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वजूद - 7

भाग 7

अरे भागवान बारिश यहां हो रही है जरूरी तो नहीं कि शहर में भी हो रही हो। अब तुम चिंता मत करो आराम से सो जाओ कल शाम तक तो वो घर आ जाएगा।

हां आपका क्या ? आप क्यों चिंता करोगे मेरा बेटा है वो। दिनभर भाभी, भाभी करके आगे पीछे घूमता रहता है।

हां बेटे की इतनी चिंता। चलो अब आराम से सो जाओ। शाम तक आ जाएगा तुम्हारा बेटा। फिर दोनों सो जाते हैं।

उनके सोने के कुछ ही देर बाद अचानक बारिशा शुरू हो जाती है। बारिशा लगातार तेज होती जाती है। निचले स्तर पर गांव होने के कारण आसपास के क्षेत्रों में होने वाली बारिशा का पानी भी गांव के पास से निकलने वाली नदी में आकर ही मिलता था। बारिश तेज, तेज और तेज होती चली जाती है। इधर नदी का जल स्तर लगातार बढ़ता जाता है और फिर नदी का पानी गांव की ओर बढ़ने लगता है। रात के अंधेरे में ही नदी में बाढ़ आ जाती है और पूरा गांव पानी-पानी हो जाता है। गांव में सोते हुए लोगों पर कुदरत का कहर बरस पड़ता है। नदी की बाढ़ में गांव में बने कच्चे घर बह जाते हैं। कई लोग पानी के साथ बह जाते हैं। पूरा गांव इधर-उधर भाग रहा था। पानी से बचने के लिए जिसे जो जगह मिल रही थी वहां वो खुद को बचाने का प्रयास कर रहा था, पर शायद कुदरत आज इस गांव पर कोई रहम करने वाली थी। गांव में लगातार पानी बढ़ता जा रहा था। छोटे घरों के साथ अब बड़े और पक्के मकान भी पानी में डूबने की कगार पर आ गए थे। रात के अंधेरे में बस त्राही-त्राही के अलावा कुछ नहीं था। सुबह की शुरूआत के साथ बारिशा भी धीमे होते हुए लगभग बंद हो गई थी।

जब तक गांव में उजाला होता तब गांव का हर घर अंधेरे में डूब चुका था। कल तक पूरी तरह से बसा हुआ गांव सिर्फ एक ही रात में पूरी तरह से उजड़ चुका था। चारों ओर सिर्फ पानी था, लोगों की चीख पुकार थी, अपनों के बिछड़ने के गम के आंसू और अपनी आंखों के सामने अपना उजड़ा हुआ आशियाना लोगों की रूह कंपा रहा था। पानी की तबाही में किसी के पास कुछ बचाने के लिए नहीं था। चारों ओर सिर्फ तबाही नजर आ रही थी। करीब 500 लोगों में सें गिने चुने लोग ही अब गांव में बचे थे। बच्चे, बुजुर्ग, पालतू जानवर सब पानी में बह चुके थे। कुछ तो ऐसे भी थे जो अपने घर के साथ ही काल के ग्रास बन चुके थे और कुछ ऐसे थे, जिनके टूटे घर उनके होने की गवाही तो दे रहे थे परंतु उस टूटे घर में वो नहीं थे, जिनका यह घर हुआ करता था। पानी की ऐसी तबाही की कल्पना इस गांव के किसी भी वाशिंदे ने कभी नहीं की होगी। कल की रात जो इस गांव पर गुजरी है उसको सोचकर गांव में बचा हर व्यक्ति एक बार को कांप जाता है। पानी की तबाही में बचे लोग इधर-उधर अपनों को खोज रहे थे, परंतु उन्हें अपने नहीं मिल रहे थे। एक रात ने इस पूरे गांव को खत्म कर दिया था। मदद के लिए प्रशासन की ओर से अब तक कोई पहल नहीं हुई थी, क्योंकि हो सकता है कि प्रशासन अब तक इस गांव की तबाही से अंजान हो। फिर दूसरा यह जिस जगह यह गांव था वहां कोई मदद आसानी से पहुंच नहीं सकती थी।

खैर प्रशासन तक गांव में पानी की तबाही की सूचना पहुंच गई थी और प्रशासन द्वारा गांव में हर संभव मदद पहुंचाने के प्रयास शुरू कर दिए गए थे। गांव में बचे लोगों को हेलीकॉप्टर की मदद से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा रहा था। सेना के जवान भी मुस्तैदी से गांव के लोगों को बचाने में जुटे हुए थे। गांव के लोग भी घायलों को बाहर लाने में सेना के जवानों की मदद कर रहे थे। जिसके पास जो बचा था वो उसे समटने में लगा था, परंतु बहुत ही कम ऐसे लोग होंगे, जिनके पास कुछ बचा था। जब पक्के मकान पानी में बह गए थे तो कच्चे मकानों का टिकना तो नामुमकिन ही था। गांव में यूं पांच सौ लोग रहते थे और करीब 350 मकान थे। इनमें से करीब 200 मकान पूरी तरह से पानी में बह चुके थे और बचे 150 में से कोई तीस या चालीस मकान ऐसे थे जो कुछ हद तक सुरक्षित थे, बाकि मकान पानी की बाढ़ में पूरी तरह से बर्बाद नहीं हुए थे, परंतु घर के अंदर का सारा सामान पानी में बह चुका था। ना सिर्फ सामान बल्कि कई लोग पानी के साथ बहकर पता नहीं कहां और कितनी दूर चले गए थे।

सुखराम काका, सुखिया काकी, प्रधान गोविंद राम, शंकर सहित गांव के कई लोगों के घर के पूरी तरह से तबाह हो चुके थे। इन घरों में रहने वाले लोग या तो मौत के आगोश में चले गए थे या फिर उनका कुछ पता नहीं था कि वे जिंदा भी है या पानी के रूप में आई मौत उन्हें भी लील चुकी है।

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