Wajood - 1 in Hindi Fiction Stories by prashant sharma ashk books and stories PDF | वजूद - 1

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वजूद - 1

प्रशांत शर्मा

भाग 1

शंकर ओ रे शंकर।

हां भाभी, क्या हुआ काहे हमारा नाम पुकारे जा रही हो ?

अरे वक्त देख। तेरे भैया वहां खेत पर खाने की राह देख रहे होंगे और तू यहां खाट तोड़ रहा है।

भाभी हम तो खेत पर जाने के लिए ही यहां बैठे थे आप खाना दो तो हम जाए ना।

हां, पता है तू यहां क्या कर रहा था। चल ले और जल्दी जा। वो भूखे बैठे होंगे।

ओहो... भाभी अब भी इतना प्यार। उनकी इतनी भी चिंता मत किया करो भाभी।

चल भाग बहुत शरारती हो गया है। तेरा ब्याह होने के बाद देखूंगी कि वो तेरा कितना ख्याल रखती है।

अरे भाभी कहां हमारे ब्याह की बात ले आई। हम नहीं करने वाली शादी। हम तो बस आपकी और भैया की सेवा करते रहेंगे पूरी जिंदगी। शादी कर ली तो उसके नखरे अलग से उठाने होंगे।

तू तो मेरा बेटा है। तेरी तो शादी मैं ही कराउंगी। देखना चांद सी दुल्हन लेकर आउंगी अपने बेटे के लिए।

दुल्हन तो बाद में लाना, पहले इस भूखे को कोई खाना खिलाएगा ? शंकर के भाई हरी ने दरवाजा खोलते हुए बरामदे में आते हुए कहा।

अरे भैया आप आ गए,  हम तो खेत पर ही आ रहे थे। ये देखो भाभी ने खाना भी बांध दिया था।

हां, आज खेत पर सारा काम हो गया था तो सोचा घर ही चलता हूं। शाम को एक चक्कर लगा लूंगा। हरी ने शंकर की बात का जवाब देते हुए कहा।

आप क्यों जाएंगे भैया हम चले जाएंगे। सिर्फ पानी ही तो बंद करना है, वो तो हम ही कर आएंगे।

हरी ने कहा- ठीक है तू ही चले जाना पर कमरे की लाइट भी चालू करके आना।

हां भैया जानते हैं। लाइट चालू करना है, पानी बंद करना है, कटी फसल को ढांकना है, सुबह के लिए दीना काका के यहां से सब्जी लाना है। रास्ते में आते समय भाभी की सुबह की पूजा के लिए फूल लाना है। बस इतना सा ही काम है।

देखा मेरा बेटा कितना जिम्मेदार है आप तो बस हमेशा उसे बेकार समझते हैं। शंकर की भाभी कुसुम ने शंकर की तरफदारी करते हुए कहा।

बेकार नहीं समझता हूं। बच्चा है कुछ भूल जाए तो फिर से जाना पड़ेगा इसलिए याद दिला रहा हूं।

अरे भाभी, भैया तो बस हमें याद दिला रहे थे। चलो अब आप ये खाना गर्म कर लो, भैया आप हाथ-पैर धो लो। मैं खाट लगा देता हूं। फिर आप खाना खाकर थोड़ा आराम कर लेना। शंकर ने बात को बदलते हुए कहा।

हरी ने शंकर से पूछा तूने खाना खा लिया ?

भैया आज तक कभी अकेले खाया है जो आज खा लेंगे। हम खेत पर हम दोनों का ही खाना लेकर आ रहे थे। चलो अब आप आ गए हो तो हम तीनों एक साथ ही खाना खाते हैं। शंकर ने कहा।

चल ठीक है। तू खाट बिछा मैं खाना गर्म कर लेती हूं। कुसुम ने शंकर के हाथ से खाने की पोटली लेते हुए कहा।

हां मैं भी हाथ पैर धोकर आता हूं। हरी ने कहा।

वैसे भाभी आज क्या बनाए हो अपने उनके लिए ?

अरे तू फिर शुरू हो गया, मारूंगी। शंकर वहां से भाग जाता है और एक और खाट उठाकर बरामदे में पहले से रखी दूसरी खाट के पास बिछा देता है। बरामदे में ही रखे मटके से वो ठंडा पानी एक जग में भरता है और छोटे स्टूल के साथ उसे खाट के पास रख देता है। फिर वो रसोई में जाता है वहां से तीन गिलास, दो थाली, दो कटोरी और तीन चम्मच लेकर बाहर आ जाता है। इस बीच कुसुम भी खाना गर्म कर लेती है और हरी भी हाथ पैर धोकर एक खाट पर आकर बैठ जाता है। कुसुम खाना लेकर आ जाती है और शंकर थाली में खाना परोसने लगता है। सब एक साथ खाट पर बैठकर खाना खाने लगते हैं।

वैसे तुम सही कह रही हो इसकी भी दुल्हन लाने का समय हो गया है। इसकी दुल्हन घर आ जाएगी तो तुम्हारा भी काम में हाथ बंट जाया करेगा और दिन भर तुम घर पर अकेली भी नहीं रहा करोगी। हरी ने शंकर के लिए बात करते हुए कहा।

कुसुम ने हरी की बात का जवाब देते हुए कहा- आप तो रहने ही दीजिए दुल्हन को लाने की बात। आपको चिंता भी है मेरे बेटे की। इसकी उम्र के गांव के सब लड़कों की शादी को दो साल होने को आए हैं और आपने अब तक मेरे बेटे के लिए कहीं बात भी नहीं चलाई है। इसकी दुल्हन तो मैं ही लाउंगी।

अरे भैया-भाभी आप दोनों फिर शुरू हो गए। हम शादी नहीं करने वाले। हम तो बस आप दोनों के साथ रहेंगे और अपनी जिंदगी आपकी सेवा में काट लेंगे। शंकर ने अपनी बात कही।

नहीं छोटे जिंदगी बहुत बड़ी है इसे अकेले नहीं काटा जा सकता है, हरी ने शंकर को समझाते हुए कहा।

हम अकेले कहां है भैया। आप हो, भाभी है। शंकर ने हरी की बात का जवाब देते हुए कहा।

कुसुम ने शंकर से कहा, ना बेटा जिंदगी का कोई भरोसा है क्या ? क्या पता कब क्या हो जाए, इसलिए मैं तो तुझे ऐसे अकेले नहीं रहने दूंगी। तेरी शादी तो होगी और बहुत ही जल्दी होगी।

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