Prem Ratan Dhan Payo - 34 in Hindi Fiction Stories by Anjali Jha books and stories PDF | Prem Ratan Dhan Payo - 34

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Prem Ratan Dhan Payo - 34






राघव अपने काम पर लग गया । हालांकि उंगलियां की बोर्ड पर चल रही थी लेकिन नजरें बार बार जानकी की तरफ चली जाया करती । इस वक्त परी जानकी की गोद में बैठी शैतान और जिद्दी गुड़िया लग रही थी । वही जानकी बिल्कुल उसकी मां लग रही थी जो नए नए बहाने कर बच्चे को खाना खिलाती हैं । राघव को हमेशा उन्हें साथ देखकर पासिटिव वाइव्स आती थी , हालांकि पहले परी का उसके करीब जाना उसे जेलेस फील कराता था लेकिन अब वो फीलिग धीरे धीरे खत्म हो रही थी ।

राज उठते हुए बोला " जानू आप यहां फर्स्ट टाइम आई हो चलो मैं आपको ऑफिस घुमाता हूं । " जानकी ने हां में सिर हिला दिया । परी वही राघव के पास रूक गयी । राज और जानकी कैबिन से बाहर चले गए ।

राज जानकी को ऑफिस भी दिखा रहा था और साथ ही बहुत सी बाते भी बता रहा था । " यू नो जानू हमारा ऑफिस भी कुछ ऐसा ही ही । कभी आपको ले चलूगा राठौर कंस्ट्रक्शन घुमाने । " जानकी इस वक्त बीसवें फ्लोर पर थी । ये आई टी डिपार्टमेंट था । यहां भी कयी लोग सिस्टम पर बैठे अपना वर्क कर रहे थे । जानकी को देख वो लोग भी काम छोड़कर उसे देखने लगे । जानकी का ध्यान राज की बातों पर था । सबके जहन में एक ही सवाल था आखिर ये लडकी हैं कौन ? एक लडकी ने आगे बढ़कर राज से कहा " हल्लो राज सर आपने तो यहां आना ही छोड दिया । वैसे आपके साथ ये लडकी कौन हैं ? "

' शी इज माय फ्रेंड ' जानू ...... ओह सॉरी " राज ने ये कहते हुए जानकी की ओर देखा क्योंकि हर बार उसे इंटरडयूस कराते वक्त उसके मूंह से ये शब्द निकल जाता । राज उस लडकी से बोला " शी इज माय फ्रेंड जानकी झा । "

" ओह ' अच्छा लगा इन्हें यहां देखकर । " ये कहते वक्त उस लड़की के चेहरे पर फीकी सी मुस्कुराहट थी । उसकी बातें और फेस एक्स्प्रेसन मैच नही कर रहे थे , मतलब जो भी उसने कहा वो दिल से नही था । राज जानकी को लेकर दूसरी तरफ चल दिया । घूमते घूमते जानकी थक चुकी थी लेकिन वो पूरा आफिस नही घूम पायी । चलते चलते जानकी रूक गयी । राज ने उसके रूकने पर कहा " क्या हुआ जानू आगे चलो ? "

जानकी मासुमियत के साथ बोली " नही राज अब हमारा बिल्कुल भी मन नही कर रहा । हम वापस चलते हैं घर पर भाभी मां भी अकेली होंगी ।‌"

राज ने उसकी बातों पर हामी भरी और दोनों राघव के केबिन में चले आए । " चलो परी अब घर भी जाना हैं । " राज ये बोलते हुए अंदर आया । उसने परी को गोद में उठाया और राघव से बोला " हम चलते हैं भैया घर पर मुलाकात होगी । " राघव को छोड वो तीनों वहां से चले गए ।

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शाम का वक्त




राघव आफिस से घर के लिए निकल चुका था । इस वक्त उसके गार्डस साथ नही थे । ड्राइवर कार ड्राइव कर रहा था और राघव पीछे वाली सीट पर बैठकर लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था । किसे ने हाथ बढ़ाकर गाडी रूकने का इशारा किया तो ड्राइवर ने गाडी रोक दी । गाडी रूकते ही राघव का ध्यान लैपटाप से हटा । इससे पहले वो कुछ पूछता किसी ने पीछे वाले शीशे पर नॉक किया । राघव ने कार का शीशा नीचे किया , तो उसे एक लडकी नज़र आई । ये लड़की और कोई नही बल्कि रागिनी थी । लाल रंग की भडकीली साडी हाथों में ढेर सारे सोने के कंगन ‌‌ , चेहरे पर भडकीला मैक अप , होंठों पर गहरे लाल रंग की लिपिस्टिक । कानों में बडे बडे झूमके । रागिनी चेहरे पर मायूसी लिए बोली " साहब हमारी गाडी खराब हो गई है । कब से इंतजार कर रहे हैं लेकिन कोई मदद के लिए नही रूका । आप हमे आगे तक लिफ्ट दे सकते हैं । बडी मेहरबानी होगी आपकी । "

राघव कुछ पल के लिए खामोश रहा । उसे बाहर एक गाडी दिखाई दी जिसे ड्राइवर चैक कर रहा था । राघव कुछ सोचकर बोला " ठीक हैं अंदर बैठ जाओ । "

" बडी मेहरबानी साहब आपकी । " ये बोलते हुए रागिनी गाडी में आकर बैठ गई । राघव को अजीब लगा । गाडी में बैठने की इजाजत जरूर दी थी , लेकिन वो पीछे वाली सीट पर आकर बैठेगी इसका अंदाजा नही था । अब वो बैठ चुकी थी इसलिए राघव ने कुछ बोलना उचित नहीं समझा । राघव ने ड्राइवर को चलने के लिए कहा , तो ड्राईवर ने गाडी स्टार्ट कर आगे बढा दी । रागिनी का दिल खुशी से झूम रहा था । उसका ख्वाब आज उसके सामने जो था । अफसोस इस बात का था की राघव का ध्यान रागिनी पर बिल्कुल भी नही था । वही रागिनी उसे आकर्षित करने के लिए कंधे से अपना पल्लू सरकाए जा रही थी । रागिनी मन में बोली " अगर ये विश्वामित्र हैं तो मैं भी किसी मेनका से कम नही । वैसे इन्होंने मुझे पहचाना क्यों नही ? पहली बार तो नही मिले हैं हम । हो सकता है लाखों की भीड में मेरा चेहरा भूल गए हो । "

( राम तो सिया के मोह में पागल थे ।‌‌‌ अगर किसी का जादू असर करता , तो कितनो के साथ उनका विवाह हो चुका होता । सुर्पनखा भी तो दिल हार बैठी थी और जोर जबरदस्ती का अंजाम उसे अपनी नाक खोकर भुगतना पडा था । )

राघव अब लैपटाप में बिजी था । न तो रागिनी के कंगन और पायलो के शोर से कोई फर्क पड रहा था और न ही उसकी ओछी हरकतों से । ड्राइवर ने मिरर से उसकी हरकतों को देख लिया था । उसने गाडी चलाते हुए मन में कहा " लगता है ये सही औरत नही हैं या फिर सरकार के बारे में जानती नहीं । अगर उन्हें गुस्सा दिलाया तो जान से भी जा सकती हैं । "

रागिनी अपने बालों में उंगली फेरते हुए राघव से बोली " साहब एक बात कहे आपसे हमनें बहुत सुना हैं आपके बारे में । बहुत मन था आपसे मिलने का लेकिन कभी मुलाकात नही हुई । आज देखिए कितना शुभ दिन हैं , आपसे मुलाकात भी हो गयी और आपने हमारी मदद भी की । " ये बोलते हुए रागिनी ने अपना हाथ राघव के हाथों पर रख दिया ।

राघव सख्ती से बोला " ड्राइवर गाडी रोको । " राघव की एक ऊंची आवाज वहां मौजूद सभी लोगों को कापने पर मजबूर कर गयी । ड्राइवर ने तुरंत गाडी रोक दी । डर के मारे रागिनी ने भी अपने हाथ पीछे खींच लिए थे । राघव ने लैपटॉप बंद किया और गाडी से निकलकर बाहर आया । उसने रागिनी की साइड का दरवाजा खोला और उसकी बांह पकड़ खींचते हुए गाडी से बाहर निकाला ।

" साहब ये क्या कर रहे हैं आप ..... ऐसे क्यों हमे .... रागिनी ने अपनी बात पूरी भी नही की थी , की तभी राघव ने उसे झटके से छोड दिया । रागिनी कुछ कदम पीछे की ओर लडखडाई ज़रूर लेकिन गिरी नही ।

राघव गुस्से से उसे उंगली दिखाते हुए बोला " इनफ हां ...... मजलूम समझकर मदद कर दी इसका मतलब ये तो नही अपनी औकात ही भूल जाओगी ‌‌। तुम्हें क्या लगता हैं ? राघव की नजर के सामने कुछ भी करोगी और उसे पता नही चलेगा । तब से तुम्हारी घटिया हरकत नोटिस कर रहा हू । आखिर क्या करने की कोशिश कर रही थी तुम ? अपने मक़सद को विराम दो । खुद को बेचने का शोख हैं तो बाजार में जाकर बैठ जाओ । मैं तुम्हारा खरीददार नही जिसके सामने तुम ....... राघव ने बात अधूरी छोडी और घृणा से उसे देखने लगा ।

" राघव सिंह रघुवंशी कोई विश्वामित्र नही , जिसे कोई भी मेनका आकर अपने वश में कर लेगी । यहां से अपनी मंजिल तक खुद पैदल चली जाओ । " इतना कहकर राघव गाडी में जाकर में बैठ गया । देखते ही देखते राघव की गाडी रागिनी के आंखों के सामने से ओझल होती चली गई । रागिनी गुस्से से पैर पटकते हुए बोली " राघव सिंह रघुवंशी भूलूंगी नही ये बेइज्जती मैं । जिसके पीछे दुनिया मरती हैं तुमने उसे ठुकराया हैं । अपनी चौखट पर आने के लिए तुम्हें मजबूर न कर दिया तो मेरा नाम भी रागिनी नही । ' इतना कहकर रागिनी ने अपने पर्स से फोन निकाला और एक नंबर डायल किया । दूसरी तरफ से ड्राइवर ने फ़ोन रिसीव किया तो रागिनी बोली " जल्दी से गाडी लेकर आगे आओ । " इतना कहकर उसने फोन काट दिया । कुछ ही देर में उसकी गाडी वहां पहुंच गयी । ये वही गाडी थी जो थोडी देर पहले खराब पडी थी । दरअसल ये सिर्फ एक बहाना था ‌‌। रागिनी को खबर थी की राघव की गाडी इसी रास्ते से होकर गुजरने वाली हैं , इसलिए लिफ्ट का बहाना बनाया ताकी उससे मुलाकात कर सके । रागिनी अपनी गाडी में बैठकर वहां से निकल गयी ।

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रात का वक्त , ठाकुर भवन




गिरिराज और कुंदन छत पर बैठे शराब पी रहे थे । इस वक्त वहां कोई नही था । कुंदन गिलास में शराब उडेलते हुए बोला " आपको नही लगता भैया ई शराब कुछ अधूरी हैं । "

" का मतलब .... ? " गिरिराज ने पूछा ।

" बडे दिन हो गए , अपनी हवेली में कोई नाटक नौटंकी नही हुई । " कुंदन ने कहा ।‌

गिरिराज शराब से भरी गिलास उठाते हुए बोला " समझ गये तुमहरे मन की बात ।‌‌ दो दिन बाद तुम्हारा जन्मदिन है न । शानदार तरीके से मनाएंगे ।‌ हवेली में जश्न भी होगा और छमिया भी आएगी । नाटक नौटंकी सब होगा । "

" सच्ची भैया "

" अरे हम कभी झूठा वादा नही करते । " गिरिराज ने कहा और दोनों ही एक साथ जाम से जाम टकराने लगे । नीचे किचन में पकोड़े तले जा रहे थे । दो महाशय छत पर मेहनत का काम कर रहे थे न उन्हीं के लिए । एक नौकरानी प्लेट में तले पकौड़े लेकर जाने लगी , तो गायत्री ने उसे आवाज देकर रोक दिया । " कहा जा रही हो तुम ? "

" वो बहुरानी ऊपर बडे और छोटे मालिक पकोडे मंगवाए हैं । "

गायत्री उसके हाथों से प्लेट लेकर बोली " तुम नही जाओगी मैं देकर आती हूं । तुम जाकर दूसरा काम देखो । "

" जी बहुरानी " ये बोल वो नौकरानी वापस किचन में चली गई । गायत्री सीढ़ियों की ओर बढ गयी । उसने चलते हुए मन में कहा " अच्छे से जानती हूं इन घर के मर्दों को । राक्षसों की टोली हैं यहां । जितना हो सकता हैं उतना तो बुरा करने से रोक ही सकती है । रावण के कुल में भी एक विभीषण था । भले आज का समाज उसके नाम पर मज़ाक बनाए , लेकिन राम का साथ देकर उसने कुछ गलत नही किया । मजले देवरजी ही एक ऐसे इंसान हैं जो इस पाप की नगरी से दूर हैं । " गायत्री खुद से ये सब कहते हुए छत पर चली आई । उसने टेबल पर प्लेट रखी और जाने लगी । गिरिराज उसे देखते हुए बोला " हम तुमसे तो नही मंगाए थे फिर तुम काहे लेकर आई । "

" आपको पकोड़े चाहिए थे न वो आ चुके हैं । फिर क्या फर्क पड़ता है हम लेकर आए या कोई और । " गायत्री ने बस इतना जवाब दिया था , की तभी गिरिराज ने उसके गालों पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया । " साली हमसे जवान लडाएगी , चुपचाप से निकलो ईहा से वरना और भी बहुत कुछ हो जाएगा । " गायत्री अपने गालों पर हाथ रख आंखों में आसूं लिए भाग गयी ।

कुंदन गिरिराज की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोला " अरे भैया काहे इतना गुस्सा कर रहे हो ? पत्नी हैं ऊं आपकी थोडा प्रेम से पेश आईए । "

गिरिराज वापस है सोफे पर बैठते हुए बोला " अरे प्रेम की भाषा ई सब नही समझती हैं । खाली जुता लात की भाषा समझ में आती है । औरत पैरों की जूती होती हैं और जूती पैर में ही शोभा देती हैं । सर पर रखोगे तो दुनिया पागल कहेगी । "

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आज भी ऐसी सोच वाले लोग इस धरती पर ज़िंदा है जो औरतों को पैरों की जूती समझते हैं लेकिन उनका अंजाम भी वक्त रहते उन्हें भुगतना पड़ता है ।

रागिनी क्या राघव द्वारा की गयी बेइजतती को भूल पाएगी या चलेगी कोई नयी चाल?

प्रेम रत्न धन पायो

( अंजलि झा )


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