Musafir Jayega kaha? - 23 in Hindi Thriller by Saroj Verma books and stories PDF | मुसाफ़िर जाएगा कहाँ?--भाग(२३)

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मुसाफ़िर जाएगा कहाँ?--भाग(२३)

अब जब कृष्णराय जी को ये पता चल चुका था कि उनका दोस्त किशोर अब इस दुनिया में नहीं रहा तो फिर उन्होंने शान्तिनिकेतन क्या इस इलाके से ही जाने का मन बना लिया और वो अपना सामान पैक करके रुकमनी बहनजी के पास पहुँचे और उनसे बोले....
"बहनजी! तो चलता हूँ आपसे इजाज़त लेने आया था,डाक्टर साहब कहाँ है मैं उन्हें भी शुक्रिया कहे देता हूँ",
"ये क्या आप जा रहे हैं"?,रुकमनी बहनजी ने पूछा...
"हाँ!अब जाना ही पड़ेगा",कृष्णराय जी बोले....
"डाक्टर साहब तो नहीं हैं,वे दवाइयांँ लेने शहर गए हैं ,एकाध दिन बाद ही लौटेगें",रुकमनी बहनजी बोलीं...
"तो ठीक है! अब मैं चलता हूँ आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद",कृष्णराय जी बोलें....
"आपको साध्वी जी ने जाने की इजाज़त दे दी",रुकमनी जी ने पूछा...
"हाँ!वो काम भी पूरा हो गया जिसके लिए मैं यहाँ आया था,जब आप सब लोग जानते थे कि किशोर इस दुनिया में अब नहीं रहा तो मुझे पहले ही बता दिया होता सो मैं पहले ही यहाँ से चला जाता,मेरा यहाँ इतना समय ना बर्बाद होता",कृष्णराय जी बोलें...
"ये आपसे किसने कहा कि किशोर बाबू अब इस दुनिया में नहीं हैं",रुकमनी बहनजी ने पूछा...
"जी! साध्वी जी ने ऐसा मुझसे कहा,कल उन्होंने मुझे किशोर की तस्वीर दिखाई ,जिस पर फूलमाला चढ़ी हुई थी",कृष्णराय जी बोले....
"ओह...अब जब उन्होंने कहा है तो यह सच ही होगा",रुकमनी बहनजी बोलीं....
"तो ठीक है अब मैं चलता हूँ,भूल चूक क्षमा कीजिएगा"
और ऐसा कहकर कृष्णराय जी ने रुकमनी बहनजी को नमस्ते की और वहाँ से चले गए और अपने कमरें में आकर वें अपना सामान बाहर निकालने लगे तो साध्वी जी उनके कमरें में आकर बोलीं.....
"जब आप इतने दिन तक यहाँ रुक चुके हैं तो मेरे कहने पर एक दिन और रुक जाइए",
"लेकिन मैं अब यहाँ रुककर करूँगा भी क्या",?,कृष्णराय जी बोलें....
"ये है किशोर जी की डायरी ,आप इसे पढ़ लीजिए ,आपको आपके सभी सवालों के जवाब मिल जाऐगें",
और फिर वो डायरी देकर साध्वी जी वहाँ से चली गईं और फिर कृष्णराय जी ने किशोर की डायरी पढ़ना शुरू किया....
मैं किशोर जोशी, मैं तब नया नया ऊधवगढ़ के इलाके में फारेस्ट आँफिसर बनकर आया था, एक दिन मैं लक्ष्मीनारायण मंदिर के दर्शन करने गया,वहाँ एक बूढ़ी औरत और उनकी बेटी से मेरी मुलाकात हुई,तभी उन बूढ़ी औरत को चक्कर आ गया और वें बेहोश हो गई,अपनी माँ को बेहोश देखकर उनकी बेटी परेशान हो उठी,तब मैंने उनकी बेटी से कहा...
"आप घबराइए नहीं!आपकी माँ को कुछ नहीं होगा",
"तो क्या आप मेरी माँ को मंदिर के बाहर खड़े ताँगे तक पहुँचवा देगें,बहुत मेहरबानी होगी आपकी",उनकी बेटी बोली...
"जी! इसमें मेहरबानी वाली क्या बात है,ये तो मेरा फर्ज है",मैंने उस नवयुवती से कहा...
फिर मैनें उन माँ जी को उनके ताँगे तक पहुँचवाया और तब तक उन माँ जी को होश आ चुका था और उन्होंने मेरा नाम पूछा तो मैनें उन्हें अपना नाम किशोर जोशी बता दिया,तब माँ जी बोलीं...
"मैं ठाकुर साहब की पत्नी कौशकी हूँ और ये मेरी बड़ी बेटी ओजस्वी है",
फिर अक्सर वें माँ बेटी मुझे लक्ष्मीनारायण मंदिर में मिल जाया करती,इसी बीच ठाकुराइन जी की तबियत ज्यादा खराब होने की वजह से वें मंदिर नहीं आ पाती थी,लेकिन ओजस्वी हर शाम मंदिर आती और अक्सर मेरी उससे मुलाकात हो जाया करती,मेरा काम तो यही था इलाके की रखवाली करना और इसके अलावा मेरे पास और कोई काम भी नहीं हुआ करता था इसलिए मैं भी घूमते घामते लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुँच ही जाता था,धीरे धीरे मैं और ओजस्वी एक दूसरे को पसंद करने लगे और एक दिन आखिरकार हमने एकदूसरे को अपने अपने मन की बातें बता दीं,चूँकि अब ओजस्वी हवेली छोड़कर अपनी माँ कौशकी जी के पास शान्तिनिकेतन में रहने लगी थी,इसलिए हम दोनों के मिलने पर किसी को कोई एतराज़ नहीं था,ओजस्वी जब हवेली छोड़कर हमेशा के लिए शान्तिनिकेतन आ गई तो इस बात से ठाकुर वीरभद्र और उनकी छोटी बेटी तेजस्वी इस बात को लेकर ओजस्वी से बहुत नाराज थे....
कहते हैं कि इश्क़ और मुश्क छुपाए नहीं छुपते तो हमारा प्यार भी अब जगजाहिर होने लगा था और इस बात की भनक ठाकुर साहब तक भी पहुँच गई और वें इस बात को लेकर बहुत नाराज हुए लेकिन उन्होंने इस बारें में ना मुझसे आकर कुछ कहा और ना ही ओजस्वी से कुछ कहा,लेकिन तेजस्वी ओजस्वी को समझाने जरूर आई कि....
" दीदी ये सब मत करो,बाबूजी की इज्ज़त सरेआम मत उछालो",
लेकिन ओजस्वी ने तेजस्वी से कुछ नहीं कहा,वो केवल उससे इतना बोली.....
"तेजस्वी!मैं बाबूजी की बहुत इज्ज़त करती हूँ,मैं उनकी मर्जी के बिना ऐसा कोई कदम नहीं उठाऊँगी जिससे उनके मन को ठेस पहुँचे"
"और जो तुम ये सब कर रही हो,उससे तो शायद बाबूजी की इज्जत को चार चाँद लग रहे होगें",तेजस्वी बोली.....
"प्यार करना कोई गुनाह तो नहीं है और फिर किशोर बाबू पढ़े लिखे हैं,नौकरी करते हैं,क्या बुराई है उनमें", ओजस्वी बोली...
"बस यही एक बुराई है कि बाबू जी उन्हें पसंद नहीं करते",तेजस्वी बोली...
"मैं अपने दिल के आगे मजबूर हूँ",ओजस्वी बोली...
"दीदी! इसका अन्जाम अच्छा नहीं होगा",तेजस्वी बोली...
"मैं किसी की परवाह नहीं करती"
और ऐसा कहकर ओजस्वी वहाँ से चली गई,इस बात को लेकर दोनों बहनों के बीच तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया था,एक हवेली जाने को तैयार नहीं थी और दूसरी हवेली छोड़ने को तैयार नहीं थीं,ये बात मुझे खुद ओजस्वी ने बताई थी,फिर मुझे पता चला कि ठाकुर साहब लक्खा और इसके अलावा और भी मजदूरों की मदद से गैरकानूनी तरीके से जंगल के पेड़ कटवाकर भारी दामों में बाहर बेचते हैं और मैंने जब इस विषय में लक्खा से बात की और उससे कहा कि....
"ठाकुर साहब और तुम ऐसा गैरकानूनी काम नहीं कर सकते,मैं वनविभाग वालों को तुम लोगों की कम्पलेन भेजूँगा",
तब लक्खा बोला....
"ओ...आँफिसर ये शिकायत की धमकी किसे देता है,यहाँ तेरे जैसे ना जाने कितने आँफिसर आए और चले गए,कुछ तो इसी धरती में गाड़ दिए गए ,लेकिन कोई भी ठाकुर साहब का बाल भी बाँका ना कर पाया,तू कौन से खेत की मूली है",
"मैं किस खेत की मूली हूँ,ये तुझे बाद में पता चलेगा,मैंने भी तुमलोगों की ये लकड़ियों की तस्करी बंद ना करवा दी तो मेरा नाम भी किशोर जोशी नहीं",
और मैं ऐसा कहकर वहाँ से चला आया और अपने क्वार्टर आ गया और उस समय ओजस्वी हवेली में रहने गई थी क्योंकि ठाकुराइन कौशकी जी ऋषिकेश गईं थीं अपने गुरू से मिलने इसलिए उन्होंने कहा था कि तुम अकेली शान्तिनिकेतन में रहकर क्या करोगी,हवेली चली जाओ और हवेली में ओजस्वी का एक भरोसेमंद नौकर था जो बचपन से ही हवेली में काम करता था,उसका नाम नारायन था और वो ओजस्वी का हमउम्र था और वो मन ही मन ओजस्वी को चाहता भी था लेकिन उसने ओजस्वी से कभी कहा कुछ नहीं था और वो ओजस्वी की हर बात मानता था और अगर ओजस्वी के खिलाफ जमींदार साहब कुछ कहते तो वो फौरन ओजस्वी से आकर कहता था,जमींदार साहब की जीप भी वही चलाया करता था वो उनका ड्राइवर भी था....
इधर लक्खा ने मेरे खिलाफ ठाकुर साहब के कान भरे कि मैं वनविभाग में उनकी शिकायत करने की बात कह रहा हूँ तो वें लक्खा से बोले....
"इस किशोर जोशी ने तो हमारी नाक में दम कर रखा है,पहले ओजस्वी का मामला और अब ये ऐसी धमकी देकर गया है,लक्खा! इसका हमेशा के लिए इलाज कर दो"
और ये बात जब नारायन ने सुनी तो उसने ओजस्वी को बता दी क्योंकि उसे फरक नहीं पड़ता था कि ओजस्वी किससे प्यार करती है,वो तो बस ओजस्वी को दिल से चाहता था और हमेशा उसकी भलाई के बारें ही सोचता था और फिर रातोंरात ओजस्वी ये बात बताने नारायन के साथ जीप में बैठकर मेरे पास आ पहुँची और मुझे सावधान रहने को कहा और तभी उसी वक्त लक्खा भी मुझे मारने आया था जब ओजस्वी यहाँ आई हुई थी और उसने हम दोनों को साथ देख लिया फिर वहाँ से लौट गया और उसने ठाकुर साहब से जाकर कहा कि....
"अब पानी सिर से ऊपर पहुँच चुका है ठाकुर साहब! ओजस्वी मालकिन इतने रात गए किशोर से मिलने गई थीं",
और ये बात सुनकर ठाकुर साहब आगबबूला हो उठे....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....