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वजूद - 10

भाग 10

वक्त की एक करवट ने क्या से क्या कर दिया था। शंकर ना खुद को संभाल पा रहा था और ना ही अपने भैया और भाभी की याद को अपने दिल से निकाल पा रहा था। वो खुद को कोस रहा था कि आखिर वो शहर गया ही क्यों ? वो शहर ना जाता तो वो अपने भैया और भाभी को बचा सकता था। वो होते तो घर फिर से बनाया जा सकता था, पर अब उसके पास अफसोस करने के सिवाय कुछ नहीं था। उस पत्थर पर बैठे शंकर के मन में कई ख्याल थे। दिन ढला, शाम हुई फिर रात भी हो गई। शंकर भारी कदमों से कैंप में लौट आया था। उसके बिस्तर के पास ही उसके खाने की थाली रखी हुई थी। उसने उस थाली को देखा और फिर अपने बिस्तर पर लेट गया। उसे कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला। पांच दिन बीते थे कि वहां कलेक्टर आ गए। उन्होंने सबसे पहले सभी के हाल जाने और अपनों को खो देने वालों को दिलासा दी। उन्होंने बाढ़ में तबाह हुए पूरे गांव का जायजा लिया, इसके बाद उन्होंने अपनी बात रखी-

नदी में आई बाढ़ के कारण पूरा गांव तबाह हो गया है। इसकी जानकारी हमने सरकार तब पहुंचाई थी। यहां टीवी नहीं है, इसलिए शायद आप सभी लोगों को जानकारी ना हो, परंतु सरकार ने गांव में बाढ़ से पीड़ित हर व्यक्ति को 2-2 लाख रूपए की आर्थिक सहायता देने का एलान किया है। कल से यह राशि आप सभी को वितरित की जाएगी, इसलिए आप सभी लोग यहां उपस्थित रहिएगा और आपकी राशि आपको प्रदान कर दी जाएगी।

कलेक्टर की इस बात ने बाढ़ पीड़ित गांवों को कुछ राहत जरूर दी थी, परंतु बाढ़ में उन लोगों ने जो खोया है वो फिर से नहीं मिल सकता था। हालांकि इस राशि से फिर से एक शुरूआत कर सकते थे। कुछ देर के बाद शंकर भी कैंप वापस आता है और प्रधान गोविंदराम उसे कलेक्टर द्वारा कही बता बताते हैं। वे उससे कहते हैं-

कल कहीं मत जाना। सरकार से जो मदद मिल रही है उससे फिर एक नई शुरूआत करना। हां तेरे भैया और भाभी तो वापस नहीं आ सकते पर इन रूपए से तू अपनी जिंदगी को फिर से शुरू कर सकता है। अपना घर बना सकता है, आगे बढ़ सकता है। शंकर सिर्फ हां में सिर हिलाता है और फिर एक जगह जाकर बैठ जाता है। हालांकि वो अपने भैया और भाभी की रोज तलाश कर रहा था, परंतु उसे रोज की निराशा हाथ लगती थी। गांव में आई बाढ़ के कारण कई लोगों की मौत हो चुकी थी। जो पानी बहकर लापता हो गए थे, उन्हें भी मृत ही मान लिया गया था। 15 दिन से ज्यादा हो गए थे और कैंप भी उठने की तैयारी कर रहा था। सरकार की ओर से जारी की गई सहायता राशि मिलने के बाद कैंप भी समाप्त हो जाना था। यह बात शायद शंकर को छोड़कर सभी को पता थी।

अगले दिन प्रशासन की ओर से करीब पांच लोग आए। उन्होंने एक टेबल और कुर्सी मैदान के बीचों बीच लगाई और एक बैग लेकर बैठ गए। उन्होंने गांव के सभी लोगों को एक लाइन में आकर राशि लेने के लिए कह दिया। गांव के लोग भी एक लाइन में आकर खड़े हो गए और कुर्सी पर बैठा एक व्यक्ति जिसका नाम पुकारता वह टेबल के पास पहुंचता, अपने कागज दिखाता, हस्ताक्षर या अंगूठा लगाता और कुर्सी पर बैठा व्यक्ति उसे दो लाख रूपए दे देता और गांव का व्यक्ति उसका अभिवादन कर चला जाता। एक-एक कर सभी गांव के लोग पहुंच जाते हैं और अपनी सहायत राशि के लिए चले जाते हैं सबसे आखिरी में प्रधान गोविंदराम और शंकर का नंबर आता है। शंकर के पास उसकी पहचान का कोई दस्तावेज नहीं था। राशि देने वाला व्यक्ति प्रधान गोविंदराम को राशि देता है। प्रधान उस व्यक्ति से कहता है कि यह शंकर है इसकी राशि भी दे ही दीजिए। वह व्यक्ति कहता है कि यह अपनी पहचान का कोई दस्तावेज दिखाए और राशि ले जाए। इस पर गोविंदराम कहते हैं-

नदी किनारे पर ही इसका घर था, पूरा का पूरा घर ही पानी में बह गया है। इसके भैया-भाभी भी पानी के साथ बह गए हैं और उनका अब तक कोई पता नहीं चला है। तो ये दस्तावेज कहां से लाएगा ?

आप तो प्रधान है, सरकारी काम का तरीका तो आपको पता ही होगा। जब तक यह अपनी पहचान का कोई दस्तावेज नहीं बता देता, हम राशि नहीं दे सकते हैं। हम कैसे मान ले कि यह वहीं शंकर है, जिसका बाढ़ के कारण नुकसान हुआ है। उस व्यक्ति ने प्रधान को कहा।

मैं इस गांव का प्रधान हूं, मैं कह रहा हूं कि यह शंकर ही है। गोविंदराम ने कहा।

उस व्यक्ति ने एक दूसरे व्यक्ति को आवाज लगाकर बुलाया- इसे जानते हो प्रधान जी ?

हां जी ये शंकर है, प्रधान गोविंदराम ने कहा।

अब ये भी शंकर है और ये भी शंकर है। आप दोनों ही शंकर को जानते हो, तो आप बताइए मैं किस शंकर को यह रकम दे दूं। क्योंकि आप तो दोनों ही शंकर को जानते हो और किसी को भी राशि देने के लिए कह सकते हो।

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