमत अदा नही की । इनकार भी किया हमने लेकिन उन्होंने जबरदस्ती हमे ये ड्रेस खरीदकर दी । "

" उन्होंने मतलब .... किसने दी ये ड्रेस खरीदकर ? " संध्या ने पूछा । जानकी नजरें झुकाकर इधर उधर देखंए लगी और फिर धीमे स्वर में बोली " राघव जी ने । "

" लो नाम तो ऐसे ले रही हैं जैसे हमारे इंडिया में पत्नी शरमाते हुए अपने पती का नाम लेती हैं । ...... और क्या हो गया राघव भैया ने इसके पैसे दिए हैं तों । " संध्या कह ही रही थी कि तभी जानकी बीच में बोली " संध्या ढाई लाख ..... ढाई लाख कोई छोटी रकम नही होती । वैसे भी यहां हमे तीन गुना सैलरी मिल रही हैं । उन्हें जोडूगी न तो लगभग तीन महीने की मेरी सैलरी इसमें चली जाएगी । "

" जानू क्या हो गया हैं तुझे ? बोल तो ऐसे रही हैं जैसे आज से पहले तूने इतनी मेंहगी ड्रेस कभी नही पहनी । मुझे अच्छे से वो वक्त याद हैं तूं जिन कपड़ों पर हाथ रखती थी चाचाजी वो खरीदकर देते थे तुझे । तेरे आगे कीमत तो उन्होंने कभी देखी ही नही और न ही तूने कभी इसकी फ़िक्र की । "

" वक्त वक्त की बात हैं संध्या । मेरा वो गुजरा वक्त लौटकर नही आएगा । मैं आज जीने में विश्वास रखती हूं । इस वक्त मैं अपनी हैसियत से ज्यादा बडे सपने नही देख सकती । मुझे ये मेंहगी ड्रेस नहीं चाहिए थी , फिर भी उन्होंने मुझे ये ड्रेस दिलाई । "

" जानू राघव भैया ऐसे ही हैं । हर दीवाली पर इस घर में काम करने वालो के लिए तोहफे आते हैं और वह कीमती ही होते हैं । शायद तू ये बात नहीं जानती पिछले दो सालों से हर रक्षाबंधन पर राघव भैया ने मुझे तोहफे दिए हैं । यह बहुत नॉर्मल सी बात है तू उसके बारे में ज्यादा मत सोच । थक गई होगी आराम कर मैं चलती हूं । " संध्या यह बोलकर वहां से चली गई । जानकी वही बिस्तर पर बैठी अपनी उधेड़बुन में गुम थी ।

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सुबह का वक्त , कलेक्टर ऑफिस




नारायण जी अपने बडे बेटे गिरिराज के साथ वक्त से पहले ही कलेक्टर ऑफिस पहुंच चुके थे ‌‌। उनके अलावा सात से आठ कंपनियां और भी थी जिन्होंने ये टेंडर भरा था । सब लोग रिजल्ट आने का वेट कर रहे थे । कलेक्टर ऑफिस के बाहर ही बडा सा ग्राउंड था जिसमें काफी सारे चेयर लगे । सब लोग अपनी अपनी बातों में लगे थे । नारायण जी चारों तरफ नजरें दौडाते हुए बोले " लगता हैं रघुवंशी कंस्ट्रक्शन ने ये टेंडर नही भरा था । "

" भर भी लेते तो क्या होता ? नतीज़ा तो नही बदल जाता । देखिएगा बाबुजी जीत हमारी ही होगी । " ये सब कहते वक्त गिरिराज के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कुराहट थीं ।

चार गाड़ियां तेज रफ्तार में धूल का गुब्बार उडाती हुई ऑफिस के आगे आकर रूकी । अजी तूफान जब आता हैं तो सूखे पत्ते यू ही तितर बितर हो जाता है । पीछे कि गाड़ियों से राघव के गार्डस निकलकर बाहर आए ‌‌। आगे वाली गाडी से दीपक बाहर निकला । पीछे वाली सीट के दोनों तरफ का डोर एकसाथ ऑपन हुआ । एक तरफ से राघव तो दूसरी तरफ से अमित बाहर आया । बाकी सभी लोग उन्हीं को देख रहे थे । एक खामोशी सी पसर चुकी थी वहां । कलेक्टर ऑफिस के अंदर हथियार ले जाने की किसी को इजाजत नहीं थी इसलिए राघव के गाडर्स वही बाहर रूक गए । राघव , अमित और दीपक तीनों अंदर चले आए ।

नारायण जी तीखी नजरों से उन्हें ही देख रहे थे । गिरिराज का पारा उन्हें देखकर आटोमेटिकली अपने आप ही बढ गया । वो तीनो आगे वाली चेयर पर आकर बैठ गए जो की उनक लिए रिजर्व रखी गयी थी । अमित ने राघव की ओर झुककर कहा " हम क्या शो पीस हैं जो ये लोग हमे यूं ही घूर रहे है । "

" थोडी देर रूक जा फिर ये सब बंद हो जाएगा । " राघव ने सामने की ओर देखकर कहा ।

नारायण जी धीरे से बोला " हमरे हर काम में इन लोगों को टांग अडाना है । " गिरिराज ने सुना जरूर लेकिन उसने कुछ नहीं कहा ।

कुछ देर बाद तीन लोग कलेक्टर ऑफिस से निकलकर बाहर आए । एक आई एस आफिसर थे और बाकी दो सरकारी आफिसर थे जो टेंडर का रिजल्ट अनाउंस करने आए थे । उनमें से एक अधिकारी बस गिरिराज को देख रहा था । बाकी दोनों बैठ गए परंतु वह आफिसर खडे रहे । उन्होंने सबको संबोधित करते हुए कहा " सबसे पहले मैं आप सभी का धन्यवाद करना चाहूंगा यहां आने के लिए । जैसा की आप सभी जानते हैं ये एक सरकारी अस्पताल बनाने का प्रजोक्ट है । आप सभी ने वाकई अच्छी कोशिश की , लेकिन ये टेंडर आप में से किसी एक को मिलेगा । कुल मिलाकर आठ कंपनियों ने इसमें भाग लिया था । जिसमें से सात कंपनियों की फाइल ही आगे पहुंची । आप सभी सोच रहे होंगे की आठवी कंपनी की फाइल कहा गयी । वो कंपनी पहले ही राउंड में बाहर निकाल दी गयी । वजह में थी की उस कंपनी ने हमारे अधिकारी को रूपयों का लालच देकर खरीदने की कोशिश की । जिसे ये लालच दिया गया वो व्यक्ति कोई और नही मैं था । अब आप सब उस कंपनी का भी नाम जानना चाह रहे होंगे । ...... आधिकारी एक पल के लिए रूक गये ‌‌सबके बीच शोर सा उठ गया था । सब लोग उस कंपनी का नाम जानने के लिए बेताब थे ।

अधिकारी अपनी बात पूरी करते हुए आगे बोले " ठाकुर कंस्ट्रक्शन ......

ये नाम सुनते ही नारायण जी की आंखें हैरानी से बडी हो गयी ।‌ वही गिरिराज के लिए तो मानों किसी ने पैरों तले जमीन खींच ली हो । अधिकारी गिरिराज को देखते हुए बोले " मिस्टर गिरिराज ठाकुर मैंने आपसे मुलाकात में एक वाक्य कहा था कि मैं बिकाऊ नही हूं । आपने कहा दुनिया में सबकुछ बिकता हैं इन्सान भी और उसके जज्बात भी । आप गलत हैं बिकाऊं इन्सान हो सकता हैं उसके जज्बात नही । पहली गलती थी इसलिए माफ़ कर रहख हू , वरना जेल की हवा खिलाने में मुझे ज्यादा वक्त नही लगता । "

गिरिराज की आंखों में गुस्सा था आखिर करे तो करे क्या ? गलती की थी उसने और पकड़ा भी गया । ये बात उसने नारायण जी से भी छुपाई थी । अब तो उनके गुस्से का सामना भी करना पडेगा ।‌‌

अधिकारी ने सबकी ओर देखकर कहा " ये टेंडर रंघुवंशी और राठौर कंस्ट्रक्शन को मिला हैं । ये दोनों ही कंपनियां कोलेबरेट करके ये प्रोजेक्ट कर रही हैं । इनका आइडिया सबको पसंद आया और साथ ही बजट भी । मिस्टर राघव सिंह रघुवंशी एंड मिस्टर अमित सिंह राठौर आप लोगों से गुजारा करूगा की आप आए और पेपर्स पर साइन करके बाकी फारमेलिटिज पूरी करे । "

राघव और अमित दोनों एक साथ खडे हुए । सब लोगों ने उनके लिए तालियां बजाईं सिर्फ नारायण जी और गिरिराज को छोड़कर । अमित और राघव दोनों ने ही पेपर्स पर साइन किए । दीपक बाकी की फारमेलिटिज करने के लिए रूक गया ।

नारायण जी उठकर जाने लगे तो पीछे से राघव ने टोकते हुए कहा " मिस्टर ठाकुर क्या आप बधाई नही देंगे ? "

" बधाई जरूर देंगे लेकिन तुमहरी लाश पर हार चढ़ाकर । " गिरिराज ने इतना ही कहा था की तभी अमित आगे बढ़कर बोला " हिम्मत है तो हाथ लगाकर दिखा । मौत की नींद कौन सोएगा ये मैं तुझे बताता हूं । "

" बचोगे ही तुम इसके साथ रहोगे तो तुम भी बली चढ जाओगे । " गिरिराज ने गुस्से से कहा ।‌।

" उसकी फ़िक्र तुम मत करो । पहली बात मेरी मौत तुम जैसे बुजदिल के हाथों नही लिखी और दूसरी बात जिस दिन मौत आनी होगी अपने आप आ जाएगी । " अमित ने कहा ।

गिरिराज आगे कुछ कहने ही जा रहा था की तभी नारायण जी ने उसे रोक दिया । " गिरिराज जाकर चुपचाप गाडी में बैठो । "

" बाबुजी आप .....?

" कहा न तुमको जाओ चुपचाप गाडी में बैठो । " नारायण जी ने थोडा सख्ती से कहा तो गिरिराज गुस्से से वहां से निकल गया । नारायण जी राघव के सामने आकर बोले " रघुवंशी खानदान के इकलौते वारिश बचे हो कही आखिरी बनकर न रह जाओ । ऐही से समझा रहे हैं संभलकर रहा करो । "

राघव अपनी आंखों से सन ग्लासेस हटाते हुए बोला " उसकी फ़िक्र आप मत कीजिए । रघुवंशियों का सर्वनाश तो रावण भी नही कर पाया फिर आप किस खेत की मूली हैं । "

ये शब्दों का तमाचा था जो बिना हाथ उठाओ गालों पर जोरदार लगा । गिरिराज जी बिना कुछ बोले वहां से चले गए । राघव और अमित उन्हें जाते हुए देख रहे थे । नारायण जी अपनी गाडी के पास आए तो देखा गिरिराज गाडी के बाहर ही खडा था । वो गुस्से से नारायण जी के पास आकर बोला " आप हमक़ो जवाव देने से काहे रोके । हम अभी उसको ..... गिरिराज ने अपनी बात पूरी भी नही की थी की तभी नारायण जी के हाथों गालों पर एक झन्नाटेदार प्रसाद मिला । गिरिराज अपने गाल पर हाथ रख हैरानी से उन्हें देखने लगा ।

" चुप करो नालायक , सब लोगों के सामने हमरी बेइजतती करवाकर चैन नही मिला तुमको । खाली अपना दिमाग चलाना आता हैं । " इतना बोल नारायण जी गाडी के अंदर बैठ गये । गिरिराज को उन्होंने आने के लिए नही कहा बल्कि ड्राइवर को गाडी हवेली ले चलने के लिए कहा । नारायण जी की गाडी

गिरिराज ने आस पास नजरें दौड़ाई तो देखा उसके आदमी सिर झुकाए खडे थे । " लाखन गाडी निकालो । " गिरिराज ने सख्त आवाज में कहा ।

" जी भैया " ये बोल लाखन दूसरी गाडी लेकर आगे बढ गया ।‌‌ गिरिराज ने अंदर बैठते हुए गाडी का दरवाजा जोर से बंद किया ।

इधर अमित राघव से बोला " इन्हें क्यों बर्दाश्त कर रहा हैं राघव ? खत्म क्यों नही कर देता इन लोगों का किस्सा ? ये लोग सुधरने वाले नही हैं । इनकी जिंदगी बख्श कर तुमने ठीक नही किया । "

" हाथ बंधे हैं मेरे अमित और ये बात तू अच्छे से जानता हैं । भाभी मां को दिया वचन नही तोड सकता बस इंतजार कर रहा हू सही वक्त का । जिस दिन पानी सर के ऊपर से गया उस दिन किस को नही छोड़ूंगा ।‌" राघव ने कहा । दोनों बात कर ही रहे थे की तभी दीपक ने आकर कहा " सर सारी फारमेलिटिज हो चुकी हैं । बाकी पेपर्स कलेक्टर साहब ने कल कलेक्ट करने को कहा हैं । "

" ठीक हैं तुम इन्हें लेकर ऑफिस जाओ ।‌। आज मेरी कोई जरूरी मीटिंग नही हैं इसलिए मैं घर जा रहा हूं । "

" जी सर " ये बोल दीपक वहां से चला गया । राघव और अमित हवेली के लिए निकल गए ।

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शाम का वक्त , रघुवंशी मेंशन




करूणा , परी , संध्या , जानकी और राज सब हवेली के पीछे वाले गार्डन में थे । करूणा झूले के पास रखे सोफे पर बैठी हुई थी । बाकी सब वहां आंख मिचौली का गेम खेल रहे थे । इस वक्त संध्या के आंखों पर पट्टी बंधी थी और बाकी सब उसके आस पास घूम रहे थे । कभी परी उसे पीछे से टच करके भाग जाती तो कभी राज उसे पुकारते हुए उसके पास सै निकल जाता । करूणा उन सबको देखकर मुस्कुरा रही थी ।

संध्या ने राज की शर्ट पकड़ ली जिससे वो भाग नही पाया । संध्या अपनी आंखों से पट्टी हटाते हुए बोली " पकड लिया .... पकड लिया......

परी भी तालिया बजाने लगी थी । संध्या राज से बोली " जल्दी आगे आईए राज अब आपकी बारी । " राज ने पट्टी बंधवाई और गेम शूरू हो गया ।

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ठाकुर परिवार की राघव से दुश्मनी बडी पुरानी है । आज उसी दुश्मनी का अंजाम गिरिराज को भुगतना पड़ा । अब तो टेंडर भी हाथ से गया और बाबुजी के हाथों से प्रसाद भी मिल गया । अब वो अपना गुस्सा कैसे निकालेगा ?

ये आंख मिचौली का खेल कौन सा करिश्मा दिखाएगा फिलहाल वो अभी नही बताऊगी । वो जानने के लिए कल का भाग जरूर पढ़ें

प्रेम रत्न धन पायो

( अंजलि झा )


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